Devil की दास्तान - 45 Sonam Brijwasi द्वारा महिला विशेष में हिंदी पीडीएफ

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Devil की दास्तान - 45

(पुराना वीरान शहर, जहाँ कभी "अमृत प्रोजेक्ट" की लैब हुआ करती थी। धुंध फैली हुई है। हवा में राख के कण उड़ रहे हैं। कहीं दूर एक जली हुई गाड़ी से चिंगारियाँ उठ रही हैं।)

(कबीर अकेला सड़क पर चलता जा रहा है। उसके चेहरे पर थकान और टूटन दोनों हैं। उसकी आँखों में सिया की झलक अब भी तैर रही है — उसकी मुस्कान, उसके आँसू, और वो आख़िरी नज़र...)

कबीर (धीरे, खुद से) बोला - 
“वो चली गई…शायद सही किया…क्योंकि एक सैतान को प्यार करना, इंसान के बस की बात नहीं।”

(वो रुकता है, एक पत्थर पर बैठता है। उसके हाथ में वही काला लॉकेट है जो सिया ने कभी दिया था।)

कबीर (लॉकेट को देखकर) बोला - 
“सिया…मैं तुझसे दूर नहीं जाना चाहता था…पर जब तुझसे नज़दीक हुआ…तो अपनी ही सच्चाई से डर गया…।”

(सिया एक छोड़ी हुई झोपड़ी में है। आँखें सूजी हुई हैं। वो आईने में खुद को देख रही है।)

सिया (आईने से) बोली - 
“तू आखिर है क्या सिया?
एक इंसान… या किसी प्रयोग की देन?”

(रुकती है, आँसू बहते हैं) बोली - 
“कबीर जी मुझसे कुछ छिपा रहे हैं… पर उनके बिना एक पल भी नहीं कटता।”

(वो अपनी हथेली पर बने हल्के निशान को देखती है — जहाँ कभी कबीर ने रक्षा मंत्र लिखा था। वो हल्का सा चमकने लगता है, जैसे दूर से कबीर का एहसास उस तक पहुँच रहा हो।)

( पहाड़ी के किनारे पर कबीर बैठा है। चाँदनी में उसका चेहरा साफ़ दिखता है। उसके पीछे धुंध में किसी की परछाईं उभरती है —
एक बूढ़ा साधु। वही जो पहले कभी मंदिर में मिला था।)

साधु बोले - 
“फिर से वही गलती कर रहा है, कबीर?”

कबीर (धीरे) बोला - 
“गलती?
प्यार गलती नहीं होती बाबा…”

साधु (गंभीर स्वर में) बोले - 
“प्यार तब वरदान है जब सच्चाई के साथ हो।
तूने उससे अपनी असली पहचान छिपाई…
इसलिए ‘नज़दीक होकर भी दूरी’ बनी रहेगी।”

(कबीर की आँखें नम हो जाती हैं।)

कबीर बोला - 
“मैं सैतान की औलाद था… पर उसने मुझमें इंसान देखा।
अब डरता हूँ कि कहीं मेरी सच्चाई उसे फिर ना तोड़ दे।”

साधु (धीरे) बोले - 
“फिर उसे सच्चाई बताने का वक़्त आ गया है।
क्योंकि झूठ का रिश्ता, चाहे कितना भी पवित्र हो, टिकता नहीं।”

(कबीर सिर झुका लेता है। दूर कहीं सिया की हल्की पुकार सुनाई देती है —
जैसे उसकी आत्मा उसे बुला रही हो।)

सिया की झोपड़ी
(वो खिड़की के पास खड़ी है। हवा चलती है, पर्दे उड़ते हैं। उसकी नज़र आसमान में जाती है — चाँद पर। धीरे-धीरे उसका चेहरा शांति से भरने लगता है।)

सिया (धीरे) बोली - 
“कबीर जी…अगर हमारा रिश्ता सच में प्यार है…तो आप लौटोगे…
भले देर से लौटो…।”

(उसकी आँखों से आँसू गिरते हैं — और उसी पल कबीर के लॉकेट पर भी एक बूँद गिरती है, जैसे दूरी के पार भी उनका रिश्ता ज़िंदा हो।)

“प्यार कभी खत्म नहीं होता…कभी वक़्त उसे परखता है, कभी सच्चाई…
कबीर और सिया —
दो आत्माएँ, दो सच्चाइयाँ…एक साथ भी हैं, और दूर भी…नज़दीक होकर भी — दूरी।”

रात का सुनसान शहर — बरसात की हल्की बूँदें सड़क पर चमकती हैं। लैम्प-पोस्ट की पीली रौशनी में साया लंबा दिखता है।)
“कभी-कभी ज़िन्दगी के सबसे वीरान रास्ते भी यादों से भरे होते हैं।
करन — जो कबीर भी था, और शैतान भी — खुद से अलग-थलग चल रहा था। उसके कदम उस शहर की ठंडी सड़क पर कुछ ऐसे ठहर रहे थे जैसे हर कदम एक सज़ा हो।”

(करन अकेला सड़क पर चल रहा है। उसका चेहरा थका हुआ और आँखों में कुछ टूटन है। वह सोचता है — फ्लैशबैक में सिमरन के छोटे-छोटे पल अछ्छे से दिखते हैं।)

करन (मन ही मन) बोला - 
“याद है जब पहली बार वो आई थी… नन्ही मुस्कान, डरती-डरती सी आँखें। जब वो सिया बनी — उसने पहले के सब डर हटा दिए थे। तब उसकी हँसी… अब कहाँ है वो हँसी?”

(वो रुक कर एक चिल्लाते हुए मोड़ पर खड़ा होता है — उसकी साँसें धीरे-धीरे बढ़ती हैं। उसे अपना शरीर अपना नहीं लगता — जैसे उस पर कोई सन्नाटा छा गया हो।)

करन (भीतर से फुसफुसाता हुआ) बोला - 
“मेरा शरीर… मेरा मन… सब कुछ खोया-सा… मैं खुद में नहीं हूँ। मैं... मैं किसका हूँ?”

(इसी बीच तेज़ी से एक गाड़ी सड़क पर आती है — सामने से लाईटें चमकती हुई। ड्राइवर संभवत: ब्रेक लगाता है पर गाड़ी फिसलती है — करन के ठीक सामने आने वाली है।) “और उसी पल, वक्त ने एक मोड़ लिया — एक ऐसी आवाज़ जो करन की दुनिया बदल सकती थी।” (स्टॉप-शॉट: गाड़ी की ब्रेक-लाइटें, करन का झटका, और अचानक एक हाथ — सिया का — गाड़ी के बीचों-बीच गिरते हुए करन को पीछे धकेलता है।)

(सिया अचानक प्रकट होती है — उसके कपड़े गिरे-भरे, चेहरा आर्कषण और डर का मिश्रण। वह करन को अपनी बाँहों में धकेलती है। गाड़ी करन के ठीक सामने से तेज़ी से गुजरती है और धूल उड़ा कर आगे निकल जाती है।)

करन (हैरानी में, धीरे से) बोला - 
“सिया…?”

सिया (उसके सीने में चिपकी हुई, धीरे-धीरे साँस लेते हुए) बोली - 
“मैं… आपको दूर नहीं होने दूँगी… इस बार भी…”

(सिया के होंठों से एक धुंधला-सा सा स्मरण निकलता है — जैसे पहले भी किसी ने उसे बचाया हो। उसकी आँखों में एक झलक आती है — स्मृतियों का कोई टुकड़ा चमक उठा।)

सिया (धुँधली-सी आवाज़ में) बोली - 
“हम्म… मुझे… ऐसा लग रहा है… जैसे पहले भी किसी ने मुझे ऐसे ही बचाया था… पर कौन? कौन था जो मुझे बचाता था?”

(वह पलभर के लिए अटकी, फिर उसका चेहरा कठोर हो जाता है — उसकी ऊर्जा में अचानक परिवर्तन आता है। आँसू रुकते हैं; आँखों में आग सी चमक आती है।)

“यह वही पल था जब सिया का भीतर एक और ताकत जाग उठी — बचपन की मासूमियत और अब परिभाषाहीन क्रोध, दोनों साथ-साथ।”

सिया (आवाज़ में ठहराव, दृढ़ आवाज में) बोली - 
“आप क्यों अकेले घूम रहे हो, करन? क्या गुनाहों की सज़ा तुम अकेले नहीं भोगोगे?”

(करन कुछ कहने की कोशिश करता है, पर शब्द नहीं निकलते। सिया अपने पैरों से उठकर उसे खींचती है — उसकी चाल तेज और निर्णायक है।)

सिया (गुस्से में, करन के कान में) बोली - 
“आपने मुझे जो दर्द दिया — अब और सहन नहीं करुँगी। चलो, घर — और जवाब दो।”

(वो करन का हाथ पकड़ कर उसे खींचती है। करन अचंभे और धड़कन के साथ उसके पीछे चलता है।)

करन (मन ही मन, टूटते स्वर में) बोला - 
“वो जो मैंने छिपाया था… वो सच इतने आसान से बयाँ नहीं कर सकता। पर उसके इस क्रोध में कहीं मेरी सजा भी है।”

(वे दोनों एक सुनसान गली में हैं। सिया अभी भी कंपकपाकर पर मजबूत — मानो किसी पुराने आदेश से चल रही हो। करन चुप है; वह खुद के अंदर जंग लड़ रहा है।)

सिया (धीमे स्वर में, पर कटु आवाज में) बोली - 
“जब आपने मुझे पहली बार देखा था… आपने मुझपर नज़र डाली पर मुँह नहीं खोला। पर जब मैं सिया बनी, मैंने वो मुस्कुराहट देखी। अब बताओ — आप कौन हो करन?”

करन (आँखें झुकाते हुए) बोला - 
“किसी का नाम… किसी का व्यक्तित्व — उससे कुछ नहीं बदलता। मैं वही हूँ… पर मैंने तुम्हें जो दर्द दिया — उसके लिए शाप खुद पर है।”

सिया (आँसू फिर आँखों में) बोली - 
“आप शब्दों से भाग रहे हो… हर बार आप वही करते हो…”

(वह रुक कर उसे घूरती है, फिर ज़ोर से खींचते हुए चलती है — करन झटके में उसके साथ चलता है। उसकी चाल अब अधीर और कठोर है — कोई ठोस इरादा लेकर।)

“कभी-कभी बचाव और आरोप एक साथ चलते हैं —
और वही हाथ जो किसी को बचाते हैं, वही हाथ कभी-कभी उसकी ज़िन्दगी का कारण बन जाते हैं।
सिया ने करन को बचाया — पर उसी बचाव ने उनके दरमियान जो दरार डाल दी थी, उसे और गहरा कर दिया।”

(दोनों तेज़ कदमों से चलते हुए शहर की ओर बढ़ते हैं — एक के सीने पर भरोसा, दूसरे के दिल में छुपी हुई सच्चाई।)

“वो बची तो गई, पर बचाव के साथ कुछ अनकहे सवाल भी आए — और सवालों के साये में, नज़दीकियाँ भी दूरियाँ बन गईं।”

रात का समय। आसमान में हल्के बादल, बाहर हवाओं की हल्की सरसराहट। कमरे में हल्की नीली रोशनी जल रही है।)
“कभी-कभी सवालों से ज़्यादा ख़तरनाक होती है — ख़ामोशी।
सिया के दिल में तूफ़ान था, और करन के दिल में वो राज़ जो उसकी ज़िन्दगी की जड़ में छिपा था।”

(सिया गुस्से में घर का दरवाज़ा खोलती है, तेज़ क़दमों से अंदर जाती है। करन उसके पीछे चुपचाप चलता है — उसकी आँखों में थकान और पछतावा दोनों हैं।)

सिया (तेज़ आवाज़ में, गुस्से से) बोली - 
“कबीर जी!! बोलो ना! आखिर आप कौन हो?!
हर बार जब मैं कुछ पूछती हूँ — आप चुप क्यों हो जाते हो?!
कौन सा सच है जो आप मुझसे छिपा रहे हो?”

(करन कुछ नहीं बोलता। बस दीवार की तरफ़ देखने लगता है। उसकी साँसें भारी हैं, पर मुँह से कोई शब्द नहीं निकलते।)

सिया (आँसू आँखों में लिए, कड़वाहट भरी आवाज़ में) बोली - 
“आपकी ये चुप्पी… मुझे डरा रही है।
कभी लगता है आप वही नहीं जो दिखते हो…”

(वो अचानक रुकती है, उसका चेहरा सख्त हो जाता है। फिर पलटती है और गुस्से में अपने कमरे की ओर चली जाती है।)

सिया (दरवाज़ा बंद करते हुए, बड़बड़ाती है) -
“अब बस! मुझे नहीं चाहिए ऐसे जवाब…
ना ही कोई अधूरी बातें… सब झूठ लगने लगा है अब…”

(वो तकिए पर सिर रखती है, बड़बड़ाती रहती है। फिर धीरे-धीरे उसकी आँखें भारी होने लगती हैं। कुछ ही पलों में वह गहरी नींद में चली जाती है।)

(कैमरा धीरे से कमरे के दूसरे कोने पर जाता है — जहाँ करन चुपचाप दरवाज़े के बाहर खड़ा है।
वो धीरे से दरवाज़ा खोलता है और कमरे में आता है।
सिया नींद में है — उसके चेहरे पर आँसुओं के निशान अब भी चमक रहे हैं।)

करन (धीरे, खुद से बुदबुदाते हुए) बोला - 
“मैं तुम्हें सच नहीं बता सकता सिमरन…क्योंकि अगर मैंने ऐसा किया… अगर मेरी ज़ुबान से सच बाहर आया…”

(उसकी आवाज़ भारी हो जाती है — आँखों में डर उतर आता है।)

करन (धीरे, काँपती आवाज़ में) बोला - 
“…तो वो लोग तुम्हें नोच खाएँगे… तुम्हारी जान ले लेंगे…
और मैं… मैं ये होने नहीं दूँगा।”

(वो एक गहरी साँस लेता है, सिया की ओर देखता है — उसके माथे पर हल्के से हाथ फेरता है।
फिर बिस्तर के दूसरी ओर जाकर बैठता है। उसके चेहरे पर थकान और दर्द की झलक है।)

“हर रात उसके लिए युद्ध थी — खुद के भीतर का और बाहर की दुनिया का।
वो सिया से प्यार करता था, पर सच कहने की सज़ा उसे डराती थी।”

(करन धीरे से करवट लेकर सिया की ओर देखता है — उसके चेहरे पर हल्की मुस्कान उभरती है, जो दर्द में बदल जाती है।)

करन (धीरे से, फुसफुसाते हुए) बोला - 
“तुम मेरी रौशनी हो सिमरन…पर मेरी परछाई इतनी काली है कि अगर तुमने उसे देख लिया…तो शायद कभी वापस मुस्कुराओगी नहीं।”

(वो धीरे से उसके पास लेट जाता है। सिया नींद में हल्के से करवट लेती है और अनजाने में उसका हाथ करन के सीने पर रख देती है।
करन एक पल को आँखें बंद करता है — और पहली बार, बहुत दिनों बाद, उसकी साँसें शांत हो जाती हैं।)

“दोनों एक ही बिस्तर पर थे —
पर उनके बीच सच की एक गहरी दीवार थी। वो दीवार… जिसे सिर्फ़ प्यार ही गिरा सकता था —या फिर… किसी बड़ी तबाही ने।”

(कैमरा धीरे-धीरे ऊपर उठता है — खिड़की के बाहर काली रात, और एक हल्की लाल चमक आसमान में उभरती है… जैसे कोई ख़तरा फिर से लौट रहा हो।)
“अगर किस्मत ने चाहा… तो तुझे सब याद आ जाएगा सिमरन…”