Pratishodh Bhagwati Prasad Dwivedi द्वारा लघुकथा में हिंदी पीडीएफ

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Pratishodh

प्रतिशोध

‘आइसक्रीम..... मलाईबरपफ.... ले लो बाबू.... दूध् वाली.... मलाई

वाली.... आइसक्रीम..... !'

पूरे गाँव में पेफरी लगाता हुआ बहिरा आइसक्रीम बेच रहा था । साँवली काया, माथे पर बालों की सपेफदी, कमर से बँध्ी घुटने तक की धेती, एक कमीज, कंध्े से लटके हुए झोले और गमछे में अनाज की गठरियाँ, माथे पर पगड़ी, जिस पर आइसक्रीम का काठ का बक्सा रखे रहता था बहिरा । चूँकि वह कानों से कुछ उफँचा सुनता था, अतः लोगों ने उसका असली नाम जानने की जरूरत नहीं समझी और ‘बहिरा' का संबोध्न ही देने लगे थे ।

मलाईबरपफ वाला बहिरा गाँव में घुसने से पहले रोज प्राइमरी स्कूल के बगल में बरगद के गाछ के नीचे अपना बक्सा उतारता और वहीं से हाँक लगाने लगता था । बालमंडली उसे चारों तरपफ से घेरकर खड़ी हो जाती । कुछ बच्चे जेब से पैसे निकालकर उसकी ओर बढ़ा देते, कुछ पैसे लाने घर की ओर कुलाँचते हुए दौड़ पड़ते और कुछेक घर से पैसे के बदले अनाज की पोटली देकर उससे आइसक्रीम की पफरमाइश करते ! बहिरा सभी बच्चों से हिल—मिलकर बतियाता । किसी का माथा सहलाने लगता, तो किसी की कोई गन्दी आदत देख उसे सबक ही देने लगता । बच्चे से बूढ़े तक सभी उसे बहिरा ही कहा करते थे । हाँ, इध्र कुछ बच्चे ‘बहिरा' के बजाय ‘बहिरा बाबा' का संबोध्न देने लगे थे और वे बच्चे होते थे गरीब—मजूरों के । मगर आज तक बहिरा को किसी पर भी गुस्साते हुए अथवा किसी से भी तू—तू—मैं—मैं करते हुए नहीं देखा—सुना गया था ।

अब चूँकि गरमी की छुट्‌टी में गाँव का वह इकलौता सरकारी प्राइमरी स्कूल बंद हो गया था, अतः बहिरा माथे पर आइसक्रीम के बक्से का बोझ लिये हुए छवर से होकर गाँव में घुस गया और हर घर के सामने आवाज लगाते हुए आगे बढ़ने लगा ।

बहिरा ने पूरे गाँव के कई चक्कर लगाये, पर बस आठ—दस आइसक्रीम की ही बिक्री हो पायी । जेठ माह की तवे की तरह तपती दुपहरी में लू नागिन—सी जीभ लपलपा रही थी । सूरज का गोला अंगारे बरसा रहा था । बहिरा के नंगे पाँव के तलवे छनाक—छनाक जल रहे थे । होंठ सूखते जा रहे थे । मन—ही—मन वह अपने नसीब को कोस रहा था कि पता नहीं, सुबह—सुबह आज किसका मुँह देखकर चला था कि इतना हलकान होने के बावजूद बिक्री ‘नहीं' के बराबर हो रही है । लगता है, बच्चों को माँ—बाप ने घरों में छुपा रखा है, वरना लू की चपेट में आने की आशंका भी तो है । मगर यदि मैं कहीं लू का शिकार हो गया तो ! पिफर सीतवा, उसकी माई, मुनुवा, गुड़ियवा—इन सबका क्या होगा ? मगर तभी मन ने ही मन की बात काट दी— होगा क्या ! भगवान का ही तो भरोसा है । कुछ नहीं होगा मुझे । कमीज की जेब टटोलकर वह आश्वस्त हुआ—सीतवा की माई ने प्याज जो रख दिया है पाकिट में ! पिफर लू काहे को लगेगी ?

परधन जी की हवेली के सामने से होकर गुजरते हुए उसने पिफर हाँक लगायी । एक बार, दो बार, तीन बार....! परधन जी की हवेली में बच्चों की पफौज है । एक—एक कर जब बाहर निकलने लगते हैं, तो बहुत—सी आइसक्रीम बिक जाती है । मगर बहुत सतर्कता भी बरतनी पड़ती है । कहीं परधन जी न आ टपकें ! देखते ही डपटकर भगा देते हैं उसे और वह भी चुपचाप हाथ जोड़कर आगे बढ़ जाता है !.... चलते—चलते उसने एक बार पिफर आवाज लगायी ।

अचानक दरवाजा खड़का और बहिरा उध्र आशा भरी नजरों से देखने लगा । मगर बच्चों के बजाय परधन जी को ही बाहर निकलते हुए देखकर वह बुझ—सा गया । पिफर भी, उन्हें बड़े अदब से सलाम ठोंकना न भूला । एकाएक परधनजी को दहाड़ते हुए देखकर बहिरा हक्का—बक्का रह गया । इतनी तेज

ध्ूप में बादल का गर्जन !

उन्होंने पिफर डपटा, ‘‘क्यों रे बहिरा, आज तू पिफर आ गया आइसक्रीम बेचने....?'' परधन जी के गुस्सैल स्वभाव की उसने चर्चा तो सुन रखी थी, मगर आज अपनी आँखों के सम्मुख देख रहा था— बाप रे ! लगता है, कच्चा निगल जायेंगे ।

‘‘का करूँ मलिकार ! पापी पेट की खातिर....'' बहिरा ने मुस्कराने की भरसक कोशिश की, मगर लगा जैसे वह रो रहा हो ।

‘‘चोप ! लड़कों की सेहत खराब करने पर तुला हुआ है ? दू कोस से आते हो, का इहे एगो गाँव सूझता है तुमको ?'' परधन जी की भृकुटी तन गयी ।

‘‘गाँव—गाँव में, गली—गली में छिछियाना पड़ता है मलिकार, तब कहीं जाकर परिवार को दू जून की रोटी नसीब हो पाती है ।'' बहिरा गिड़गिड़ाया ।

परधन जी ने हाथ की छड़ी नचाई और पिफर बहिरा के माथे पर ध्रे बक्से को जोर लगाकर ठेल दिया, ‘‘ले, जुटा साले परिवार की रोटी !''

बक्सा उसके माथे से उलटकर ध्ड़ाम से ध्रती पर गिरा और ढेर सारी आइसक्रीम भरभराकर बाहर जमीन पर आ गिरी ।

‘‘हम मर—बिला जायेंगे मलिकार ! हमारी जोरू.... हमारे बाल—बुतरू तबाह हो जायेंगे हाकिम.... ऐसा मत करें माई—बाप !'' बहिरा गुहार लगाते हुए परधन जी के पैरों पर गिर पड़ा, मगर उन्होंने अपने दाहिने पैर के जूते से एक जोरदार ठोकर बक्से को मारी, जिससे कुछ और आइसक्रीम के टुकड़े ध्रती पर छितरा गये । पिफर उन्होंने बहिरा की पीठ पर भी तीन—चार छड़ी अंधध्ुंध् जमा दीं और एक झटके के साथ पलट, हवेली में घुसकर भीतर से दरवाजा बंद कर लिया ।

बहिरा माथा पकड़कर बैठ गया । जैसे—जैसे आइसक्रीम गल—गलकर पानी के रूप में ध्रती पर पैफलती जा रही थी, बहिरा को ऐसा लग रहा था जैसे उसके शरीर का समूचा खून पानी होकर ध्रती पर बहने लगा हो ।

अपने—अपने दरवाजे—खिड़कियों से लोग तमाशबीन—से बहिरा को घूर रहे थे । सब—के—सब बस सोच रहे थे कि बहिरा अब पुक्का पफाड़कर रो पड़ेगा ! बाल—बच्चों को अब क्या खिलाये—पिलायेगा बहिरा.....?

मगर आज बहिरा की आँखों में आँसू नहीं थे । उसने कमीज की जेब टटोली और दियासलाई की खनक सुनकर आश्वस्त हुआ । मन—ही—मन वह किसी निश्चय पर जा पहुँचा ।

बहिरा उठा और दनदनाता हुआ चल पड़ा परधन जी के खलिहान की तरपफ । बस एक दपफा उसने पीछे मुड़कर देखा । लगा, जैसे उसकी आँखों के दहकते हुए अंगारों से ही परधन जी की हवेली ध्ू—ध्ू कर जल उठेगी ।