मामा और मामी से विदा लेकर मैं एक बार फिर माँ के साथ ठाकुर साहब की हवेली की तरफ़ चल पड़ा था। मामी ने बहुत कहा कि मोहिनी दीदी को कुछ दिन और उनके पास रहने दूँ, लेकिन मैंने उन्हें समझाया कि माँ को चिराग की चिंता है और शायद इसी वजह से वह वापस जाना चाहती हैं।
मामा ने भी माँ से कहा, “दीदी, जब भी मन करे, वापस आ जाना। माँ तो अब नहीं रहीं, लेकिन मैं अभी ज़िंदा हूँ। तुम्हारा भाई हूँ मैं। इस घर के दरवाज़े तुम्हारे लिए हमेशा खुले रहेंगे।”
मामा की बात सुनकर माँ की आँखें फिर से नम हो गईं। उन्होंने अपने भाई और भाभी को गले लगाया और भारी मन से विदा ली।
मैं माँ को लेकर वहाँ से निकल आया, लेकिन जाते समय मैंने उनकी आँखों में जो दर्द देखा, वह मेरे दिल में कहीं गहराई तक उतर गया। शायद माँ के लिए उस घर को छोड़ना आसान नहीं था। वहाँ उनकी माँ की यादें थीं, उनका बचपन था और एक ऐसा रिश्ता था, जिसे उन्होंने बरसों बाद फिर से जीने की कोशिश की थी।
लेकिन अब उन्हें वापस लौटना था।
एक बार फिर उसी हवेली में, उसी ज़िंदगी में, जहाँ उनके अपने कुछ रिश्ते थे और कुछ ऐसी मजबूरियाँ, जिनके बारे में मैं पूरी तरह नहीं जानता था।
जब हम हवेली पहुँचे, तो पता चला कि ठाकुर साहब भी उसी दिन वापस आ गए थे।
माँ को सामने देखकर उन्होंने न तो कोई नाराज़गी दिखाई और न ही मुझसे कोई सवाल किया। वह कुछ पल माँ को देखते रहे, फिर उनके चेहरे पर एक ऐसी गंभीरता उतर आई, जिसे मैं समझ नहीं पाया।
शायद वह भी समझ चुके थे कि इंसान चाहे जितना बड़ा क्यों न हो जाए, अपने खून के रिश्तों को हमेशा के लिए नहीं तोड़ सकता।
माँ अपनी माँ से मिलने गई थीं। इसमें नाराज़ होने जैसा था ही क्या?
जब ठाकुर साहब को नानी के निधन के बारे में पता चला, तो उनके चेहरे पर गहरा दुख दिखाई दिया। उन्होंने माँ के पास आकर धीमे स्वर में कहा, “मोहिनी, मुझे माफ़ कर दो। मुझे तुम्हें इतने सालों तक अपनी माँ से दूर नहीं रखना चाहिए था। शायद मैं तुम्हारे दर्द को कभी ठीक से समझ ही नहीं पाया।”
उनकी बात सुनकर माँ की आँखों से आँसू बह निकले।
शायद वह इसी पल का इंतज़ार कर रही थीं।
इतने दिनों से अपने भीतर दबाए हुए दर्द को बाहर निकालने के लिए उन्हें बस किसी अपने के कंधे की ज़रूरत थी। और आज उनके पति ने पहली बार उनके उस दर्द को समझने की कोशिश की थी, जिसे वह बरसों से अकेले सहती आई थीं।
माँ ने आगे बढ़कर ठाकुर साहब को गले लगा लिया और उनके कंधे से लिपटकर फूट-फूटकर रोने लगीं।
“मैंने कभी नहीं सोचा था कि मुझे उनसे मिलने के लिए इतने साल इंतज़ार करना पड़ेगा। मैं उनके आखिरी दिनों में उनके पास नहीं थी। मैं उनसे बहुत कुछ कहना चाहती थी, लेकिन...”
उनकी आवाज़ आँसुओं में डूब गई।
ठाकुर साहब ने उन्हें अपने सीने से लगा लिया।
“बस, मोहिनी... अब और मत रोओ। जो हो गया, उसे हम बदल नहीं सकते। काश, मैं तुम्हारा दर्द पहले समझ पाता।”
मैं कुछ दूरी पर खड़ा उन दोनों को देख रहा था।
वह अपने पति के कंधे पर सिर रखकर रो रही थीं और ठाकुर साहब उन्हें चुप कराने की कोशिश कर रहे थे। उस पल उनके बीच का रिश्ता पहले से कहीं ज़्यादा गहरा दिखाई दे रहा था।
आख़िरकार वह उनके पति थे।
वह उनकी पत्नी थीं।
और यह हवेली उनका घर था।
लेकिन न जाने क्यों, उन्हें इस तरह एक-दूसरे के करीब देखकर मेरे मन में एक अजीब-सा एहसास पैदा होने लगा था।
ऐसा लग रहा था, जैसे मैं इस परिवार का हिस्सा होते हुए भी इसका हिस्सा नहीं हूँ।
जैसे मैं कोई पराया इंसान हूँ, जो कुछ दिनों के लिए इस घर में आकर ठहर गया हो।
मैंने अपनी नज़रें झुका लीं।
पता नहीं क्यों, आज पहली बार मुझे अपनी जगह को लेकर इतना असमंजस महसूस हो रहा था।
माँ की अपनी दुनिया थी। ठाकुर साहब उनके पति थे। चिराग इस घर का बेटा था। इन सबके बीच मैं कहाँ खड़ा था?
क्या सिर्फ़ माँ का बेटा होने से इस घर में मेरी कोई जगह बन जाती थी?
या फिर मैं हमेशा एक ऐसा इंसान ही रहने वाला था, जिसे इस परिवार के बीच रहकर भी अपनेपन की तलाश करनी पड़ेगी?
मैं जानता था कि ठाकुर साहब ने कभी मेरे साथ बुरा व्यवहार नहीं किया था। उन्होंने मुझे कभी पराया महसूस कराने की कोशिश भी नहीं की थी। लेकिन कुछ एहसास ऐसे होते हैं, जो किसी के कहने या करने से नहीं, बल्कि हमारे अपने मन में जन्म लेते हैं।
और आज मेरे भीतर भी ऐसा ही एक एहसास जन्म ले चुका था।
मैंने माँ की तरफ देखा। वह अब भी ठाकुर साहब के पास खड़ी थीं। उनकी आँखों में आँसू थे, लेकिन चेहरे पर एक अजीब-सा सुकून भी था। शायद इतने दिनों बाद उन्हें अपने पति के साथ की ज़रूरत महसूस हो रही थी।
मैं उन्हें खुश देखकर खुश होना चाहता था।
लेकिन सच कहूँ, तो मेरे भीतर कहीं एक खालीपन बढ़ता जा रहा था।
मुझे लगा, जैसे माँ की दुनिया में मेरी जगह धीरे-धीरे बदल रही है। जैसे अब वह अपनी ज़िंदगी के उन रिश्तों की तरफ़ लौट रही हैं, जिनसे मैं कभी पूरी तरह जुड़ ही नहीं पाया था।
मैं चुपचाप वहाँ से हट गया।
किसी ने मुझे रोका नहीं।
शायद किसी ने ध्यान भी नहीं दिया कि मैं वहाँ से चला गया हूँ।
मैं अपने कमरे में आकर बैठ गया। चारों तरफ़ खामोशी थी। मैंने खिड़की से बाहर देखा, जहाँ हवेली का आँगन रोशनी से जगमगा रहा था।
और मैं सोच रहा था कि अजीब है न इंसान की ज़िंदगी भी।
जिस माँ के लिए मैंने अपनी सारी चिंताएँ भुला दीं, आज उसी माँ को अपने पति के साथ खुश देखकर मुझे अपने भीतर अकेलापन महसूस हो रहा था।
क्या यह मेरा स्वार्थ था?
क्या मैं माँ को सिर्फ़ अपने पास रखना चाहता था?
नहीं... शायद ऐसा नहीं था।
मैं तो बस इतना चाहता था कि उनकी ज़िंदगी में मेरी भी एक जगह बनी रहे। ऐसी जगह, जहाँ मुझे किसी से अपनेपन का प्रमाण न माँगना पड़े।
लेकिन शायद मैं भूल रहा था कि माँ का प्यार किसी एक रिश्ते तक सीमित नहीं था। वह मेरी माँ थीं, लेकिन किसी की बेटी भी थीं, किसी की पत्नी भी और अपने अतीत से जुड़ी एक ऐसी औरत भी, जिसके अपने अधूरे सपने और दर्द थे।
मुझे यह समझना होगा।
मुझे माँ को अपनी ज़िंदगी जीने देनी होगी।
लेकिन इसका मतलब यह तो नहीं था कि मैं अपनी ज़िंदगी को यूँ ही अधूरा छोड़ दूँ?
अचानक मेरे मन में मीरा का ख़याल आया।
कितने दिनों से मैं उससे मिलने के बारे में सोच रहा था। हर बार कोई न कोई बात मुझे रोक देती थी। पहले माँ को नानी से मिलाना था, फिर नानी की बीमारी, उनका निधन और अब माँ को वापस हवेली लाने की ज़िम्मेदारी।
लेकिन अब मैं और इंतज़ार नहीं करना चाहता था।
मुझे मीरा से मिलना ही होगा।
यह जानना ही होगा कि मेरे जाने के बाद उसकी ज़िंदगी में क्या हुआ। क्या वह अब भी मेरा इंतज़ार कर रही है, या उसने अपनी ज़िंदगी में आगे बढ़ने का फैसला कर लिया है?
अगर उसने शादी कर ली होगी, तो शायद मुझे अपने दिल को समझाना पड़ेगा। शायद मुझे यह स्वीकार करना पड़ेगा कि कुछ लोग हमारी ज़िंदगी में हमेशा के लिए नहीं आते, बल्कि हमें कुछ सिखाने के लिए आते हैं।
लेकिन अगर उसकी ज़िंदगी में अब भी मेरे लिए कोई जगह बाकी हुई...
तो शायद मुझे अपनी कहानी को एक नया मौका देना चाहिए।
मैंने मोबाइल उठाया और मीरा का नंबर देखने लगा।
मेरे होंठों पर एक फीकी-सी मुस्कान आ गई।
शायद अब वक्त आ गया था कि मैं दूसरों की ज़िंदगी के फैसलों के बीच अपनी ज़िंदगी के बारे में भी कुछ सोचूँ।
क्योंकि मैं नहीं जानता था कि इस हवेली में मेरे लिए क्या लिखा था, लेकिन इतना ज़रूर जानता था कि मेरी ज़िंदगी का एक हिस्सा अब भी कहीं मेरा इंतज़ार कर रहा था।
और वह हिस्सा था—मीरा।