ज़िंदगी न जाने कैसी हो चली थी। माँ को मैं अब अक्सर ठाकुर साहब के साथ देखता था। दोनों के बीच धीरे-धीरे पहले जैसी दूरियाँ कम होने लगी थीं। माँ के चेहरे पर भी अब कुछ सुकून दिखाई देने लगा था।
अपने पिता का चेहरा तो मुझे याद नहीं था, लेकिन नानी जैसे अक्सर कहा करती थीं कि वह जैसे भी थे, अच्छे ही रहे होंगे। शायद इसी वजह से बचपन से ही मेरे मन में अपने पिता को लेकर एक अलग-सी कल्पना रही थी। कभी-कभी सोचता था कि अगर वह आज ज़िंदा होते, तो क्या मेरी ज़िंदगी कुछ और होती? क्या मुझे भी दूसरे बच्चों की तरह अपने पिता का प्यार मिल पाता?
लेकिन अब इन सवालों के कोई मायने नहीं रह गए थे।
मेरी दिनचर्या एक बार फिर पहले जैसी हो गई थी। ठाकुर साहब के साथ ऑफिस का काम सँभालना, उनके निजी मामलों में उनके साथ रहना और उनकी ज़रूरतों का ध्यान रखना। फर्क बस इतना था कि अब मैं उन्हें पहले से कहीं ज़्यादा करीब से जानने लगा था।
शुरुआत में मैंने शायद उन्हें गलत समझा था। मुझे लगता था कि वह सिर्फ़ अपने रुतबे और पैसों के दम पर दूसरों की ज़िंदगी के फैसले लेने वाले इंसान हैं। लेकिन जैसे-जैसे मैंने उनके साथ वक्त बिताया, मुझे एहसास हुआ कि दुनिया में हर चीज़ वैसी नहीं होती, जैसी पहली नज़र में दिखाई देती है।
ठाकुर साहब के भीतर भी भावनाएँ थीं, अपने लोगों के लिए चिंता थी और कुछ ऐसे दर्द थे, जिन्हें वह दूसरों के सामने जाहिर नहीं करते थे।
अब वह मुझे भी पहले से ज़्यादा महत्व देने लगे थे। शायद इसलिए कि मैं उनकी पत्नी का बेटा था। या शायद इसलिए कि उन्होंने मेरे भीतर कुछ ऐसा देख लिया था, जिसकी वजह से वह मुझ पर भरोसा करने लगे थे।
लेकिन न जाने क्यों, मेरा मन अब भी उन्हें पिता के रूप में स्वीकार करने के लिए तैयार नहीं था।
मैं उनकी इज़्ज़त करता था। उनके अनुभवों से सीखता था और उनके साथ काम करते हुए मुझे अच्छा भी लगता था। फिर भी, जब कभी मन में उन्हें पिता कहने का ख़याल आता, तो मैं खुद को रोक लेता।
शायद रिश्ते सिर्फ़ नाम देने से नहीं बनते। उन्हें दिल से स्वीकार करने में वक्त लगता है।
और मैं अभी उस मोड़ तक नहीं पहुँचा था।
एक शाम हम तीनों डाइनिंग टेबल पर साथ बैठकर खाना खा रहे थे। माँ अब पहले की तरह कुछ सामान्य होने लगी थीं। वह कभी-कभी ठाकुर साहब से बातें भी कर लेती थीं और उनके चेहरे पर हल्की मुस्कान दिखाई देने लगी थी।
मैं चुपचाप खाना खा रहा था कि तभी ठाकुर साहब की आवाज़ सुनाई दी।
"क्षितिज, मोहिनी... मुझे तुम दोनों से कुछ बात करनी है।"
उनकी आवाज़ में कुछ ऐसा था कि मेरा खाना खाता हुआ हाथ अचानक रुक गया। मैंने चम्मच प्लेट में रखा और उनकी तरफ देखने लगा।
"जी, कहिए।"
माँ ने भी उनकी तरफ देखा।
"क्या हुआ?" उन्होंने पूछा।
ठाकुर साहब ने एक लंबी साँस ली और अपनी कुर्सी पर थोड़ा आराम से बैठ गए। कुछ पल तक वह खामोश रहे, जैसे अपने शब्दों को ठीक से चुन रहे हों।
फिर उन्होंने माँ की तरफ देखते हुए कहा, "मोहिनी, मैं क्षितिज को अपनाना चाहता हूँ।"
माँ उन्हें हैरानी से देखने लगीं।
ठाकुर साहब ने अपनी बात आगे बढ़ाई।
"यह तुम्हारा बेटा है। और तुम मेरी पत्नी हो। इस लिहाज़ से देखा जाए, तो मैं इसका पिता हुआ। लेकिन मैं नहीं चाहता कि हमारा रिश्ता सिर्फ़ नाम का हो। मैं चाहता हूँ कि क्षितिज मुझे अपने पिता के रूप में स्वीकार करे। मैं इसे कानूनी तौर पर अपना वारिस बनाना चाहता हूँ।"
उनकी बात सुनकर मुझे ऐसा लगा, जैसे किसी ने अचानक मेरे सामने कोई बहुत बड़ा फैसला रख दिया हो।
मैं कुछ पल तक उन्हें देखता रह गया।
दूसरी तरफ़ माँ की खुशी का कोई ठिकाना नहीं था। उनकी आँखें चमक उठीं और वह लगभग अपनी कुर्सी से उठते हुए उनके पास आ गईं।
"आप सच कह रहे हैं?"
ठाकुर साहब मुस्कुराए।
"हाँ, मोहिनी। बिल्कुल सच कह रहा हूँ।"
माँ की आँखों में खुशी के आँसू आ गए। शायद वह लंबे समय से चाहती थीं कि ठाकुर साहब मुझे अपने बेटे के रूप में स्वीकार करें। आज जब उन्होंने खुद यह बात कही, तो माँ के लिए अपने एहसासों को छिपाना मुश्किल हो गया।
लेकिन ठाकुर साहब ने तुरंत अपनी बात में एक और बात जोड़ दी।
"हालाँकि, मैं इस बारे में क्षितिज की राय जानना चाहता हूँ। मैं उस पर किसी तरह का दबाव नहीं डालूँगा। यह उसकी ज़िंदगी है और उसे अपने फैसले लेने का पूरा हक है। वह जैसा चाहेगा, वैसा ही होगा।"
यह कहते हुए उन्होंने मेरी तरफ देखा।
"लेकिन जहाँ तक मैं समझता हूँ, क्षितिज एक समझदार लड़का है। वह सोच-समझकर ही कोई फैसला करेगा।"
मैं उनकी बातें सुन रहा था, लेकिन मेरा मन अब भी उलझा हुआ था।
एक तरफ़ माँ थीं, जिनके चेहरे पर मैंने बहुत दिनों बाद इतनी खुशी देखी थी। दूसरी तरफ़ ठाकुर साहब थे, जो मुझे सिर्फ़ अपने घर में जगह नहीं देना चाहते थे, बल्कि अपने नाम और अपनी संपत्ति में भी हिस्सा देना चाहते थे।
लेकिन क्या मैं इसके लिए तैयार था?
क्या किसी को अपना पिता मान लेना इतना आसान होता है?
मैंने पानी का गिलास उठाया और एक घूँट पीकर वापस रख दिया।
तभी ठाकुर साहब की आवाज़ ने मेरा ध्यान फिर अपनी तरफ खींचा।
"क्षितिज, तुम जानते हो कि चिराग की हालत ठीक नहीं है। डॉक्टर भी लगभग जवाब दे चुके हैं। मैं हर हाल में उसे बचाना चाहता हूँ, लेकिन सच यह है कि शायद वह अब ज़्यादा समय तक जीवित न रह पाए।"
चिराग का नाम सुनते ही मेरे मन में एक अजीब-सी बेचैनी पैदा हुई।
मैं जानता था कि चिराग की हालत कितनी गंभीर थी। मैंने उसकी आँखों में वह बेबसी देखी थी, जो किसी इंसान को तब घेर लेती है, जब उसका अपना शरीर ही उसका साथ छोड़ने लगे।
ठाकुर साहब कुछ पल रुके। फिर उन्होंने भारी आवाज़ में कहा, "और अगर वह बच भी गया, तो शायद वह तुम्हारे या मेरे जैसा एक सामान्य इंसान नहीं बन पाएगा। उसे ज़िंदगी भर किसी न किसी के सहारे की ज़रूरत पड़ सकती है।"
माँ की आँखों में चिंता उतर आई।
मैं चुपचाप ठाकुर साहब की तरफ देखता रहा।
वह आगे बोले, "मैं यह सब तुम्हें इसलिए बता रहा हूँ, क्योंकि अगर तुम मेरा वारिस बनते हो, तो तुम्हें सिर्फ़ मेरी संपत्ति ही नहीं मिलेगी। इसके साथ कुछ ज़िम्मेदारियाँ भी आएँगी। मैं चाहता हूँ कि तुम इस बात को अच्छी तरह समझ लो।"
अब मुझे धीरे-धीरे समझ आने लगा था कि यह बातचीत सिर्फ़ मुझे अपना बेटा बनाने तक सीमित नहीं थी।
इसके पीछे चिराग का भविष्य भी जुड़ा हुआ था।
ठाकुर साहब ने मेरी तरफ देखते हुए कहा, "मैं नहीं जानता कि आगे क्या होगा। लेकिन अगर कभी मैं और मोहिनी चिराग के साथ न हों, तो मैं चाहता हूँ कि उसके पास कोई ऐसा इंसान हो, जो उसे अकेला न छोड़े। मैं यह नहीं कह रहा कि तुम उसके लिए अपनी पूरी ज़िंदगी छोड़ दो। मैं सिर्फ़ चाहता हूँ कि तुम उसे अपने परिवार का हिस्सा समझो।"
मैंने अनायास ही माँ की तरफ देखा।
उनके चेहरे पर खुशी के साथ-साथ एक गहरी चिंता भी थी। शायद वह भी अब समझ रही थीं कि ठाकुर साहब मुझे अपना वारिस बनाने का फैसला इतनी आसानी से नहीं कर रहे थे। वह अपने बाद चिराग के भविष्य को लेकर परेशान थे।
कुछ देर तक कमरे में खामोशी छाई रही।
फिर ठाकुर साहब ने सीधे मुझसे पूछा—
"क्षितिज, क्या तुम मुझे अपने पिता के रूप में स्वीकार कर सकते हो?"