एक पुरुष—सबके बीच अकेला - 12 Aloka Patel द्वारा प्रेरक कथा में हिंदी पीडीएफ

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एक पुरुष—सबके बीच अकेला - 12

भाग १२ — सफलता की कीमत

मिहिर पूरी रात सो नहीं पाया।

उसके मोबाइल में कंपनी का ईमेल खुला था।

प्रमोशन।

बेहतर पद।

ज्यादा वेतन।

बड़ा प्रोजेक्ट।

और शायद…

विदेश जाने का मौका।

कुछ साल पहले अगर कोई उससे पूछता कि जिंदगी में क्या चाहिए, तो शायद वह यही कहता—

“एक अच्छी नौकरी, अच्छा वेतन और अपने परिवार के लिए सुरक्षित भविष्य।”

आज वही सब उसके सामने था।

फिर भी उसके मन में खुशी नहीं थी।

क्योंकि इस सफलता की एक कीमत थी—

परिवार से फिर दूर जाना।

सुबह निशा ने उसे चुपचाप देखा।

“रात सोए नहीं?”

“नहीं।”

“प्रमोशन की वजह से?”

मिहिर ने उसकी तरफ देखा।

“तुम्हें कैसे पता?”

“तुम्हारे चेहरे से।”

मिहिर ने मोबाइल उसकी तरफ बढ़ा दिया।

निशा ने ईमेल पढ़ा।

कुछ पल तक वह कुछ नहीं बोली।

फिर उसने पूछा—

“तुम क्या सोच रहे हो?”

“मुझे समझ नहीं आ रहा।”

“क्यों?”

“अगर मैं यह मौका छोड़ देता हूँ तो शायद जिंदगी में फिर ऐसा मौका न मिले।”

“और अगर स्वीकार कर लिया?”

“तो फिर से तुम लोगों से दूर जाना पड़ेगा।”

निशा ने मोबाइल वापस कर दिया।

“इस बार फैसला मैं नहीं करूँगी।”

मिहिर ने हैरानी से पूछा—

“क्यों?”

“क्योंकि यह तुम्हारी जिंदगी है।”

मिहिर चुप हो गया।

“पिछली बार मैंने तुम्हें जाने के लिए कहा था।”

निशा की आवाज धीमी हो गई।

“क्योंकि तब तुम्हें खुद को साबित करने की जरूरत थी।”

“और अब?”

“अब तुम्हें खुद से पूछना है कि तुम्हें सच में क्या चाहिए।”

मिहिर ने सिर झुका लिया।

उस शाम पूरा परिवार एक साथ बैठा था।

मिहिर ने सबको प्रमोशन के बारे में बताया।

माँ की आँखों में खुशी थी।

“वाह बेटा! इतनी बड़ी जिम्मेदारी मिल रही है।”

पापा ने भी मुस्कुराकर कहा—

“मुझे पता था तू बहुत आगे जाएगा।”

बच्चे उत्साहित हो गए।

“पापा विदेश जाओगे?”

मिहिर मुस्कुराया।

“शायद।”

लेकिन निशा चुप थी।

पापा ने उसकी तरफ देखा।

“तुम कुछ नहीं कह रही?”

निशा ने कहा—

“कहने को बहुत कुछ है।”

मिहिर उसकी तरफ देखने लगा।

“लेकिन पहले मैं मिहिर की बात सुनना चाहती हूँ।”

मिहिर ने गहरी साँस ली।

“मुझे डर लग रहा है।”

पापा ने पूछा—

“किस बात का?”

“कि कहीं सफलता के पीछे भागते-भागते मैं फिर से अपना परिवार न खो दूँ।”

कमरे में खामोशी छा गई।

माँ ने धीरे से कहा—

“बेटा, परिवार सिर्फ एक जगह रहने से नहीं जुड़ा रहता।”

मिहिर ने उनकी तरफ देखा।

“लेकिन दूरी रिश्तों को बदल देती है माँ।”

पापा बोले—

“दूरी रिश्ते नहीं बदलती। लोग बदलते हैं।”

मिहिर चुप रहा।

पापा आगे बोले—

“तू अगर बाहर जाएगा और हमें भूल जाएगा, तो दूरी समस्या होगी।”

“लेकिन अगर तू बाहर जाकर भी रोज हमारा हाल पूछेगा, समय देगा, जरूरत में हमारे पास आएगा… तो दूरी सिर्फ किलोमीटर होगी।”

मिहिर की आँखें नम हो गईं।

तभी निशा ने कहा—

“और इस बार हम भी तुम्हारे साथ चलेंगे।”

मिहिर ने हैरानी से उसकी तरफ देखा।

“क्या?”

“अगर कंपनी कुछ साल के लिए भेज रही है, तो हम कोशिश करेंगे कि कुछ समय बाद बच्चों के साथ मैं भी तुम्हारे पास आ जाऊँ।”

“लेकिन बच्चों की पढ़ाई?”

“उसका इंतजाम करेंगे।”

“माँ-पापा?”

पापा मुस्कुराए।

“हम यहीं हैं।”

माँ ने कहा—

“और वीडियो कॉल नाम की भी कोई चीज होती है।”

सब हँस पड़े।

कई दिनों बाद मिहिर के मन का बोझ थोड़ा हल्का हुआ।

अगले दिन मिहिर ने कंपनी को जवाब दिया।

उसने प्रमोशन स्वीकार कर लिया।

लेकिन कुछ शर्तों के साथ।

उसने स्पष्ट कहा कि उसे अपने परिवार से नियमित रूप से मिलने की छुट्टी चाहिए और लंबे समय तक परिवार से पूरी तरह दूर रहना उसके लिए संभव नहीं होगा।

उसे उम्मीद नहीं थी कि कंपनी मान जाएगी।

लेकिन बॉस ने कहा—

“मिहिर, कंपनी को अच्छे कर्मचारी चाहिए। लेकिन हमें यह भी समझना चाहिए कि कर्मचारियों की जिंदगी ऑफिस के बाहर भी होती है।”

मिहिर मुस्कुराया।

उसे लगा जैसे जिंदगी उसे एक बार फिर कुछ सिखा रही थी।

काम जरूरी है।पैसा जरूरी है।सफलता जरूरी है।लेकिन इंसान की जिंदगी सिर्फ इन चीजों से नहीं बनती।

कुछ सप्ताह बाद मिहिर विदेश जाने की तैयारी करने लगा।

इस बार उसके मन में पिछली बार जैसा डर नहीं था।

क्योंकि अब वह जानता था कि वह किसके लिए जा रहा है।

वह सिर्फ पैसा कमाने नहीं जा रहा था।

वह अपने परिवार के भविष्य को बेहतर बनाने जा रहा था।

जाने से एक रात पहले वह छत पर बैठा था।

निशा उसके पास आई।

“क्या सोच रहे हो?”

“पहले मैं सोचता था कि पुरुष की सफलता का मतलब ज्यादा पैसा होता है।”

“अब?”

“अब लगता है… सफलता का मतलब है कि पैसा कमाते हुए भी अपने लोगों को खोना नहीं।”

निशा मुस्कुराई।

“अब तुम समझदार हो गए हो।”

मिहिर हँस पड़ा।

“इतने सालों में?”

“हाँ।”

दोनों कुछ देर आसमान देखते रहे।

फिर निशा ने उसका हाथ पकड़ लिया।

“एक बात वादा करो।”

“क्या?”

“काम कितना भी बढ़ जाए…”

“हम्म।”

“अपने मन की बात मुझसे छुपाना मत।”

मिहिर ने उसका हाथ कसकर पकड़ लिया।

“वादा।”

अगले दिन एयरपोर्ट पर पूरा परिवार उसे छोड़ने आया।

बच्चे उससे लिपट गए।

माँ ने उसके लिए भगवान से प्रार्थना की।

पापा ने गले लगाकर कहा—

“इस बार लौटकर सिर्फ सफल आदमी मत बनना।”

मिहिर ने पूछा—

“तो?”

पापा मुस्कुराए।

“खुश आदमी बनकर लौटना।”

ये शब्द मिहिर के दिल में उतर गए।

उसने पापा को गले लगाया।

फिर माँ को।

फिर बच्चों को।

अंत में निशा के सामने खड़ा हो गया।

कुछ कहने के लिए शब्द नहीं थे।

निशा ने बस कहा—

“फोन करते रहना।”

मिहिर मुस्कुराया।

“हर दिन।”

वह मुड़ा और आगे बढ़ गया।

कुछ कदम चलने के बाद उसने पीछे देखा।

पूरा परिवार उसे देख रहा था।

इस बार उसके मन में कोई सवाल नहीं था।

न नौकरी का डर।

न पैसे की चिंता।

न अकेलेपन का डर।

क्योंकि अब उसे पता था—

सच्चा परिवार वह नहीं जो आपको हर समय अपने पास रखे।सच्चा परिवार वह है जो आपको उड़ने की आजादी दे… और लौटने के लिए अपना दरवाजा खुला रखे।

मिहिर ने आखिरी बार हाथ हिलाया।

और आगे बढ़ गया।

लेकिन उसे नहीं पता था कि विदेश पहुँचने के कुछ ही दिनों बाद…

एक ऐसा फोन आने वाला था…

जो उसकी पूरी जिंदगी फिर से बदल देगा।