purnta ka abhaas Priya Vachhani द्वारा लघुकथा में हिंदी पीडीएफ

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purnta ka abhaas

शाम का समय केफै में चहल-पहल थी , अपने लिए बैठने की जगह ढूंढ़ते हुए कामिनी को अचानक एक परिचित सा चेहरा दिखाई दिया , जैसे ही वह उस चेहरे के पास गयी अनायास ही उसके मुंह से निकला "मधुर तुम ! "
मधुर भी उसे पहचानते हुए बोल पडी " अरे कामिनी तुम यहां ! तुम तो विदेश गयी थी ना आगे की पढाई करने ! " "
हां यार गयी थी और पूरी कर के वापस यहीं आ गयी" मधुर के पास वाली कुर्सी पर बैठते हुए कामिनी ने कहना जारी रखा , " मगर जो अपनापन और सुकून अपने देश में है वह परदेश में कहां ! इसलिए यहीं पर एक कंपनी में अच्छे पद पर हूं , अच्छा कमाती हूं " "
पतिदेव क्या करते हैं ? और बच्चे कितने हैं ?" मधुर ने पूछा "
नहीं यार सोचा पहले करियर से बना लूं अभी पति , बच्चों की जिम्मेदारी और घर के बंधनो में नहीं बंधना चाहती ,अभी आजाद पंछी हूं , जब चाहूं कहीं भी आ जा सकती हूं कोई रोक-टोक नहीं , तुम सुनाओ ! माथे पर चाँद सी गोल बिंदीया , चमकता सिंदूर , कंगन , साडी पहने हुए पूरी भारतीय नारी लग रही हो , कितने बच्चे हैं ?"
मधुर मुस्करा कर कहने लगी " दो बेटीयां हैं , पति बिजनस मैन हैं ।" "
और तुम ? तुम क्या करती हो ?" कामिनी ने पूछा "
मैं ,घर संभालती हूं , हाऊस वाईफ हूं , शापिंग करते हुए थक गयी तो यहां काफी पीने बैठ गयी " मधुर ने बुझे स्वर में कहा
बातों -बातों में विदाई लेने का समय आ गया दोनो ने फिर मिलने का वादा करते हुए विदा ली ।
उस दिन से मधुर कुछ बुझी-बुझी सी रहने लगी थी सोचती कितनी आजाद है ना कामिनी , न घर की न बच्चों की जिम्मेदारी , न कोई रोकने -टोकने वाला कितनी शानदार जिंदगी है ।
कुछ दिनों बाद अचानक घर के दरवाजे पर कामिनी को देखकर मधुर ने हैरानी और उत्सुकता से उसका स्वागत किया "आज अचानक कैसे आना हुआ ?" "
सच कहूं मधुर ! तो उस दिन तुम्हें पूर्ण भारतीय नारी के रूप में देखकर मुझे बहुत खुशी हुई और अपनी कमी का अहसास भी , ये भी कोई जिंदगी है न कोई पूछने वाला कि खाना खाया कि नही! न कोई बोलने वाला, कितना भी करियर क्यूं न बना लूं मगर परिवार की कमी कोई नहीं पूरी कर सकता , इसलिए जिस लड़के से प्यार करती थी उसी से अगले हफ्ते शादी कर रही हूं , तुझे अपने पूरे परिवार के साथ आना है !" "
हां जरूर आऊँगी , यह भी कोई कहने की बात है !" कहते हुए मधुर की आँखों में चमक आ गयी थी ,उसे अब अहसास हो गया था कि कामिनी की जिस आजादी को देखकर उसे खुद से शिकवा था वह आजादी नहीं बल्कि अधूरापन था , परिवार के बिना कैसी पूर्णता ।

नाम- प्रिया वच्छानी
पता- Bajrang palace B.k.no.208/1

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Mob.no. 09765450444
सम्प्रति - स्वतंत्र लेखन ,देश व विदेश के प्रतिष्ठित समाचार पत्रों , व पत्रिकाओं में रचनाएँ प्रकाशित, आकाशवाणी रेडियो पर नियमित कार्यक्रम
प्रकाशित पुस्तकें - स्वप्न सृजन
अपनी-अपनी धरती ,
अपना -अपना आसमान
अपने-अपने सपने
सहोदरी सोपान E mail id-