भाग ८ — खाली जेब और भरा हुआ घर
मिहिर घर पहुँचा तो रात के करीब नौ बज चुके थे।
दरवाजा निशा ने खोला।
मिहिर अंदर आया और बिना कुछ बोले सोफे पर बैठ गया।
उसके कंधे झुके हुए थे।
चेहरे पर थकान थी।
लेकिन सबसे ज्यादा थकान उसके मन में थी।
निशा उसके पास बैठी।
“खाना लगा दूँ?”
मिहिर ने सिर हिला दिया।
“मन नहीं है।”
निशा कुछ नहीं बोली।
वह रसोई में गई और एक गिलास पानी लेकर आई।
“पहले पानी पी लो।”
मिहिर ने गिलास हाथ में लिया।
तभी माँ कमरे से बाहर आईं।
उन्होंने मिहिर को देखा।
“आ गया बेटा?”
मिहिर ने सिर्फ सिर हिलाया।
माँ उसके पास बैठ गईं।
“क्या हुआ?”
मिहिर ने नजरें नीचे कर लीं।
कुछ पल बाद उसने कहा—
“मेरी नौकरी चली गई।”
माँ कुछ क्षण बिल्कुल शांत रहीं।
फिर उन्होंने उसके सिर पर हाथ रखा।
“कोई बात नहीं बेटा।”
मिहिर की आँखें भर आईं।
“माँ… इतनी आसानी से मत कहो।”
“क्यों?”
“घर कैसे चलेगा?”
माँ ने कहा—
“घर नौकरी से नहीं, परिवार से चलता है।”
मिहिर ने माँ की तरफ देखा।
तभी पापा भी बाहर आ गए।
उन्हें सारी बात पता चली तो उन्होंने कहा—
“कल से मेरे साथ दुकान पर चलना।”
मिहिर ने तुरंत कहा—
“नहीं पापा।”
“क्यों?”
“मैं आपकी दुकान पर काम नहीं करूँगा।”
पापा मुस्कुराए।
“काम छोटा-बड़ा नहीं होता बेटा।”
“बात काम की नहीं है पापा।”
मिहिर कुछ देर रुका।
“मैं चाहता हूँ कि मैं खुद अपने पैरों पर फिर से खड़ा होऊँ।”
पापा ने उसके कंधे पर हाथ रखा।
“तो खड़ा हो जा।”
उस रात मिहिर ने बहुत देर तक नींद का इंतजार किया।
लेकिन नींद नहीं आई।
उसने मोबाइल में बैंक बैलेंस देखा।
कुछ बचत थी।
लेकिन वह कितने दिनों तक चलती?
उसने बच्चों की फीस का हिसाब लगाया।
घर का किराया।
बिजली।
राशन।
पापा का लोन।
माँ के खर्च।
हर नंबर उसे परेशान कर रहा था।
निशा जाग रही थी।
उसने धीरे से पूछा—
“सोए नहीं?”
“नहीं।”
“क्या सोच रहे हो?”
“पैसों के बारे में।”
निशा उसके पास बैठ गई।
“हमारे पास थोड़ी बचत है।”
“वह ज्यादा दिनों तक नहीं चलेगी।”
“तब तक कुछ न कुछ रास्ता निकल जाएगा।”
मिहिर ने कहा—
“अगर नहीं निकला तो?”
निशा ने उसकी तरफ देखा।
“तुम हमेशा सबसे बुरा क्यों सोचते हो?”
मिहिर हल्का-सा मुस्कुराया।
“क्योंकि जिम्मेदारी लेने वाला आदमी हमेशा आगे की चिंता करता है।”
निशा ने कहा—
“और जिम्मेदारी बाँटने वाला आदमी?”
मिहिर ने उसकी तरफ देखा।
निशा मुस्कुराई।
“वह थोड़ा चैन से सो सकता है।”
मिहिर के चेहरे पर हल्की मुस्कान आ गई।
अगली सुबह उसने एक फैसला किया।
वह घर पर बैठकर नौकरी का इंतजार नहीं करेगा।
उसने अपना पुराना लैपटॉप खोला।
रिज्यूमे फिर से बनाया।
ऑनलाइन कई जगह आवेदन किए।
अपने पुराने दोस्तों से बात की।
कुछ लोगों ने मदद का भरोसा दिया।
कुछ ने फोन तक नहीं उठाया।
कुछ ने साफ कह दिया—
“अभी हमारे पास कोई वैकेंसी नहीं है।”
हर जवाब के साथ उसका आत्मविश्वास थोड़ा-थोड़ा टूट रहा था।
लेकिन वह रुका नहीं।
तीन दिन बाद उसे एक कंपनी से इंटरव्यू का कॉल आया।
मिहिर के चेहरे पर महीनों बाद उम्मीद दिखाई दी।
“निशा!”
निशा रसोई से बाहर आई।
“क्या हुआ?”
“इंटरव्यू है।”
“कब?”
“परसों।”
निशा मुस्कुराई।
“तो फिर तैयारी शुरू करो।”
उस रात निशा ने उसकी शर्ट प्रेस की।
जूते साफ किए।
मिहिर ने कहा—
“इतना सब करने की जरूरत नहीं है।”
निशा बोली—
“जरूरत है।”
“क्यों?”
“क्योंकि तुम सिर्फ इंटरव्यू देने नहीं जा रहे।”
“तो?”
“तुम अपनी जिंदगी को वापस लेने जा रहे हो।”
मिहिर कुछ पल उसे देखता रहा।
फिर मुस्कुरा दिया।
इंटरव्यू वाले दिन वह सुबह जल्दी उठ गया।
पापा ने उसे जाते समय कहा—
“बेटा, परिणाम की चिंता मत करना।”
माँ ने माथे पर हाथ रखा।
“भगवान सब अच्छा करेंगे।”
निशा ने बस इतना कहा—
“खुद पर भरोसा रखना।”
मिहिर इंटरव्यू देने पहुँचा।
सामने तीन लोग बैठे थे।
सवाल शुरू हुए।
अनुभव।
काम।
टीम मैनेजमेंट।
तनाव।
जिम्मेदारियाँ।
मिहिर ने हर सवाल का जवाब आत्मविश्वास से दिया।
आखिर में एक अधिकारी ने पूछा—
“आपकी पिछली नौकरी क्यों छूटी?”
यह सवाल सुनकर मिहिर कुछ पल चुप रहा।
फिर उसने सच कहा—
“कंपनी ने कर्मचारियों की संख्या कम की थी।”
अधिकारी ने पूछा—
“उसके बाद आपने क्या किया?”
मिहिर ने कहा—
“अपने परिवार के साथ बैठा। डर को स्वीकार किया। और फिर दोबारा शुरुआत की।”
कमरे में कुछ पल खामोशी रही।
इंटरव्यू खत्म हुआ।
“हम आपको जल्द बताएँगे।”
मिहिर बाहर आ गया।
उसे नहीं पता था कि उसका चयन होगा या नहीं।
लेकिन आज उसे अपने ऊपर गर्व था।
क्योंकि कई दिनों बाद उसने खुद को असफल नहीं…
बल्कि फिर से कोशिश करने वाला इंसान महसूस किया था।
शाम को वह घर पहुँचा।
निशा ने पूछा—
“कैसा गया?”
“पता नहीं।”
“मतलब?”
“इंटरव्यू अच्छा गया।”
निशा मुस्कुराई।
“बस फिर ठीक है।”
रात को पूरा परिवार साथ बैठकर खाना खा रहा था।
मिहिर सबको देख रहा था।
माँ।
पापा।
निशा।
बच्चे।
उसने सोचा—
“शायद मेरे पास इस समय पैसे कम हैं… लेकिन मेरे पास ऐसा परिवार है जो मुझे टूटने नहीं देगा।”
उसी समय उसका मोबाइल बजा।
स्क्रीन पर अनजान नंबर था।
मिहिर ने फोन उठाया।
“हैलो?”
दूसरी तरफ से आवाज आई—
“नमस्ते मिहिर जी। मैं उसी कंपनी से बोल रहा हूँ जहाँ आपने इंटरव्यू दिया था।”
मिहिर सीधा होकर बैठ गया।
“जी…”
“हमें आपका इंटरव्यू पसंद आया।”
मिहिर की धड़कन तेज हो गई।
फिर सामने से कहा गया—
“हम आपको एक और राउंड के लिए बुलाना चाहते हैं।”
मिहिर ने आँखें बंद कर लीं।
उसने कुछ नहीं कहा।
सिर्फ मुस्कुराया।
फोन रखने के बाद निशा ने पूछा—
“क्या हुआ?”
मिहिर ने उसकी तरफ देखा।
“अभी नौकरी नहीं मिली।”
निशा का चेहरा थोड़ा उतर गया।
मिहिर मुस्कुराया।
“लेकिन दरवाजा खुल गया है।”
पापा ने कहा—
“बस बेटा… दरवाजा खुला हो तो अंदर जाने की हिम्मत रखनी चाहिए।”
मिहिर ने सिर हिलाया।
उस रात वह पहले से थोड़ा हल्का महसूस कर रहा था।
लेकिन उसे पता नहीं था कि अगली सुबह उसे एक ऐसा फैसला लेना होगा…
जो सिर्फ उसकी नौकरी नहीं…
बल्कि उसके पूरे परिवार के भविष्य को बदल सकता था।