भाग २ — माँ का बेटा या पत्नी का पति?
सुबह के सात बजे थे।
मिहिर की आँखें खुलीं, लेकिन नींद पूरी नहीं हुई थी।
पिछली रात के शब्द अभी भी उसके कानों में गूँज रहे थे—
“तुम सबके लिए हो मिहिर… लेकिन मेरे लिए कब हो?”
वह धीरे से बिस्तर से उठा।
निशा अभी सो रही थी।
मिहिर ने उसकी तरफ देखा।
कल उसकी आँखों में आए आँसू उसे याद आ गए।
वह कुछ कहने ही वाला था कि बाहर से माँ की आवाज़ आई।
“मिहिर, उठ गया?”
“हाँ माँ।”
“बेटा, जरा यहाँ आना।”
मिहिर कमरे से बाहर आया।
माँ सोफे पर बैठी थीं।
“क्या हुआ?”
“कुछ नहीं। कल डॉक्टर ने कहा है कि दवा नियमित लेनी है। तू आज दवा ले आना।”
“हाँ माँ।”
माँ थोड़ी देर रुकीं और बोलीं,
“और बेटा… कल तू बहुत देर से आया था।”
“हाँ माँ, ऑफिस में काम था।”
“मुझे पता है।”
माँ थोड़ा मुस्कुराकर बोलीं,
“लेकिन तू पूरा दिन सबका काम करता है। अपना काम कब करता है?”
मिहिर चौंक गया।
यही सवाल कल रात वह खुद से पूछ रहा था।
“माँ, मैं ठीक हूँ।”
माँ ने उसकी आँखों में देखा।
“माँ के सामने बेटा कभी ‘ठीक हूँ’ होने का नाटक नहीं कर सकता।”
मिहिर कुछ नहीं बोला।
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थोड़ी देर बाद निशा रसोई में आई।
“माँ, नाश्ता तैयार है।”
“हाँ बहू।”
निशा ने टेबल पर नाश्ता रखा।
मिहिर कुर्सी पर बैठ गया।
माँ सामने।
निशा रसोई में।
तीनों एक ही घर में थे, लेकिन माहौल में एक अजीब-सी खामोशी थी।
माँ ने कहा,
“निशा, मिहिर को आज शाम जल्दी भेज देना। मुझे दवा लेने जाना है।”
निशा ने तुरंत जवाब दिया,
“माँ, मैं कभी उसे रोकती नहीं हूँ।”
माँ चुप हो गईं।
मिहिर ने निशा की तरफ देखा।
“निशा, माँ ने ऐसा कहाँ कहा?”
“उन्होंने नहीं कहा। लेकिन बात हमेशा ऐसी ही होती है।”
“कैसी बात?”
निशा धीरे से बोली,
“जब माँ को कुछ होता है तो तुम सब कुछ छोड़कर उनके पास होते हो। और जब मुझे तुम्हारी जरूरत होती है तो तुम्हारे पास काम होता है।”
माँ ने तुरंत कहा,
“बहू, मिहिर मेरा बेटा है। मेरी जिम्मेदारी है।”
निशा ने शांत स्वर में कहा,
“माँ, मैं जानती हूँ।”
“तो फिर?”
“लेकिन वह मेरा पति भी है।”
हॉल में सन्नाटा छा गया।
मिहिर के हाथ में पकड़ा चम्मच रुक गया।
ये दोनों स्त्रियाँ उसकी जिंदगी के दो सबसे महत्वपूर्ण रिश्ते थीं।
एक ने उसे जन्म दिया था।
दूसरी ने उसके साथ जीवन बिताने का फैसला किया था।
लेकिन आज दोनों के बीच खड़ा आदमी…
मिहिर था।
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मिहिर ऑफिस गया, लेकिन पूरे दिन उसका मन घर पर ही रहा।
हर्ष ने पूछा,
“आज क्या हुआ?”
“घर पर थोड़ा माहौल खराब है।”
“माँ और निशा के बीच?”
मिहिर ने सिर हिला दिया।
“हाँ।”
हर्ष ने कहा,
“तू हमेशा एक गलती करता है।”
“कौन-सी?”
“तू दोनों में से किसी एक का पक्ष लेने की कोशिश करता है।”
मिहिर उसकी तरफ देखने लगा।
“तो क्या करूँ?”
“किसी का पक्ष मत ले। दोनों की बात सुन।”
“लेकिन अगर दोनों सही हों तो?”
हर्ष हँसा।
“यही तो परेशानी है। रिश्तों में हमेशा एक सही और एक गलत नहीं होता।”
मिहिर चुप रहा।
हर्ष आगे बोला,
“तेरी माँ को अपना बेटा चाहिए।”
“और निशा को?”
“उसे अपना पति चाहिए।”
“तो मैं क्या करूँ?”
हर्ष ने कहा,
“दोनों बने रह।”
मिहिर धीरे से बोला,
“लेकिन मैं इंसान भी तो हूँ ना?”
हर्ष ने पहली बार कोई जवाब नहीं दिया।
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शाम को जब मिहिर घर आया तो माँ दरवाजे के पास खड़ी थीं।
“बेटा, दवा लाया?”
“हाँ माँ।”
“चल, मुझे दिखा।”
मिहिर ने दवा दे दी।
उसी समय निशा अंदर से बोली,
“मिहिर, आज थोड़ी जल्दी आ गए?”
“हाँ।”
“मुझे तुमसे बात करनी है।”
माँ ने तुरंत कहा,
“पहले मुझे दवा कैसे लेनी है, वो समझा दे।”
मिहिर ने माँ की तरफ देखा।
फिर निशा की तरफ।
दो सेकंड।
तीन सेकंड।
उसने धीरे से कहा,
“हाँ माँ, पहले आपको समझा देता हूँ।”
निशा के चेहरे पर फिर वही उदासी आ गई।
वह अपने कमरे में चली गई।
मिहिर ने माँ को दवा समझाई।
फिर तुरंत निशा के पास गया।
“निशा?”
कोई जवाब नहीं।
“मेरी बात सुनो।”
निशा खिड़की के पास खड़ी थी।
“क्या सुनूँ?”
“तुम नाराज़ हो।”
“मैं नाराज़ नहीं हूँ।”
“तुम हो।”
“तो क्या करूँ? रोज नाराज़ होती रहूँ?”
मिहिर चुप रहा।
निशा पलटी।
“मुझे तुम्हारी माँ से कोई परेशानी नहीं है, मिहिर।”
“मुझे पता है।”
“लेकिन मुझे इस बात से परेशानी है कि तुम जब भी कोई फैसला लेते हो तो पहले बेटा बनते हो… पति बाद में।”
मिहिर को ये शब्द चुभ गए।
“तो तुम चाहती हो कि मैं माँ को अकेला छोड़ दूँ?”
“नहीं।”
“तो?”
निशा की आँखों में आँसू आ गए।
“मैं चाहती हूँ कि तुम मुझे भी ‘अपना’ समझो।”
मिहिर आगे बढ़ा।
“निशा, तुम मेरी हो।”
“सिर्फ कहने से?”
“ऐसा नहीं है।”
“तो फिर करके दिखाओ।”
मिहिर के पास फिर कोई जवाब नहीं था।
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उस रात मिहिर बहुत देर तक जागता रहा।
एक तरफ माँ का कमरा।
दूसरी तरफ पत्नी का कमरा।
बाहर हॉल में पापा।
और वह?
घर के हर कमरे से जुड़ा हुआ।
लेकिन किसी एक कमरे में पूरी तरह अपना नहीं था।
वह उठा और पापा के पास गया।
पापा टीवी बंद करके बैठे थे।
“क्या हुआ?” पापा ने पूछा।
“पापा, एक बात पूछूँ?”
“पूछ।”
“जब आप मेरी उम्र के थे… तब आपको भी ऐसा लगता था?”
पापा कुछ देर तक खामोश रहे।
फिर धीरे से मुस्कुराए।
“तुझे क्या लगता है?”
“मुझे लगता है कि शायद आपको भी परेशानी हुई होगी।”
पापा ने टीवी की तरफ देखते हुए कहा,
“मिहिर, पुरुष की जिंदगी में एक उम्र ऐसी आती है, जब वह बेटा भी रहता है, पति भी बनता है, पिता भी बनता है, दोस्त भी बनता है और कमाने वाला भी।”
“हाँ।”
“लेकिन लोग उसे इंसान समझना भूल जाते हैं।”
मिहिर की आँखें नम हो गईं।
पापा ने पहली बार उसके कंधे पर हाथ रखा।
“लेकिन एक बात याद रखना।”
“क्या?”
“घर संभालने के लिए खुद को तोड़ मत देना।”
मिहिर ने पापा की तरफ देखा।
“तो क्या करूँ?”
पापा ने धीरे से कहा,
“सबको खुश रखने की जिम्मेदारी भगवान ने भी किसी एक इंसान को नहीं दी है।”
मिहिर बहुत देर तक चुप रहा।
यह वाक्य उसके मन में उतर गया।
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अगली सुबह मिहिर ने एक छोटा-सा फैसला लिया।
नाश्ते की टेबल पर माँ, पापा और निशा तीनों बैठे थे।
मिहिर ने कहा,
“मुझे सबको एक बात कहनी है।”
तीनों ने उसकी तरफ देखा।
“मैं आप सबकी हर बात सुनना चाहता हूँ। माँ की भी, पापा की भी, निशा की भी।”
कुछ पल शांति रही।
“लेकिन एक बात…”
मिहिर की आवाज़ थोड़ी काँप गई।
“मुझे भी कभी-कभी थक जाने का अधिकार है।”
कोई नहीं बोला।
“मुझे भी कभी-कभी ‘नहीं’ कहने का अधिकार है।”
माँ की आँखों में आँसू आ गए।
निशा भी चुप रही।
मिहिर आगे बोला,
“मैं किसी के पक्ष में नहीं हूँ। मैं अपने परिवार के बीच हूँ। और मुझे आप सबके बीच दीवार नहीं… पुल बनना है।”
पापा ने धीरे से सिर हिलाया।
माँ ने मिहिर का हाथ पकड़ लिया।
निशा ने पहली बार हल्की-सी मुस्कान दी।
लेकिन मिहिर को नहीं पता था कि…
यह तो सिर्फ शुरुआत थी।
क्योंकि कुछ ही दिनों में उसकी जिंदगी में एक ऐसी घटना होने वाली थी,
जिसमें माँ और पत्नी नहीं…
पापा और दोस्त के बीच चुनाव उसके सामने खड़ा होने वाला था।
और इस बार फैसला और भी मुश्किल था।
क्योंकि एक तरफ था रिश्ते का कर्ज…
और दूसरी तरफ था वर्षों पुराना विश्वास।