Devil की दास्तान - 2 Sonam Brijwasi द्वारा डरावनी कहानी में हिंदी पीडीएफ

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Devil की दास्तान - 2

ऑफिस का कैबिन। AC की ठंडी हवा चल रही है, लेकिन सिमरन के माथे पर पसीना है। वो डरी-सहमी कुर्सी पर बैठी है। उसके सामने करण, गहरी नज़रों से लगातार उसे घूर रहा है।
"कभी-कभी डर शब्दों से नहीं... निगाहों से पैदा होता है।
सिमरन के लिए करण की लाल आँखें वही डर थीं... जो उसके सीने की धड़कनें रोक रही थीं।"

सिमरन फाइल्स में नोट्स लिख रही है, लेकिन उसका ध्यान बार-बार करण की आंखों की तरफ चला जाता है। वो घबराकर नज़रें झुका लेती है।

सिमरन (मन ही मन) में बोली - 
हे भगवान जी! ये बार-बार मुझे क्यों देखते हैं? ये इंसान है भी, या कुछ और? इनकी आंखें लाल क्यूं हैं?

करण अचानक आगे झुकता है और धीमी आवाज़ में बोलता है।

करण ( फुसफुसाते हुए) बोला - 
तुम्हें पता है, जब इंसान डरता है तो उसकी सांसें तेज़ हो जाती हैं। दिल की धड़कनें रुक-रुक कर चलती हैं।
और उस वक्त, उसका खून और भी मीठा हो जाता है।"

सिमरन हक्की-बक्की रह जाती है। उसके हाथ से पेन गिर जाता है।

सिमरन (कांपते हुए) बोली - 
क क्या मतलब s sir?

करण (हल्की ठंडी मुस्कान के साथ) बोला - 
मतलब ये कि गलती मत करना। वरना मैं तुम्हें कभी माफ़ नहीं करूँगा।


(अगले दिन – सिमरन कंप्यूटर पर काम कर रही है। घबराहट में वो एक फाइल का डेटा गड़बड़ा देती है। स्क्रीन पर एरर आ जाता है।)

सिमरन (डरी हुई) बोली - 
हाय राम! ये क्या कर दिया मैंने। अब मेरा क्या होगा? Sir तो मुझे कच्चा चबा जाएंगे।

अचानक कमरे की लाइट्स टिमटिमाने लगती हैं। AC की आवाज़ रुक जाती है। कमरे में अंधेरा छा जाता है। सिर्फ करण की लाल आँखें दिखने लगती हैं।
सिमरन कुर्सी से उठकर पीछे हट जाती है। उसके पैरों में जान नहीं रहती।

करण (भारी आवाज़ में) बोला - 
गलती इंसान से होती है।
पर तुम मेरी पर्सनल एम्प्लॉई हो।
और मेरी दुनिया में गलती की सज़ा सिर्फ डर है।

वो धीरे-धीरे उसके पास आता है। हर कदम पर उसकी परछाई लंबी होती जाती है। सिमरन दीवार से टिक जाती है। उसकी आंखों से आंसू बहने लगते हैं।

सिमरन (रोते हुए) बोली - 
प्लीज़ Sir , मुझे माफ़ कर दीजिए, दुबारा ऐसा नहीं होगा!

करण उसके करीब आ जाता है। उसका चेहरा सिमरन के बिल्कुल पास, आंखें सीधे उसकी आंखों में  घुसती हुई।

करण (धीरे से, फुसफुसाकर) बोला - 
याद रखना मेरे राज में गलती करोगी, तो डर से मर जाओगी।
मैं सिर्फ सिखाता नहीं डराता भी हूँ।

सिमरन सिसकते हुए सिर हिलाती है। करण मुस्कुराता है और अचानक पीछे हट जाता है। कमरे की लाइट्स सामान्य हो जाती हैं।

ऑफिस कैफ़ेटेरिया। भीड़ है, मगर फुसफुसाहट का माहौल। सिमरन अपने हाथ में files लेकर एक कोने में बैठी है। उसके चेहरे पर घबराहट साफ झलकती है।

Employee 1 (धीरे से) बोली - 
सुना है? लाल आँखों वाले बॉस ने एक पर्सनल एम्प्लॉई रखी है।

Employee 2 (सिहरते हुए) बोला - 
हाँ! और वो भी सिर्फ 18 साल की। पता नहीं उस बच्ची का क्या होगा।

Employee 3 (मजाक बनाकर) बोला - 
शायद उसे रात को अकेले बुलाएगा!

सभी हल्की हंसी हंसते हैं। सिमरन ये बातें सुन लेती है। उसके हाथ से pen गिर जाती है। उसकी आंखों में आंसू आ जाते हैं।

सिमरन (मन ही मन, कांपते हुए) बोली - 
लोग क्या सोच रहे हैं, मैं फँस गई हूँ। हे भगवान! अब मैं क्या करूँ?

वो तुरंत उठती है और बाहर निकलने लगती है। और कुछ सोच कर रुक जाती है। उसे अपने पीछे कुछ महसूस हुआ। घबराहट में वो पीछे मुड़ती है। और अचानक सीधे करण से टकरा जाती है।
उसकी फाइलें गिर जाती हैं। उसकी सांसें रुक सी जाती हैं। चेहरा सफेद पड़ जाता है।

सिमरन (हकलाते हुए) बोली - 
म माफ़ कर दीजिए s Sir।

करण स्थिर खड़ा है। उसकी आंखों का लाल रंग और भी गहरा दिख रहा है बिल्कुल खून की तरह। उसकी ठंडी आवाज़ कैफ़ेटेरिया की हलचल को काट देती है।

करण (धीरे-धीरे, डरावनी ठंडक से) बोला - 
लोग हमेशा वही कहते हैं जो उनकी समझ में आता है।
पर तुम्हें डरना  दूसरों की बातों से नहीं चाहिए।
बल्कि मुझसे चाहिए।

सिमरन कांपते हुए उसकी ओर देखती है। करण उसके  करीब आ जाता है। उसकी सांसें जैसे जम जाती हैं।

करण (और भी धीमी, मगर खौफ़नाक आवाज़ में) बोला - 
याद रखो अब तुम्हारी दुनिया सिर्फ मैं हूँ।
अगर भागने की सोची भी तो मौत तुम्हें मुझसे पहले पकड़ लेगी।

सिमरन के हाथ काँपते हैं। उसका दिल इतनी तेज़ धड़कता है मानो अभी फट जाएगा। उसकी आँखों से आंसू बहने लगते हैं।

करण अचानक पीछे हटता है और सामान्य लहजे में:
करण बोला - 
अब जाओ... और अपना काम पूरा करो।

(सिमरन कांपते हुए फाइलें समेटती है और तेज़ी से भाग जाती है। कैफ़ेटेरिया के सारे लोग खामोश होकर उन्हें देख रहे होते हैं।)

ये कोई आम बॉस और एम्प्लॉई की कहानी नहीं थी।
ये डर, रहस्य और किस्मत का जाल था।
जहाँ सैतान ने एक मासूम लड़की को अपनी दास्तान में बाँध लिया था।

ऑफिस का टाइम खत्म हो चुका है। सारे कर्मचारी जा चुके हैं। बड़ी बिल्डिंग में सिर्फ हल्की नीली लाइटें जल रही हैं। सिमरन अपनी सीट पर बैठी फाइलें टाइप कर रही है। सिमरन ने गलती की थी जिस वजह से करण ने उसका over time लगवा दिया था। उसके चेहरे पर थकान और डर दोनों साफ नज़र आते हैं।

कभी-कभी डर चुपचाप दीवारों में छिपा होता है।
और उस रात सिमरन बिल्कुल अकेली थी।

अचानक कमरे का दरवाजा धीरे-धीरे क्र्रीक की आवाज़ के साथ खुलता है। सिमरन चौंक जाती है।

सिमरन (डरते हुए) बोली - 
क कौन है?

दरवाजे पर करण खड़ा है। उसकी आंखों खून जितनी लाल थीं ।  अंधेरे में और साफ दिखाई दे रही है।

करण (गहरी ठंडी आवाज़ में) बोला - 
डर गई? ये तो बस शुरुआत है।
ओवरटाइम का मतलब है अब तुम और मैं इस ऑफिस में अकेले हैं।

सिमरन कांपते हुए कुर्सी से खड़ी हो जाती है।

सिमरन (डरी हुई, आवाज़ टूटती हुई) बोली - 
मैंमैं घर जाना चाहती हूँ s sir,  देर हो रही है। P please मुझे जाने दीजिए।

करण धीरे-धीरे उसकी ओर बढ़ता है। हर कदम पर उसकी परछाई लंबी और डरावनी होती जाती है।

करण बोला - घर?
तुम्हारा घर अब यही है , ये ऑफिस, और मैं।

सिमरन पीछे हटती है और उसकी पीठ दीवार से टकरा जाती है। उसका दिल इतनी तेज़ धड़क रहा है मानो अभी बाहर निकल आएगा।

सिमरन (रोते हुए) बोली - 
कृपया मुझे जाने दीजिए। मम्मी पापा इंतेज़ार कर रहे हैं। 

करण उसके करीब आता है। उसकी खून जैसी लाल आँखें सीधे सिमरन की आंखों पर पड़ती है। सिमरन की सांसें रुकने लगती हैं।

करण (फुसफुसाकर, डरावनी आवाज़ में) बोला - 
झूठ बोल रही हो। क्योंकि तुम्हारे मम्मी पापा तो वृन्दावन में हैं। और तुम दिल्ली में , तो वो इंतेज़ार कैसे कर सकते हैं। याद रखो- गलती करने वालों को मैं डराकर मारता हूँ।
और भागने वालों को मौत से भी बुरा हाल देता हूँ।

सिमरन की आंखें भर जाती हैं। उसका चेहरा पीला पड़ चुका है। अचानक कमरे की सारी लाइटें फ्लिकर करती हैं और बुझ जाती हैं। चारों ओर अंधेरा। बस करण की लाल आंखें चमकती रहती हैं। करण सिमरन के करीब था। और सिमरन बिल्कुल डरी सहमी खड़ी उसे देख रही थी। 

ऑफिस का माहौल। सभी लोग अपने-अपने काम में लगे हैं। लेकिन सिमरन की हालत सबसे अलग है। उसके चेहरे पर थकान, आंखों में नींद की कमी और होंठ कांपते रहते हैं।

"डर... कभी-कभी जेल बन जाता है।
और सिमरन... अपने ही ऑफिस में क़ैद हो चुकी थी।"

सिमरन टेबल पर फाइलें टाइप कर रही है। हाथ काँप रहे हैं। अचानक करण कमरे में आता है। उसका चेहरा हमेशा की तरह गंभीर और लाल आंखें चमकती हुई।

करण तेज़ आवाज़ में बोला -
"ये क्या है? इतनी छोटी-सी रिपोर्ट में भी गलती!
तुमसे तो एक लाइन ठीक से टाइप नहीं होती!"

सिमरन का चेहरा पीला पड़ जाता है। वह तुरंत खड़ी हो जाती है।

सिमरन हकलाते हुए बोली -
"स..सॉरी सर... दुबारा नहीं होगा।"

करण टेबल पर जोर से फाइल पटकता है। कमरे में सन्नाटा गूंज उठता है।

करण धीमे मगर डरावने लहजे में बोला -
"गलतियाँ मुझे बर्दाश्त नहीं हैं।
और जो मुझे नाराज़ करता है... उसे उसकी सज़ा मिलती है।
और तुम्हारी सजा ये है कि तुमको आज भी overtime करना है।"

सिमरन की आंखों में आंसू आ जाते हैं, मगर वह चुपचाप सिर झुका लेती है।

सिमरन मन में बोली - आज ही क्या रोज तो over time कराते हैं इंसान नहीं मशीन समझ रखा है।

करण बोला - कुछ कहा तुमने?

सिमरन बोली - न नहीं sir।

ऑफिस खाली हो चुका है। बाहर अंधेरा। बिल्डिंग में सिर्फ एक-एक लाइट टिमटिमा रही है। सिमरन अपनी सीट पर बैठी है। घड़ी में रात के 11 बज रहे हैं।

सिमरन धीमे स्वर में बड़बड़ाते हुए बोली -
"हर दिन ओवरटाइम। हर दिन डर। अब तो साँस लेना भी मुश्किल लग रहा है।"

अचानक पीछे से कदमों की आवाज़ आती है। करण धीरे-धीरे पास आता है। उसकी परछाई सिमरन पर पड़ती है।

करण ठंडी आवाज़ में बोला - "थक गई...?
याद रखो... तुम्हारा काम खत्म तभी होगा जब मैं कहूँगा।"

सिमरन धीरे से सिर हिलाती है। उसकी आंखों से आंसू गिरते हैं, पर वो बोलने की हिम्मत नहीं जुटा पाती।

करण उसकी ओर झुकता है और फुसफुसाता है।

करण बोला -
"डर अच्छा है। डर इंसान को काबू में रखता है।
और तुम... सिर्फ मेरी हो।"

सिमरन कांप उठती है। उसकी सांसें तेज़ हो जाती हैं।

"सिमरन के लिए ऑफिस अब नौकरी की जगह नहीं...
बल्कि एक डरावना पिंजरा बन चुका था।
जहाँ उसका हर दिन... मौत से भी बदतर था।"

दिल्ली की सुनसान सड़क। घड़ी में रात के 12 बज रहे हैं। सिमरन अकेली, कांपते कदमों से घर की ओर चल रही है। सड़क पर लाइट्स टिमटिमा रही हैं।

"कभी-कभी अंधेरे से ज़्यादा ख़तरनाक... वो परछाइयाँ होती हैं जो अंधेरे में आपका पीछा करती हैं।"

पीछे से कुछ आवारा लड़के आते हैं। हंसते, सीटी बजाते, शोर मचाते।

लड़का 1 हँसते हुए बोला -
"अरे वाह! अकेली बच्ची आधी रात को घूम रही है!"

लड़का 2 बोला -
"चलो मजे लेते हैं!"

सिमरन डर जाती है। उसकी आँखों में आँसू भर आते हैं। वह तेज़-तेज़ चलने लगती है।

सिमरन रोते हुए मन ही मन बोली -
"भगवान जी... कोई तो मेरी मदद करो!"

लड़के उसके चारों ओर घिर जाते हैं। सिमरन चीख पड़ती है।

सिमरन बोली -
"प्लीज़... मुझे जाने दो!"

अचानक दूर से हेडलाइट्स चमकती हैं। एक काली कार तेज़ ब्रेक लगाकर रुकती है। दरवाज़ा खुलता है। करण बाहर आता है। उसकी लाल आँखें हल्की चमक रही हैं।

लड़का 3 घबराकर बोला -
"ये... ये तो वही लाल आँखों वाला है!"

करण बिना कुछ कहे उनकी ओर बढ़ता है। उसकी चाल ठंडी और डरावनी है। लड़के उस पर हमला करने की कोशिश करते हैं, लेकिन करण एक-एक करके उन्हें ज़मीन पर पटक देता है। एक की नाक से खून, दूसरे का हाथ मरोड़ देता है।

करण गरजते हुए बोला -
"गायब हो जाओ... वरना हड्डियाँ तोड़ दूँगा!"

लड़के जान बचाकर भाग जाते हैं। सड़क पर सन्नाटा छा जाता है। सिमरन डरी-सहमी दीवार से लगी खड़ी है।

करण धीमी आवाज़ में उसकी ओर देखते हुए बोला -
"तुम ठीक हो?"

सिमरन काँपते हुए सिर हिलाती है। उसकी आँखों में आँसू हैं। करण उसकी ओर बढ़ता है।

करण बोला -
"आओ... मैं तुम्हें घर छोड़ देता हूँ।"

सिमरन चुपचाप उसकी कार में बैठ जाती है। कार का माहौल भारी है। वह खिड़की से बाहर देखती है, पर बार-बार करण की लाल आंखों पर उसकी नज़र टिक जाती है।

"जिससे वो सबसे ज़्यादा डरती थी... वही उसकी ज़िंदगी की सबसे बड़ी ढाल बन चुका था।
लेकिन सवाल ये था...
ये ढाल कब तलवार बन जाए... कोई नहीं जानता।"

कार रुकती है। करण बिना उसकी तरफ देखे बस इतना कहता है।

करण ठंडी आवाज़ में बोला -
"घर के अंदर जाओ... और अगली बार इतनी देर तक बाहर मत रहना।"

सिमरन खुद से बोली -
पहले तो overtime कराते हैं फिर बोलते हैं इतना देर तक घर से बाहर मत रहो।

करण बोला -
कुछ कहा तुमने!

सिमरन बोली - न नहीं sir।

सिमरन जल्दी से उतर जाती है। पीछे मुड़कर देखती है, तो करण की लाल आँखें अंधेरे में चमकती हैं।

ऑफिस का कॉरिडोर। सिमरन घबराई-सी HR के केबिन से निकल रही है। उसके हाथ में इस्तीफ़ा का पेपर है। उसके चेहरे पर डर और थकान साफ है।

सिमरन मन ही मन बोली -
"अब और नहीं। हर दिन डरना, हर दिन सज़ा। मैं ये नौकरी छोड़ दूँगी।"

वह रिसेप्शन पर जाती है, लेकिन तभी पीछे से ठंडी हवा का एहसास होता है। करण वहीं खड़ा है। उसकी आँखें हल्की लाल चमक रही हैं। वो गुस्से में था।

करण धीमी मगर डरावनी आवाज़ में बोला -
"नौकरी छोड़ने का ख्याल... दोबारा मत लाना।"

सिमरन काँप जाती है। उसके हाथ से इस्तीफ़ा का पेपर ज़मीन पर गिर जाता है। करण धीरे-धीरे आगे बढ़ता है। वह उसे खींचकर अपने cabin में ले गया।

करण बोला -
"याद रखो... ये जगह छोड़ने की इज़ाज़त सिर्फ मैं दूँगा।
तुम्हें जहाँ जाना होगा... मैं तय करूँगा।"

सिमरन की आँखों से आँसू बहने लगते हैं। वह हाथ जोड़कर खड़ी हो जाती है।

सिमरन रोते हुए बोली -
"प... प्लीज़ सर... मुझे जाने दीजिए। मैं नहीं कर सकती ये सब, मुझे बहुत डर लगता है। मुझे नहीं रहना यहां।"

करण अचानक ज़ोर से टेबल पर मुक्का मारता है। लकड़ी की टेबल हिल उठती है। सिमरन डर के मारे पीछे हट जाती है।

करण गरजते हुए बोला -
"डरना सीखो। डर ही तुम्हें जिंदा रखेगा।
और तुम... मेरी हो। इस ऑफिस से भागने की हिम्मत मत करना।"

उस रात, सिमरन अपने कमरे में बैठी है। खिड़की से बाहर देख रही है। उसके हाथ कांप रहे हैं। वह डायरी में लिखती है।

सिमरन लिखते हुए धीमी आवाज़ में बोली -
"मैं फँस गई हूँ... एक ऐसी दुनिया में जहाँ मेरी कोई आज़ादी नहीं।
वो आदमी... या जो भी है... उसने मुझे अपने जाल में क़ैद कर लिया है।
काश... कोई रास्ता होता भागने का।"

अचानक खिड़की से बाहर एक लाल चमकती परछाई नज़र आती है। सिमरन डर के मारे डायरी गिरा देती है। परछाई धीरे-धीरे गायब हो जाती है।

"सिमरन के लिए अब ये नौकरी नहीं... बल्कि एक सज़ा बन चुकी थी।
वो जितना भागने की कोशिश करती... उतना ही लाल आँखों वाला साया उसे घेर लेता।
क्योंकि करण के लिए... सिमरन सिर्फ एक कर्मचारी नहीं... बल्कि एक शिकार थी।"

क्या चाहता था करण सिमरन से ? क्यों वो उसे हर बार डरा के रखता? क्यों वो उससे over time करता? क्यों वो नहीं चाहता था कि वो जॉब छोड़कर जाए?