बस अपनी रफ़्तार से लखनऊ की सड़कों पर दौड़ रही थी। खिड़की से आती ठंडी हवा पूरे माहौल को सुकून दे रही थी।
सनाया के दूसरी सीट पर चले जाने के बाद अर्जुन फिर से खिड़की के बाहर देखने लगा। लेकिन कुछ ही पल बाद उसे महसूस हुआ कि कोई उसकी तरफ़ बढ़ रहा है।
उसने सिर घुमाया।
सामने आयत खड़ी थी।
उसके चेहरे पर हल्की-सी झिझक थी, जैसे कुछ कहना चाहती हो लेकिन हिम्मत नहीं जुटा पा रही हो।
अर्जुन मुस्कुराया।
"जी... कुछ कहना था?"
आयत ने धीरे से कहा,
"वो... अगर आपको बुरा न लगे तो... मैं दो मिनट यहाँ बैठ सकती हूँ?"
अर्जुन ने बगल वाली सीट की तरफ़ इशारा किया।
"ज़रूर।"
आयत बैठ गई।
दोनों के बीच कुछ पल तक ख़ामोशी छाई रही।
आख़िरकार आयत ने ही बात शुरू की।
"सब आपको टीम लीडर बनने की बधाई दे रहे थे... मैंने भी सोचा था कहूँ... लेकिन मौका ही नहीं मिला।"
अर्जुन हल्का-सा मुस्कुराया।
"थैंक यू।"
"सच कहूँ... मुझे बिल्कुल भी हैरानी नहीं हुई। मुझे पहले से लग रहा था कि टीम लीडर आप ही बनेंगे।"
अर्जुन ने उसकी तरफ़ देखा।
"इतना भरोसा?"
आयत मुस्कुराई।
"जिस इंसान को पूरा कॉलेज इज़्ज़त देता हो... वो वजह से ही देता होगा।"
अर्जुन कुछ पल चुप रहा।
फिर बोला,
"इज़्ज़त कमाने में बहुत समय लगता है... और खोने में सिर्फ़ एक गलती। इसलिए कोशिश करता हूँ कि किसी का भरोसा न टूटे।"
आयत उसकी बात सुनती रह गई।
उसे महसूस हुआ कि लोगों ने अर्जुन के बारे में जितना बताया था, वह उससे कहीं ज़्यादा समझदार है।
"वैसे..." अर्जुन ने पूछा, "पहली बार घर से एक महीने दूर रहोगी?"
आयत ने हल्की-सी साँस ली।
"हाँ... थोड़ा डर लग रहा है।"
"डरने की ज़रूरत नहीं है। हम सब साथ हैं।"
बस इतना-सा वाक्य था...
लेकिन न जाने क्यों, आयत के चेहरे पर मुस्कान लौट आई।
"शुक्रिया..."
"थैंक यू मत कहा कीजिए... टीम में हैं, एक-दूसरे की मदद करना तो बनता है।"
दोनों हल्के से मुस्कुरा दिए।
उसी समय सामने की सीट से सनाया ने यह दृश्य देख लिया।
वह अपनी सीट से उठी और पानी लेने के बहाने पीछे आई।
लेकिन लौटते समय बस के हल्के झटके से उसका संतुलन बिगड़ गया।
सीधे जाकर करण से टकरा गई।
करण ने तुरंत उसे संभाल लिया।
"संभलकर..."
सनाया ने खुद को सँभालते ही भौंहें चढ़ाईं।
"फिर तुम?"
करण हँस पड़ा।
"इस बार मेरी गलती नहीं थी। बस ने ब्रेक लगाया था।"
"हाँ-हाँ... बहाने तो अच्छे बना लेते हो।"
"अगर यक़ीन नहीं है तो ड्राइवर से पूछ लो।"
सनाया होंठ दबाकर मुस्कुराई, लेकिन अगले ही पल फिर अकड़कर बोली,
"ज़्यादा स्मार्ट बनने की कोशिश मत करना।"
करण ने भी मुस्कुराते हुए जवाब दिया,
"कोशिश नहीं करता... मैं हूँ ही।"
"ओह! अपने बारे में इतनी बड़ी-बड़ी बातें?"
"सच बोलने में क्या बुराई है?"
सनाया ने आँखें तरेरीं।
"एक दिन तुम्हारा ये घमंड ज़रूर तोड़ूँगी।"
करण हँसते हुए बोला,
"उस दिन का इंतज़ार रहेगा, मिस सनाया खन्ना।"
दोनों अपनी-अपनी सीट पर लौट गए।
लेकिन इस बार उनके चेहरे पर गुस्से से ज़्यादा हल्की-सी मुस्कान थी।
उधर खिड़की के पास बैठे अर्जुन और आयत फिर से बाहर देखने लगे।
दोनों कुछ नहीं बोल रहे थे...
फिर भी ऐसा लग रहा था जैसे उनके बीच बिना शब्दों के एक नई शुरुआत हो चुकी हो।
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