दुरिया Bhagwati Prasad Dwivedi द्वारा लघुकथा में हिंदी पीडीएफ

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दुरिया

दूरियाँ

उससे मिलने के लिए मेरी बेचैनी बढ़ती जा रही थी । आज ज्यों ही उस पर नजर पड़ी थी, मेरा मन बेताब हो उठा था । आश्चर्य और उल्लास से भर उठा था । चाहता तो उसी वक्त मिल सकता था, पर वहाँ का वातावरण मुझे उपयुक्त न लगा था और मन—ही—मन मैंने दफ्रतर से छुट्‌टी पाने के बाद उससे मिलने की येाजना बना डाली थी । पिफर अपनी सीट पर वापस लौटकर मैंने पफाइलों में खोने की भरसक कोशिश की, पर न जाने क्यों, पफाइलों में मन रमा नहीं । सुबह दफ्रतर आते ही मैंने ढेर—सारी पफाइलें निकाल ली थीं और दृढ़ निश्चय कर रखा था कि आज तमाम पेण्डिंग चिटि्‌ठयों का डिस्पोजल जरूर कर दूँगा । मगर ज्यों ही मैं किसी पत्रा को पढ़कर नोट्‌स लिखना शुरू करता, एकाएक नोट—शीट पर उसी की सूरत जम जाती और मेरा हाथ जड़वत्‌ रुका रह जाता । विस्पफारित आँखों से बस टुकुर—टुकुर ताकता रह जाता था मैं । यही वजह थी कि पफाइलें अब भी टेबिल पर पड़ी—पड़ी मुझे मुँह चिढ़ा रही थीं ।

ड्रॉअर से मैंने गिलास निकाला और सुराही से पानी ढालकर गटागट पी गया । मन को कुछ राहत—सी मिली । पता नहीं क्यों, मैं अपने—आपको इतना उद्विग्न महसूस कर रहा था । आज सुबह कुछ विलम्ब से मैं दफ्रतर में हाजिर हुआ था । घर में एक मेहमान आये हुए थे और उन्हें विदा करने में ही देरी हुई थी । अपने सेक्शन में पहुँचकर अटेण्डेन्स बना ही रहा था कि मेरे बगलगीर शर्मा जी ने सूचना दी थी कि बहुत दिनों से रिक्त हमारे अध्किारी के पद पर आज किसी आरसी साहब ने ज्वाइन कर लिया है । उनकी बिल्कुल नयी नियुक्ति ही हुई है ।

मैंने आश्चर्य में डूबकर पूछा था, ‘‘आरसी ?'' ‘‘हाँ भाई !'' शर्मा जी ने मुझे समझाने की गरज से कहा था, ‘‘चूँकि वे जाति—र्ध्म की संकीर्णताओं से परे हैं, अतः जातिसूचक सम्बोध्न नाम के साथ नहीं रखते । विद्यार्थी जीवन में छात्रा—नेता रहे थे और आगे चलकर एक ध्ुरन्ध्र मंत्राी के प्राइवेट सेक्रेटरी भी । अब लेट—लतीपफ आने की आदत छोड़ दो, वरना....।''

मैं उफहापोह की स्थिति से गुजरने लगा था— आरसी, छात्रा—नेता, मंत्राी का पी.एस. ! तब तो जरूर वह अपना दोस्त ही होगा—आरसी ।

यों तो मैं और आरसी—दोनों एक ही मोहल्ले के दो ब्राह्मण परिवार में पैदा हुए थे, पर आर्थिक दृष्टिकोण से दोनों परिवार में जमीन—आसमान का पफर्क था । मुझे उसके ठेकेदार पिता राजा भोज लगते थे और अपने अध्यापक बाप गंगू तेली । उसने एक चर्चित कान्वेण्ट स्कूल में शिक्षा लेनी शुरू की थी, जबकि मुझे नगरपालिका के एक सरकारी स्कूल में डाल दिया गया था । पिफर भी हम दोनों सुबह—शाम अक्सर मिला करते थे, हँसी—ठहाके लगाया करते थे । जब मैं उसे ओका—बोका तीन तड़ोका, कबड्‌डी, गुल्ली—डण्डा जैसे खेल खेलने के लिए प्रस्तावित करता तो वह मेरी ओर अजीब हिकारत भरी नजरों से देखने लगता था । ऐसे समय में शर्म से गड़ जाता था मैं । आत्मग्लानि से भर उठता था कि क्यों मैंने उसके सम्मुख यह गन्दी बात कह दी । वह कभी कैरमबोर्ड, कभी शतरंज तो कभी बास्केट बाल खेला करता और मैं सम्मोहित दृष्टि से कभी आरसी को तो कभी उन खेलों को टुकुर—टुकुर निहारता रहता । शाम को स्कूल से छूटते ही चिउड़ा—गुड़ या भूँजा जेब में ठूँसकर मैं उसके घर की ओर चल देता था, जहाँ वह मेरी प्रतीक्षा किया करता था ।

एक रोज उसने मुझे चॉकलेट देकर खाने को कहा था । मगर जब मुझे उसका स्वाद अच्छा नहीं लगा तो उसने कहा था, ‘‘अमाँ यार, तुम्हें अपने टेस्ट का स्टैण्डर्ड सुधरना चाहिए ।''

क्या स्वाद का भी कोई स्तर होता है ? मैं मन—ही—मन सवाल दोहराता रह गया था, मगर उससे पूछकर अपनी बेवकूपफी जाहिर करने से क्या लाभ ! लेकिन मैंने सदा गौर किया है कि जब कभी मैं ऐसे बिन्दुओं पर सोचने की खातिर बाध्य होता था, वह छत—तोड़ ठहाके लगाते हुए मेरे गले में बाँहें डालकर गा उठता था, ‘‘ये दोस्ती हम नहीं छोड़ेंगे.....।''

उध्र आरसी अपने स्कूल से उत्तीर्ण होता रहा था, इध्र मैं हर वर्ष प्रथम श्रेणी हासिल करता रहा था ।

संयोगवश हम दोनों ने आगे चलकर एक ही विश्वविद्यालय में दाखिला लिया था। वहाँ ध्ीरे—ध्ीरे आरसी की लोकप्रियता बढ़ने लगी थी । विश्वविद्यालय की तानाशाही व्यवस्था के खिलापफ वह लम्बे—चौड़े भाषण झाड़ने लगा था । ‘छात्रा एकता—जिंदाबाद' के नारे आये दिन गूँजने लगे थे । चुनाव हुआ । आरसी छात्रा—नेता बन गया । परीक्षाएँ भी होती रहीं । मैं और आरसी—दोनों पास होते रहे । एक अपनी प्रतिभा और परिश्रम के बल पर और दूसरा, राजनीतिक हथकण्डों के बूते पर ।

एम.ए. की परीक्षा एक ही साथ उत्तीर्ण करने के बाद मैं अपने घर आ गया था । सोलह वर्षों तक हाड़—माँस गलाने के एवज में मुझे इस महकमे में किरानीगिरी मिली थी और तभी से मैं अपना शहर छोड़ इस नौकरी में जोता जाने लगा था । अगर नहीं जुतता तो पूरा परिवार भूखों मरता, क्योंकि पिता जी अध्यापन से सेवानिवृत्त हो चुके थे और मेरे लिए दूसरा कोई चारा नजर नहीं आ रहा था ।

सुबह दस से शाम छः तक मैं कार्यालय की गहमागहमी में खोया रहता, पर रात में अक्सर मुझे अपने घर की और मित्राों की याद सताया करती थी । मैंने आरसी के नाम घर के पते से कई खत छोड़े थे, पर जवाब नहीं आया था । एक मित्रा ने ही बताया था मुझे कि आरसी एक मंत्राी का व्यक्तिगत सचिव बन गया है । पिफर मुझे उसका कुछ भी अता—पता नहीं चल पाया था.... और आज अपने अध्किारी के रूप में उसका नाम सुनकर मेरे अचरज की सीमा न थी ।

अपनी जिज्ञासा को मैं और अध्कि दबा नहीं पाया था ओर ‘लंच ऑवर' में अध्किारी के चैम्बर की तरपफ जा बढ़ा था । नेम प्लेट देखकर एक बार पिफर चौंक उठा था— आरसी । पिफर पर्दे की आड़ से झाँककर देखा—सचमुच वही था—एकदम स्मार्ट और अप—टू—डेट !

सेक्शन में वापस लौटकर मैं पिफर उध्ेड़बुन में लग गया । कार्यालय में आज उससे मिलना मैंने उचित नहीं समझा । वैसे, कल तो हमें परिचय के लिए बुलाया जायेगा ही, पर शाम को ही उससे मिलकर मैं उसे चौंका दूँगा । पिफर खोद—खोदकर पूछूँगा कि अब तक कहाँ—कहाँ रहा, क्या—क्या करता रहा । किस प्रकार उसने इतना बड़ा तीर मार लिया ? मेरे खतों का जवाब क्यों नहीं दिया ? आखिर क्या समझता है वह अपने आपको ! उसे दोस्ती का अर्थ समझाना ही होगा ।

मैं बार—बार पफाइलों में खोने की हर सम्भव कोशिश करता, पर हर बार आरसी में ही उलझ कर रह जाता था । ध्ुआँधर भाषण झाड़ता हुआ आरसी । हॉस्टल के मेरे कमरे में बैठकर चुनाव सम्बन्ध्ी गुप्त मंत्राणा करता हुआ आरसी । हम दोनों का साथ—साथ घूमना—पिफरना, उठना—बैठना, मेरी प्रतिभा और सीध्ेपन पर मुग्ध् होता हुआ आरसी । मुझे क्लब में जबरन साथ ले जाता हुआ आरसी । आरसी—मेरा दोस्त, मेरा हमदम !

इस शहर में बारह सौ रुपये मकान का किराया देना मुझे शुरू से ही अखरता रहा । अब क्या ! अब तो आरसी को एक अच्छा—खासा सरकारी क्वार्टर मिलेगा ही । उसी में मैं भी एडजस्ट कर लूँगा । नाहक बारह सौ रुपये हर माह बर्बाद करने से क्या पफायदा ! आज शाम को ही सारी बातें उससे खोलकर कहनी होंगी ।

छह बज गये । प्रतीक्षा की घड़ी खत्म होने को आयी । मैं अपना बैग सम्भालते हुए पफटापफट सेक्शन से बाहर निकलकर गेट के पास जा पहुँचा और आरसी से मिलने की खातिर वहीं चुपचाप खड़ा रहा । ढेर—सारे कर्मचारी,

अध्किारी रवाना हो गये । पर मुझे तो आज अपने आरसी की प्रतीक्षा थी । कभी घड़ी पर नजर जाती तो कभी आने—जाने वाले व्यक्तियों पर ।

अचानक एक मोटर साइकिल आती दिखी । वही था—अपना आरसी । मेरी बाँछें खिल उठीं । बस, उसी की ओर अपलक ताकता रहा । नजदीक आने पर हाथ मिलाना चाहा, पर न जाने क्यों, हड़बड़ी में दोनों हाथ जुड़ गये, ‘‘प्रणाम सर !''

उसने एक उपेक्षापूर्ण दृष्टि डाली और पिफर सिर झटक कर आगे बढ़ गया । मैं हतप्रभ—सा मोटर साइकिल को आँखों से ओझल होने तक टुकुर—टुकुर देखता रहा ।