(सुबह का समय। खिड़की से हल्की धूप कमरे में फैल रही है। पर कमरे में शांति नहीं, एक बेचैनी है। सिया करवट बदल रही है। उसका चेहरा पसीने से भीगा हुआ है।)
“कभी-कभी सपने वो बताते हैं जो हकीकत छिपा देती है…
पर कुछ सपने इतने उलझे होते हैं कि उनमें सच और झूठ का फर्क मिट जाता है…”
🎭 सपने का दृश्य –
(धुंधली रौशनी, सिया सफ़ेद कपड़ों में एक खाली हॉल में खड़ी है।)
(चारों ओर अंधेरा, बीच में एक लाल दरवाज़ा है। सिया धीरे-धीरे उसकी तरफ़ बढ़ती है।)
सिया (धीरे से, डरते हुए) बोली -
“कौन है वहाँ…?”
(दरवाज़े के पार से किसी की हल्की हँसी आती है — पुरुष की भारी, गहरी आवाज़।)
आवाज़ (गूंजती हुई) बोली -
“सिमरन… तुम वापस आ गईं…”
(सिया चौक जाती है। उसके हाथ कांपते हैं।)
सिया (हैरान होकर) बोली -
“सिमरन? कौन सिमरन…? मेरा नाम सिया है…”
(दरवाज़ा धीरे-धीरे खुलता है। अंदर एक परछाई दिखती है — वही परछाई जो उसे कभी-कभी अपने सपनों में दिखाई देती थी। आँखों में लाल रोशनी, हाथ में खून से सनी चेन।)
परछाई (धीरे से) बोली -
“भूल गई तुम… मैं वो हूँ… जिसने तुम्हे अमर बना दिया…”
(सिया डर से पीछे हटती है। चारों ओर काली धुंध फैलती है। ज़मीन उसके नीचे से फटने लगती है।)
सिया (चीखते हुए) बोली -
“नहीं!!!”
(अचानक सब कुछ सफेद हो जाता है — और सिया बिस्तर पर झटके से उठ बैठती है। उसके माथे पर पसीना, साँसें तेज़ हैं।)
In reality —
(कबीर उर्फ़ करन दरवाज़े के पास खड़ा है, उसके हाथ में पानी का ग्लास है। सिया को हाँफता देखकर जल्दी से उसके पास आता है।)
कबीर (चिंता से) बोला -
“सिया! क्या हुआ? फिर से वो ही बुरे सपने?”
(सिया कुछ पल उसकी ओर देखती है, उसकी आँखों में उलझन है — जैसे कुछ याद आने की कोशिश कर रही हो, पर सब धुंधला हो।)
सिया (हकबकाई हुई आवाज़ में) बोली -
“कबीर जी… मैंने किसी को देखा… वो मुझे सिमरन कह रहा था…
कह रहा था कि मैंने उसे अमर बनाया…”
(कबीर का चेहरा पलभर को सख्त हो जाता है। वो नज़रें झुका लेता है ताकि उसका डर छिप जाए।)
कबीर (धीरे से, बनावटी मुस्कान के साथ) बोला -
“सपना था सिया… ज़्यादा मत सोचो… कभी-कभी पुरानी कहानियाँ दिमाग़ में ऐसे आ जाती हैं।”
(सिया धीरे से सिर हिलाती है, पर उसकी आँखों में शक का साया है।)
सिया (धीरे से) बोली -
“पर वो सपना… बहुत सच्चा लग रहा था…”
(कबीर उसके सिर पर हाथ रखता है, प्यार से बोलता है।)
कबीर बोला -
“आराम करो… मैं हूँ ना… जब तक मैं ज़िंदा हूँ, कोई तुम्हें कुछ नहीं कह सकता।”
(सिया उसकी ओर देखती है — उसके शब्दों में एक अजीब सी सच्चाई है, जैसे कोई झूठ छिपा हो।)
“सपनों ने दस्तक दी थी… पर दरवाज़ा अब भी बंद था।
सिया ने कुछ देखा ज़रूर था… पर समझ कुछ नहीं पाई थी।”
(खिड़की के बाहर जहाँ हवा में लाल धुआँ फैलता दिखता है,
जैसे कोई पुरानी रूह फिर से ज़िंदा हो रही हो…)
शाम का वक्त। घर में हल्की रौशनी है। बाहर बारिश हो रही है। सिया (जो अब-भी अपने अंदर सिमरन की झलक महसूस करती है) खिड़की के पास खड़ी है। उसकी आँखों में गुस्सा भी है और उलझन भी।)
सिया (तेज़ आवाज़ में) बोली -
“कब तक चुप रहोगे, करण जी!?
हर बार मैं पूछती हूँ, और आप बस देखते रहते हो!”
(करण सोफे पर बैठा है, सिर झुकाए, उसकी उंगलियाँ आपस में फँसी हुई हैं।)
करण (धीरे से, थके हुए लहजे में) बोला -
“हर सवाल का जवाब देना ज़रूरी नहीं होता, सिया।”
(सिया पलटकर उसकी ओर देखती है, आँखों में आँसू तैर रहे हैं।)
सिया (गुस्से में) बोली -
“तो फिर क्यों नहीं बताते आप मुझे?
कौन हूँ मैं आपके लिए?
कभी सिमरन, कभी सिया — आखिर मैं हूँ कौन!?”
(करण की आँखें भर आती हैं, पर वो खुद को रोक लेता है।)
करण (टूटे हुए लहजे में) बोला -
“कभी-कभी… सच्चाई बोलने से ज़्यादा दर्द देती है।”
सिया (कटाक्ष भरे स्वर में) बोली -
“दर्द!? आपको क्या पता दर्द क्या होता है, करण जी!”
(वो पास आती है, उसकी तरफ़ झुककर कहती है)
सिया बोली -
“आपकी वजह से मैं आज भी खुद को समझ नहीं पाती…
हर दिन, हर पल… मुझे लगता है जैसे कोई मुझमें छिपा है — जो रो रहा है, जो चिल्ला रहा है…”
(करण उठता है, उसके पास जाता है — लेकिन सिया पीछे हट जाती है।)
करण (धीरे से) बोला -
“मैं तुम्हें खोना नहीं चाहता था…”
(सिया का चेहरा सख़्त हो जाता है)
सिया (तीखे स्वर में) बोली -
“तो क्या किया आपने? झूठ बोलते रहे? सब छिपा लिया मुझसे?”
(वो दरवाज़े की ओर जाती है। करण उसके पीछे बढ़ता है, पर रुक जाता है।)
सिया (दरवाज़े के पास रुककर) बोली -
“आपकी ये चुप्पी अब मुझे डराने लगी है, करण जी।
कभी तो सच बोलो…”
(वो कमरे से बाहर चली जाती है। करण वहीं खड़ा रह जाता है।)
(अंधेरे कमरे में, बारिश की आवाज़ के बीच)
(वो खिड़की के पास जाता है, बाहर देखता है। उसकी आँखों में दर्द और पछतावा है।)
करण (अपने आप से) बोला -
अगर बोल दूँ… तो वो जान जाएगी कि वो सिया नहीं…
वो वही है — सिमरन।
वो लड़की जिसे मैं बचा नहीं सका…
(उसके हाथ काँपते हैं। टेबल पर रखी सिमरन की पुरानी फोटो उठाता है — वही फोटो जिसमें वो मुस्कुरा रही है।)
करण (धीरे से, टूटे हुए स्वर में) बोला -
“काश… मैं तुझसे फिर से कह पाता — कि मैं अब भी तुझसे उतना ही प्यार करता हूँ…”
(फोटो पर एक बूँद पानी की गिरती है — शायद बारिश की नहीं, उसकी आँखों की थी।)
“सवाल वही थे, पर जवाब अब भी गुम थे।
कभी-कभी सच्चाई इतनी भारी होती है कि लफ्ज़ उसका वज़न नहीं उठा पाते…”
(करण की चुप्पी में सिर्फ़ बारिश की आवाज़ गूंजती रहती है…)
रात का सन्नाटा। घर में बस घड़ी की टिक टिक और हवा की सरसराहट सुनाई दे रही है। सिया कमरे में अकेली है। करण सो चुका है या शायद दिखा रहा है कि सो गया है।)
(सिया धीरे-धीरे कमरे के कोने में जाती है, जहाँ दीवार के पीछे पुराना अलमारी जैसा ताला लगा हुआ है।)
सिया (धीरे से, खुद से) बोली -
“ये तिजोरी... करण जी इसे हमेशा बंद क्यों रखते हैं? इसमें आखिर ऐसा क्या है जो मुझसे छिपाया जा रहा है?”
(वो अपने बैग से छोटा-सा hacking tool निकालती है। धीरे-धीरे कोड घुमाती है। ताले की बीप सुनाई देती है — क्लिक! — तिजोरी खुल जाती है।)
(अंदर एक पुरानी डायरी और एक फोटो एल्बम रखा है। एल्बम के ऊपर लिखा है: “The Journey – Karan & Simran.”)
सिया (हैरान होकर, फुसफुसाते हुए) बोली -
“Simran...? लेकिन... ये तो मैं हूँ... या थी...?”
(वो धीरे से एल्बम खोलती है। अंदर की तस्वीरें रंगीन हैं — करण और सिमरन हँसते हुए, कॉफी पीते हुए, शादी की ड्रेस में, मंदिर में — दोनों बेहद करीब। सिया की साँसे रुक जाती हैं।)
सिया (थोड़े काँपते स्वर में) बोली -
“ये... कब हुआ था?
करण जी ने तो कहा था कि मैं उन्हें सड़क पर बेहोश मिली थी... फिर ये शादी की तस्वीरें...?”
(उसकी आँखों में उलझन, दर्द और शक सब एक साथ उमड़ आते हैं।) (वो तुरंत करण का फोन उठाती है जो बेड पर रखा है। स्क्रीन जलती है।)
सिया (धीरे से) बोली -
“शायद इसमें कुछ जवाब हो...”
(वो फोन की गैलरी खोलने की कोशिश करती है — “LOCKED” दिखता है।)
सिया (हल्की मुस्कान के साथ) बोली -
“पासवर्ड तो जरूर कुछ खास होगा... शायद... Simran?”
(वो टाइप करती है — “S-I-M-R-A-N” — फोन खुल जाता है। बीप की आवाज़।)
सिया (सन्न रह जाती है) बोली -
“ये सच नहीं हो सकता…”
(स्क्रीन पर वही पुरानी तस्वीरें — करण और सिमरन की मुस्कुराहटें, उनकी शादी के दिन की सेल्फी, और सिमरन का वीडियो जिसमें वो कह रही है — “आपके बिना मैं अधूरी हूँ, करण जी।”)
(सिया के हाथ काँपते हैं। उसकी आँखों से आँसू गिरते हैं।)
सिया (धीरे से खुद से) बोली -
“तो ये सब... सच था?
मैं... वही सिमरन हूँ?
पर फिर... करण जी ने क्यों कहा कि मैं बस एक अनजान लड़की थी?”
(वो हड़बड़ाकर डायरी उठाती है। पन्ने पलटती है। कुछ हिस्से धुंधले हैं — पर एक पेज पर साफ लिखा है:)
> “अगर कभी सिमरन को ये डायरी मिले, तो समझ जाना — वो अब वो नहीं रही जो थी। उसे बचाने का एक ही तरीका है — उसे सच्चाई से दूर रखना।”
(सिया पन्ने बंद कर देती है। उसकी साँसे तेज़ चलने लगती हैं। तभी बाहर से हल्के कदमों की आहट आती है — करण लौट रहा है।)
सिया (फौरन सब कुछ समेटते हुए) बोली -
“मुझे ये नहीं दिखाना चाहिए…”
(वो डायरी अपने बैग में छिपा लेती है, एल्बम बंद कर देती है, और तिजोरी दोबारा लॉक करती है। ठीक उसी वक्त करण कमरे में दाखिल होता है।)
करण (धीरे से) बोला -
“सिया? तुम अब तक जाग रही हो?”
(सिया जल्दी से मुस्कुराने की कोशिश करती है, पर उसकी आँखों में डर झलकता है।)
सिया (धीरे स्वर में) बोली -
“नहीं… बस… नींद नहीं आ रही थी।”
(करण उसे गौर से देखता है — जैसे कुछ महसूस कर रहा हो।)
करण बोला -
“सब ठीक है न?”
(सिया मुस्कुराने का दिखावा करती है)
सिया बोली -
“हाँ... सब ठीक है।”
(करण हल्की मुस्कान देकर लाइट बंद कर देता है और सो जाता है। लेकिन कैमरा दिखाता है — सिया तकिये के नीचे डायरी छिपाए लेटी है, आँखें खुली हैं।)
“कभी-कभी सच्चाई इतनी खामोश होती है कि उसके चीखने की आवाज़ सिर्फ वही सुन सकता है —
जिसके अंदर वो दबी होती है…”
(सिया की आँखों में डर और शक की झिलमिलाहट… और पृष्ठभूमि में करण का चेहरा अंधेरे में धुँधला पड़ता है।)