priyansh Priya Vachhani द्वारा कविता में हिंदी पीडीएफ

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priyansh

नाम- प्रिया वच्छानी
पता- Bajrang palace B.k.no.208/1
opp.ganesh apt.
near bewas chowk
ulhasnager- 421001
thane maharshtra
Mob.no.
09765450444
सम्प्रति - स्वतंत्र लेखन ,देश व विदेश के प्रतिष्ठित समाचार पत्रों , व पत्रिकाओं में रचनाएँ प्रकाशित, आकाशवाणी रेडियो पर नियमित कार्यक्रम
प्रकाशित पुस्तकें - स्वप्न सृजन
अपनी-अपनी धरती ,
अपना -अपना आसमान
अपने-अपने सपने
सहोदरी सोपान
सृजन सागर -2
दीपशिखा
शब्दकलश
सम्मान - मांडवी प्रकाशन द्वारा "साहित्यगरिमा" सम्मान
अनुराधा प्रकाशन द्वारा "राष्ट्रभाषा रत्न" सम्मान ,"दीपशिखा सम्मान", "शब्द कलश सम्मान", "शब्द मधुकर सम्मान", "काव्य साहित्य सरताज", "संपादक शिरोमणि" एव भाषा सहोदरी द्वारा दो बार सम्मानित, E mail id-


1- अजन्मी बच्ची की पुकार
मुझे अपने गले से लगा लो न माँ
डर लगता है इस दुनिया से
बहुत ज़ालिम है ये दुनिया
मुझे अपने सीने में छुपा लो न माँ
न जाने क्यू लोग बेटियो को
कोख में ही मार देते है
बेटा पाने की चाह में
बेटियो की जान वार देते है
तुम मेरे साथ ऐसा न होने दोगी न माँ
बहुत ज़ालिम है यह दुनिया
मुझे अपने सीने में छुपा लो न माँ

इक बार जन्म लेने की
कोशिश की थी मैंने
अभी बस माँ की कोख ही देखी थी मैंने
फिर इक दिन न जाने कैसी हलचल हुई
देख अपने आस-पास हथियारों को
मेरे दिल में कुछ कंपन हुई
चुभा था मुझे जब वो हथियार
जोर से की थी मैंने चीख पुकार
माँ बचा लो मुझे कहते हुए
मैं बहुत चिल्लायी थी
पर शायद मेरी चीख माँ
के कानो तक पहुच न पाई थी
अब फिर यह अत्याचार तो
मुझ पर न होने दोगी न माँ
बहुत ज़ालिम है ये दुनिया
मुझे अपने सीने में छुपा लो न माँ

फिर एक बार मैं इस दुनिया में आई थी
अभी आँख मेरी खुलने भी न पाई थी
कि बाऊजी ने दूध के बर्तन में
मेरे होठो को सिया था
बड़ी घुटन हुई थी मुझे तब
जब कानो और नाक से
मैंने वो दूध पिया था
जिस दूध को पी मैं बड़ी होती तब
उसी दूध मे मेरी मौत हुई थी जब्त
तुम तो अब मेरे साथ फिर ऐसा
न होने दोगी न माँ
बहुत ज़ालिम है ये दुनिया
मुझे अपने सीने में छुपा लो न माँ

बेटी बिना संसार कैसे चलेगा
हो रिश्ता कोई भी
बेटी बिन कैसे फलेगा
गर लडकिया ही न होगी
तो कैसे कोई वंश बढ़ेगा
ये बात दुनिया को समझाओ न माँ
बहुत जालिम है ये दुनिया
मुझे अपने सीने में छुपा लो न माँ ।

2- माँ ======

देखा था कई बार मैंने उनको,
भीगी पलकों में मुस्कुराते
हसते हुए कई बार,
अपना दर्द सबसे छुपाते
चुपचाप सुनती रहती,
बातें वह सबकी
फिर भी देखा उनको,
सबपर सदैव प्रेम लुटाते
कभी न की शिकायत
किसी आभाव की
कभी न किया विरोध,
किसी अन्याय का
कभी सास, कभी ननद,
कभी पति के ताने
सुनकर भी अनसुना कर
वो चलती रहती अविरल सी
बिना अपने चेहरे पर
कोई शिकन लाये
मैं ही बिफर उठती,
कभी पूछती सवाल
क्यों चुपचाप सब, सहती हो माँ ?
क्यों सब सुनकर भी
अनसुना कर प्रेम धारा बन
बहती हो माँ ?
माँ उस समय भी केवल मुस्कुराती
कहीं अंदर ही अंदर
अपना दर्द छुपाती
कहती जब तुम बड़ी हो जाओगी
तब सब समझ जाओगी
जब हुई मैं बड़ी,
शादी सर पर आ पड़ी
तब माँ ने उन रहस्यों से
पर्दा एक दिन उठाया
और बड़े प्यार से तब
मुझे उन्होंने समझाया
औरत का जीवन इतना
आसान नहीं होता
बिन संघर्ष कोई
महान नहीं होता
दूसरों के लिए जीना ही
औरत का नाम है
पति, बच्चे,घरवालों की
ख़ुशी में खुश होना
औरत का एकमात्र काम है
धरती सी सहनशीलता रख
रिश्तों को सहेज संभालकर रखना
अंतस मन की पीड़ा को दबाकर
निरंतर प्रेम धारा बरसाना ही
औरत का दूसरा नाम है
गर्व होता अब मुझे खुद पर
मैं भी तुम्हारी तरह हो गई हूँ माँ
तुम्हारी ही तरह झूठी जिंदगी जीना
मैं भी अब सीख गई हूँ माँ
भीगी पलकों से अब
मैं भी मुस्कुराती हूँ
किसी को न अपना दर्द सुनाती हू
गर हो गई कभी इंतेहा दर्द की
तो आँखे बंद कर सपनो में
मैं तुम्हारी गोद में सो जाती हू
मन ही मन बता देती हू तुम्हे सारे दर्द
अपने सर पर तुम्हारे हाथो का
प्यार भरा स्पर्श तब पाती हूँ
आ जाती है एक नयी उमंग सी मुझ में
फिर मुस्कुराते हुए इस झूठी दुनिया का
सामना करने तैयार हो जाती हू ।

3- पापा =======

मन में भावनाओं का सागर हिलोरें खा रहा है
क्या लिखूं आपके बारे में पापा
समझ नही आ रहा है
लिखूं आपको ममता का सागर
या त्याग की मूरत लिख जाऊं
किन लफ़्ज़ों में बयां करूँ व्यक्तित्व
कोई शब्द न मिलने पा रहा है
आपने ही हमें जीना सिखाया
ऊँगली पकड़ राह चलना सिखाया
कदम दर कदम थामे रहे हाथ हमारा
संस्कारों का पाठ नित हमें पढ़ाया
सदा बने प्रेरणा आप हमारी
नित आगे बढ़ना हमें सिखाया
हर त्यौहार पर दिलाये हमें नए कपड़े,
खुद भले पुराने कपड़ों में त्यौहार मनाया
रहे हो चाहे खुद आभाव में पर कभी किसी आभाव का अहसास न हमें कराया
पूरी करते रहे हमारी हर ख्वाहिश
हमारे नित नए सपनो को सजाया
जाने क्यों दुनियां का दस्तूर ही रहा ऐसा
पिता को बनाया गंभीर व्यक्तित्व जैसा
कितने किये हैं त्याग हमारे लिए
नही कर पाया कभी कोई ऐसा
खुद से ज्यादा बच्चों को दिया आपने प्यार
हममें ही ढूंढा आपने अपना संसार
एकता से रहे हमारा परिवार
मधुर बना रहे सबका व्यवहार
प्रिया करती है आज आपसे वादा
इस सपने को जरूर पूरा करुँगी
जब तक अपनी सांसों संग जिऊंगी
एक रखूँगी परिवार को प्रेम बंधन में
भारत वर्ष में आपका नाम करूंगी।

4- देश के गद्दारों को समर्पित भाव =====================

कैसी इंसानियत है यह तुममे
कैसा यह गज़ब ढाते हो
खाते हो जिस थाली में खाना
उसी में छेद करने चले आते हो

कुछ तो शर्म आँखों में रखते तुम
देश के नमक की तो लाज रखते तुम
क्यों हर बार अपनी गद्दारी दिखा जाते हो
खाते हो जिस थाली में खाना
उसी में छेद करने चले आते हो

लाज आती है अब हमको
क्यों हम खुद पर ऐसा जुल्म ढाते है
तुम जैसे सांपो को हम क्यों
अपनी आस्तीन में पालते है
किन्तु भूल गये तुम एक बात
जो पालन जानते है सांप को
वो तोडना भी जानते है उनके दांत
क्यों हर बार जहर उगल दिखाते हो
खाते हो जिस थाली में खाना
उसी में छेद करने चले आते हो

मगर अब बस बंद करो
अपनी हैवानियत का यह गंदा नाच
गर आए हम अपने पर तो दिखा देंगे
तुमको तुम्हारी असली औकात
गर नही पसंद तुम्हे शान्ति तो
वतन से क्यों नही चले जाते हो
खाते हो जिस थाली में खाना
उसी में छेद करने चले आते हो

यह देश उन वीरो का है
जिसने देश की रक्षा की
भारत माँ की शान के लिए
अपने प्राणों की न परवाह की
क्यों ऐसे वीरो के हाथ
अपने लहू से गंदे करवाते हो
खाते हो जिस थाली में खाना
उसी में छेद करने चले आते हो ।

5- बहिष्कार===========

लग गयी है क्यों जंग
समाज के ठेकेदारों में
घूम रहे हैं बनकर ढोंगी
सत्ता के गलियारों में
चीख पुकार सुनाई न देती
मदमस्त हैं अपने उजियारो में
मासूम बच्चीयों की अस्मत
लुट जाती है अंधियारों में
घूम रहे देखो भूखे भेड़िये
गलीयों और चौबारों में

क्षोभ भरा अब मन में इतना
मिलता न मुझको करार है
दिल चाहता करना अब इन
बलात्कारियों का शिकार है
समझ न आता
फैला समाज में क्यों
इतना अत्याचार है
बच्चीयों में भी फर्क न समझे
कैसा ये व्यभिचार है

जिन कन्याओं को
माँ का स्वरुप समझ
सदैव पूजा जाता है
पैर पूजकर जिनके
स्वर्ग को पाया जाता है
वही मासूम बच्चीयों को
अपनी हैवानियत का
बनाना शिकार भला किस
धर्म में सिखाया जाता है ?

कैसे ये नर पिशाच
इतने घृणित हो जाते हैं
अपनी गन्दी मानसिकता में
कन्या की महत्ता न जान पाते हैं
कितना दर्द में तड़पी होगी वो बच्ची
उनकी चीख भी न सुन पाते हैं ?
क्यों हवस में इतने अंधे हो
इंसानियत को शर्मसार कर जाते हैं

ऐसे कृत्यों के बाद भी समाज
कैसे सभ्य कहलाता है
जिसकी राजधानी में ही
लड़कियों पर ऐसा
अत्याचार हो जाता है
कहाँ गए अब वो
पाखंडी साहित्यकार
जो धर्म के नाम पर
सम्मान वापस लौटाते हैं
ऐसी बच्चीयों के समय वो
क्यों कर मौन हो जाते हैं

करे इन दानवों का इलाज
ऐसी न्याय व्यवस्था चाहिए
सरेआम फांसी पर लटकाये इनको
अब ऐसा फैसला चाहिए
गर आएं पक्ष में घरवाले भी तो
ऐसे परिवार का समाज को
बहिष्कार करना चाहिये ।

6-मौत का सफ़र ==========

सोचती हूँ कभी-कभी कैसा होता है मौत का सफ़र
क्या गुजरती है मरने वाले के दिल पर
कभी इस जगह मैं खुद को रखती हूँ
और मरने के बाद की कल्पना करती हूँ

जिस दिन मैं मर जाऊँगी, कैसे मैं मुक्ति पाऊँगी
मरने के बाद मेरे अपने कैसे मुझे जलायेगे
जब चिता पर लिटा कर अग्नि स्नान करायेंगे
तब मेरे रोएं-रोएं जब आग में जल जायेंगे
बड़ी तकलीफ होगी मुझे, न जलन सह पाऊँगी
एक ऊँगली जलने पर रोती हूँ
पूरा शरीर जलता कैसे सह पाऊँगी
न बाबा न सोचती हूँ मरने से पहले
मैं यह वसीयत कर जाउँगी
चाहे दफना देना मुझे, जलना न सह पाऊँगी

फिर सोचती हूँ, जब मुझे दफनाया जाएगा
दफनाते वक्त मेरा धर्म आड़े आएगा
अच्छा है जो धर्म आगे आकर मुझे बचाएगा
वरना मिटटी में दब तो मेरा दम ही घुट जाएगा
धर्म की वजह से ही मैं तब बच जाऊँगी
न बाबा न मैं दफ़न न हो पाऊँगी

अब कुछ ज्ञानी अपना ज्ञान बघारने आएंगे
मुझे मुक्ति दिलाने को पैतरे आजमाएंगे
कहेगे न जलना चाहती है तो गंगा में बहायेंगे
जब गंगा में मुझे बहाया जाएगा
नाक, कानो में मेरे पानी भर जाएगा
बड़ी तकलीफ होगी मुझे तब, जब
मछलियों का ग्रास मुझे बनाया जाएगा

सोचती हूँ क्यों आग में जलूं, क्यों मीट्टी में घुट जाऊ
क्यों मछलियो की बनू ग्रास
इससे अच्छा क्यों न
मारना ही कैंसिल कर जाऊं ।

7-याद आ गया कोई ============

आज फिर याद आ गया कोई
भीगी हुई धड़कनों को
थमी-थमी सी इन साँसों को
सोई हुई आरज़ूओं को
आज फिर जगा गया कोई
आज फिर याद आ गया कोई

आँखों के इकरार को
खोये हुए उस प्यार को
लौट आने की उम्मीद को
सपनो के लिए मचलती नींद को
आज फिर उकसा गया कोई
आज फिर याद आ गया कोई

चल रही मध्यम सी पुरवाई को
कानों में गूंजती शहनाई को
उन यादों के मौसम को
आज फिर महका गया कोई
आज फिर याद आ गया कोई

मिट्टी की उठती सौंधी महक को
कोयल की चहकती कूक को
बरसते हुए पहले सावन को
आज फिर आग लगा गया कोई
आज फिर याद आ गया कोई

सपनो के उन रंगीन बादलों को
आवारा पागल से अरमानों को
पल दो पल की चैन वाली नींद को
आज फिर सता गया कोई
आज फिर याद आ गया कोई

चाँद से निकलती चाँदनी को
दिए से उसकी रौशनी को
इन हसीन वादियो की रंगत को
आज फिर बुझा गया कोई
आज फिर याद आ गया कोई ।

8-अलफ़ाज़ नहीं मिलते ==============

लिखना चाहती हूं बहुत लेकिन अलफ़ाज़ नहीं मिलते
छू जाए सीधे दिल को ऐसे अब हालात नही मिलते

मिलने को तो मिल जाते है कई हमराज़ ज़िन्दगी में पर
बिन कहे समझे दिल की बात ऐसे हमसाज़ नही मिलते

चलते-चलते बन तो जाते है कई हमराह राहो में
मगर हर किसी से तो अपने ख़यालात नहीं मिलते

पत्थरो के शहरो में भीड़ तो है क़यामत की लेकिन
आज इंसानो में ही इंसानो जैसे जज़्बात नही मिलते

कुछ ऐसे मसरूफ़ हुए हम ज़माने के दिए गमो में
कि ढूंढने पर भी अब ख़ुशी में डूबे लम्हात नही मिलते

हैरान हू आज देखकर अपनी ख्वाहिशो का समंदर
ऊँचे है जितने ख्वाब मेरे इतने ऊँचे आसमान नहीं मिलते ।

9-रात भर ======

कल यादों की शमा जलती रही रात भर
मैं बस यूं ही करवटे बदलती रही रात भर

नींद कोसो दूर भागती रही मुझसे और मैं
जागती आँखों से सपने बुनती रही रात भर

बहाना था कुछ अहसास लिखने का
स्याही मैं पन्नों पर बिखेरती रही रात भर

न लिख सकी कोई कलाम मोह्हबत का
खूबसूरत अल्फाज़ो को ढूढ़ती रही रात भर

ग़ुम हुई कुछ इस तरह वीरानियों के भँवर में
तन्हाइयां मुझसे तेरा पता पूछती रही रात भर

तमन्ना थी फूलों से सजाऊँ आशियाँ अपना
फूलों की चाह में कांटे चुनती रही रात भर

मचलती हवाएं ख़ुशबू बिखरा गई कुछ यूं
मैं यादों में डूबकर उभरती रही रात भर।

10-कहाँ खो गया कल =============

कहां खो गया हमारा
वो बीता हसीं कल
वो साथ बिताये हुए
कुछ प्यार भरे पल
वो लम्हें जिनमे हम साथ थे
ज़रा सी नजदीकियां
और प्यार भरे अहसास थे
क्यों हम एक दूजे से
यूं इतना दूर हुए !
क्यों हम ज़माने के आगे
इस कदर मजबूर हुए !
क्यों हम हार गये
ज़ुल्म-ओ-सितम के आगे !
क्या इतने कच्चे थे
हमारे प्रेम के धागे !
क्यों हम दुनियां का
सामना न कर पाये !
क्यों ये झूठे रीत रिवाज़
हम न तोड़ पाये !
आज भी टूट सकते है
ये रस्म-ओ-रिवाज़ सारे
आज भी हो सकते है हम
सिर्फ और सिर्फ तुम्हारे
मगर.........
क्या फिर वो ज़माना
लौट सकता है !
क्या फिर वो वक्त सुहाना
लौट सकता है !
क्या फिर आ सकते हैं
साथ बिताये वो पल !
क्या फिर आ सकता है
गुजरा हुआ हंसी वो कल !
क्या फिर तुम मेरे पहलू में
उसी तरह खो जाओगे !
क्या फिर तुम मुझे अपनी
बाहों में सुला के सो जाओगे !
क्या अब भी दीवानों जैसी
मोह्हबत है तुम्हें मुझसे !
क्या अब भी वही ऐतबार है
तुम्हे मुझपे ....!
डर लगता है शीशे के ख्वाब मेरे
कहीं फिर टूट न जायें
कहीं फिर गमों की आँधियाँ
मेरी आशा की लौ न बुझायें
कहीं फिर कोई मेरी राहों में
स्याह अँधेरे न बिखराये ।

11- दूरियां बनायीं जायें================

इससे पहले के दरारे हमारे दिलो में पड़ जाये
संग चलते -चलते हमारी राहे जुदा न हो जाये
कि हम कभी साथ चलने को भी तरस जाये
बेहतर है कि अब कुछ दूरियां बनाई जाये......

आँख के पास की चीज़ भी दिखती नही कभी
थोड़ी दूरी हो तो चीज़े अच्छी लगती है सभी
ज्यादा करीबियां आँखों को अँधा न कर जाये
बेहतर है कि अब कुछ दूरियां बनाई जाये ....

ऐसा न हो कि दुरिया हम में इतनी बढ़ जाये
कि कभी मिलने के लिये भी हम तरस जाये
फासले कही इतने तेरे मेरे दरमिया न हो जाये
बेहतर है कि अब कुछ दूरिया बनाई जाये .....

सुना है ज्यादा नजदीकियां भी खटास लाती है
दिलो से दिलो को यह जुदा भी कर जाती है
कही हम अपने हाथो से अपना न ये रिश्ता गवाये
बेहतर है कि अब कुछ दूरियां बनाई जाये......

12-नाज़ है मुझे
================
कब चाहा है मैंने के तुझे सिर्फ अपना बनाऊ
मैं सिर्फ तेरी हूं ....इस बात पर नाज़ है मुझे

कब चाहा है मैंने के तुझे पास अपने बुलाऊ
मैं सिर्फ तेरे पास हूं इस बात पर नाज़ है मुझे

कब चाहा है मैंने के तेरे सपनो में रोज़ मैं आऊ
मैं सिर्फ तेरे सपने देखूं इस बात पर नाज़ है मुझे

कब चाहा है मैंने के तुझे दामन से अपने बाँध लूं
मैं सिर्फ तेरे पहलू में हूं इस बात पर नाज़ है मुझे

कब चाहा है मैंने के तुझ संग हँसी के पल बिताऊ
मैं सिर्फ तेरे दर्द बाँटू इस बात पर नाज़ है मुझे

कब चाहा मैंने के तेरे अधरों पर हसी बन बिखर जाऊ
मैं सिर्फ तेरीआँखों का पानी नहीं इस बात पर नाज़ है मुझे ।

13-सत्य का कहाँ कोई अब रखवाला है ======================

सत्य का कहाँ कोई अब रखवाला है
झूठ का चहुँ और चलता बोल बाला है

झूठा ढोल पीट-पीटकर कहता अपनी
सच की ज़ुबा पे दुनिया लगाती ताला है

झूठे को बिठाते पुचकार कर गोद में अपनी
लोग करते अब तो सच का ही मुँह काला है

झूठ मिटाने में लगा है सच के वर्चस्व को
मगर कब सच को इसने अपने रंग में ढाला है

हैरान हूँ देखकर लोगो के दोहरे व्यक्तित्व को
कैसे अपनी ही आस्तीन में इन्होंने साँप पाला है

अब तो झूठ का ही साथ देते हैं मिलकर सब
सच अकेला खड़ा अपने पाँव में लिए छाला है

झूठ चढ़कर बुलंदी पर परचम है फहराता
अब तो सच का बस खुदा ही रखवाला है।

14-अस्मत को लुटते देखा ===============

मानव अधिकार की धज्जियों को उड़ते देखा
हमने पल-पल यहाँ बच्चीयों को मरते देखा

थी जिनकी उम्र अभी गुड्डे-गुड़ियों संग खेलने की
उन्ही बच्चीयों के पेट में पाप को पलते देखा

मासूम बच्चीयां पैदा करती अनचाही संतान को
बच्ची हो कोख में तो विवाहिता का गर्भ गिरते देखा

ये कैसी लचर क़ानून वयवस्था है इस देश की
बलात्कारियों को खुले आम विचरण करते देखा

नहीं रही महफूज़ बेटियां अब अपने घरो में भी
बाप के हाथों भी बेटी की अस्मत को लुटते देखा

कभी मारी जाती कोख में, कभी पैदा कर फेकी जाती
दहेज़ के लोभियों के हाथों तिल-तिल कर जलते देखा

मानवता हो रही है शर्मसार हर रोज आज यहां
हवस के अंधे इंसानो को दानवों का रूप धरते देखा।

15-सम्मान वापसी ===========

खरबूजे को देखकर जैसे खरबूजा रंग बदल रहा है
वैसे ही सम्मान वापस करने का नया दौर चल रहा है

साहित्यकार फिर वैज्ञानिक अब अभिनेता इस राह आये हैं
चाटुकारिता से पाया था जो सम्मान वह लौटाने आये हैं

क्या सचमुच साम्प्रदायिकता की ऐसी आँधी आई है!
या यह नोटँकी विपक्षी दलों और मीडिया द्वारा फैलाई है!

क्या इतने दंगे हो रहे जो कोई और राह न दी दिखालायी है!
या फिर देश की तरक्की, अमन, शान्ति इनको रास न आई है !

ऐसा नहीं इतने सालों में देश में कोई ऐसी घटना न घटित हुई
पर अब तक इनका ज़मीर क्यों न जागा था सोचकर मैं चकित हुई

एक दादरी की बात पर इन बुद्धिजीवीयों नें इतना शोर मचा लिया
हुए कश्मीरी पंडित जब बेघर तब क्यों था मुँह में दही जमा लिया

हो साहित्यकार,वैज्ञानिक या अभिनेता इसी देश का खाते हैं
फिर क्यों आज एक पक्ष का सोचकर ज़हर उगल दिखाते हैं

वापस है लौटाता अपना सम्मान आज यह हकला इंसान
जिसनें कहा था मोदी के प्रधानमंत्री बनते ही जाऊँगा पाकिस्तान

क्या हम नहीं जानते कैसे बन गए तुम इतने महान
क्यों ऐसी हरकतें कर तुम खुलवाते हो हमारी जुबान

माना लोकतंत्र है तुम बेहिचक मन की बात बोल सकते हो
पर क्या बोलना है, खुद भी तोअपने शब्दों को तोल सकते हो

चुपचाप जो काम आज तक करते हो वो तुम करते जाओ
देश का नमक खा कर देश से गद्दारी तो न कर दिखलाओ।

16-ज़िन्दगी =======

जिंदगी बन कर तेरी मेरी कहानी रह गई,
आँखों में मेरी बस अश्कों की रवानी रह गई,

रास ना आया मेरा आँचल फूलों को कभी,
काँटे ही दामन में इकलौती निशानी रह गई,

हसरतों की कब्रगाह होकर मेरा दिल रह गया,
चाहतें सारी की सारी अब रूहानी रह गई,

मिल नहीं पाईं मुकम्मल मंजिलें मुझको कभी,
राहें सारे शहर की मुझसे बेगानी रह गई,

शोर सन्नाटों का सुनती ही रही मैं रात भर,
खामोशियाँ होकर शर्म से पानी पानी रह गई,

मैं किसी की दुआओं में शामिल हो न सकी,
इश्क की राहों में तनहा मैं दीवानी रह गई।

17-संत कबीर=======

अनिर्वचनीय है
संत कबीर की महिमा
न कर सकता कोई
कभी इनका बखान
हम है इक छोटी सी चींटी
वह थे कवी बड़े महान
थे भक्ति काल के
इक ऐसे कवी वो
सामाजिक आडम्बरो
पर जो करते प्रहार
थे समाज सुधारक
लोक कल्याण पर
देते थे अपनी जान
कोई कहता लहरतला तालाब
के कमल पर हुए प्रकट
कोई कहता काशी की ब्राह्मणी
की थे वो संतान
पालन-पोषण हुआ
एक जुलाहे के घर
हिन्दू-मुस्लिम फकीरो से
अर्जित किया था ज्ञान
एक ही मानते ईश्वर को
कर्मकाण्ड का करते विरोध
ललकारते पाखंडियो को
ढ़ोगियो पर करते व्यंग्य बान
हो भारत में चर्चा किसी भी भाषा
या हो चर्चा किसी भी संस्कृति की
बिन कबीर की चर्चा के
पूरा न हो सका कोई व्याख्यान
अरबी ,फ़ारसी, बुन्देलखंडी,
पंजाबी ,ब्रजभाषा, खड़ीबोली
इन भाषाओ के शब्द मिलते
इनकी रचनाओ में
पंचमेल खिचड़ी या सधुक्कड़ी भाषा
कहा जाता इनकी बोली को
जिनका न था कही कोई सान
जब मगहर में त्यागी देह
तब हुआ हिन्दू-मुस्लिम विवाद
हिन्दू चाहते हिन्दू रीत से
मुस्लिम चाहते मुस्लिम रीत
से हो अंतिम संस्कार
जब हटाई देह से चादर
तो वहा था फूलो का अम्बार
आधे फूल लिए हिन्दू
करने चले अंतिम संस्कार
आधे फूल लेकर मुस्लिम
ने बनाई उनकी मजार
आज भी पूजते मगहर में
उनकी मजार को
चाहे हिन्दू हो चाहे मुसलमान ।

18-बढ़ना चाहती हूँ ==========

जब भी बढ़ना
चाहती हूं आगे
देना चाहती हूं
हसरतो को उड़ान
इक डोर आकर
खींचती है मुझे
रोकना चाहती है
मेरी उम्मीदों की उड़ान
मायूस , हताश होकर
चुप बैठ जाती हू
सोचती हू ......
क्या उड़ना बुरा है ?
क्या सच में .....
ज़माना इतना बुरा है ?
जो किसी को आगे
बढ़ने नही देना चाहता
जो किसी को तरक़्क़ी
करते देखता नहीं चाहता
गर निकली है
औरत घर से बाहर
मिलाना चाहती है
कदम से कदम
देना चाहती है अपनी
भावनाओ को शक़्ल
बनाना चाहती है अपनी
इक नयी पहचान
तो क्या वह गलत है ????
गर घर के काम निपटा कर
अपने सारे धर्म निभाकर
कुछ पढ़ने कुछ लिखने के लिए
कुछ पल अपनी ही
ज़िन्दगी से चुराकर
देना चाहती है
खुद को नयी पहचान
तो क्या वह बुरी है ????
नही.................
फिर एक झटके से
उठ खड़ी होती हू
अपने इरादों को और
मजबूत करते हुए
इस दुनिया से मुकाबला कर
अपनी पहचान बनाने के लिए
एक नए जोश ,
नयी उम्मीद के साथ
अब न रुकूँगी कभी
अब न थकूँगी कभी
यह सोचते हुए देती हूँ
अपने पंखो को परवाज़ ।

19-जी लू ज़रा =========

गर तुम इजाजत दो तो खुश हो लू ज़रा
बैठ के तुम्हारे पहलू में हस लूं रो लूं ज़रा

दिन जो बचे हैं जिंदगी के अब थोड़े से
उन्हें तुम संग जी भर के जी लूं ज़रा

दुनिया के सामने समझदार बनती रही हरदम
गर बुरा न मानो तो तुम संग बचपन जी लूं ज़रा

तकदीर में जो लिखा होगा वो देखा जायेगा
जी चाहता है तकदीर से मुंह मोड़ लूं ज़रा

रफ्ता-रफ्ता खत्म हो रहा है सफर जिंदगी का
गर इजाजत दो तो चंद सांसे महका लूं ज़रा

अब के सोई तो शायद उठ न पाऊंगी कभी
कहो तो थोड़े सपने तुम संग बुन लूं ज़रा

गर तुम इजाजत दो तो खुश हो लूं ज़रा
बैठ के तुम्हारे पहलू में हस लूं रो लूं ज़रा ।

20-जीना सिखा रहा है कोई ===============

मेरे सूने सफर में ऐसे साथ निभा रहा है कोई
इस बेजान बुत को जीना सिखा रहा है कोई

अंधेरों के घने सायों से निकालकर मुझे
उजालों के बीच रहना सिखा रहा है कोई

कभी थी मैं पत्थर की मूरत के मानिन्द
तराश कर मुझे हीरा बना रहा है कोई

जिंदगी थी मेरी इक सूने रिगिस्तान सी
मगर इस सेहरा में गुल खिला रहा है कोई

मैं तो थी पानी की इक छोटी सी बूंद जैसी
मुझे फूलों पे शबनम सा बना रहा है कोई

जो कल तक थी इक टूटे हुए शीशे सी
उसे आईना-ए-हयात बना रहा है कोई

ये सिला मिला है मुझे मेरी वफाओं का "प्रिया"
मुझे खुद से मुहब्बत करना सिखा रहा है कोई ।

21-व्यथा ======

चित्कार रहा आज मेरा मन
भीगा है आँसूओं से दामन
क्या की थी मैंने ऐसी खता
जो तार-तार किया तुमने मेरा दामन
गर लड़की होना कसूर था मेरा
तो क्यूं लड़की के रूप में न दिखी
तुम्हें तुम्हारी माँ और बहन

लूटकर अस्मिता मेरी
क्या तुमने पाया है
महज चंद मिनटों के
जोश में तुमने
एक मासूम का जीवन गंवाया है
अब कैसे सामान्य जीवन
जी पाऊंगी मैं
तुम्हारे इस कृत्य के बाद
अब कैसे घरवालों से
नजरें मिला पाऊंगी मैं
तुम्हारा यह घिनौना
रूप देखने के बाद

कौन अपनाएगा अब मुझे
कौन थामेगा अब मेरा हाथ
सच कहना !
क्या तुम ही चलना पसंद करोगे
जीवन भर ऐसी लड़की के साथ !
गर नहीं !
तो किसने दिया था तुम्हें यह अधिकार
जीवन उजाड़ देना किसी मासूम का
क्या यही थे तुम्हारे संस्कार !

कभी सोचा तुमने क्या होगा मेरा हाल
किस कदर हुआ होगा मेरा मन तार-तार
किस कदर महसूस किया था मैंने
खुद को बेबस और लाचार
ज़रा दिल पर हाथ रखकर बताना तुम
क्या कभी सह पाओगे तुम अपनी
बहन या बेटी पर होते यह अत्याचार !

गर नहीं
तो क्यूं किसी की बेटी पर
यह जुल्म ढाया है
क्यूं शर्मिंदा कर के उसको
अपनी मर्दानगी का सबूत दिखाया है
क्या औरत को दबाना , कुचलना
यह मर्दानगी है !

गर नहीं
तो क्यूं मैं महसूस करूं खुद को शर्मसार
क्या गलती की थी मैंने !
असल मैं तो तुम हो गुनहगार
शर्मसार तो तुम हो जिसने
मुझे इक खिलौना समझ रौंदा है
शर्मसार हो वह दहलीज
जहां तुमने ऐसे संस्कार पाये हैं
शर्मसार तो होती होगी वह कोख
जिसको तुमने आज छला है ।

22-कदम से कदम मिलाऊँ कैसे=================

इस तेज़ रफ्तार से चलते लोगों से
कदम से कदम मिलाऊं कैसे

चल रहे हैं सब अपने हमसफर के संग
मैं अकेली मंजिल को पाऊं कैसे

भुलभुलैया सी लगती है यह दुनियां
मैं अपनी राह बनाऊं कैसे

चली तो थी मैं इक कारवां के साथ
अब तन्हा वापस जाऊँ कैसे

हर इक शख्स लगता है बेगाना सा
किसी को हमराज बनाऊ कैसे

हस तो लेती हूं दुनियां के साथ पर
तन्हाई में आँखों की बरसात छुपाऊं कैसे

इस तेज रफ्तार से चलते लोगों से
कदम से कदम मिलाऊ कैसे ।

23-राखी =====

इस राखी पर भैया
मुझे बस यही तोहफा देना तुम
रखोगे ख्याल माँ-पापा का
बस यही एक वचन देना तुम
मुझे न चाहिए सोना-चाँदी
न चाहिए हीरे-मोती
मैं इन सब चीज़ों से
कहाँ सुख पाऊँगी
देखूँगी जब माँ-पापा को
पीहर में खुश
तो ससुराल में चैन से
मैं भी जी पाऊँगी
अनमोल हैं ये रिश्ते
इन्हें यूँ ही न गवां देना तुम
रखोगे ख़याल माँ-पापा का
बस यही वचन देना तुम

वो कभी तुम पर या भाभी पर
गुस्सा हो जाएंगे
कभी चिड़चिड़ाहट में
कुछ कह भी जाएंगे
न गुस्सा करना
न पलट कर कुछ कहना
उम्र का तकाज़ा है यह
भाभी को भी समझा देना तुम
रखोगे ख़याल माँ-पापा का
बस यही वचन देना तुम

बेटी हूँ मैं, शायद
रोज ससुराल से न आ पाऊँगी
जब भी पीहर आऊँगी
इक मेहमान बनकर आऊँगी
पर वादा है
ससुराल में संस्कारों से
पीहर की शोभा बढ़ाऊगी
तुम तो बेटे हो इस बात को
न भुला देना तुम
इस राखी पर भैया मुझे
बस यही तोहफा देना तुम
रखोगे ख़याल माँ-पापा का
मुझे बस यही वचन देना तुम।

24- बाकी है =========

मन के सूने हुए कोने में इक याद अभी बाकी है
ज़ख्म सारे भर गए हैं पर दाग अभी बाकी हैं

समेटी है शमाओं ने बिखरी रौशनी अपनी
दिल में मेरे उम्मीदों का चराग अभी बाकी है

मिटा दिए हैं सबूत उसने अपनी बेवफाई के
दिल मेरा बनकर इक सुराग अभी बाकी है

इक ख़ुशी की तमन्ना में बीती उम्र सारी मेरी
लगता है ग़म का इक सैलाब अभी बाकी है

यूँ तो बिखरते रहे सपने ताउम्र ही मेरे, लेकिन
टिमटिमाता हुआ इक ख्वाब अभी बाकी है

ज़िन्दगी नें सिखाया इक नया सबक हमें लेकिन
मांगी हुई दुआ का हिसाब अभी बाकी है।

25- दिल अब फरेब का सामान हो चला है =========================

लहज़ा इस कदर बदजुबान हो चला है
दिल अब फरेब का सामान हो चला है

रास न आती है मोह्हबत की बातें इसे
बेवफाई ही इसका ईमान हो चला है

न डर ज़माने का, न ख़ौफ़ है खुदा का
कुछ इस कदर ये बदगुमान हो चला है

रास आया काँटों का दामन इस कदर कि
बहारों में भी गुलशन वीरान हो चला है

फैली देख वहशत धर्म के नाम पर इतनी
जानवर भी डरकर अब इंसान हो चला है

बढ़ गयी हैं रिश्तों में दूरियां इस कदर कि
साँझा चूल्हा बस अब एक नाम हो चला है।