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रूट नंबर थर्टीन

रूट नंबर थर्टीन

अगर किसी दहब वह बस ज़मीन पर न चल रही होती तो हवाई जहाज़ की कहलाती. बात एरोफ्लोट क्लब की चार्टर्ड बस रूट नंबर थर्टीन की हो रही है जो महानगर के दूर-दराज़ इलाकों की पॉश कालोनियों से उड़ते उड़ते, दूसरी तमाम ज़न्नतों को छूते हुए एक घंटा सत्तावन मिनट में डॉलर प्लेस के मेन पोर्टिको में लैंड करती है. फिर मिनट भर में उसमें बैठी बत्तीस बिजनेस गन्स बेआवाज़ उतर कर पूरे डॉलर तंत्र में जज़्ब हो जाती हैं.

चंद्रपाल उस बस का ड्राइवर है और यह उसका रेकॉर्ड है कि उसके दम पर कभी बस एक मिनट भी लेट नहीं हुई... लेकिन उसकी असली खूबी है उसका गज़ब का म्यूजिक सेन्स.फ़िल्मी, क्लासिकल या इंस्ट्रूमेंटल जो कुछ भी लगाएगा, चुन कर लगाएगा.

जैकी कंडक्टर है. वैसे बस को कंडक्ट तो मिस्टर जुनेजा करते हैं. किसको कहाँ बैठाना है, किसके लिए लेडीज़ सीट रुकवा कर रखनी है, किसे बस के कैबिन में बुला लेना है, किसे स्टॉप पर देख कर भी अनदेखा किया जा सकता है...और असली काम, कलेक्शन. जैकी सिर्फ जुनेजा को यह बताता है की कौन आएगा, कौन नहीं आएगा और किसकी मेम्बरशिप कब ख़त्म हो रही है. जुनेजा जैकी के अलावा और किसी से बात नहीं करता. वैसे भी, बस के भीतर किसी से भी बात करता ही कौन है...? लोग म्यूजिक सुनते हैं, अखबार पढ़ते हैं, अपने मोबाइल पर फुसफुसाते हैं, या बहुत ज़रूरी हुआ तो बोल लिया किसी से, “ एक्सक्यूज़ मी...”

कहानी का बीज बस के तीसरे स्टॉप से ज़मीन पर गिरा और सातवें स्टॉप तक धरती के नीचे सिर्फ सोया रहा.आगे मिसेज़ कुलकर्णी बस में चढ़ीं.उनके साथ उनका चार साल का बेटा है. आज उन्हें अपने पेरेंट्स के घर जाना है. एक सीट पर मिसेज़ कुलकर्णी बैठी हैं दूसरी पर उनका बेटा.नीचे सीट के पास एक बास्केट में उनका सामान है. कुछ पैकेट्स, बच्चे की पिक्चर बुक्स, बिसलरी की बौटल. मिसेज़ कुलकर्णी पिक्चर बुक निकाल कर बेटे को देती हैं और बास्केट से वॉकमैन निकाल कर उसका हेडफोन कान पर चढ़ा लेतीं हैं. अपना म्यूजिक अलग से सुनती हैं मिसेज़ कुलकर्णी...इन्फेक्शन से बचना होता है न... चंद्रपाल ने अपने सिस्टम पर ‘जैसलमेर’ लगाया है.

मिसेज़ कुलकर्णी किशोरी अमोनकर सुन रहीं हैं.बीटा हाथ में पिक्चर बुक ले कर कुछ ढूँढ़ रहा है, एलीफेंट कहाँ है..? बच्चा किताब रख कर बस में एलिफेंट खोजने लगता है.. मम्मी ने उसकी कोई मदद नहीं की, वह अपनी ही दुनिया में खोई हुई हैं. तभी बच्चे की नज़र एक जगह टिकी और अचानक धरती के अन्दर कहानी का सोया हुआ बीज जाग गया. बस में लेडीज़ सीट के पीछे वाली लाइन में, खिडकी के पास एक अधेड़ उम्र का आदमी, जो तीसरे स्टॉप से चढ़ा था, बैठा है. उसके पास न कोई ब्रीफकेस है, न बैग. बेहतरीन फिटिंग वाला ओशन ग्रीन रंग का कीमती सफारी सूट पहने, आँख पर स्टील फ्रेम का चश्मा लगाए वह आदमी पता नहीं कहाँ देख रहा है. उसकी नज़र न ज़मीन पर है न आसमान पर.वह न म्यूजिक सुन रहा है, न कुछ पढ़ रहा है. बस, लगातार रोये जा रहा है. हाथ में रुमाल लिए बैठा है वह आदमी और पता नहीं कहाँ गुम है.

बच्चा मम्मी को हिला कर बताता हैं, “ मम्मी, देखो वह आदमी रो रहा है.”

मिसेज़ कुलकर्णी पास पड़ी पिक्चर बुक उठा कर बच्चे को थमा देती हैं, “ देखो, फिश देखो बेटा...” और सामने खुल आये पेज पर छपी मछली को बच्चे के आगे फेक देतीं हैं.

बच्चा मछली को छू कर डरने की एक्टिंग करता है और ठठा कर हंस पड़ता है.

मन ही मन ‘थैंक गॉड’ कहती हैं मिसेज़ कुलकर्णी. एक नज़र उस रोते हुए आदमी पर डालती हैं और फिर अपनी दुनिया में गुम हो जाती हैं. फ्लाईट बादलों के बीच से गुज़र रही है. इस नै कॉलोनी के मेघदूत अपार्टमेन्ट के फाटक पर एक बड़ा सा फव्वारा है जिससे उछल कर अक्सर पानी की फुहार बस को नम कर जाती है. बस यहाँ ज्यादा देर रूकती है. यहाँ पर इंडस्ट्रियल एरिया के लोग उतर जाते हैं.किसी प्राइवेट एयर लाइन की कॉलोनी भी यहीं है. यहाँ से भी जेन्ट्री चढ़ती है. जुनेजा झट से नीचे उतर कर एक ट्रिपल फाइव जितनी खींच पाता है, खींच लेता है.चंद्रपाल इस स्टॉप को बादल टाउन कहता है.

“ मम्मी वह आदमी सचमुच रो रहा है...”

बच्चे की आवाज़ मिसेज़ कुलकर्णी को खींचती है. वह देखती हैं, वह आदमी सचमुच रो रहा है. बे आवाज़, लेकिन उसके चहरे पर उसकी यातना सघन है. वह चश्मा उतार अपने आंसू रूमाल से पोछता है और पल भर में फिर उसके गाल भीगने लगते हैं.

“ मम्मी देखो न, वह आदमी चश्मा लगाये लगाये रो रहा है...”

खीझ उठती हैं मिसेज़ कुलकर्णी.वह चॉकलेट, पानी, राइम्स सब कुछ आजमा चुकी हैं. हर बार, कुछ देर बाद वह बच्चा कुलबुलाता है.

बस अब रन वे के साथ साथ चल रही है. चंद्रपाल ने बस की रफ़्तार तेज़ कर दी है. उसे वह टाइम कवर करना है जो जुनेजा ने सिगरेट पीने में गवांया है. मिसेज़ कुलकर्णी की ही लाइन में, उधर खिडकी के पास वाली सीट पर जींस पहने , काला चश्मा लगाये एक लड़की हाथ में कैसेट लिए कुलबुला रही है. वह चाहती है कि चंद्रपाल वह कैसेट लगा दे. वह बेचैन हो कर बार बार घडी देखती है. बार बार जैकी को आँखों से कोंचती है.अभी अभी रन वे पर किसी एयरक्राफ्ट ने लैंड किया है.

मिसेज़ कुलकर्णी अपने बेटे को बताती हैं... यह फ़्लाइंग क्लब का छोटा जहाज़ है. पीले रंग का छोटा जहाज़ किसी चिड़िया की तरह लग रहा है. बच्चा जहाज़ देखता है, किलकारी मारता है और फिर अपने में लौट आता है,

“ मम्मी देखो, उसने अपना चश्मा उतार कर रुमाल से अपनी आँखें ढक ली हैं... मम्मी उसका मुंह ऐसे टेढ़ा क्यों हो रहा है...?”

नज़र उठा कर देखती हैं मिसेज़ कुलकर्णी. एक परेशानी है उनके चेहरे पर. अभी अभी तो उन्होंने ‘कॉल ऑफ वैली’ लगाया है... घडी में सिर्फ बीस मिनट बाकी हैं.उस आदमी का चेहरा किसी तकलीफ से बदरंग हो रहा है. गोर चुस्त चेहरे पर काली बारीक मूछें स्मॉर्ट लुक देतीं हैं, लेकिन इस बार दर्द की लकीरें जरा ज्यादा गहरी नज़र आती हैं.

“ मम्मी, आखिर रोता ही क्यों जा रहा है वह आदमी..?”

“ उधर मत देखो बेटा, कुछ प्रॉब्लम होगी उसे.” मिसेज़ कुलकर्णी की खीझ बेकाबू हो जाती है. वह धमकाती हैं बेटे को, “ शोर करोगे तो गन नहीं देगा मामा...”

बच्चा चुप हो कर किताब में गन ढूँढने लगता है. जींस वाली लड़की के बहुत कोंचने पर जुनेजा उसके हाथ से कैसेट ले कर देखता है और मुंह बिचकाता है,

‘ छोरा रे छिछोरा, रे छिछोरा, रे छिछोरा..’

कैसेट जुनेजा के हाथ से ड्राइवर के कैबिन में पहुँचने के लिए लड़कियों औरतों के बीच इस हाथ से उस हाथ घूम रहा है.

कॉन्वेंट के सामने से गुज़रती बस एकदम धीमी हो गयी है. चंद्रपाल ने हाथ बढ़ा कर म्यूजिक बंद कर दिया है. सारा माहौल एक दम शांत हो गया है. जींस वाली लड़की बेचैन है. घडी देखती है, सिर्फ बारह मिनट बचे हैं, कि रूट नंबर थर्टीन लैंड कर जायेगी.

उस आदमी का रुमाल पूरी तरह आंसुओं से भीग आया है. उसने राल से अपनी आँखें हथेलियों के बीच ढक ली हैं. उसकी बगल में बैठे आदमी ने अपनी किताब बंद कर दी है और ऊपर से अपना बैग उठा रहा है. बच्चा नज़र उठा कर फिर उस रोते हुए आदमी की तरफ देखता है लेकिन मां का चेहरा देख कर अपना सवाल भीतर ही भीतर पी गया है. कॉन्वेंट पार करते ही बस दोनों तरफ स्काई क्रीपर्स के बीच दौड़ने लगी है. कैबिन में लड़कियां औरतें पता नहीं किस बात पर खी खी करके हंस रहीं हैं. चंद्रपाल ने झुंझला कर एक मोती भहराती औरत के हाथ से कैसेट ले कर डेक में ठूंस दिया है.

‘छोरा, रे छिछोरा, रे छिछोरा, रे छिछोरा’

लैंडिंग में सिर्फ चार मिनट बाकी हैं.

कैबिन में बैठ एक लड़की ने उठ कर वाल्यूम छेड दिया है और स्पीकर्स अचानक बदहवास चीखने लगे हैं. बस में लोग अपने अपने बैग, ब्रीफकेस समेट कर उतरने को तैयार हैं. बस पार्किंग लॉट में पहुँच कर धीमी हो गयी है. दूसरी बसें पहले एंट्री ले रही हैं. मिसेज़ कुलकर्णी ने दूर से अपने भाई को देख लिया है और वह बच्चे को बता रही हैं,

“ वो देखो, मामा हमें लेने आया है.”

चंद्रपाल ने बस रुकते ही कैसेट लगभग फेंक कर जुनेजा को वापस किया है. लोग सलीके भरी फुर्ती से नीचे उतर कर दायें बाएं छितर जा रहे हैं. बच्चा पीछे मुद कर अभी भी सीट पर बैठे रोते आदमी को देख रहा है. मिसेज़ कुलकर्णी का भाई हाथ में गन लिए बच्चे को बुला रहा है. बच्चा लगातार उस आदमी को देखे जा रहा है जो बस से उतर कर एक ओर खड़ा हो गया है.

चंद्रपाल और जैकी सड़क के उस पार कैफेटेरिया में चले गये हैं. बच्चा अब अपने मामा से पूछ रहा है,

“ मामा, वह आदमी तब से रो क्यों रहा है...?

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