राहुल की पहली बडी कामयाबी को दो दिन बीत चुके थे.
ऑफिस में अब उसका नजरिया लोगों के प्रति पहले जैसा ही था, लेकिन लोगों का नजरिया उसके प्रति बदलने लगा था. जिस लडके को कुछ दिन पहले लोग अनुभवहीन समझकर उसका मजाक उडाते थे, अब वही लोग उसके काम की तारीफ करने लगे थे.
राहुल को इससे कोई खास फर्क नहीं पडा.
वह आज भी सुबह समय पर ऑफिस आता, अपनी सीट पर बैठता और पूरी ईमानदारी से काम करता.
न किसी से बहस करता और न ही अपनी तारीफ सुनकर घमंड करता.
अंजलि यह सब दूर से देखती थी.
पहले राहुल की मेहनत देखकर उसे खुशी होती थी.
अब उसकी मेहनत के साथ- साथ राहुल की छोटी- छोटी बातें भी अंजलि का ध्यान खींचने लगी थीं.
सुबह के करीब दस बजे अंजलि ऑफिस पहुँची.
अंदर आते ही उसकी नजर अनायास राहुल की सीट पर गई.
कुर्सी खाली थी.
अंजलि कुछ पल वहीं रुक गई.
उसने घडी देखी.
राहुल अभी तक आया नहीं?
पास से गुजर रहे कर्मचारी ने कहा,
मैम, शायद आज रास्ते में कहीं फँस गया होगा।
अंजलि ने सामान्य आवाज में कहा,
ठीक है।
लेकिन उसके मन में बेचैनी शुरू हो चुकी थी.
उसने अपनी फाइल खोली, कंप्यूटर ऑन किया और काम में लग गई.
फिर पाँच मिनट बाद उसने दोबारा घडी देखी.
फिर दस मिनट बाद.
तभी ऑफिस का दरवाजा खुला और राहुल अंदर आया.
उसके चेहरे पर हल्की घबराहट थी.
वह सीधे अपनी सीट की तरफ जाने लगा.
राहुल।
अंजलि की आवाज सुनकर वह रुक गया.
जी मैम?
आज देर कैसे हो गई?
सॉरी मैम. रास्ते में बस खराब हो गई थी. दूसरी बस मिलने में समय लग गया।
अंजलि का चेहरा थोडा नरम पड गया.
ठीक है. लेकिन आगे से ध्यान रखना।
जी मैम।
राहुल अपनी सीट की तरफ बढ गया.
अंजलि कुछ पल उसे देखती रही.
फिर उसने खुद से पूछा—
मैं इतनी परेशान क्यों हो गई थी?
उसने तुरंत अपने विचारों को झटक दिया.
शायद इसलिए कि राहुल नया है. और मैं उसकी जिम्मेदारी महसूस करती हूँ।
लेकिन उसके दिल को यह जवाब अधूरा लगा.
दोपहर तक राहुल लगातार काम करता रहा.
अंजलि की नजर कई बार उस पर गई.
राहुल अपने काम में इतना डूबा हुआ था कि उसे आसपास की दुनिया का ध्यान ही नहीं था.
उसके सामने फाइलों का ढेर था.
वह एक- एक कागज ध्यान से देख रहा था और कंप्यूटर में जानकारी दर्ज कर रहा था.
करीब दो घंटे बाद अंजलि ने गौर किया कि राहुल ने अपनी सीट से उठकर पानी तक नहीं पिया.
राहुल।
जी मैम?
पानी पिया?
राहुल ने कंप्यूटर से नजर हटाई.
नहीं मैम, अभी पीता हूँ।
अभी नहीं. अभी जाओ।
राहुल मुस्कुरा दिया.
जी मैम।
वह पानी लेने चला गया.
अंजलि उसे जाते हुए देखती रही.
तभी उसके मन में एक अजीब- सा एहसास हुआ.
वह राहुल के काम की ही नहीं, उसकी सेहत और आराम की भी चिंता करने लगी थी.
कुछ दिनों पहले तक उसे किसी कर्मचारी के लंच करने या पानी पीने की चिंता नहीं होती थी.
लेकिन राहुल के मामले में वह खुद को रोक नहीं पा रही थी.
लंच टाइम हुआ.
ऑफिस के लगभग सभी लोग कैंटीन की तरफ जाने लगे.
राहुल अपनी सीट पर बैठा काम करता रहा.
अंजलि अपने केबिन से बाहर आई.
राहुल, लंच नहीं करना?
जी मैम, करता हूँ. बस ये काम खत्म कर लूँ।
काम बाद में भी हो जाएगा।
बस पाँच मिनट।
अंजलि ने उसकी स्क्रीन देखी.
तुमने सुबह से लगातार काम किया है. चलो, पहले खाना खाओ।
राहुल ने उसकी तरफ देखा.
जी मैम।
दोनों कैंटीन की तरफ चले गए.
राहुल हमेशा की तरह साधारण खाना लेकर एक कोने में बैठ गया.
अंजलि की नजर उसकी प्लेट पर गई.
इतना कम खाना?
राहुल मुस्कुराया.
मेरे लिए इतना काफी है।
तुम रोज इतना ही खाते हो?
हाँ।
क्यों?
राहुल ने कुछ पल सोचा.
शायद आदत बन गई है।
अंजलि ने गंभीर होकर कहा,
आदत बदलनी चाहिए।
राहुल ने हँसते हुए कहा,
आप हर चीज बदलने को क्यों कहती रहती हैं?
अंजलि भी मुस्कुरा दी.
क्योंकि कुछ चीजें बदलना जरूरी होता है।
राहुल ने पहली बार उसे गौर से देखा.
आप मेरी इतनी चिंता क्यों करती हैं?
सवाल सुनते ही अंजलि कुछ पल के लिए शांत हो गई.
उसके पास जवाब था, लेकिन वह खुद उसे बोलना नहीं चाहती थी.
उसने नजरें झुका लीं.
क्योंकि तुम मेरे ऑफिस में काम करते हो।
राहुल मुस्कुराया.
बस?
अंजलि ने उसकी तरफ देखा.
हाँ. बस।
राहुल ने कुछ नहीं कहा.
लेकिन उसके चेहरे पर एक हल्की मुस्कान आ गई.
अंजलि ने नजरें दूसरी तरफ कर लीं.
उसका दिल तेज धडक रहा था.
उसे समझ नहीं आ रहा था कि राहुल के एक साधारण से सवाल ने उसे इतना परेशान क्यों कर दिया.
दिन गुजरते गए.
अंजलि को राहुल की आदतें याद रहने लगीं.
उसे पता था कि राहुल काम करते समय अपनी भौंहें हल्की सिकोड लेता है.
उसे यह भी पता चल गया था कि जब राहुल परेशान होता है तो चुप हो जाता है.
जब खुश होता है तो उसकी मुस्कान बहुत हल्की होती है.
और जब कोई उसकी तारीफ करता है तो वह तुरंत विषय बदल देता है.
अंजलि इन छोटी- छोटी बातों को कब याद करने लगी थी, उसे खुद पता नहीं चला.
एक शाम राहुल ऑफिस से निकलने ही वाला था कि अंजलि ने उसे रोक लिया.
राहुल।
जी मैम?
आज तुम बहुत थके हुए लग रहे हो।
नहीं मैम, ठीक हूँ।
झूठ मत बोलो।
राहुल हल्का सा हँसा.
सच में ठीक हूँ।
घर कैसे जाओगे?
बस से।
मैं छोड देती हूँ।
राहुल तुरंत बोला,
नहीं मैम, इसकी जरूरत नहीं है।
मैंने पूछा नहीं कि जरूरत है या नहीं।
राहुल चुप हो गया.
दोनों ऑफिस से बाहर निकले.
रास्ते में कुछ देर तक कोई बात नहीं हुई.
फिर राहुल ने कहा,
मैम.
हाँ?
आपने मेरे लिए बहुत कुछ किया है।
अंजलि ने उसकी तरफ देखा.
मैंने कुछ खास नहीं किया।
अगर उस दिन आपने मुझे मौका नहीं दिया होता तो शायद मेरी जिंदगी ऐसी नहीं होती।
अंजलि की आँखों में एक पल के लिए नमी आ गई.
तुमने मौका मिलने के बाद खुद को बदला है राहुल. मैंने सिर्फ दरवाजा खोला था।
राहुल चुप हो गया.
अंजलि ने सडक की तरफ देखते हुए कहा,
और एक बात.
जी?
अपने अतीत को हमेशा अपने साथ मत लेकर चलो।
राहुल ने उसकी तरफ देखा.
क्यों?
क्योंकि तुम्हारी जिंदगी अभी बाकी है।
राहुल के चेहरे पर हल्की मुस्कान आई.
शायद।
अंजलि ने कहा,
शायद नहीं. जरूर।
उस रात घर पहुँचने के बाद अंजलि काफी देर तक अपने कमरे में बैठी रही.
उसके सामने खुली किताब थी, लेकिन वह पढ नहीं रही थी.
उसका ध्यान बार- बार राहुल की बातों पर जा रहा था.
उसकी मुस्कान.
उसका संघर्ष.
उसका आत्मसम्मान.
और उसकी वह आदत, जिसमें वह अपनी तकलीफ छिपाकर भी दूसरों के सामने मुस्कुराता था.
अंजलि ने फोन उठाया.
उसकी स्क्रीन पर राहुल का नाम दिखाई दिया.
उसने कुछ सेकंड तक नंबर को देखा.
फिर Call करने के लिए उंगली आगे बढाई.
लेकिन अचानक रुक गई.
नहीं.
उसने फोन रख दिया.
कुछ देर बाद फिर उठा लिया.
इस बार उसने सिर्फ एक छोटा- सा मैसेज लिखा—
घर पहुँच गए?
वह मैसेज भेजकर कुछ सेकंड तक स्क्रीन देखती रही.
कुछ ही देर में जवाब आया—
जी मैम, पहुँच गया. आप भी ध्यान रखिएगा।
अंजलि के चेहरे पर अनायास मुस्कान आ गई.
उसने फोन अपने सीने के पास रख लिया.
फिर खुद से धीरे से पूछा—
राहुल. तुम मेरे लिए इतने खास कब बन गए?
कोई जवाब नहीं मिला.
लेकिन उसके दिल में एक एहसास साफ था.
राहुल अब उसके लिए सिर्फ वह लडका नहीं था, जिसे उसने मुश्किल समय में सहारा दिया था.
वह उसकी जिंदगी का एक ऐसा हिस्सा बनता जा रहा था, जिसकी चिंता किए बिना अंजलि का दिन पूरा नहीं होता था.
अभी वह इस भावना को कोई नाम नहीं देना चाहती थी.
शायद डरती थी.
शायद खुद को समझने के लिए उसे समय चाहिए था.
लेकिन एक बात तय थी—
अंजलि का राहुल के प्रति लगाव अब सिर्फ जिम्मेदारी नहीं रहा था.
और आने वाले दिनों में यही लगाव उसकी जिंदगी का सबसे बडा सवाल बनने वाला था.