भाग 13 — जब पुरुष टूटने लगता है
रात के लगभग ग्यारह बज चुके थे।
पूरा घर सो चुका था।
लेकिन मिहिर की आँखों में नींद नहीं थी।
वह बालकनी में अकेला बैठा था।
सामने सड़क पर कभी-कभार कोई गाड़ी गुजरती और फिर चारों तरफ वही खामोशी छा जाती।
मिहिर के हाथ में चाय का कप था, लेकिन चाय कब की ठंडी हो चुकी थी।
उसकी नजरें सामने थीं और मन कहीं बहुत दूर।
पिछले कुछ दिनों से उसके भीतर बहुत कुछ जमा हो रहा था।
ऑफिस का तनाव।
घर की जिम्मेदारियाँ।
पिता की उम्मीदें।
माँ की भावनाएँ।
पत्नी निशा की शिकायतें।
बच्चों की जरूरतें।
और इन सबके बीच…
मिहिर खुद कहाँ था?
यह सवाल वह खुद से कई बार पूछ चुका था।
लेकिन हर बार जवाब देने से पहले ही कोई न कोई जिम्मेदारी उसके सामने खड़ी हो जाती।
उसने धीरे से आँखें बंद कीं।
उसे अपना दोस्त हर्ष याद आया।
कुछ दिनों पहले हर्ष ने उससे कहा था—
“मिहिर, तू सबकी चिंता करता है… लेकिन कभी अपनी चिंता भी कर लिया कर।”
उस समय मिहिर ने हँसकर बात टाल दी थी।
लेकिन आज वही बात उसके दिल में चुभ रही थी।
सुबह हुई।
मिहिर रोज की तरह जल्दी उठ गया।
रसोई से बर्तनों की आवाज आ रही थी।
निशा नाश्ता बना रही थी।
मिहिर ने पूछा—
“मैं कुछ मदद कर दूँ?”
निशा ने बिना उसकी तरफ देखे कहा—
“नहीं, रहने दो। तुम्हारे पास वैसे भी बहुत काम रहता है।”
मिहिर समझ गया कि निशा नाराज़ है।
वह चुपचाप तैयार होने लगा।
नाश्ते की मेज पर पिता पहले से बैठे थे।
उन्होंने अखबार नीचे रखते हुए कहा—
“मिहिर, इस महीने घर के खर्च थोड़े बढ़ गए हैं। तुम्हें अपनी सैलरी का थोड़ा और हिस्सा घर में देना पड़ेगा।”
मिहिर ने सिर हिलाया।
“ठीक है पापा।”
पिता ने फिर कहा—
“और अगले महीने तुम्हारे छोटे भाई की फीस भी भरनी है।”
“जी।”
मिहिर ने बस इतना ही कहा।
उसकी प्लेट में नाश्ता था, लेकिन भूख कहीं नहीं थी।
निशा चुपचाप सब सुन रही थी।
अचानक उसने कहा—
“और बच्चों की स्कूल फीस?”
मिहिर ने उसकी तरफ देखा।
“वो भी मैं देख लूँगा।”
निशा कुछ पल चुप रही।
फिर धीरे से बोली—
“तुम हर चीज़ ‘मैं देख लूँगा’ कहकर कैसे संभाल लेते हो?”
मिहिर मुस्कुराया।
“क्या करूँ?”
निशा की आवाज़ थोड़ी भारी हो गई।
“यही तो समस्या है मिहिर। तुम कभी किसी को बताते ही नहीं कि तुम कितना संभाल रहे हो।”
मिहिर चुप रहा।
उसे लगा जैसे निशा पहली बार उसकी परेशानी को समझने की कोशिश कर रही है।
उस दिन ऑफिस में भी मिहिर का मन काम में नहीं लगा।
कंप्यूटर स्क्रीन पर फाइल खुली थी।
लेकिन उसकी नजर बार-बार मोबाइल पर जा रही थी।
अचानक हर्ष का फोन आया।
“हाँ हर्ष?”
“कहाँ है?”
“ऑफिस में।”
“आज शाम मिल सकता है?”
मिहिर कुछ पल चुप रहा।
फिर बोला—
“हाँ।”
शाम को दोनों एक पुराने कैफे में मिले।
हर्ष ने मिहिर को ध्यान से देखा।
“तू ठीक नहीं है।”
मिहिर हँस पड़ा।
“मैं बिल्कुल ठीक हूँ।”
हर्ष ने सिर हिलाया।
“यही झूठ तू सबसे बोलता है। मुझसे मत बोल।”
मिहिर की मुस्कान धीरे-धीरे गायब हो गई।
कुछ सेकंड तक वह चुप बैठा रहा।
फिर पहली बार उसने अपना मन खोल दिया।
“हर्ष… मैं थक गया हूँ।”
हर्ष कुछ नहीं बोला।
मिहिर आगे कहता गया—
“मैं सबके लिए मजबूत बनने की कोशिश करता हूँ। लेकिन कभी-कभी लगता है कि अगर मैं एक दिन भी कमजोर पड़ गया, तो पूरा घर बिखर जाएगा।”
उसकी आँखें नम हो गईं।
“मुझे नहीं पता मैं बेटा सही हूँ या नहीं… पति सही हूँ या नहीं… पिता सही हूँ या नहीं…”
वह रुक गया।
“बस इतना पता है कि मैं खुद के लिए सही नहीं हूँ।”
हर्ष ने उसकी तरफ देखा।
“मिहिर, पुरुष होने का मतलब यह नहीं कि तुम्हें दर्द महसूस करने की इजाजत नहीं है।”
मिहिर ने सिर झुका लिया।
हर्ष ने उसका कंधा थपथपाया।
“कभी-कभी मदद माँग लेना कमजोरी नहीं होती।”
मिहिर की आँखों से एक आँसू निकल आया।
उसने तुरंत उसे पोंछ दिया।
लेकिन इस बार उसने उसे छिपाने की कोशिश नहीं की।
उस रात मिहिर घर लौटा।
दरवाजा खोला तो निशा अभी जाग रही थी।
उसने पूछा—
“आज देर कैसे हो गई?”
मिहिर ने जूते उतारते हुए कहा—
“हर्ष से मिलने गया था।”
निशा ने कुछ नहीं कहा।
मिहिर उसके पास जाकर बैठ गया।
कुछ देर तक दोनों के बीच
मोशी रही।
फिर मिहिर ने धीरे से कहा—
“निशा… क्या मैं तुमसे कुछ कह सकता हूँ?”
“हाँ।”
“मैं थक गया हूँ।”
निशा ने उसकी तरफ देखा।
मिहिर की आँखों में वह दर्द था जिसे उसने महीनों से छिपाकर रखा था।
“मुझे भी कभी-कभी किसी के सामने रोने का मन करता है।”
निशा की आँखें भी भर आईं।
उसने धीरे से मिहिर का हाथ पकड़ लिया।
“तो रो लो।”
मिहिर ने उसकी तरफ देखा।
निशा बोली—
“हर बार तुम्हें पति, बेटा और पिता बनकर खड़े रहने की जरूरत नहीं है। कभी-कभी सिर्फ मिहिर बनकर भी रहो।”
यह सुनकर मिहिर की आँखों से आँसू बहने लगे।
निशा ने उसका हाथ और कसकर पकड़ लिया।
उस रात पहली बार मिहिर को लगा—
शायद वह इस घर में सचमुच अकेला नहीं है।
शायद उसने खुद ही अपने चारों तरफ एक दीवार बना ली थी।
अगली सुबह मिहिर ने एक छोटा-सा फैसला किया।
वह अब हर समस्या का समाधान अकेले नहीं करेगा।
वह परिवार से बात करेगा।
अपनी परेशानियाँ बताएगा।
अपनी सीमाएँ बताएगा।
और सबसे जरूरी—
वह खुद को भी उतनी ही अहमियत देगा जितनी वह दूसरों को देता आया था।
क्योंकि उसने आखिरकार समझ लिया था—
परिवार को संभालने वाला पुरुष भी इंसान होता है।
उसे भी दर्द होता है।
उसे भी डर लगता है।
उसे भी कभी किसी के कंधे की जरूरत पड़ती है।
और शायद…
एक पुरुष की सबसे बड़ी ताकत यह नहीं कि वह कभी टूटता नहीं, बल्कि यह है कि टूटने के बाद भी वह खुद को फिर से जोड़ना सीखता है।
मिहिर ने खिड़की खोली।
सुबह की हल्की धूप कमरे में फैल गई।
उसने गहरी साँस ली।
और बहुत दिनों बाद उसके चेहरे पर एक सच्ची मुस्कान आई।
लेकिन उसे नहीं पता था…
उसकी जिंदगी में आने वाला अगला फैसला उसके पूरे परिवार की दिशा बदलने वाला था।