नामुमकिन इश्क - एपिसोड 11 kajal jha द्वारा प्रेम कथाएँ में हिंदी पीडीएफ

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नामुमकिन इश्क - एपिसोड 11

बस धीरे-धीरे कॉलेज के मुख्य गेट से बाहर निकल चुकी थी। खिड़कियों के बाहर लखनऊ की सड़कें पीछे छूटती जा रही थीं, जबकि बस के अंदर हँसी-मज़ाक और बातचीत का माहौल था।


कोई गाने सुन रहा था, कोई सेल्फी ले रहा था, तो कोई आने वाले एक महीने की ट्रेनिंग को लेकर उत्साहित था।


अर्जुन हमेशा की तरह सबसे अलग था।


वह बस की सबसे आख़िरी सीट पर, खिड़की के पास जाकर बैठ गया। एक हाथ खिड़की पर टिका था और दूसरे हाथ में मोबाइल। कभी वह किसी मेडिकल नोट्स को देख रहा था, तो कभी बाहर गुजरते हुए नज़ारों पर उसकी नज़र चली जाती।


उधर कुछ सीट आगे बैठी आयत की नज़र अनजाने में अर्जुन पर चली गई।


उसने देखा कि पूरे बस में सबसे ज़्यादा शांत अगर कोई था, तो वह अर्जुन था।


न जाने क्यों...


उसकी नज़र बार-बार उसी तरफ़ चली जाती।


उसी समय अर्जुन ने भी जैसे महसूस किया कि कोई उसे देख रहा है।


उसने धीरे से सिर उठाया।


दोनों की नज़रें मिलीं...


बस कुछ पल के लिए समय जैसे ठहर-सा गया।


न अर्जुन कुछ बोला...


न आयत।


बस दोनों एक-दूसरे को देखते रहे।


अगले ही पल आयत ने झेंपकर अपनी नज़रें नीचे कर लीं।


उसके होंठों पर हल्की-सी मुस्कान आ गई।


तभी उसके बगल में बैठी रीवा ने सब देख लिया।


उसने धीरे से आयत को कुहनी मारी।


"क्या बात है... चोरी-चोरी किसी को देखा जा रहा है?"


आयत चौंक गई।


"क... क्या?"


रीवा मुस्कुराते हुए बोली,


"अरे, हमें भी देखने दिया करो। अकेले-अकेले मुस्कुरा रही हो।"


आयत ने बनावटी नाराज़गी दिखाई।


"तुम भी ना... कुछ भी सोचती रहती हो।"


"अच्छा...? तो फिर अभी किसे देख रही थीं?"


आयत के पास कोई जवाब नहीं था।


उसने तुरंत अपना चेहरा खिड़की की तरफ़ घुमा लिया।


रीवा बस मुस्कुराकर रह गई।


उधर आख़िरी सीट पर बैठा अर्जुन भी हल्का-सा मुस्कुरा दिया।


उसे खुद समझ नहीं आ रहा था कि आयत की तरफ़ उसका ध्यान बार-बार क्यों चला जाता है।


तभी बस के बीच वाले हिस्से से एक जानी-पहचानी आवाज़ आई।


"एक्सक्यूज़ मी..."


अर्जुन ने सिर उठाया।


उसके सामने सनाया खन्ना खड़ी थी।


महँगे ब्रांड के कपड़े, आत्मविश्वास से भरा अंदाज़ और चेहरे पर वही शरारती मुस्कान।


"अगर तुम्हें कोई दिक्कत न हो... तो मैं यहाँ बैठ जाऊँ?"


अर्जुन ने सामान्य स्वर में कहा,


"सीट खाली है... बैठ जाइए।"


सनाया उसके बगल वाली सीट पर बैठ गई।


कुछ पल तक दोनों के बीच ख़ामोशी रही।


फिर सनाया मुस्कुराकर बोली,


"तुम हमेशा इतने सीरियस रहते हो क्या?"


अर्जुन ने मोबाइल बंद करते हुए कहा,


"नहीं... बस बेवजह ज़्यादा बोलने की आदत नहीं है।"


"लेकिन लोग कहते हैं तुम पूरे कॉलेज के हीरो हो।"


अर्जुन हँस पड़ा।


"लोग बहुत कुछ कहते हैं।"


सनाया ने हल्के मज़ाक में कहा,


"वैसे एक बात बोलूँ?"


"हूँ?"


"तुम पर ब्लैक जैकेट काफ़ी अच्छी लगती है।"


अर्जुन मुस्कुराया।


"थैंक यू।"


"बस... इतना ही? कोई कॉम्प्लिमेंट वापस नहीं?"


अर्जुन ने हँसते हुए जवाब दिया,


"कॉम्प्लिमेंट दिल से दिया जाए तो अच्छा लगता है... सिर्फ़ औपचारिकता निभाने के लिए नहीं।"


सनाया कुछ पल उसे देखती रह गई।


"इंटरेस्टिंग..."


दूर बैठा करण यह सब देख रहा था।


न जाने क्यों...


सनाया को अर्जुन के साथ हँसते-बात करते देखकर उसके मन में हल्की-सी कसक उठी।


वह खुद भी नहीं समझ पा रहा था कि ऐसा क्यों महसूस हो रहा है।


उसने नज़रें दूसरी तरफ़ कर लीं।


कुछ देर बाद सनाया उठी।


"ठीक है मिस्टर अर्जुन वशिष्ठ... फिर हॉस्पिटल में मिलते हैं।"


"ज़रूर।"


वह मुस्कुराती हुई आगे की सीट पर जाकर बैठ गई।


जाते-जाते उसकी नज़र अचानक करण से मिली।


दोनों कुछ सेकंड तक एक-दूसरे को देखते रहे।


करण ने तुरंत अपनी नज़रें फेर लीं और बाहर देखने लगा।


सनाया ने मन ही मन सोचा,


"ये वही लड़का है... जिससे मेरी हर मुलाक़ात किसी न किसी बहस से शुरू होती है। कितना अजीब इंसान है..."


वहीं करण के मन में भी एक अलग ही उथल-पुथल चल रही थी।


"पता नहीं क्यों... जब भी इसे किसी और के साथ देखता हूँ, अच्छा नहीं लगता।"


लेकिन उसने उन ख़यालों को वहीं दबा दिया।


बस अपनी रफ़्तार से सिटी सुपर स्पेशियलिटी हॉस्पिटल की तरफ़ बढ़ती रही...


और किसी को अंदाज़ा भी नहीं था कि यह सफ़र उनकी ज़िंदगी की दिशा बदलने वाला है।