एपिसोड 2: पहली टक्कर
सुबह के लगभग नौ बजे थे।
लखनऊ की सड़कें रोज़ की तरह चहल-पहल से भरी हुई थीं। कोई अपने दफ़्तर जा रहा था, कोई दुकान खोल रहा था, तो कोई कॉलेज की ओर भाग रहा था।
उधर अर्जुन वशिष्ठ अपनी काली बाइक पर तेज़ रफ़्तार से मेडिकल कॉलेज की ओर बढ़ रहा था। गले में रुद्राक्ष की माला, दाहिने हाथ में लाल कलेवा, हल्की दाढ़ी और चेहरे पर वही बेपरवाह अंदाज़।
कॉलेज के गेट पर पहुँचते ही कई छात्रों की नज़र उस पर पड़ी।
"भाई... अर्जुन आ गया।"
"आज फिर किसी की शामत आने वाली है।"
कुछ लड़कियाँ मुस्कुराकर उसे देखने लगीं, लेकिन अर्जुन ने हमेशा की तरह किसी की ओर ध्यान नहीं दिया। उसने बाइक पार्क की और बैग कंधे पर डालकर कॉलेज के अंदर जाने लगा।
तभी...
कॉलेज के पीछे वाले रास्ते से एक लड़की की घबराई हुई आवाज़ सुनाई दी।
"प्लीज़... मुझे जाने दीजिए..."
अर्जुन के कदम वहीं रुक गए।
उसने आवाज़ की दिशा में देखा।
चार लड़के एक लड़की का रास्ता रोककर खड़े थे। उनमें से एक उसकी किताबें छीनकर हँस रहा था।
"इतना घबराती क्यों हो? दोस्ती ही तो करनी है..."
लड़की की आँखों में डर साफ़ दिखाई दे रहा था।
अर्जुन ने गहरी साँस ली और धीरे-धीरे उनकी ओर बढ़ा।
"किताब नीचे रख दो।"
चारों लड़कों ने मुड़कर देखा।
उनमें से एक हँसते हुए बोला, "क्यों? तू कौन होता है बीच में बोलने वाला?"
अर्जुन ने बिना गुस्सा दिखाए कहा,
"आख़िरी बार कह रहा हूँ... किताब नीचे रखो और यहाँ से चले जाओ।"
दूसरा लड़का हँस पड़ा।
"नहीं रखेंगे... जो करना है कर ले।"
बस...
इतना सुनना था कि अर्जुन ने एक ही मुक्के में उसे ज़मीन पर गिरा दिया।
बाकी तीन लड़के उसकी तरफ़ दौड़े।
एक ने पीछे से पकड़ने की कोशिश की, लेकिन अर्जुन ने उसकी कलाई पकड़कर ऐसा मोड़ा कि वह दर्द से चिल्ला उठा।
दूसरे को पेट में घूँसा मारा।
तीसरे को धक्का देकर दीवार से टकरा दिया।
कुछ ही सेकंड में चारों लड़के ज़मीन पर पड़े कराह रहे थे।
आसपास खड़े छात्र यह सब देखकर सन्न रह गए।
अर्जुन ने उनमें से एक का कॉलर पकड़कर कहा,
"कॉलेज पढ़ने आते हो या लड़कियों को परेशान करने? अगली बार किसी भी लड़की की तरफ़ ग़लत नज़र उठी... तो हाथ नहीं, घमंड टूटेगा।"
चारों डर के मारे बिना कुछ बोले वहाँ से भाग गए।
लड़की की साँसें अभी भी तेज़ चल रही थीं।
उसने काँपते हुए अपनी किताबें उठाईं।
"थ... थैंक यू..."
अर्जुन ने किताबें उसके हाथ में दीं और शांत स्वर में बोला,
"थैंक यू मुझे नहीं... आगे से अपने लिए आवाज़ उठाना सीखो। अगर कभी कोई परेशानी हो, चुप मत रहना।"
इतना कहकर वह बिना रुके वहाँ से चला गया।
लड़की बस उसे जाती हुई देखती रह गई।
कॉलेज के कई छात्र आपस में बातें करने लगे।
"यार... अर्जुन जैसा गुस्सा किसी में नहीं देखा।"
"लेकिन उसने कभी किसी बेगुनाह पर हाथ नहीं उठाया।"
"इसीलिए तो पूरा लखनऊ उसे जानता है।"
अर्जुन सीढ़ियाँ चढ़कर अपनी क्लास की तरफ़ बढ़ ही रहा था कि उसी समय कॉलेज के मुख्य गेट पर एक सफ़ेद कार आकर रुकी।
कार का दरवाज़ा खुला।
धीरे-धीरे एक लड़की बाहर उतरी।
हल्के आसमानी रंग का सूट, सिर पर सलीके से रखा दुपट्टा, हाथ में किताबें और चेहरे पर सादगी।
उसकी आँखों में झिझक थी, लेकिन उसकी शख्सियत में एक अलग ही नूर था।
वह पहली बार इस कॉलेज में आई थी।
आसपास खड़े कई छात्र अनायास उसकी ओर देखने लगे।
वह कॉलेज की इमारत को देखती हुई आगे बढ़ी।
उसे रास्तों का अंदाज़ा नहीं था।
जल्दी-जल्दी में वह सामने से आ रहे अर्जुन को देख नहीं पाई।
धड़ाम...
दोनों की हल्की-सी टक्कर हो गई।
उसके हाथ से किताबें नीचे गिर गईं।
"सॉरी..."
दोनों के मुँह से एक साथ यही शब्द निकला।
अर्जुन झुककर किताबें उठाने लगा।
लड़की भी झुकी।
एक ही किताब पर दोनों का हाथ एक साथ पड़ा।
दोनों की नज़रें मिलीं।
कुछ पल के लिए जैसे आसपास की सारी आवाज़ें थम गईं।
अर्जुन, जो आज तक किसी लड़की की ओर दूसरी बार देखकर भी नहीं रुका था...
पहली बार किसी चेहरे पर ठहर गया।
और वह अनजान लड़की...
वह भी अर्जुन की गहरी आँखों में कुछ पल के लिए खो-सी गई।
दोनों बिना कुछ कहे एक-दूसरे को देखते रहे।
उन्हें ज़रा भी अंदाज़ा नहीं था...
कि यह मामूली-सी टक्कर उनकी ज़िंदगी की सबसे बड़ी कहानी की शुरुआत बनने वाली है।