Ummid Ashok Gupta द्वारा लघुकथा में हिंदी पीडीएफ

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Ummid

उम्मीद

घर बहुत छोटा तो नहीं था, लेकिन टीवी एक ही कमरे में था क्योंकि घर में एक ही टीवी था.

टीवी वाले कमरे में एक सोफे पर पिताजी हम दोनो भाई बहनों को ले कर बैठते थे. उसी कमरे में एक तख़्तपोश पर बाबुल चाचा भी होते थे. मैं नौवीं क्लास में पहुँच गयी थी, वीरू अभी पांचवीं में आया था. पिताजी हमें ज़्यादातर ऐसे प्रोग्राम दिखाते थे जिसमें जानवरों, मछलियों और चिड़ियों पक्षियों के बारे में, जंगल, समुद्र और पहाड़ के बारे में सुंदर सुंदर तस्वीरें होतीं थीं और बहादुरी के कारनामे होते थे. बाबुल चाचा को भी यही सब देखना पसंद था.

वैसे, बाबुल चाचा की पसंद नापसंद का क्या जिक्र करना... वह बीमार थे. पिताजी उन्हें बीमार कहते थे और अम्मा कहती थीं कि वह बौरा गये हैं...क़स्बा छोड़ कर शहर की हवा उन्हें माफिक नहीं आई, और पता नहीं कैसी बयार ने उनकी मति फेर दी...चाचा पढाई में बहुत तेज़ थे. कस्बे के इंटर कॉलेज में उन्होंने सबसे ज्यादा नंबर लिये थे, और पिताजी ने उन्हें शहर में आगे पढ़ने भेज दिया था. बी ए में फिर उन्होंने फर्स्ट क्लास लिया. आगे उनका मन बना कि वह आई ए एस की तैयारी करें और इस बीच शहर में ही कहीं कोई नौकरी पकड़ लें. बात बन गयी. चाचा को एक डिग्री कॉलेज में लाइब्रेरियन का काम मिल गया. पिताजी कस्बे के एक डॉक्टर के पास कंपाउंडर थे लेकिन वह पढ़ाईं लिखाई और ऊँची नौकरी का रुतबा जानते थे.

उसी साल अम्मा ने जोर दे कर चाचा की शादी करा दी. चाचा की मर्ज़ी तो नहीं थी, लेकिन अब तक तो सारा कुछ उनकी ही मर्ज़ी से हो रहा था. वह मना करते भी तो कैसे..? शादी हो गयी. चाचा शहर में ही नौकरी और कम्पटीशन की तैयारी में जुटे रहे. चाची वहीँ कस्बे में ही रहती रही. शहर में अभी चाचा के पास कहाँ कोई ढंग का ठिकाना था जो वह परिवार रखते. वह महीना पंद्रह दिन में आते और एकाध दिन रुक कर चले जाते. शुरू में वह दो तीन बार चाची को लेकर शहर भी गये. घुमाया फिराया, फिल्म सिनेमा दिखाया, और कुछ खरीददारी करा कर उन्हें वापस ले आये.

आगे किस्मत के धनी निकले चाचा ,कि उन्हें कामयाबी मिली. पहली पोस्टिंग होते ही वह घर दौड़े आये. फल मिठाई और सारे घर के लिये कुछ न कुछ उनके पास था. और उस ‘कुछ न कुछ’ में यह अरमान था कि अब वनवास खत्म और वह चाची को साथ लेकर लौटें. लेकिन यहां तो उनके लिये भी ‘कुछ न कुछ’ धरा था...चाची उम्मीद से थीं, और सात महीने बाद चाचा बाप बनने वाले थे. खैर, खुशी के साथ, मायूसी का बोझ ले कर चाचा वापस लौट गये.

महीने भर बाद ही वह फिर आये. उनके पास हम सब को ले जाने के लिये रेल का टिकट था, कि सब लोग हफ्ता भर के लिये उनके साथ शहर ही नहीं, उस महानगर चलें, जहाँ वह अफसर बन कर रह रहे हैं. हम सब के लिये स्लीपर क्लास का टिकट था और चाचा चाची के लिये फर्स्ट क्लास का. लेकिन फर्स्ट क्लास में चाची के साथ उन्होंने अम्मा को बैठाया और खुद हम बच्चों और पिताजी के साथ स्लीपर कोच में चले.

चाचा का घर बहुत बड़ा था. उनके कमरे में भी बहुत से जानवरों और चाँद की धरती की तस्वीरें सजी थीं. हफ्ता कैसे बीता हमें पता नहीं चला. यहीं हमने चाचा को, चाची के नाम से बुलाते सुना. हमें अब जा कर पता चला कि चाची का नाम मालती है. अभी तक तो अम्मा उन्हें बबुनी ही कह कर बुलातीं थीं, बाबुल की बबुनी.

सच कहते हैं अम्मा के पंडित जी, ‘ समय बहुत तेज़ दौड़ता है. बीतते पता नहीं चलता.’ सच कहतीं है हमारी कहारिन मौसी, ‘ बखत की मार का कोई भरोसा नहीं. अचानक कहर बन कर टूटता है, और अच्छा बुरा नहीं देखता..’

सच हुआ था सबका कहा. बखत चाची के सिर कहर बन कर टूटा, और उन्हें साथ ले गया.. पता नहीं बेटा था उनकी कोख में या बेटी. भसम तो उसको होना ही था अपनी मां के साथ. चाचा ने सुना तो भागे आये थे . वैसे जचकी का टाइम तो अभी दूर था. अम्मा, कहारिन मौसी से तो यही बता रहीं थीं. पगलाहट ने पत्थर कर दिया था चाचा को. वह कभी अम्मा के सामने जा कर बैठते, तो कभी पिताजी के सामने, लेकिन कहते कुछ भी नहीं थे. हमसे मिलने से बचते रहते थे . जैसे तैसे उन्होंने तेरह चौदह दिन काटे थे और फिर अपनी पगलाहट की गठरी लेकर वापस चले गये थे.

फिर, चाची की बरसी से तीन महीने पहले वह फिर आये... नहीं, आये नहीं, लाये गये. उन्हें उनके ऑफिस के लोग पहुंचा कर गये. उनके पास उनका सारा सामान था, उनकी अब तक की डॉक्टरी रिपोर्टें थीं. चार पांच महीने से उनका दिमागी इलाज वहीँ चल रहा था. डॉक्टर की राय थी कि यही दवाएं वह कम से कम साल भर नियम से खाएं, और आराम करें. आराम के लिये नींद का इंजेक्शन बताया गया था. पिताजी तो खुद कम्पाउन्डर थे. सब समझ लिया था उन्होंने.

चाचा पता नहीं कैसे बावले थे ? न वह गणेशी की तरह दंगा और नंगई करते थे और न तोड़ फोड़... बस, जब तब कुछ कुछ बोलने लगते थे. देर तक. बिना किसी की ओर देखे. बस, अपने तख्तपोश पर बैठे, सामने रखे टीवी से नजर हटा कर, एक कोने को ताकते हुए, मानो वहां कोई खड़ा हो. अम्मा या पिताजी के दिये दवाई वह चुपचाप खा लेते थे. नहीं तो चुप्प लेटे छत ताकते रहते थे. हमारे सामने अब तक उनका यह हाल करीब सात महीने से था. चाचा की नौकरी एकदम छूटी नहीं थी, वह इलाज के लिये छुट्टी पर थे और उनकी तनख्वाह आती थी. हम आदी हो गये थे इस सब के, और इसी को सब ठीक ठाक चलना मानने लगे थे.

***

हम दोनों भाई बहन सोफे पर पिताजी के दायें बाएं बैठे टीवी पर जानवरों की दुनिया देख रहे थे. अम्मा रसोई में थीं. चाचा भी अपने तख्तपोश पर बैठे टीवी देख रहे थे. अजीब दृश्य था. नदी के किनारे एक जिराफ गिर गया था. बताया जा रहा था कि जिराफ अपनी जिंदगी भर केवल खड़ा रहता है, और अगर गिर जाता है तो अपने कद और वज़न के कारण उसका फिर उठ खड़ा होना असंभव होता है. शायद अमरीका से आया हुआ कोई पशु प्रेमी उस जिराफ को खड़ा करने की कोशिश कर रहा था. उसके साथ कुछ गांव वाले भी जुट आये थे.

अचानक चाचा बोलने लगे.

“अब यह जिराफ खुद खड़ा नहीं हो सकता. उसकी काया ही उसकी दुश्मन है. कुदरत का तमाशा है. एक तिलचट्टा भी ऐसा ही लाचार जीव है. वह अगर उलट जाय तो कितना भी हाथ पांव मार ले, खुद सीधा नहीं हो सकता. उल्टे पड़े तिलचट्टे पर चींटियों का हमला होता है और वही उसकी मौत बन जाती हैं..

दूसरी तरफ तिलचट्टे के बारे में यह कहा जाता है कि क़यामत तक सिर्फ तिलचट्टे बचे रहेंगे, लेकिन जब तिलचट्टा मरेगा तो ऎसी ही असहाय मौत मरेगा. उसके आसपास लोग ताली बजा बजा कर उसकी बेबसी देखते हैं, लेकिन शायद ही कोई उसे सीधा कर देता हो.”

टीवी पर ब्रेक हो गया. अम्मा एक गिलास में गुनगुना पानी ले आईं.

“ बाबुल की दवा का टाइम है.”

पिताजी दवाएं ले कर आये. चाचा ने चुप रह कर दवाएं लीं. ब्रेक में सब तितर बितर हो लिये. ब्रेक अभी जारी ही था कि चाचा ने फिर बोलना शुरू कर दिया, हालांकि कमरे में कोई नहीं था.

“ कोई नहीं खड़ा कर पायेगा जिराफ को ऐसे.. न वह अमरीकी और न उस इलाके के लोकल लोग....यह इंसान के बस का नहीं है. उस इलाके में तो जिराफों की भरमार है... चार जिराफ मिल कर कोशिश करें तो एक गिरे हुए को मौत से बचा सकते हैं. उनकी लंबी गर्दनों में और पैरों में ज़बरदस्त ताकत होती है... वह एक दूसरे की भाषा भी समझते हैं... लेकिन नहीं. यही तो ट्रेजिडी है.”

चाचा इतना कह कर चुप हो गये. इस बीच पिताजी कमरे में आ गये. हमको भी आना ही था.

“ ... और तिलचट्टे...?” चाचा ने फिर बोलना शुरू कर दिया.

“ एक उल्टे पड़े छटपटाते तिलचट्टे को अगर चींटियाँ खींच कर ले जा सकती हैं तो फिर चार तिलचट्टे आ कर उसे सीधा क्यों नहीं कर सकते...? वो क़यामत के बाद भी जिंदा रहने वाले तिलचट्टे...? और उनका एक साथी देखते देखते मौत के मुंह में चला जाता है.”

चाचा क्षण भर को फिर चुप हो गये.

“ ...लेकिन इस दुनिया में कौन किसको बचाता है ?” इस बार चाचा की आवाज़ रोआंसी हो आयी थी.

“..... देखते देखते अपनी गोद में अपना और मेरा बच्चा लिये मर गयी मेरी मालती.. सभी मजबूत टांगों वाले डॉक्टर कंपाउंडर नर्स देखते रहे.. कस्बा, शहर महानगर.. अपने निजी डॉक्टर की जीप... सब धरी रह गयी. उल्टे पड़े तिलचट्टे की तरह चली गयी मेरी मालती...नन्हीं चींटियाँ उसे खीच ले गयीं”

चाचा बिलखने लगे. वह मालती के लिये, अपने बच्चे के लिये विलाप करने लगे. न जाने क्या क्या हिंदी अंग्रेजी में बोलने लगे, बे-सिरपैर का और बेतुका. बीच बीच में उनके मुंह से नंदिता का भी नाम आता जा रहा था...

“ ऊंची गर्दन वाले कितने ही चेयरमैन, डायरेक्टर थे नंदिता के चारों ओर...उसके लिखे रिसर्च पेपर्स के दम पर दो बड़े डायरेक्टर प्रमोट हुए और विदेश पहुँच गये. उसी के नंदिता साथ यह साज़िश भरा सलूक....उसे मजबूर कर दिया जाय कि वह अपना इस्तीफा सरकाए और चलती बने. उसका जाना लिये डिपार्टमेंट में एक गहरा सदमा बरसा गया. सब को पता था कि मिसेज़ नंदिता ने कोई गलत मुद्दे नहीं उठाये थे. वह अमेरिका से अपने विभाग का बारह साल का खास तजुर्बा ले कर भारत आईं थी. सचमुच उन्होंने अपने बाल धूप में सफ़ेद नहीं किये थे. लेकिन उनकी रिपोर्ट से पहले कंपनी के आका लोगों के चेहरे सफ़ेद हुए थे, फिर लाल और आखिर में कुटिलता से काले हो गये थे. मिसेज़ नंदिता की रिपोर्ट सारे विभाग के हित की बात कहती थी. सब उससे खुश थे, लेकिन जब अपने संघर्ष से हार कर वह जाने लगीं तो क्या रोका किसी ने मालती को ? किसी ने हिम्मत कर के पूछा भी नहीं कि अब क्या करेंगी मिसेज़ नंदिता ? यह उमर तो नई नौकरी पकड़ पाने की भी नहीं है.

नंदिता... मालती, मेरी औलाद, यह सब चतुर सयाने इंसानों के बीच वैसी ही मौत मरे, जैसी मौत उल्टा पड़ा तिलचट्टा मरता है, उन तिलचट्टों के होते हुए जो क़यामत के बाद भी बचे रहते हैं.”

चाचा अब बोल कम, बिलख ज्यादा रहे थे. शोर सुन कर रसोई से अम्मा बाहर आईं,

“ दौरा पड़ा है.” कह कर अम्मा चाचा को नींद की सुई लगाने की तैयारी करने लगीं

ज़रूरत को देखते हुए अम्मा ने सूई लगाने का यह काम सीख लिया है. उन्हें उम्मीद है कि एक दिन बाबुल यह सब दुनिया भर के बेमतलब गम भूल कर भले चंगे हो जाएंगे और काम पर लौटेंगे... और क्या, संसार में प्राणी का मरना जीना तो लगा ही रहता है.

सचमुच सयानी हैं अम्मा. उनकी उम्मीद जरूर फलेगी एकदिन.