नामुमकिन इश्क - एपिसोड 20 kajal jha द्वारा प्रेम कथाएँ में हिंदी पीडीएफ

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नामुमकिन इश्क - एपिसोड 20

एपिसोड 20– पहली नाइट ड्यूटी

 
शाम के करीब पाँच बज चुके थे।
 
सिटी सुपर स्पेशियलिटी हॉस्पिटल में पूरे दिन की भागदौड़ के बाद भी किसी को आराम नहीं था। इमरजेंसी वार्ड के बाहर मरीजों की आवाजाही लगातार बनी हुई थी।
 
सभी ट्रेनी स्टूडेंट्स कॉन्फ्रेंस रूम में बैठे थे।
 
तभी डॉ. मीरा सक्सेना अंदर आईं।
 
"स्टूडेंट्स... आज से आपकी ट्रेनिंग का अगला फेज़ शुरू होने वाला है।"
 
सभी एक-दूसरे का चेहरा देखने लगे।
 
डॉ. मीरा ने आगे कहा,
 
"आज रात आप सभी की पहली नाइट ड्यूटी होगी।"
 
यह सुनते ही पूरी क्लास में हलचल मच गई।
 
रीवा ने धीरे से आयत के कान में कहा,
 
"पहली ही नाइट ड्यूटी... मुझे तो थोड़ा डर लग रहा है।"
 
आयत भी मुस्कुरा दी।
 
"मुझे भी..."
 
डॉ. मीरा ने हाथ उठाकर सबको शांत किया।
 
"घबराने की ज़रूरत नहीं है। आप लोगों के साथ सीनियर डॉक्टर और नर्सें भी रहेंगी। लेकिन याद रखिए, आज की ड्यूटी बहुत महत्वपूर्ण है।"
 
उन्होंने एक फाइल खोली।
 
"टीम लीडर अर्जुन वशिष्ठ..."
 
"यस मैम।"
 
"आज पूरी टीम की जिम्मेदारी तुम्हारे ऊपर होगी। अगर किसी को कोई परेशानी हो तो सबसे पहले तुम उसे संभालोगे।"
 
"जी मैम।"
 
अर्जुन की आवाज़ हमेशा की तरह शांत थी।
 
उधर रोहन यह सब देखकर मन ही मन बोला,
 
"हर बार वही... हर जिम्मेदारी उसी को क्यों मिलती है?"
 
डॉ. मीरा ने सभी को अलग-अलग वार्ड में बाँटना शुरू किया।
 
"अर्जुन, आयत और रीवा... तुम लोग जनरल वार्ड में रहोगे।"
 
"रोहन, समर और बाकी टीम... इमरजेंसी ऑब्ज़र्वेशन यूनिट।"
 
"करण और सनाया... पीडियाट्रिक वार्ड।"
 
यह सुनकर करण ने एक नज़र सनाया की तरफ़ देखा।
 
सनाया ने भी उसकी तरफ़ देखा, लेकिन बिना कुछ बोले दूसरी तरफ़ देखने लगी।
 
करण मन ही मन मुस्कुरा दिया।
 
"कम से कम आज पूरी ड्यूटी साथ तो रहेगी..."
 
रात के आठ बज चुके थे।
 
जनरल वार्ड में मरीज आराम कर रहे थे।
 
अर्जुन एक-एक बेड पर जाकर मरीजों का हाल पूछ रहा था।
 
आयत उसके साथ नोट्स बना रही थी।
 
एक बुज़ुर्ग महिला ने अर्जुन का हाथ पकड़ लिया।
 
"बेटा..."
 
"जी दादी?"
 
"तुम डॉक्टर हो या अभी पढ़ रहे हो?"
 
अर्जुन मुस्कुराया।
 
"अभी सीख रहा हूँ, दादी।"
 
महिला ने प्यार से उसके सिर पर हाथ फेर दिया।
 
"भगवान तुम्हें बहुत बड़ा डॉक्टर बनाए। तुम्हारे चेहरे पर अपनापन दिखता है।"
 
अर्जुन हल्का-सा मुस्कुरा दिया।
 
आयत चुपचाप यह सब देख रही थी।
 
उसने धीरे से कहा,
 
"आप सबसे इतनी आसानी से घुल-मिल जाते हैं।"
 
अर्जुन ने उसकी तरफ़ देखा।
 
"मरीज को दवा से पहले भरोसे की ज़रूरत होती है। अगर उसे लगे कि डॉक्टर उसकी बात सुन रहा है, तो उसका आधा डर वैसे ही खत्म हो जाता है।"
 
आयत कुछ पल तक उसे देखती रही।
 
"शायद... यही वजह है कि सब इनकी इतनी इज़्ज़त करते हैं।"
 
उधर पीडियाट्रिक वार्ड...
 
एक छोटा बच्चा लगातार रो रहा था।
 
नर्स उसे चुप कराने की कोशिश कर रही थी।
 
सनाया उसके पास गई।
 
"हाय चैंपियन..."
 
लेकिन बच्चा फिर भी नहीं माना।
 
करण पास आया।
 
उसने जेब से एक छोटी-सी रंगीन सीटी निकाली।
 
"देखो... ये जादू है।"
 
उसने सीटी बजाई।
 
बच्चा रोना भूलकर हँसने लगा।
 
सनाया हैरानी से करण को देखने लगी।
 
"तुम्हें बच्चों को संभालना भी आता है?"
 
करण मुस्कुराया।
 
"मेरी छोटी बहन है... उसी के साथ खेल-खेलकर सीख गया।"
 
सनाया पहली बार उसे बिना गुस्से के देख रही थी।
 
उसके चेहरे पर हल्की-सी मुस्कान आ गई।
 
"इतने भी बुरे नहीं हो... जितना मैं समझती थी।"
 
करण हँस पड़ा।
 
"थैंक्यू... इसे मैं तारीफ़ समझ लूँ?"
 
सनाया ने कुछ नहीं कहा।
 
लेकिन उसके चेहरे की मुस्कान ही जवाब थी।
 
रात के करीब साढ़े दस बजे...
 
डॉ. मीरा अचानक सभी वार्ड का निरीक्षण करने निकलीं।
 
उन्होंने देखा कि अर्जुन की पूरी टीम पूरी लगन से काम कर रही थी।
 
डॉ. मीरा ने संतोष से सिर हिलाया।
 
"वेरी गुड।"
 
फिर उन्होंने रोहन की टीम की तरफ़ देखा।
 
रोहन अपना काम तो कर रहा था, लेकिन उसका ध्यान बार-बार अर्जुन की तरफ़ जा रहा था।
 
डॉ. मीरा ने सख़्त आवाज़ में कहा,
 
"रोहन!"
 
"जी मैम।"
 
"ड्यूटी के समय ध्यान सिर्फ़ मरीजों पर होना चाहिए, किसी और पर नहीं।"
 
"सॉरी मैम।"
 
रोहन ने सिर झुका लिया।
 
लेकिन उसके मन में जलन और बढ़ गई।
 
रात के बारह बज चुके थे।
 
हॉस्पिटल की कैंटीन अभी भी खुली थी।
 
अर्जुन पानी लेने गया।
 
वहीं आयत भी कॉफी लेने पहुँची।
 
दोनों एक-दूसरे को देखकर मुस्कुरा दिए।
 
कुछ पल तक दोनों के बीच खामोशी रही।
 
फिर अर्जुन बोला,
 
"बहुत थक गई होंगी?"
 
आयत हल्का-सा हँसी।
 
"थोड़ी... लेकिन मज़ा भी आ रहा है।"
 
"पहली नाइट ड्यूटी हमेशा याद रहती है।"
 
"और आपकी?"
 
अर्जुन कुछ पल चुप रहा।
 
"मेरी भी... क्योंकि उसी दिन मुझे पहली बार एहसास हुआ था कि डॉक्टर होना सिर्फ़ एक पेशा नहीं... एक जिम्मेदारी है।"
 
आयत उसकी बातें बड़े ध्यान से सुन रही थी।
 
उसी समय दूर खड़ा रोहन उन दोनों को साथ देखकर फिर बेचैन हो उठा।
 
उसने मन ही मन कहा,
 
"इन दोनों के बीच की दूरी हर दिन कम होती जा रही है... अगर इन्हें अभी नहीं रोका, तो फिर कभी नहीं रोक पाऊँगा।"
 
उसकी आँखों में फिर एक नई योजना जन्म ले चुकी थी...
 
और उसे ज़रा भी अंदाज़ा नहीं था कि आने वाले दिनों में यह मुकाबला सिर्फ़ पढ़ाई का नहीं, बल्कि भरोसे, दोस्ती और प्यार का भी होने वाला था।
 
क्रमशः...