ऑफिस का ओपन एरिया। कुछ कर्मचारी कॉफी मशीन के पास खड़े होकर सिमरन का मज़ाक बना रहे हैं।
कर्मचारी 1 हंसते हुए बोला -
अरे ये तो बिलकुल बच्ची जैसी है। अठारह साल की है पर दिमाग़ से तेरह का।
कर्मचारी 2 मज़ाक उड़ाते हुए बोला -
कल तो ट्रैफिक सिग्नल पर भी खड़ी रह गई थी। हाहाहा।
बाकी सब हंसने लगते हैं। सिमरन का चेहरा लाल पड़ जाता है। उसकी आँखों में आँसू आ जाते हैं। वह चुपचाप अपना काम करने की कोशिश करती है, पर उसका दिल टूट रहा है।
अचानक कमरे का माहौल बदल जाता है। करण अपने केबिन से बाहर आता है। उसकी आँखें गुस्से में लाल चमक उठती हैं।
करण कड़क आवाज़ में बोला -
चुप। अगर किसी ने दुबारा उसका मज़ाक उड़ाया तो याद रखना, तुम्हारा करियर यहीं ख़त्म हो जाएगा।
कमरे में सन्नाटा छा जाता है। वे लड़के सिर झुकाकर चुपचाप वहाँ से खिसक जाते हैं। बाकी कर्मचारी भी इधर-उधर हो जाते हैं।
सिमरन अपने आँसू रोक नहीं पाती। वह अचानक उठती है और करण की ओर भागकर उसके सीने से लग जाती है।
सिमरन बचपन जैसी मासूमियत में, रोते हुए बोली -
वो सब मेरा मज़ाक क्यों उड़ाते हैं। मैं इतनी बुरी हूँ क्या। मुझे अच्छा नहीं लगता जब लोग हँसते हैं। अब नहीं सहन कर पाती ये मजाक का टॉर्चर। बचपन से बहुत सहा है मैंने। बच्चों का, टीचर्स का। मुझे भी तो बुरा लगता है, तकलीफ होती है, दर्द होता है। कोई क्यों नहीं समझता मुझे।
करण सख़्त खड़ा रहता है। उसके हाथ हवा में रुके रहते हैं। पहली बार उसकी आँखों की लाल चमक हल्की पड़ती है।
पहली बार लाल आँखों वाले शैतान को किसी इंसान के आँसू ने छुआ था।
पहली बार उसे वो डर नहीं बल्कि एक अजीब-सा अपनापन महसूस हुआ।
करण धीरे से अपने हाथ बढ़ाकर सिमरन के कंधों पर रखता है। उसकी ठंडी आवाज़ में नरमी आ जाती है।
करण धीमी आवाज़ में बोला -
तुम बुरी नहीं हो।
लोग तुम्हारी मासूमियत नहीं समझते। पर ये मासूमियत ही तुम्हारी ताक़त है।
सिमरन उसके सीने से लगी रोती रहती है। करण की आँखों में पहली बार इंसानियत की झलक दिखती है।
जिस शैतान का मिशन था इंसानों को झुकाना
आज वही शैतान एक बच्ची जैसी लड़की के आँसुओं में खो गया था।
क्या ये बदलाव उसके मिशन को बदल देगा।
रात का समय। ऑफिस लगभग खाली है। हल्की पीली रोशनी और कंप्यूटर स्क्रीन की ब्लू लाइट। सिमरन अपनी डेस्क पर काम कर रही है। उसकी आँखों में डर और थकान साफ़ है।
डर जब आदत बन जाए तो इंसान जीते जी मरने लगता है।
सिमरन अब उसी डर में साँस ले रही थी।
सिमरन फाइल काटने के लिए पेपर कटर उठाती है, लेकिन गलती से उसका हाथ कट जाता है। खून बहने लगता है।
सिमरन सहमी हुई चीखकर बोली -
आह।
वह खून देखकर घबरा जाती है। कुछ ही पल में वह फर्श पर गिरकर बेहोश हो जाती है।
करण तुरंत उसकी ओर बढ़ता है। उसे गोद में उठाता है। उसकी लाल आँखें खून देखकर और गहरी हो उठती हैं। वह उसे कुर्सी पर बिठा देता है। खुद दूसरी कुर्सी लेकर उसके सामने बैठ जाता है।
करण मन ही मन, भारी साँसें लेते हुए बोला -
खून। यही मेरी ताक़त है, यही मेरी कमजोरी।
कितना आसान है अभी इसका खून पी लेना।
वह सिमरन के हाथ से बहता खून देखता है। उसकी साँसें तेज हो जाती हैं। वह झुकता है, होंठ खून के करीब आते हैं, लेकिन वह अचानक रुक जाता है।
करण दाँत भींचकर बोला -
नहीं। मिशन पहले। इंसानियत को झुकाना है।
ये कमजोरी मुझे रास्ते से हटा नहीं सकती।
वह दवाई का बॉक्स निकालता है। कांपते हाथों से सिमरन के घाव पर दवा लगाता है। पट्टी बाँधता है। फिर उसके पास बैठ जाता है।
जिसके लिए इंसानों का खून सिर्फ़ ईंधन था
वह उसी खून को रोकने की कोशिश कर रहा था।
क्या ये बदलाव एक शैतान को इंसान बना देगा।
कुछ देर बाद सिमरन होश में आती है। उसकी नज़र सामने बैठे करण पर पड़ती है।
सिमरन घबराकर चीखती है -
आप। आप मुझे मार देंगे।
वह डर के मारे पीछे हटती है। उसके चेहरे पर खून का डर और करण की आँखों का खौफ़ एक साथ है।
करण ठंडी आवाज़ में बोला -
डरना सीखो। लेकिन याद रखो
मैं वो नहीं करूँगा जो तुम सोच रही हो।
सिमरन फिर भी काँपती रहती है। करण उसके आँसुओं को देखता है, लेकिन चुप रहता है।
सिमरन को लगा वह मौत के दरवाज़े से लौटकर आई है।
लेकिन असल में करण अपनी सबसे बड़ी लड़ाई खुद से लड़ रहा था।
सुबह का वक़्त। सिमरन सड़क किनारे खड़ी है। ट्रैफिक की आवाज़ें गूंज रही हैं।
सिमरन जो हर कदम डर-डर कर रखती थी
आज दिल्ली की तेज़ रफ़्तार सड़कों के सामने खड़ी थी।
सिमरन सड़क पार करने की कोशिश करती है। आधी सड़क तक पहुँचती है। अचानक सामने से तेज़ रफ़्तार कार आती है। वह घबरा जाती है।
सिमरन डरी हुई चीखती है -
आऽऽऽऽ।
उसी पल एक मज़बूत हाथ उसकी कलाई पकड़कर खींच लेता है। वह सीधे किसी के मजबूत सीने से टकराती है। आँखें खोलती है—वो करण है। उसकी लाल आँखें गुस्से से भरी हुई हैं।
सिमरन हकलाई हुई बोली -
आप।
करण उसे मज़बूती से पकड़ता है। उसके चेहरे पर गुस्सा साफ है।
करण गरजते हुए बोला -
क्या मरने का शौक है तुम्हें।
दिमाग है या नहीं।
कल से तुम जहाँ जाओगी मेरे साथ जाओगी और मेरे साथ ही आओगी।
सिमरन डर से चुप हो जाती है। उसकी आँखों में आँसू आ जाते हैं।
सिमरन धीमे स्वर में रोते हुए बोली -
मैं तो बस... कोशिश कर रही थी। पर मुझे डर लग रहा था।
करण उसका चेहरा देखता है। गुस्सा नरमी में बदलता है।
करण बोला -
तुम्हें अंदाज़ा नहीं कि तुम्हारी जान कितनी कीमती है।
मेरे लिए... और मेरे मिशन के लिए भी।
सिमरन चौंककर उसे देखती है, पर कुछ बोल नहीं पाती। करण उसे कार तक ले जाता है।
सिमरन को लगा वह मौत से बच गई।
लेकिन हकीकत ये थी कि अब वह एक और बड़ी क़ैद में फँस चुकी थी।
जहाँ उसकी हर साँस लाल आँखों वाले साए के कब्ज़े में थी।
करण का मकसद क्या था? क्यों वो बार बार सिमरन तक पहुंच जाता? क्यों वो उसे मारने की जगह बचा रहा था?