उन्होंने मुझ पर अपने फैसले नहीं थोपे थे। उन्होंने मुझे अपनी बात रखने का मौका दिया था, मेरी राय को महत्व दिया था और अब वह मुझसे एक ऐसा रिश्ता माँग रहे थे, जिसे स्वीकार करने के लिए शायद मैं खुद भी तैयार नहीं था।
मैं उन्हें देखता रहा।
मेरे मन में कई सवाल उठ रहे थे।
अगर मैं उन्हें पिता मान लेता, तो क्या अपने उस अतीत से दूर हो जाता, जिसमें मैंने अपने असली पिता की कल्पना की थी?
क्या माँ की खुशी के लिए मुझे यह रिश्ता स्वीकार कर लेना चाहिए?
मैंने माँ की तरफ देखा। उनकी आँखों में उम्मीद थी। वह कुछ कह नहीं रही थीं, लेकिन उनके चेहरे से साफ़ पता चल रहा था कि वह चाहती हैं मैं हाँ कह दूँ।
मैंने फिर ठाकुर साहब की तरफ देखा।
वह मेरे जवाब का इंतज़ार कर रहे थे। उनके चेहरे पर न कोई दबाव था, न नाराज़गी। बस एक उम्मीद थी कि शायद मैं उन्हें वह जगह दे दूँ, जिसकी इच्छा उन्होंने आज पहली बार मेरे सामने जाहिर की थी।
मैंने गहरी साँस ली।
"ठाकुर साहब..."
मेरे मुँह से उनके लिए वही पुराना संबोधन निकला।
माँ की आँखों में एक पल के लिए हल्की-सी निराशा दिखाई दी, लेकिन उन्होंने कुछ नहीं कहा।
मैंने अपनी बात आगे बढ़ाई।
"मैं आपकी इज़्ज़त करता हूँ। आपने मेरे साथ हमेशा अच्छा व्यवहार किया है। मैं यह भी जानता हूँ कि आप जो कुछ कर रहे हैं, उसके पीछे आपकी अपनी वजहें हैं। लेकिन..."
मैं कुछ पल के लिए रुक गया।
"लेकिन मैं अभी आपको अपने पिता के रूप में स्वीकार करने के लिए तैयार नहीं हूँ।"
माँ का चेहरा उतर गया।
कमरे में अचानक खामोशी छा गई।
मैंने जल्दी से अपनी बात स्पष्ट करने की कोशिश की।
"इसका मतलब यह नहीं है कि मैं आपको गलत समझता हूँ या आपके साथ मेरा कोई विरोध है। बात बस इतनी है कि मैंने अपने जीवन का बहुत बड़ा हिस्सा अपने पिता के बिना बिताया है। उनके बारे में मेरे पास सिर्फ़ कुछ यादें हैं, कुछ बातें हैं, और नानी की कही हुई कुछ बातें हैं। मैं उस रिश्ते को कभी समझ ही नहीं पाया। इसलिए किसी दूसरे इंसान को उस जगह पर स्वीकार करने में मुझे वक्त लगेगा।"
ठाकुर साहब मेरी बात ध्यान से सुनते रहे।
मैंने आगे कहा, "मैं नहीं चाहता कि सिर्फ़ माँ की खुशी के लिए या आपकी संपत्ति और नाम के कारण मैं कोई ऐसा रिश्ता स्वीकार कर लूँ, जिसे मैं अभी दिल से महसूस नहीं करता। अगर कभी मैं आपको पिता कहूँगा, तो वह मेरे दिल से निकला हुआ शब्द होना चाहिए, किसी मजबूरी में कहा गया शब्द नहीं।"
मेरी बात खत्म हुई, तो कुछ देर तक कोई कुछ नहीं बोला।
मुझे डर था कि शायद ठाकुर साहब मेरी बात से नाराज़ हो जाएँगे। आखिर मैंने उनके इतने बड़े प्रस्ताव को स्वीकार करने से मना कर दिया था।
लेकिन उन्होंने कुछ पल बाद सिर हिलाया।
"मैं तुम्हारी बात समझता हूँ, क्षितिज।"
उनकी आवाज़ में निराशा तो थी, लेकिन नाराज़गी नहीं।
"रिश्ते जबरदस्ती नहीं बनाए जा सकते। मैं तुम्हें वक्त दूँगा। और जहाँ तक वारिस बनाने की बात है, उस पर भी हम तब तक कोई फैसला नहीं करेंगे, जब तक तुम खुद इसके लिए तैयार न हो।"
मैंने राहत की साँस ली।
मैं जानता था कि मैंने जो कहा, वह सच था। लेकिन यह भी जानता था कि मेरे जवाब से माँ को दुख पहुँचा था।
और शायद यही बात मेरे मन को सबसे ज़्यादा परेशान कर रही थी।
क्योंकि ज़िंदगी में पहली बार मुझे एहसास हो रहा था कि कभी-कभी सच बोलना भी अपने लोगों को दुख पहुँचाने का कारण बन जाता है।
मैं अपनी जगह गलत नहीं था।
लेकिन क्या सिर्फ़ सही होना ही काफी होता है?
उस रात खाना अधूरा छोड़कर मैं अपने कमरे में आ गया।
मेरे मन में ठाकुर साहब की बातें घूम रही थीं। चिराग का भविष्य, माँ की उम्मीदें और मेरा अपना अतीत—सब कुछ एक साथ उलझ गया था।
मेरे मन में एक अजीब-सी उलझन थी। आखिर मैंने मना क्यों किया?
मैंने तो हमेशा यही चाहा था कि बैठे-बिठाए मुझे एक अमीर आदमी बनने का मौका मिल जाए। लाखों की जायदाद हो, खूब सारा रुपया-पैसा हो, बैंक बैलेंस हो, विदेश घूमने के मौके मिलें और दुनिया की हर ऐशो-आराम की चीज़ मेरे कदमों में हो। मुझे कुछ करना न पड़े और ज़िंदगी की सारी खुशियाँ मुझे आसानी से मिल जाएँ।
मैंने इसके लिए न जाने कितनी कोशिशें की थीं। हमेशा यही सोचता रहा कि कहीं कोई ऐसा बड़ा हाथ लग जाए, जो मेरी पूरी ज़िंदगी बदल दे। इसी चाहत में मैंने न जाने कितने गलत फैसले लिए। यहाँ तक कि मीरा का दिल तोड़कर उसे भी छोड़ दिया, क्योंकि मुझे लगता था कि उसके साथ रहकर शायद मैं वह ज़िंदगी कभी नहीं पा सकूँगा, जिसका सपना मैंने देखा था।
और आज, जब वही मौका खुद चलकर मेरे सामने आया था, तो मैंने ठाकुर साहब को मना कर दिया!
आखिर क्यों?
मैं बेचैनी से अपने कमरे में टहल रहा था। मेरे दिमाग में तरह-तरह के खयाल घूम रहे थे। कभी मैं खुद को समझाने की कोशिश करता, तो कभी अपने ही फैसले पर सवाल उठाने लगता।
क्या मैं सचमुच बदल गया था?
आखिर जब मैं हमेशा से यही सब चाहता था, तो आज मैंने ठाकुर साहब के प्रस्ताव को ठुकरा क्यों दिया?
क्या दौलत और शोहरत अब मेरे लिए मायने नहीं रखती थीं? क्या मैं अचानक इतना स्वाभिमानी हो गया था कि किसी की संपत्ति और नाम के सहारे अपनी ज़िंदगी बदलना मुझे मंज़ूर नहीं था?
नहीं... बात इतनी सीधी नहीं थी।
मैं खुद को अच्छी तरह जानता था। मैं कोई ऐसा इंसान नहीं था, जिसे पैसों से नफ़रत हो गई हो। आज भी मुझे एक अच्छी ज़िंदगी चाहिए थी। आज भी मैं चाहता था कि मेरे पास इतना पैसा हो कि मुझे अपनी ज़रूरतों के लिए किसी के सामने हाथ न फैलाना पड़े।
फिर आखिर मेरे कदम क्यों रुक गए थे?
मैंने खिड़की के पास जाकर बाहर देखा। हवेली के आँगन में हल्की रोशनी फैली हुई थी। सब कुछ कितना शांत था, लेकिन मेरे भीतर जैसे कोई तूफ़ान उठ रहा था।
मैं जानता था कि उन्होंने जान-बूझकर मुझे मेरी माँ से दूर नहीं किया था, फिर भी कहीं न कहीं मेरे भीतर यह भावना बैठ गई थी कि उनकी वजह से मैंने अपनी माँ के साथ बहुत-सा वक्त खो दिया।
लेकिन अब माँ मेरे पास थीं।
मैंने उन्हें फिर से पाया था।
और ठाकुर साहब भी... वह उतने बुरे इंसान नहीं थे, जितना मैंने कभी उन्हें समझ लिया था। जितना मैं उन्हें करीब से जानने लगा था, उतना ही महसूस हुआ कि उनके भीतर भी एक इंसान है, जो अपने परिवार से प्यार करता है, अपने लोगों की चिंता करता है और अपनी गलतियों को स्वीकार करने की हिम्मत रखता है।
फिर भी, जब उन्होंने मुझे अपना बेटा और वारिस बनाने की बात कही, तो मैं पीछे हट गया।
क्यों?
मैंने खुद से यह सवाल दोबारा किया।
शायद इसलिए कि मैं उनकी दौलत तो चाहता था, लेकिन उनके बेटे की जगह लेने के लिए तैयार नहीं था।
शायद इसलिए कि मैं उनके नाम का वारिस बन सकता था, लेकिन अपने दिल में उस रिश्ते को जगह देने के लिए मुझे अभी वक्त चाहिए था।
या फिर...
क्या मेरे भीतर अब भी यह डर था कि अगर मैंने उन्हें अपना पिता मान लिया, तो कहीं मैं उस पिता को भुला न दूँ, जिसे मैंने कभी जाना ही नहीं था?
मैं खुद भी नहीं समझ पा रहा था।
मैंने बिस्तर पर बैठकर अपना चेहरा हथेलियों में छिपा लिया।
पहले मैं सोचता था कि दुनिया में सबसे ज़रूरी चीज़ पैसा है। पैसा हो, तो इंसान कुछ भी हासिल कर सकता है। इज़्ज़त, पहचान, सुख-सुविधाएँ और एक बेहतर ज़िंदगी।
लेकिन अब पहली बार मुझे लग रहा था कि शायद कुछ चीज़ें ऐसी भी होती हैं, जिन्हें सिर्फ़ पैसों से हासिल नहीं किया जा सकता।
माँ का प्यार।
किसी अपने का भरोसा।
और वह अपनापन, जिसे पाने के लिए इंसान को अपने दिल के दरवाज़े खोलने पड़ते हैं।
क्या मैं सचमुच इन चीज़ों की अहमियत समझने लगा था?
क्या इतने सालों के अनुभवों ने मुझे बदल दिया था?
मैंने मीरा को याद किया।
उसका चेहरा मेरी आँखों के सामने उभर आया। वह लड़की, जिसने मुझसे प्यार किया था, मुझ पर भरोसा किया था, लेकिन मैंने अपनी महत्वाकांक्षाओं के लिए उसका दिल तोड़ दिया।
उस वक्त मुझे लगता था कि मैं सही कर रहा हूँ। मुझे लगता था कि प्यार से ज़्यादा ज़रूरी मेरी कामयाबी है। अगर मुझे अमीर बनना है, तो मुझे अपने रास्ते में आने वाली हर चीज़ को पीछे छोड़ना होगा।
और मैंने वही किया।
लेकिन क्या मैं सचमुच खुश था?
आज मेरे सामने दौलत हासिल करने का एक ऐसा मौका था, जिसके लिए मैं कभी कुछ भी करने को तैयार रहता। मुझे बस हाँ कहनी थी और ठाकुर साहब का वारिस बनने का रास्ता मेरे लिए खुल जाता।
फिर भी मैं हाँ नहीं कह पाया।
शायद इसलिए कि अब मैं सिर्फ़ वह लड़का नहीं रह गया था, जो हर चीज़ को पैसों से तौलता था।
या शायद मैं अभी भी वही था, बस पहली बार अपने ही मन के सामने खड़ा था।
मैंने गहरी साँस ली और सिर पीछे टिकाकर आँखें बंद कर लीं।
मुझे खुद को समझने के लिए वक्त चाहिए था।
मैं उठकर फिर खिड़की के पास आ गया। रात गहरी हो चुकी थी। हवेली के ज्यादातर कमरों की बत्तियाँ बुझ गई थीं।
मेरे मन में अब भी कई सवाल थे, लेकिन उनके बीच एक बात धीरे-धीरे साफ़ होने लगी थी।
शायद मैं दौलत नहीं ठुकरा रहा था, बल्कि उस रिश्ते को झूठे मन से स्वीकार करने से बच रहा था, जिसे मैं अभी तक समझ नहीं पाया था।
लेकिन क्या यही पूरी सच्चाई थी?
मैं नहीं जानता था।
क्योंकि मेरे भीतर एक और सवाल था, जिससे मैं अब तक बचता आया था।
अगर ठाकुर साहब की दौलत, उनका नाम और उनकी हैसियत मेरे सामने न होती, तो क्या मैं उन्हें अपना पिता मानने के बारे में सोचता भी?
और अगर जवाब नहीं था, तो क्या मैं सचमुच बदल गया था, या बस अपने फैसले को सही साबित करने की कोशिश कर रहा था?
मैंने मोबाइल उठाया। स्क्रीन पर मेरी पुरानी तस्वीरें थीं। उनमें से एक तस्वीर पर मेरी नज़र ठहर गई, जिसमें मैं और मीरा साथ थे।
मैं कुछ देर तक उसे देखता रहा।
न जाने क्यों, उस पल मुझे महसूस हुआ कि मेरी ज़िंदगी में सिर्फ़ एक ही चीज़ अधूरी नहीं थी।
कुछ रिश्ते थे, जिन्हें मैंने दौलत की चाह में खो दिया था।
कुछ सवाल थे, जिनके जवाब मुझे अब तक नहीं मिले थे।
और कुछ फैसले थे, जिनका बोझ आज भी मेरे दिल पर था।
शायद अब वक्त आ गया था कि मैं अपनी ज़िंदगी को सिर्फ़ इस नज़र से देखना बंद कर दूँ कि मुझे क्या हासिल हो सकता है।
मुझे यह भी सोचना होगा कि मैंने क्या खोया है।
और सबसे ज़रूरी...
क्या मैं अब भी उन चीज़ों को वापस पाने की हिम्मत रखता हूँ, जिन्हें कभी मैंने खुद अपने हाथों से छोड़ दिया था?