एक पुरुष—सबके बीच अकेला - 6 Aloka Patel द्वारा प्रेरक कथा में हिंदी पीडीएफ

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एक पुरुष—सबके बीच अकेला - 6

भाग ६ — जब जिम्मेदारियाँ फिर लौट आईं

मिहिर को लगा था कि अब सब कुछ धीरे-धीरे ठीक होने लगेगा।

पिछली रात परिवार के साथ हुई बातचीत ने उसके मन का बहुत बड़ा बोझ हल्का कर दिया था।

उसे पहली बार महसूस हुआ था कि उसकी खामोशी को भी कोई सुन सकता है।

लेकिन जिंदगी हमेशा हमारी उम्मीद के मुताबिक नहीं चलती।

कुछ दिनों तक घर का माहौल सचमुच बदल गया।

माँ छोटी-छोटी बातों में मिहिर से सलाह लेने के बजाय खुद फैसले लेने लगीं।

पापा भी अब हर खर्च और हर जिम्मेदारी मिहिर के सामने नहीं रखते थे।

निशा तो जैसे मिहिर को समझने की कोशिश में लग गई थी।

वह रोज पूछती—

“आज ऑफिस में दिन कैसा रहा?”

पहले मिहिर सिर्फ “ठीक था” कहकर बात खत्म कर देता था।

अब वह कभी-कभी अपनी परेशानी भी बता देता।

उसे अच्छा लगने लगा था।

लेकिन एक सोमवार की सुबह सब कुछ बदल गया।

मिहिर ऑफिस जाने के लिए तैयार हो रहा था तभी पापा ने उसे आवाज दी—

“मिहिर, जरा इधर आना।”

मिहिर उनके कमरे में गया।

पापा के हाथ में कुछ कागज थे।

“क्या हुआ पापा?”

पापा कुछ देर चुप रहे।

फिर बोले—

“बैंक से फोन आया था।”

“किस बात का?”

“जिस लोन की किश्त चल रही है ना… उसमें कुछ दिक्कत हो गई है।”

मिहिर ने कागज हाथ में लिया।

उसने हिसाब देखा।

कुछ पल के लिए उसका चेहरा उतर गया।

“इतना पैसा?”

पापा ने धीरे से कहा—

“हाँ।”

“लेकिन पापा, आपने मुझे पहले क्यों नहीं बताया?”

“तू अभी कुछ दिनों से परेशान था। सोचा था बाद में बता दूँगा।”

मिहिर ने गहरी साँस ली।

उसके मन में फिर वही पुराना डर लौट आया।

फिर से सब कुछ मुझे ही संभालना पड़ेगा?

वह चुपचाप कमरे से बाहर आया।

निशा ने उसका चेहरा देखा।

“क्या हुआ?”

“कुछ नहीं।”

निशा ने तुरंत कहा—

“मिहिर, फिर से ‘कुछ नहीं’ मत कहना।”

मिहिर ने उसे देखा।

कुछ पल तक वह चुप रहा।

फिर कागज उसकी तरफ बढ़ा दिया।

निशा ने सब पढ़ा।

“हम इसे मिलकर संभालेंगे।”

मिहिर ने हल्की मुस्कान दी।

“कैसे?”

“पता नहीं।”

“फिर?”

“पहले समस्या को देखेंगे। फिर रास्ता निकालेंगे।”

मिहिर कुछ नहीं बोला।

उसे निशा की यह बात अच्छी लगी।

पहले जब भी कोई परेशानी आती थी, वह अकेले ही समाधान ढूँढने बैठ जाता था।

अब पहली बार किसी ने उसके साथ बैठकर परेशानी देखने की बात कही थी।

उस दिन ऑफिस में भी मिहिर का मन नहीं लगा।

काम करते-करते उसके मोबाइल पर बैंक का फोन आया।

फिर पापा का फोन।

फिर घर से मैसेज।

हर कॉल उसे अंदर से और परेशान कर रही थी।

शाम को वह घर पहुँचा तो पापा बाहर बैठे थे।

“बेटा…”

मिहिर उनके पास बैठ गया।

“पापा, आप चिंता मत करो।”

पापा ने उसकी तरफ देखा।

“मैंने तेरे ऊपर बहुत बोझ डाल दिया ना?”

मिहिर चुप हो गया।

“नहीं पापा।”

“झूठ मत बोल।”

पापा की आवाज भर्रा गई।

“मैंने पूरी जिंदगी यही सोचा कि बेटा बड़ा हो गया है तो अब मेरा सहारा बनेगा।”

उन्होंने मिहिर का हाथ पकड़ लिया।

“लेकिन मैं भूल गया कि बेटा भी कभी-कभी पिता का सहारा चाहता है।”

मिहिर की आँखें नम हो गईं।

उसने पापा का हाथ दबाया।

“आप मेरे पिता हैं पापा। आपकी मदद करना मेरा फर्ज है।”

पापा ने कहा—

“फर्ज और प्यार में फर्क होता है बेटा।”

मिहिर ने उनकी तरफ देखा।

“फर्ज इंसान निभाता है… लेकिन प्यार इंसान को बाँधकर नहीं रखता।”

मिहिर कुछ समझ नहीं पाया।

पापा ने आगे कहा—

“मैं नहीं चाहता कि मेरी वजह से तू अपनी जिंदगी जीना भूल जाए।”

ये शब्द सीधे मिहिर के दिल में उतर गए।

उस रात मिहिर ने अपने कमरे में बैठकर बहुत देर तक हिसाब लगाया।

कितनी आमदनी थी।

कितने खर्च थे।

कितनी बचत थी।

और कितनी जिम्मेदारियाँ थीं।

कागज पर लिखे नंबर बढ़ते जा रहे थे।

लेकिन इस बार मिहिर अकेला नहीं था।

निशा उसके सामने बैठी थी।

“एक काम करते हैं।”

“क्या?”

“कुछ खर्च कम करते हैं।”

“कौन से?”

निशा ने मुस्कुराकर कहा—

“जो जरूरी नहीं हैं।”

मिहिर ने कहा—

“लेकिन तुम्हारी जरूरतें?”

“मेरी जरूरतें बाद में। पहले घर।”

मिहिर ने तुरंत सिर हिलाया।

“नहीं निशा। मैं तुम्हें हर चीज से दूर नहीं कर सकता।”

निशा ने उसकी तरफ देखकर कहा—

“मैं तुम्हारी पत्नी हूँ, ग्राहक नहीं।”

मिहिर हँस पड़ा।

कई दिनों बाद उसके चेहरे पर खुलकर हँसी आई थी।

दोनों ने रात भर बैठकर खर्चों की सूची बनाई।

कुछ चीजें बंद करने का फैसला किया।

कुछ खर्च कम किए।

कुछ जिम्मेदारियाँ बाँटीं।

और पहली बार मिहिर ने महसूस किया कि—

परिवार का बोझ तब बोझ नहीं लगता, जब उसे उठाने वाले हाथ एक से ज्यादा हों।

लेकिन जिंदगी शायद मिहिर की परीक्षा अभी खत्म नहीं करना चाहती थी।

अगली सुबह ऑफिस पहुँचते ही उसके बॉस ने उसे अपने केबिन में बुलाया।

“मिहिर, बैठो।”

मिहिर बैठ गया।

बॉस ने एक फाइल उसके सामने रखी।

“कंपनी में कुछ बदलाव होने वाले हैं।”

मिहिर ने फाइल खोली।

उसकी आँखें एक जगह जाकर रुक गईं।

“कुछ कर्मचारियों की नौकरी समाप्त की जाएगी।”

मिहिर का दिल अचानक तेज धड़कने लगा।

उसने बॉस की तरफ देखा।

बॉस कुछ पल चुप रहे।

फिर बोले—

“मिहिर… मुझे तुमसे एक जरूरी बात करनी है।”

मिहिर के हाथ ठंडे पड़ गए।

उसके दिमाग में सिर्फ एक सवाल घूम रहा था—

“क्या मेरी नौकरी भी जाने वाली है?”

और अगर ऐसा हुआ…

तो घर की सारी जिम्मेदारियाँ?

पापा का लोन?

बच्चों का भविष्य?

माँ की दवाइयाँ?

निशा?

मिहिर ने पहली बार महसूस किया—

जिस जिंदगी को उसने अभी संभालना शुरू ही किया था…

वही जिंदगी फिर से उसके सामने एक नई चुनौती बनकर खड़ी थी।