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बख्शीश

बख्शीश

जाड़े की साँय—साँय करती रात । श्मशान—सी सुनसान सड़कें । पूरे शहर में जैसे कफ्रर्यू लगा हुआ हो और दहशतजदा नर—नारी बाल—बच्चों के साथ अपने—अपने घरों में जा छिपे हों । पुलिस—सी निर्मम शीतलहर चौकसी के बहाने मासूमों की जिन्दगी के साथ खिलवाड़ कर रही थी । अखबारों में रोज ही शीतलहर की चपेट में आकर दम तोड़ने वालों की संख्या में बेतहाशा वृि( की खबरें छप रही थीं । इस बरस की ठंडक गरीबों को जड़ से मिटाने में सरकार की कुछ ज्यादा ही सहायिका सि( हो रही थी ।

मगर कुलकर्णी साहब के बंगले में किसी को भी इस शीतलहर का अहसास तक नहीं था । बंगले का कोना—कोना इन्द्रध्नुषी रोशनियों, झालरों और अत्याध्ुनिक सजावटों की चकाचौंध् से जगमगा रहा था । बाहर कारों, मोटर साइकिलों और स्कूटरों का रेला लगा था । पार्टी में शरीक अति विशिष्ट अतिथियों में कई सरकारी विभागों के उच्च अध्किारी, राजनेता और ठेकेदार आदि मौजूद थे । विदेशी खुशबुओं से पूरा हाल महमहा उठा था ।

कुलकर्णी साहब की शादी की वर्षगाँठ की यह पार्टी अब अपने शबाब पर थी । आरकेस्ट्रा के स्वर आहिस्ता—आहिस्ता तीव्र और तीव्रतर होने लगे । पीने—पिलाने का दौर चल रहा था । सबकी आँखों में नशा उमड़ता जा रहा था । सभी जोड़े झूम रहे थे, देश—दुनिया से बेखबर हो एक—दूसरे की बाँहों में ।

परभुवा बरामदे में पड़ा कँपकँपा रहा था । उसकी छाती का दर्द बढ़ता ही जा रहा था । पार्टी की तैयारी में वह महीनों से लवसान रहा था । कुलकर्णी साहब ने दैनिक मजदूर के रूप में उसकी बहाली कार्यालय में की थी और पिफर समझा—बुझाकर बंगले पर भेज दिया था । साब, मेमसाब के कपड़े धेना, झाड़ू—पोंछा लगाना, खाना बनाना, बरतन माँजना, खरीद—पफरोख्त, बाजार—हाट के वक्त पुछल्ला बनकर कुत्ते—सा घिसटते चले जाना और उध्र से सामानों के बंडल लिये हुए बंगले में हाजिर होना उसकी ड्‌यूटी थी । सुबह पाँच बजे से रात के ग्यारह बजे तक । बस, काम और काम । मेमसाब की डाँट—पफटकार और गाली—गलौज का खिताब अलग से । इतना खटने के बावजूद आलसी, कामचोर, खाउफमल आदि की उपाध्यिों का अलंकरण । वह अन्दर—ही—अन्दर कटकर रह जाता । पार्टी की तैयारी में साहब, मेमसाब आदेश—दर—आदेश दिये चले जाते और वह कभी न्यू मार्केट, कभी सब्जी मंडी, कभी गुलजारबाग, तो कभी मुसल्लहपुर हाट की दौड़ लगाता रहता । इसी दरम्यान शायद ठंड लग गयी थी बदन में । लगता, जैसे छाती की पसलियाँ चिटक रही हों । कापफी प्रयत्न पूर्वक रोकने के बावजूद कराह पूफट ही पड़ती थी मुँह से ।

‘‘परभू..... ऐ....परभू !'' कुलकर्णी साहब की भारी—भरकम आवाज की अनुगूँज सुनकर वह हड़बड़ाकर साहब के सम्मुख खड़ा हो गया । दाहिने हाथ से अब भी छाती दबा रखी थी उसने ।

‘‘देख परभुवा, पाँच बोतल और ला....पफटापफट....वही....ये ले रुपये !'' कुलकर्णी साहब ने उसकी हथेली पर तुड़े—मुड़े नोट ध्र दिये ।

‘‘मगर—सर, मेरी छाती में..... दुकानें भी तो बन्द हो गयी होंगी ।'' दर्द वाली बात उगलते—उगलते पिफर निगल गया वह । आज साहब की शादी की वर्षगाँठ है और मैं मंगल में यह दर्द की अमंगल बात ले उठा.... ध्त्‌ तेरे की ! उसने मन—ही—मन अपने—आपको ही कोसना शुरू कर दिया ।

‘‘नहीं रे ! वर्मा जी की दुकान खुली होगी । मैंने बोल रखा है । तू जा तो सही !.... और सुन, ये ले अपनी बख्शीश !'' ....कुलकर्णी साहब ने उसे एक नोट और थमाया ।

पचास रुपये का कड़कड़ाता नोट देखकर परभुवा के मुँह में पानी आ गया । चलो, इसी से कल एक बोतल ठर्रा लेंगे । पिफर तो दर्द—वर्द छू—मंतर—सा भागेगा । हाँका—प्यासा चल पड़ा वह वर्मा जी की दुकान की तरपफ ।

हवा का बपर्फीला झोंका अचानक उसके पूरे बदन से आ टकराया । लगा, मानो किसी ने एक ही साथ सैकड़ों पिनें उसकी देह में चुभो दी हों । ‘बाप रे बाप' की पुकार, कराह और पिफर सिसकियों का सिलसिला । वह दौड़ने लगा । छाती का दर्द जोर पकड़ता गया । मगर वह भागता रहा— भागता ही रहा ।

जब उसने चलते—चलते बन्द मुट्‌ठी खोली तो लगा, जैसे हथेली पर पचास रुपये का नोट नहीं, बल्कि उसकी जान रखी हुई हो और वह अपनी जान हथेली पर लिये हुए दौड़ रहा हो । पचास रुपये की इस अतिरिक्त कमाई की खुशी ने क्षणभर के लिए उसके सारे दुःख—दर्द भुला दिये ।

दुकान से लौटते वक्त पिफर शीतलहर से मुठभेड़ । मगर वह सब कुछ झेलता रहा । झेलना ही तो नियति है गरीब—गुरबा की ।

उसने विदेशी शराब की बोतलें कुलकर्णी साहब को आहिस्ता—से थमा दीं । पिफर एक उचटती—सी नजर चारों तरपफ डाली । कुछेक लोग आलिंगनब( हो चुके थे— अध्किांश पुरुष परस्त्राी के साथ और स्त्रिायाँ परपुरुष के साथ । परभुवा को अहसास हुआ, जैसे वह एकाएक अपने बचपन में चला गया हो और आँखमिचौनी या चोर—सिपाही का खेल देख रहा हो । मगर जब उसने एक—एक चेहरे को पहचानने की कोशिश की, तो उसका गँवई मन बजबजा उठा । बाहर आकर उसने खँखारकर थूका—आक्थू !

लौटकर पिफर बरामदे में बैठ गया परभुवा । उसे अपना गाँव याद हो आया । पिफर एक—एक कर अपनी बुध्यिा याद आयी, अपना मुनुवा याद आया । इस हलकानी से तो गाँव के बबुआनों की मजूरी भली । जाँगर ठेठाना पड़ेगा तो क्या हुआ, अपनी जोरू और बबुआ के साथ भी तो रहूँगा । जैसे उड़ि जहाज का पंछी, पिफर जहाज पर आवे ! ....परभुवा कब गाँव की स्मृति में, सतरंगे सपनों में खो गया, पिफर कब सो गया, कौन जाने !

सुबह मालकिन को चाय की तलब लगी । ‘अरे परभुवा !' उन्होंने बिस्तर में दुबके—दुबके ही आवाज लगायी । जब प्रत्युत्तर न मिला तो वह लाल—पीली हो उठीं, ‘‘कई दपफा कहा कि ऐसे गध्े को जल्दी रपफा—दपफा करो, मगर मेरी सुनता कौन है ! ....अबे हरामखोर, कहाँ मर गया रे....?'' मेम साब पैर पटकते हुए बेडरूम से बाहर निकलकर बरामदे की तरपफ बढ़ीं ।

एकाएक परभुवा पर नजर पड़ते ही मालकिन को जैसे बिजली का करंट छू गया । उसकी देह लकड़ी—सी अकड़ी हुई थी । पूरा बदन काला पड़ गया था ।

‘‘अजी, सुनते हो ?'' उनकी चीख गूँजी । वह हड़बड़ाकर अन्दर भागीं । उनकी घिग्घी बंध्ती जा रही थी । अकबकाहट में वह दीवार से जा टकरायीं और पफर्श पर मुँह के बल ध्ड़ाम—से गिर पड़ीं ।

बाहर बरामदे में परभुवा की देह बपर्फ की सिल्ली—सी यथावत पड़ी थी । आँखें टँगी हुई थीं । दायीं हथेली पर अब भी पचास रुपये का तुड़ा—मुड़ा कड़कड़िया नोट पड़ा था, जिसे साहब ने उसे बतौर बख्शीश दिया था ।

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