भाग ४ — पत्नी की शिकायतें
रात को हर्ष का मैसेज पढ़ने के बाद भी मिहिर को नींद नहीं आई।
निशा उसके बगल में सो रही थी।
मिहिर छत की ओर देख रहा था।
पिछले कुछ दिनों में बहुत कुछ बदल गया था।
पापा की डायरी ने उसे अपने पिता की आँखों से अपनी ही जिंदगी को देखने की सीख दी थी।
मम्मी और निशा के बीच का तनाव भी थोड़ा कम हुआ था।
लेकिन अब मिहिर के मन में एक सवाल था—
निशा आखिर कितने समय से अकेली थी?
उसने कभी उसकी शिकायतों को गंभीरता से सुना ही नहीं था।
हर बार उसे लगता—
“घर की छोटी-सी बात है।”
लेकिन शायद वह छोटी बात नहीं थी।
शायद छोटी-छोटी बातें मिलकर वर्षों की दूरी बन गई थीं।
⸻
सुबह जब मिहिर उठा तो निशा रसोई में थी।
मिहिर उसके पास गया।
“निशा।”
“हाँ?”
“आज शाम तुम मेरे साथ बाहर चलोगी?”
निशा ने हैरानी से उसकी ओर देखा।
“कहाँ?”
“कहीं नहीं। बस, थोड़ा समय तुम्हारे साथ बैठना है।”
निशा थोड़ा मुस्कुराई।
“आज तुम्हें ऑफिस में काम नहीं है?”
“होगा।”
“तो?”
“काम रोज रहेगा। तुम रोज नहीं रहोगी।”
निशा कुछ पल उसे देखती रही।
“आज तुम्हें क्या हुआ है?”
मिहिर हँस पड़ा।
“कुछ नहीं।”
निशा ने तुरंत कहा,
“फिर से ‘कुछ नहीं’?”
दोनों हँस पड़े।
काफी समय बाद उनके बीच की हँसी इतनी सहज थी।
⸻
शाम को मिहिर निशा को शहर के एक शांत कैफे में ले गया।
दोनों एक कोने की टेबल पर बैठे थे।
निशा ने पूछा,
“मिहिर, सच में क्या बात है?”
“मुझे तुम्हें सुनना है।”
“क्या?”
“तुम्हें।”
निशा थोड़ी चौंकी।
“मैं क्या?”
“तुम्हें मुझसे क्या चाहिए?”
निशा ने तुरंत कोई जवाब नहीं दिया।
उसने कप में रखी चाय की ओर देखा।
“मुझे नहीं पता।”
“पता है।”
“नहीं।”
“है।”
निशा ने लंबी साँस ली।
“तो सुनो।”
मिहिर थोड़ा आगे झुक गया।
“जब मैंने तुमसे शादी की थी, तब मुझे लगा था कि हम दोनों मिलकर एक घर बनाएँगे।”
“हाँ।”
“मुझे लगा था कि तुम मेरे दोस्त बनोगे।”
“मैं हूँ।”
निशा हल्का-सा मुस्कुराई।
“थे।”
मिहिर चुप हो गया।
निशा आगे बोली,
“शादी के बाद मुझे समझ आया कि तुम सिर्फ मेरे पति नहीं हो। तुम किसी के बेटे हो, किसी के भाई हो, किसी के दोस्त हो, ऑफिस में किसी के कर्मचारी हो।”
“हाँ।”
“और इन सबके बीच… मैं कहीं सबसे पीछे रह गई।”
मिहिर कुछ नहीं बोला।
“शुरुआत में मैंने सोचा कि समय के साथ सब बदल जाएगा।”
“फिर?”
“फिर मैंने शिकायत करना शुरू किया।”
“और मैं?”
“तुम मेरी शिकायत को झगड़ा समझते रहे।”
मिहिर की आँखें नीचे झुक गईं।
निशा आगे बोली,
“मुझे तुम्हारी मम्मी से कोई परेशानी नहीं थी। मुझे इस बात से परेशानी थी कि तुम मुझसे पूछे बिना हर फैसला ले लेते थे।”
“कौन-सा फैसला?”
“घर के।”
“मैं तो परिवार के लिए करता था।”
“मुझे पता है।”
“तो फिर?”
“परिवार का मतलब सिर्फ तुम्हारी मम्मी और पापा नहीं हैं, मिहिर।”
कुछ पल के लिए खामोशी छा गई।
“मैं भी तुम्हारा परिवार हूँ।”
इन शब्दों ने मिहिर को अंदर तक हिला दिया।
⸻
निशा ने पहली बार एक पुरानी बात सामने रखी।
“तुम्हें याद है, हमारी शादी को दो साल हुए थे तब?”
“हाँ।”
“मुझे नौकरी बदलनी थी।”
“हाँ, लेकिन उस समय पापा की तबीयत खराब थी।”
“मुझे पता था।”
“इसीलिए मैंने कहा था कि बाद में देखेंगे।”
“और वह ‘बाद में’ कभी आया ही नहीं।”
मिहिर ने आँखें बंद कर लीं।
उसे वह बात याद थी।
लेकिन उसकी नजर में वह सिर्फ एक छोटा-सा फैसला था।
निशा के लिए शायद वह उसकी अपनी पहचान का सवाल था।
“तुम्हें पता है, उस समय मैं कितने दिनों तक रोई थी?”
मिहिर चुप रहा।
“मैंने तुम्हें बताया था?”
“नहीं।”
“क्योंकि तुम पहले से ही बहुत थके हुए थे।”
“निशा…”
“मैं तुम्हारी परेशानी नहीं बनना चाहती थी।”
मिहिर की आँखें नम हो गईं।
“तो तुम अंदर ही अंदर सब कुछ रखती रहीं?”
“हाँ।”
“क्यों?”
निशा मुस्कुराते हुए बोली,
“क्योंकि मुझे लगता था कि तुम सुनोगे ही नहीं।”
मिहिर को उस एक वाक्य ने सबसे ज्यादा दुख पहुँचाया।
अगर पत्नी को अपनी बात कहने का भी भरोसा न हो, तो शादी में आखिर बचता ही क्या है?
⸻
कैफे से बाहर निकलने के बाद दोनों लंबे रास्ते पर चलने लगे।
कुछ देर तक दोनों में से कोई कुछ नहीं बोला।
फिर मिहिर ने कहा,
“मुझे तुमसे माफी माँगनी है।”
निशा रुक गई।
“क्यों?”
“तुम्हारी सारी शिकायतों के लिए नहीं।”
“तो?”
“तुम्हारी शिकायतों के पीछे छिपे दर्द को समझने में देर कर दी, उसके लिए।”
निशा की आँखों में आँसू आ गए।
“मुझे भी तुमसे माफी माँगनी है।”
“तुम्हें क्यों?”
“कई बार मैंने तुम्हें समझे बिना तुम पर गुस्सा किया।”
“वह ठीक है।”
“नहीं, ठीक नहीं है।”
उसने मिहिर का हाथ पकड़ लिया।
“तुम भी एक इंसान हो। यह समझने में मुझे देर हो गई।”
मिहिर हल्का-सा मुस्कुराया।
“अब समझ आ गया?”
“थोड़ा।”
“बाकी?”
“पूरी जिंदगी सीखेंगे।”
दोनों हँस पड़े।
⸻
जब वे घर वापस आए तो मम्मी हॉल में बैठी थीं।
“आज बहुत देर हो गई?”
निशा आगे बढ़ी।
“मम्मी, हम चाय पीने गए थे।”
मम्मी ने मिहिर की ओर देखा।
“मुझे बता देते, मैं भी आती।”
शा कुछ पल के लिए रुक गई।
फिर बोली,
“अगली बार साथ चलेंगे।”
मम्मी मुस्कुराईं।
“ठीक है।”
मिहिर दोनों को देख रहा था।
कुछ समस्याओं का समाधान बहुत बड़ा नहीं होता।
बस किसी एक को पहला वाक्य बोलना होता है।
⸻
उस रात पापा मिहिर के पास आए।
“आज कहाँ गए थे?”
“निशा के साथ बाहर।”
“अच्छा।”
पापा ने थोड़ा रुककर पूछा,
“बात हुई?”
“बहुत सारी।”
“वह खुश है?”
मिहिर मुस्कुराया।
“आज पहली बार मुझे लगा कि मैंने उसे सच में सुना है।”
पापा ने सिर हिलाया।
“शादी में सबसे बड़ा काम प्यार करना नहीं है।”
“तो?”
“सुनना है।”
मिहिर ने पापा की ओर देखा।
“आपने यह सब कब सीखा?”
पापा हँस पड़े।
“जब तुम्हारी मम्मी से शादी की थी।”
दोनों हँस पड़े।
⸻
लेकिन अगले दिन सुबह मिहिर का फोन बजा।
हर्ष का फोन था।
“हाँ हर्ष?”
दूसरी तरफ कुछ पल खामोशी रही।
फिर हर्ष ने कहा,
“मिहिर, मुझे तुम्हारी मदद चाहिए।”
“बोल।”
“मेरी नौकरी चली गई है।”
मिहिर चौंक गया।
“क्या?”
“हाँ।”
“लेकिन क्यों?”
“कंपनी बंद हो रही है।”
“फिर?”
हर्ष की आवाज धीमी हो गई।
“मुझे एक फैसला लेना है।”
“कौन-सा?”
“मेरे पास एक बिजनेस शुरू करने का मौका है। लेकिन मुझे पैसों की जरूरत है।”
मिहिर कुछ नहीं बोला।
“मुझे पता है कि तुम शायद मेरी मदद कर सकते हो।”
“कितने?”
हर्ष ने रकम बताई।
मिहिर के चेहरे पर गंभीरता छा गई।
वह रकम छोटी नहीं थी।
अगर वह इतने पैसे निकालता, तो घर की आने वाली EMI, मम्मी की दवाइयों और पापा के खर्चों पर असर पड़ता।
हर्ष ने धीरे से कहा,
“मुझे पता है, मैं तुमसे भीख नहीं माँग रहा।”
“हर्ष…”
“मुझे सिर्फ अपने दोस्त पर भरोसा है।”
फोन कट गया।
मिहिर काफी देर तक फोन हाथ में लिए बैठा रहा।
एक तरफ—
वर्षों पुराना दोस्त।
दूसरी तरफ—
अपना घर।
और पहली बार मिहिर को समझ आया…
जिंदगी में कभी-कभी सबसे मुश्किल फैसला वह होता है,
जहाँ दोनों तरफ सही लोग खड़े हों।
उस शाम मिहिर को अपनी जिंदगी का सबसे बड़ा फैसला लेना था।
और इस फैसले के बाद…
मिहिर और हर्ष की दोस्ती भी पहले जैसी नहीं रहने वाली थी।