एक पुरुष—सबके बीच अकेला - 7 Aloka Patel द्वारा प्रेरक कथा में हिंदी पीडीएफ

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एक पुरुष—सबके बीच अकेला - 7

भाग ७ — नौकरी का डर

मिहिर कुछ पल तक बॉस के सामने चुप बैठा रहा।

उसकी नजर सामने रखी फाइल पर थी।

दिल में हजारों सवाल थे।

आखिर बॉस ने कहा—

“मिहिर, कंपनी में पिछले कुछ महीनों से काम कम हुआ है। मैनेजमेंट ने कुछ पदों को खत्म करने का फैसला किया है।”

मिहिर ने धीरे से पूछा—

“सर… मेरा क्या होगा?”

बॉस ने तुरंत जवाब नहीं दिया।

उनकी चुप्पी ही मिहिर के लिए सबसे बड़ा जवाब बन गई।

“सर?”

“अभी अंतिम फैसला नहीं हुआ है।”

मिहिर ने लंबी साँस ली।

“मतलब?”

“मतलब यह कि अगले कुछ दिनों में तुम्हें पता चल जाएगा।”

मिहिर के चेहरे पर चिंता साफ दिखाई दे रही थी।

बॉस ने कहा—

“तुम अच्छे कर्मचारी हो, मिहिर। लेकिन फैसला सिर्फ मेरे हाथ में नहीं है।”

मिहिर फाइल लेकर बाहर आ गया।

अपनी सीट पर बैठते ही उसने कंप्यूटर की स्क्रीन खोली।

स्क्रीन पर वही काम था जो वह रोज करता था।

लेकिन आज उसकी नजर किसी चीज पर नहीं टिक रही थी।

उसने मन ही मन सोचा—

“अगर नौकरी चली गई तो?”

पहले उसे सिर्फ अपनी नौकरी की चिंता होती।

आज नौकरी के साथ पूरा परिवार जुड़ा था।

पापा का लोन।

घर का खर्च।

बच्चों की फीस।

माँ की जरूरतें।

और निशा…

उसे लगा जैसे उसके कंधों पर अचानक फिर से बहुत बड़ा पहाड़ रख दिया गया हो।

शाम को घर लौटते समय उसने किसी को कुछ नहीं बताया।

दरवाजा खोलते ही निशा सामने आई।

“आ गए?”

“हाँ।”

“आज बहुत चुप हो।”

“थक गया हूँ।”

निशा ने उसके चेहरे को ध्यान से देखा।

“ऑफिस में कुछ हुआ है?”

मिहिर ने जूते उतारते हुए कहा—

“नहीं।”

निशा चुप हो गई।

लेकिन उसे यकीन नहीं था।

रात को खाना खाने के बाद मिहिर बालकनी में चला गया।

वही बालकनी…

जहाँ कुछ दिन पहले उसने निशा से अपने दिल की बात कही थी।

कुछ देर बाद निशा भी वहाँ आ गई।

“मिहिर।”

“हम्म?”

“मुझसे झूठ मत बोलो।”

मिहिर ने उसकी तरफ देखा।

निशा ने धीरे से पूछा—

“नौकरी की कोई परेशानी है?”

मिहिर की आँखें झुक गईं।

“तुम्हें कैसे पता?”

“तुम्हारा चेहरा बता रहा है।”

मिहिर कुछ देर चुप रहा।

फिर उसने सारी बात बता दी।

निशा ने ध्यान से सुना।

“अभी नौकरी गई तो नहीं है ना?”

“नहीं।”

“तो फिर अभी से क्यों डर रहे हो?”

मिहिर ने उसकी तरफ देखा।

“क्योंकि मुझे डर लग रहा है।”

निशा ने उसका हाथ पकड़ लिया।

“डरना गलत नहीं है।”

“लेकिन मैं…”

मिहिर की आवाज टूट गई।

“मैं नहीं चाहता कि मेरे कारण तुम सबको परेशानी हो।”

निशा ने कहा—

“तुम्हारे कारण नहीं, मिहिर। जिंदगी में आने वाली परेशानी है।”

मिहिर चुप रहा।

“और अगर नौकरी चली भी गई…”

निशा कुछ पल रुकी।

“तो हम दूसरी नौकरी ढूँढेंगे।”

मिहिर ने कहा—

“इतना आसान नहीं है।”

“मुझे पता है।”

“उम्र भी हो रही है।”

“मुझे यह भी पता है।”

“इतनी जिम्मेदारियाँ हैं।”

निशा मुस्कुराई।

“और यह भी पता है।”

फिर उसने कहा—

“लेकिन तुम्हारे साथ मैं हूँ।”

मिहिर ने उसकी तरफ देखा।

निशा ने आगे कहा—

“तुम हमेशा कहते हो कि परिवार तुम्हारी जिम्मेदारी है।”

“हाँ।”

“आज से परिवार मेरी भी जिम्मेदारी है।”

मिहिर की आँखें भर आईं।

वह कुछ बोल नहीं पाया।

अगले दिन से मिहिर ने एक नया काम शुरू किया।

ऑफिस के बाद वह नई नौकरी ढूँढने लगा।

रात को रिज्यूमे अपडेट करता।

कंपनियों में आवेदन करता।

पुराने दोस्तों को फोन करता।

कुछ जगह इंटरव्यू भी दिए।

लेकिन हर जगह एक ही जवाब मिलता—

“हम आपको बाद में बताते हैं।”

दिन बीतते गए।

एक सप्ताह।

फिर दूसरा सप्ताह।

और आखिरकार वह दिन आ गया जिसका डर मिहिर को कई दिनों से था।

उसे बॉस ने फिर अपने केबिन में बुलाया।

मिहिर अंदर गया।

बॉस ने सामने रखी फाइल बंद की।

“मिहिर, बैठो।”

मिहिर बैठ गया।

बॉस ने धीमी आवाज में कहा—

“मुझे अफसोस है।”

बस दो शब्द।

लेकिन मिहिर समझ गया।

उसकी नौकरी जा चुकी थी।

उसने कुछ नहीं कहा।

बस सिर झुका लिया।

बॉस ने कहा—

“तुम्हारे लिए कुछ महीनों की सेटलमेंट राशि की व्यवस्था की गई है।”

मिहिर ने फाइल ले ली।

“धन्यवाद, सर।”

वह उठकर बाहर आ गया।

पूरे ऑफिस में लोग अपना काम कर रहे थे।

किसी को पता भी नहीं था कि मिहिर के लिए आज उसकी जिंदगी का एक बड़ा हिस्सा खत्म हो गया था।

वह अपनी सीट पर गया।

कंप्यूटर बंद किया।

अपनी मेज पर रखी कुछ चीजें बैग में रखीं।

एक पुरानी फोटो हाथ में आई।

फोटो में पूरा परिवार मुस्कुरा रहा था।

मिहिर कुछ पल उसे देखता रहा।

उसकी आँखों में आँसू आ गए।

उसने फोटो बैग में रखी और ऑफिस से बाहर निकल गया।

बाहर तेज धूप थी।

लेकिन उसे कुछ महसूस नहीं हो रहा था।

वह सड़क के किनारे खड़ा रहा।

फिर उसने मोबाइल निकाला।

सबसे पहले निशा का नंबर खोला।

उँगली कॉल बटन पर जाकर रुक गई।

वह सोचने लगा—

“क्या बताऊँ उसे?”

कुछ सेकंड बाद उसने कॉल कर दिया।

“हैलो?”

निशा की आवाज आई।

मिहिर कुछ बोल नहीं पाया।

“मिहिर?”

उसकी आवाज सुनते ही मिहिर की आँखों से आँसू निकल पड़े।

“निशा…”

“हाँ?”

“आज… मैं थोड़ा देर से घर आऊँगा।”

“क्यों?”

मिहिर ने कुछ पल आँखें बंद कीं।

फिर कहा—

“क्योंकि आज मेरे पास नौकरी नहीं है।”

दूसरी तरफ कुछ सेकंड के लिए खामोशी छा गई।

मिहिर को लगा जैसे सब खत्म हो गया।

लेकिन फिर निशा की आवाज आई—

“तो क्या हुआ?”

मिहिर चौंक गया।

“क्या?”

“नौकरी गई है… तुम तो नहीं गए ना?”

मिहिर की आँखों से आँसू और तेज बहने लगे।

निशा ने कहा—

“घर आ जाओ।”

“लेकिन…”

“मिहिर, इस बार तुम अकेले नहीं हो।”

कॉल कट गया।

मिहिर सड़क पर खड़ा रहा।

पहली बार उसे समझ आया—

एक पुरुष को हमेशा मजबूत बने रहने की जरूरत नहीं होती।

कभी-कभी उसे भी टूटने का अधिकार होता है।

और शायद…

उसे संभालने के लिए किसी का साथ भी चाहिए।

मिहिर ने आँसू पोंछे।

बैग कंधे पर रखा।

और घर की तरफ चल पड़ा।

उसे नहीं पता था कि आगे क्या होगा।

लेकिन आज पहली बार…

उसे भविष्य से उतना डर नहीं लग रहा था।

क्योंकि इस बार…

वह अकेला नहीं था।