राजसभा महेश रौतेला द्वारा कविता में हिंदी पीडीएफ

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राजसभा

राजसभा-१

कौरव-प्रतिनिधि दुर्योधन था

पांडव युधिष्ठिर के साथ खड़े थे,

भीष्मपितामह, गुरुजन भी

उसी सभा में बैठे थे।

राजसभा के भीतर झाँका

द्यूतक्रीड़ा के पासे थे,

अनैतिक इस क्रीड़ा के

मूकदर्शक सब महारथी थे।

द्रौपदी तो अग्निगर्भा थी

हवन उसी में होना था,

महाभारत की नींव वही थी

राजा अंधा, पुत्रमोह था।

श्रीकृष्ण तो सूक्ष्म बने थे

विराट अक्ष घूम रहा था,

बुद्धि भ्रष्ट थी,इधर-उधर थी

जब राजसभा में द्यूत चला था।

राजसभा-२

पासा शकुनि के धूर्त हस्त में  

द्वापर  का अंश शकुनि था,

दुर्योधन विनाश का पहिया

कलियुग उसके मन में था।

शकुनि के पासे में

आत्मा जीत की बैठी थी,

उसने जो अंक माँगा

वही खुल कर आत था।

द्रौपदी एकान्त में बैठी

वह अग्नि से पैदा थी,

दूषित मन के पास उसे

खींच दुशासन लाया था।

क्यों जर्जर मन से महारथी

देख रहे थे विनाश लीला,

वह अग्नि से उपजी कन्या

श्रीकृष्ण को पुकार रही थी।

राजसभा-३

हाँ,हाँ  युधिष्ठिर तुम भी तो

अपनी सीमा लाँघ चुके थे,

भाई-भार्या सबको तो

अपने दाँव पर हार चुके थे।

कृष्ण सूक्ष्म थे, वहीं खड़े थे,

सबकी रचना देख रहे थे,

चुप रहने का अपराध भीष्म का

मन ही मन सोच रहे थे।

द्रौपदी को  कृष्ण याद थे

न्याय सूक्ष्म परिक्रमा में था,

विधि की बातें विधि ही जाने

राजसभा को ढहना ही था।

बारह साल का वनवास तय था

षड्यंत्रों का जाल बिछा था,

गुप्तकाल कठिन चुना था

द्यूतक्रीड़ा का परिणाम वीभत्स था।

राजसभा-४

राजसभा मौन पड़ी थी

विदुर विरोध में बोल रहे थे,

अनिष्ट की भविष्यवाणी

धृतराष्ट्र को सुना रहे थे।

खेल-खेल में राज्य लुटा था

मर्यादा का हनन हुआ था,

अधर्म धर्म पर भारी था

ऐसा भाइयों का बँटवारा था।

राजपरिवार की परंपरा में

अँधा राजा बन बैठा था,

भूमि युद्ध की सजनी थी

गीता श्रीकृष्ण को कहनी थी।

मानव में क्या है ऐसा

जो रण तक उसको लाता है!

प्राणों की गति को वह

बाँधकर नहीं रख पाता है।

राजसभा-5

एक दिन की द्यूतक्रीड़ा

वर्षों का वनवास,

छल छाया था पग-पग पर

नहीं कहीं प्रिय निवास।

श्रीकृष्ण तो सूक्ष्म थे

दुर्योधन को नहीं दिखते थे,

आँधे राजमहल में दिये जला

 द्यूत जीत में  सुख दिखते थे।

उदय-अस्त शाश्वत था

मानव मन में विकार वृहत था,

वरिष्ठ सब चुप्पी साधे

मोल चुकाना शेष बहुत था।

कृष्ण तो सूक्ष्म बहुत थे

द्रौपदी के साथ खड़े थे,

थका था नीच कुकृत्य में

फिर भी दुर्योधन नहीं समझा था।

राजसभा-६

श्रीकृष्ण तो अति सूक्ष्म थे

पर सबके जीवन ज्ञाता थे,

मर्यादा का शव खींचते

राजसभा में दुष्ट बिछे थे।

समय चर्चा में व्यस्त लगा था

आगत का चित्र लिए था,

कुरुवंश के क्षण-क्षण को

एक पासे में बटोर रहा था।

होनी को होने दो

श्रीकृष्ण का विचार लगा था,

आगे कितने खंदक थे

युधिष्ठिर को भान नहीं था।

हर चाल शकुनि की

कुल घातक थी,

जीत दुर्योधन की

नीच- कपट थी।

चौसर का यह खेल नहीं था

यहाँ महाभारत का आगाज लिखा था,

यहाँ नारी की प्रतिष्ठा को

अमिट-अटूट आघात लगा था।

राजसभा-७

पल-पल ग्रह घूमते

लोभ राज्य का बढ़ता जाता,

चक्षुहीन राजा के आगे

पुत्रमोह शिशु बन जाता।

अति सूक्ष्म हो कृष्ण ने यहाँ

 लाज वस्त्र बढ़ाया था,

पर अपमान का घूँट लिये

भीम भीषण प्रण बाँध लिये।

लिखा हुआ था पासे के अन्दर

भाग्य किसी का,दुर्भाग्य किसी का,

वनवास वहाँ, राज्य वहाँ

अपमान का सारा ज्ञान वहाँ।

मरना भी शुद्ध होना है

ऐसा कुछ ईश्वर कहते हैं,

मरना भी शुद्ध होना है

ऐसा कुछ ईश्वर कहते हैं,

प्रत्यंचा चढ़ा तू धर्म अतुल्य

अधर्म पर विजय पा,कहते हैं।

राजसभा-८

समय कहीं पर बँधा नहीं था

वह निर्विकार ही चलता था,

चीरहरण का मंतव्य लिए

समय शर्म से झुका हुआ था।

गोकुल में गाय चराने वाला

राधा के आगे झुकने वाला,

वृहद होनी भाँप गया था

अपनी सृष्टि में डोल रहा था।

वह नहीं बोला,"पासे रुक जा तू"

नहीं बोला "दुर्योधन हट जा तू",

नहीं सभा को ललकारा था

बस, द्रौपदी के संग खड़ा था।

दुशासन की शक्ति का लोप हुआ

उसके वक्ष से लहू निकलना था,

दुर्योधन की जंघाओं पर

गदा का प्रहार होना था।

जो रण आगे होना था

वहाँ "गीता" का उदय निश्चित था,

पासे रण के संग लिए

श्रीकृष्ण पांडवों के संग खड़े थे।

राजधर्म-९

राजधर्म से बाहर राजा

कुशल नहीं अकुशल था राजा,

राजसभा में द्यूत चला था

राजा चुप निरीह पड़ा था।

पुत्रमोह विनाश बना था

अकारण विपत्ति को न्योता था,

महारथी चुप बैठे थे

क्या राज- सुखों से बँधे हुये थे?

जब लोभ मन में घर कर जाता

कीड़े जैसा मानव बन जाता,

त्याग-तपस्या मर जाती 

द्यूत राज सभा में आ जाता।

मन की आँखें अंधी हो

विपुल कुचक्र-षड्यंत्र  रचती,

भोर के आने तक राज में

गहन रात छायी रहती। ----।