भाग १ — एक दिन, कई जिम्मेदारियाँ
सुबह छह बजे अलार्म बजा।
मिहिर ने आँखें खोलीं, लेकिन कुछ क्षणों तक बिस्तर पर ही पड़ा रहा।
बगल में उसकी पत्नी निशा अभी सो रही थी। सामने की दीवार पर घड़ी की सुइयाँ तेजी से आगे बढ़ रही थीं।
छह बजकर पाँच मिनट।
मिहिर ने गहरी साँस ली और बिस्तर से उठ गया।
“आज भी देर हो जाएगी,” उसने खुद से कहा।
रसोई से बर्तनों की आवाज़ आने लगी थी।
“मिहिर, चाय रख देना,” पीछे से उसकी माँ की आवाज़ आई।
“हाँ माँ।”
वह रसोई में गया।
गैस जलाई। चाय रखी। मोबाइल में ऑफिस के मैसेज चेक किए।
पाँच नए मैसेज।
दो क्लाइंट के।
एक बॉस का।
दो टीम के।
चाय उबल रही थी और मोबाइल भी लगातार वाइब्रेट कर रहा था।
“मिहिर, आज मुझे डॉक्टर के पास लेकर जाना था ना?”
माँ फिर बोली।
“हाँ माँ, लेकर जाऊँगा।”
“लेकिन तू तो ऑफिस जाएगा।”
“ऑफिस थोड़ा जल्दी खत्म कर दूँगा।”
ऐसा कहते हुए मिहिर जानता था कि वह झूठ बोल रहा है।
ऑफिस जल्दी खत्म करना लगभग असंभव था।
लेकिन माँ से “नहीं हो पाएगा” कहने की उसकी हिम्मत नहीं थी।
थोड़ी देर बाद निशा रसोई में आई।
“मिहिर, आज शाम को हम बाहर जाने वाले थे ना?”
मिहिर रुक गया।
“हाँ… लेकिन आज थोड़ा काम है।”
निशा के चेहरे पर तुरंत निराशा आ गई।
“फिर काम?”
“निशा, समझने की कोशिश करो। आज बहुत जरूरी है।”
“मेरे लिए कभी कुछ जरूरी नहीं होता ना?”
मिहिर ने कोई जवाब नहीं दिया।
वह जानता था कि अगर अभी जवाब देगा तो बात बढ़ जाएगी।
तभी पापा हॉल से बोले,
“मिहिर, शाम को घर आते समय बैंक चले जाना। पेंशन का एक काम है।”
“हाँ पापा।”
मिहिर ने चाय का कप टेबल पर रखा।
एक कप माँ के लिए।
एक पापा के लिए।
एक निशा के लिए।
और उसका अपना कप?
ठंडी हो चुकी चाय।
उसने कप उठाया और एक घूँट लिया।
चाय सच में ठंडी थी।
लेकिन मिहिर को अब ठंडी चाय की आदत हो चुकी थी।
जैसे उसे अधूरी नींद की आदत हो चुकी थी।
अधूरे भोजन की आदत हो चुकी थी।
और सबसे ज्यादा…
अपनी अधूरी भावनाओं की आदत हो चुकी थी।
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मिहिर जब घर से बाहर निकला, तब सुबह के आठ बज चुके थे।
पापा ने पीछे से कहा,
“शाम को जल्दी आ जाना।”
माँ ने कहा,
“डॉक्टर को भूलना मत।”
निशा ने कहा,
“और मुझसे बात करना मत भूलना।”
मिहिर दरवाजे पर खड़े होकर तीनों की तरफ देखने लगा।
तीन अलग-अलग आवाज़ें।
तीन अलग-अलग अपेक्षाएँ।
और एक ही आदमी।
“हाँ… सब करूँगा।”
उसने कहा और बाहर निकल गया।
बाइक स्टार्ट की।
सड़क पर ट्रैफिक था।
लेकिन मिहिर के मन में उससे भी ज्यादा ट्रैफिक था।
ऑफिस।
माँ।
पापा।
निशा।
घर।
बैंक।
डॉक्टर।
क्लाइंट।
EMI।
बिल।
जिम्मेदारियाँ।
और कहीं बहुत अंदर…
मिहिर खुद।
जिससे बहुत समय से किसी ने पूछा ही नहीं था—
“मिहिर, तुम कैसे हो?”
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ऑफिस पहुँचा तो नौ बजकर पंद्रह मिनट हो चुके थे।
बॉस दरवाजे पर ही खड़े थे।
“मिहिर, क्लाइंट की फाइल तैयार है?”
“सर, लगभग तैयार है।”
“लगभग नहीं। मुझे दस बजे से पहले चाहिए।”
“ओके सर।”
मिहिर अपनी डेस्क पर बैठ गया।
कंप्यूटर चालू किया।
उसी समय निशा का फोन आया।
“हैलो?”
“आप डॉक्टर की अपॉइंटमेंट याद रखना।”
“हाँ।”
“और शाम को देर मत करना।”
“हाँ निशा।”
“मिहिर…”
“हाँ?”
कुछ पल खामोशी रही।
“कुछ नहीं।”
फोन कट गया।
मिहिर स्क्रीन की तरफ देखने लगा।
उसे लगा कि निशा कुछ कहना चाहती थी।
लेकिन क्या?
शायद शिकायत।
शायद प्यार।
शायद एक सरल-सा वाक्य—
“मुझे तुम्हारी जरूरत है।”
लेकिन मिहिर के पास वह सुनने का भी समय नहीं था।
वह काम में लग गया।
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दोपहर एक बजे लंच का समय हुआ।
मिहिर ने टिफिन खोला।
निशा की बनाई हुई रोटी और सब्जी।
पहला निवाला मुँह में रखा।
तभी पापा का फोन आया।
“मिहिर, बैंक का काम आज हो जाएगा ना?”
“हाँ पापा।”
“कल जाने को मत कहना। आज ही कर देना।”
“हाँ पापा।”
फोन रख दिया।
फिर माँ का फोन आया।
“बेटा, डॉक्टर चार बजे हैं।”
“हाँ माँ।”
“तुझे आने में देर तो नहीं होगी ना?”
मिहिर कुछ पल चुप रहा।
“नहीं माँ।”
फोन रख दिया।
उसने टिफिन की तरफ देखा।
रोटी हाथ में थी।
लेकिन भूख कहीं गायब हो चुकी थी।
उसने टिफिन बंद कर दिया।
सामने बैठे उसके दोस्त हर्ष ने पूछा,
“क्या हुआ?”
“कुछ नहीं।”
“तू पिछले कई दिनों से यही कह रहा है।”
मिहिर मुस्कुराया।
“कुछ नहीं हुआ यार।”
हर्ष ने धीरे से कहा,
“मिहिर, इंसान जब बार-बार ‘कुछ नहीं’ कहने लगे ना, तब समझ लेना कि अंदर बहुत कुछ होता है।”
मिहिर हँसा।
“तू कब से फिलॉसफर बन गया?”
हर्ष भी हँस दिया।
लेकिन दोनों जानते थे—
बात मजाक में खत्म नहीं हुई थी।
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शाम के चार बजे।
मिहिर ऑफिस से निकलने के लिए खड़ा हुआ।
बॉस ने तुरंत कहा,
“मिहिर, पाँच बजे मीटिंग है।”
मिहिर रुक गया।
“सर, आज घर पर थोड़ा जरूरी काम है।”
“सबके घर पर जरूरी काम होता है। लेकिन ऑफिस का काम भी करना पड़ता है।”
मिहिर वापस कुर्सी पर बैठ गया।
माँ का फोन आया।
“बेटा, हम अस्पताल पहुँच गए हैं।”
“माँ… मैं बस आता हूँ।”
“कितनी देर?”
मिहिर ने घड़ी देखी।
पाँच बजे की मीटिंग।
फिर बैंक।
फिर अस्पताल।
फिर घर जाना।
उसने आँखें बंद कर लीं।
“माँ, थोड़ा देर हो जाएगी।”
दूसरी तरफ कुछ पल खामोशी रही।
फिर माँ ने सिर्फ इतना कहा,
“ठीक है बेटा।”
फोन कट गया।
मिहिर को उस “ठीक है बेटा” में एक ऐसी उदासी सुनाई दी, जो पूरे दिन की किसी भी आवाज़ में नहीं थी।
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रात के साढ़े नौ बजे मिहिर घर पहुँचा।
दरवाजा खोला।
घर में शांति थी।
डाइनिंग टेबल पर खाना ढककर रखा हुआ था।
माँ अपने कमरे में थीं।
पापा टीवी के सामने बैठे थे।
निशा बेडरूम में थी।
मिहिर ने धीरे से पूछा,
“खाना खा लिया?”
कोई जवाब नहीं आया।
वह अपने कमरे में गया।
निशा बिस्तर पर बैठी थी।
“आज भी देर।”
“हाँ।”
“माँ को डॉक्टर के पास लेकर गए?”
“हाँ।”
“बैंक का काम?”
“हो गया।”
“ऑफिस?”
“वो भी।”
निशा ने उसकी तरफ देखा।
“और मैं?”
मिहिर चुप रहा।
“मेरे लिए तुम्हारे पास क्या है?”
मिहिर के होंठ खुले।
लेकिन शब्द बाहर नहीं निकले।
निशा की आँखों में आँसू आ गए।
“तुम सबके लिए हो मिहिर… लेकिन मेरे लिए कब हो?”
वह उठी और कमरे से बाहर चली गई।
मिहिर बिस्तर पर बैठा रहा।
थोड़ी देर बाद वह हॉल में आया।
पापा अभी भी टीवी देख रहे थे।
माँ अपने कमरे में सो गई थीं।
निशा रसोई में अकेली बैठी थी।
मिहिर ने तीनों की तरफ देखा।
उसे पहली बार समझ आया—
वह किसी एक इंसान से नहीं लड़ रहा था।
वह तो पूरी जिंदगी की अपेक्षाओं के बीच फँस गया था।
बेटा बने तो पत्नी दुखी होती है।
पति बने तो माता-पिता अकेले पड़ जाते हैं।
पिता बने तो अपना जीवन पीछे छूट जाता है।
दोस्त बने तो समय नहीं है।
कर्मचारी बने तो घर के लिए समय नहीं है।
और इन सबके बीच…
एक पुरुष कहाँ जाए?
मिहिर बालकनी में चला गया।
आसमान में चाँद था।
उसने धीरे से खुद से पूछा—
“क्या मैं सच में खुश हूँ?”
कई सालों बाद…
उस सवाल का जवाब देने के लिए उसके पास कोई शब्द नहीं था।
सिर्फ आँखों में आँसू थे।
और उस रात पहली बार मिहिर ने समझा—
घर के सभी लोग जब थक जाते हैं, तो एक-दूसरे के पास जाकर रो सकते हैं।
लेकिन पुरुष?
उसे तो कहा जाता है—
“तुम मजबूत रहना।”
मिहिर ने आँखें बंद कर लीं।
और मन में सिर्फ एक विचार आया—
“लेकिन मुझे भी कभी-कभी किसी के कंधे की जरूरत पड़ती है…”