(अंधेरा कमरा। बाहर से आती हवा की सीटी, खिड़कियाँ ज़ोर-ज़ोर से हिल रही हैं। दरवाज़े पर बार-बार चोट पड़ रही है। अचानक...)
धड़ाम्म्म!!
(दरवाज़ा टूटकर गिर जाता है। वो काली परछाई चाकू लहराते हुए अंदर घुस आती है। उसकी आँखें धुंधली पर डरावनी चमक रही हैं। सिमरन चीख उठती है और पीछे हटने लगती है।)
सिमरन (चीखकर) बोली -
"आआआ... हे भगवान!"
(क्षणभर में करण सिमरन को अपनी बाँहों में खींच लेता है। उसके विशाल पंख फैलकर उसे पूरी तरह ढक लेते हैं। सिमरन उसका सीना कसकर पकड़ लेती है, उसका दिल ज़ोर-ज़ोर से धड़क रहा है। उसके चेहरे पर आँसू हैं और डर से उसकी साँसें अटक रही हैं।)
"वो मासूम... जिसे करण से सबसे ज़्यादा डर लगता था...
आज उसी के साए में छिपी... खुद को सबसे ज़्यादा महफूज़ महसूस कर रही थी।"
(करण की लाल आँखें आग की तरह चमक उठती हैं। वो धीरे-धीरे सिमरन को अपने पंखों में छिपाए बैठा रहता है और उस परछाई की तरफ़ देखता है।)
करण (गरजती आवाज़ में) बोला -
"ये... मेरी हद है।
अगर उसे छूने की कोशिश की...
तो अंजाम ऐसा होगा... कि तेरे जैसी परछाइयाँ भी डरना सीख जाएँगी।
ये लड़की और इसका खून सिर्फ मेरा है।"
(परछाई ज़ोर से चीखती है और करण पर हमला करती है। करण सिमरन को अपनी बाँहों से थामे हुए ही पीछे हटता है, फिर एक हाथ उठाकर हवा में आग की लपटें पैदा करता है।)
फुssss...!!
(आग की लाल-नीली लपटें परछाई की तरफ़ बढ़ती हैं। परछाई कराह उठती है और पीछे हटती है। लेकिन हार नहीं मानती।)
सिमरन (उसके सीने से लगी, काँपते हुए फुसफुसाती है) -
"प... प्लीज़... रुक जाइए... मत मारिए उसे..."
(करण नीचे झुककर उसकी आँखों में देखता है। उसकी पुतलियाँ खून जैसी लाल, मगर उनमें गुस्से के साथ एक अनजाना दर्द भी है।)
करण (धीमे स्वर में, लेकिन चेतावनी भरे लहज़े में) बोला -
"चुप रहो... जब तक मैं हूँ... कोई तुम्हें छू भी नहीं सकता।"
(करण फिर गरजता है और अपनी पूरी शक्ति से परछाई पर वार करता है। कमरा कांपने लगता है। सिमरन डर से उसकी छाती से और कसकर चिपक जाती है। बाहर खिड़कियाँ टूट जाती हैं, और परछाई धीरे-धीरे धुंध बनकर गायब हो जाती है।)
"उस रात...
सिमरन ने पहली बार देखा कि उसका boss... उसका डर...
वो सचमुच एक सैतान था।
लेकिन वही सैतान... उसकी सबसे बड़ी ढाल भी बन गया।"
(परछाई करण के वार से गिर जाती है और धुंध में बदलकर ग़ायब होने लगती है। लेकिन इस लड़ाई में करण की साँसें भारी हो जाती हैं। उसकी लाल आँखों की चमक थोड़ी धुंधली पड़ती है।)
"शक्ति कितनी भी बड़ी हो...
हर बार इस्तेमाल होने पर उसका बोझ भी बढ़ जाता है।
करण भी कमज़ोर पड़ चुका था।
लेकिन उसकी पकड़ अब भी सिमरन की कलाई पर मज़बूत थी।"
(सिमरन हांफ रही है, उसका चेहरा आँसुओं से भीगा हुआ है। मासूम दिल की धड़कन इतनी तेज़ है कि मानो कभी भी टूट जाएगी।)
सिमरन (रोते हुए, काँपते स्वर में) बोली -
"म-मुझे घर जाना है... प्लीज़... प्लीज़ छोड़ दीजिए मुझे..."
(करण कुछ नहीं बोलता। वो बस उसका हाथ थामे तेज़ क़दमों से कॉरिडोर से बाहर निकल जाता है। दोनों बिल्डिंग से बाहर आते हैं। तूफ़ान थम चुका है। चाँदनी सब कुछ ठंडी रोशनी से नहला रही है।)
(करण सिमरन को अपनी कार में बिठाता है। उसके चेहरे पर अब भी डर साफ़ है। वो सीट पर सिकुड़कर बैठ जाती है और खिड़की के बाहर देखने लगती है। उसकी आँखें करण से मिलने से भी डरती हैं।)
"उसका मासूम दिल...
अभी तक उस परछाई और उस दानवी चेहरें से काँप रहा था।
पर अजीब ये था... कि उसी दानव ने उसे मौत से बचाया भी था।"
(कार रुकती है। करण सिमरन के घर के सामने उतरता है। दरवाज़ा खोलकर सिमरन को बाहर उतरने का इशारा करता है। सिमरन धीरे-धीरे कार से निकलती है।)
सिमरन (धीरे, डर से भरी आवाज़ में) बोलो -
"अ... आप... अब चले जाइए... प्लीज़..."
(करण बस खामोश खड़ा रहता है। उसकी आँखें ठंडी लाल चमकती हैं। सिमरन जल्दी-जल्दी घर के अंदर चली जाती है और दरवाज़ा बंद कर लेती है।)
(रात गहराती है। सिमरन खिड़की से झाँकती है। बाहर करण अब भी खड़ा है। बिना हिले-डुले... जैसे कोई पत्थर की मूर्ति हो। उसकी नज़रें अंधेरे में चौकस हैं।)
"वो रात...
सिमरन के लिए नींद और चैन सब छीन ले गई।
क्योंकि उसके घर के बाहर खड़ा था एक सैतान...
जो दुश्मन भी था... और रखवाला भी।"
(सिमरन पर्दे के पीछे से उसे देखती है। उसका दिल और तेज़ धड़कने लगता है। वो बिस्तर पर जाकर बैठती है, मगर उसकी आँखें अब भी डर और सवालों से भरी हैं।)
(सिमरन खिड़की से देखती है। करण अब भी गेट के पास खड़ा है। उसका चेहरा सख़्त, आँखें लाल और पूरी देह ऐसे चौकन्नी जैसे किसी भी पल हमला हो सकता हो। सिमरन पर्दा गिरा देती है और बिस्तर पर लेट जाती है।)
"वो रात... उसके लिए मौत और पहरेदारी के बीच अटकी हुई थी।
एक तरफ़ डर... और दूसरी तरफ़ वही डर उसका रक्षक भी बना हुआ था।"
(सिमरन आँखें बंद करती है। पर नींद आने के बजाय उसे एक अजीब सपना आने लगता है।)
(सपना: वो फिर उसी अंधेरे कॉरिडोर में है। परछाई उसका पीछा कर रही है। वो भाग रही है। अचानक करण सामने आता है। उसकी आँखें और भी ज़्यादा लाल, उसके दाँत और नुकीले, पंख और फैल जाते हैं। वो परछाई को पीछे धकेलता है, मगर उसी वक्त सिमरन की ओर भी झपटता है।)
सिमरन (सपने में चिल्लाकर) बोली -
"नहीं... प्लीज़ मत आना मेरे पास...!"
(सिमरन झटके से नींद से जागती है। उसके माथे पर पसीना है। वो साँसें तेज़ी से ले रही है। धीरे-धीरे खिड़की की तरफ़ जाती है और पर्दा थोड़ा हटाती है।)
(बाहर करण अब भी खड़ा है। उसकी आँखें लाल चमक रही हैं। सिमरन का दिल काँपता है।)
सिमरन (अपने आप से, धीमे डर भरे स्वर में) बोली -
"ये... आख़िर हैं क्या?
ये मुझे मारना चाहते हैं... या बचाना?"
(वो पर्दा गिराकर पीछे हटती है। बिस्तर पर बैठ जाती है और तकिये को सीने से लगा लेती है। उसकी आँखों में डर के साथ-साथ उलझन भी है।)
(बाहर करण खड़ा है। उसके चेहरे पर एक दर्द भरी सख़्ती है। आँखें आधी बंद। मानो वो खुद को काबू में रखने की कोशिश कर रहा हो। उसके होंठों पर खून की प्यास का हल्का कंपन है।)
"सिमरन उस रात डर से सोई नहीं...
और करण उस रात अपनी प्यास से लड़ा।
एक ही रात ने दोनों की दुनिया बदल दी थी।"