Devil की दास्तान - 40 Sonam Brijwasi द्वारा नाटक में हिंदी पीडीएफ

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Devil की दास्तान - 40

(सूरज की हल्की धूप कमरे में फैल रही है। सिया धीरे-धीरे आँखें खोलती है। उसका चेहरा मासूम और शांत दिखता है। पिछले रात की घटनाओं का कोई पता नहीं।

सिया (अचकचाते हुए, खुद से) बोली - 
“कल रात… क्या हुआ था? मुझे कुछ याद नहीं…
कबीर जी कहाँ है?”

(वो अपने कमरे में देखती है — सब सामान वैसा ही है जैसे हमेशा रहता है। कोई डर नहीं, कोई लाल आँखें नहीं। सिर्फ उसका पति, इंसानी रूप में, कुर्सी पर बैठा काम कर रहा है।)

सिया (धीरे-धीरे मुस्कुराते हुए) बोली - 
“हाँ… ये वही मेरे पति हैं… हमेशा की तरह…”

(कबीर सिया की तरफ देखता है और हल्की मुस्कान देता है। उसे पता है कि सिया ने पूरी तरह से भूल चुकी है कि वह शैतानी रूप में क्या था।)

कबीर (धीरे से, शांत स्वर में) बोला - 
“सिया… तुम उठ गई हो… अच्छा है। सब कुछ ठीक है।”

(सिया ने उसे देखा, बिना किसी डर के पास चली आई। उसने उसकी बाँह पकड़ी। उसकी मासूमियत और भरोसा कबीर के दिल को छू जाता है।)

सिया (हल्की हँसी के साथ) बोली - 
“कबीर जी… आज का दिन बहुत सुंदर लग रहा है।
कभी-कभी लगता है जैसे… सब कुछ पहले जैसा ही है।”

(कबीर बस सिया को देखता है, उसकी मासूमियत में डूबा हुआ। उसके लाल आँखों की चमक अब पूरी तरह छिपी हुई है।)
“पिछली रात की भयावहता अब सिया की यादों से मिट चुकी थी।
लेकिन कबीर जानता था — अंधकार कहीं दूर नहीं गया।
अब उसे और सावधानी बरतनी होगी, ताकि सिया की मासूम दुनिया हमेशा सुरक्षित रहे…।”

सूरज की रोशनी धीरे-धीरे कमरे में फैल रही है। सिया अभी भी मासूमियत से अपने पति कबीर के पास खड़ी है। उसे पिछली रात की कोई याद नहीं है।)

कबीर (धीरे, गंभीर स्वर में खुद से) बोला - 
“अब सब कुछ साफ है… सिया भूल चुकी है कि मैं क्या हूँ…
लेकिन मुझे ध्यान रखना होगा कि उसका मासूमपन कभी खतरे में न पड़े।”

(उसकी आँखों में लाल रंग नहीं, सिर्फ इंसानी रूप में प्यार और चिंता है।)

सिया (हल्की मुस्कान के साथ) बोली - 
“कबीर जी… आज लगता है जैसे सब कुछ पहले जैसा है।
मुझे डर नहीं लग रहा… सब बहुत शांत है।”

कबीर (हल्के से मुस्कुराते हुए) बोला - 
“हाँ… सिया, सब ठीक है। मैं यहाँ हूँ, तुम्हारे पास।”

(सिया उसकी बाँहों में चली जाति है। कबीर उसे धीरे से पकड़ता है और अपने पास कसता है। उसकी लाल आँखों की चमक अंदर ही अंदर दबी रहती है, पर सिया को कोई डर नहीं।)
“कबीर ने ठान लिया था कि चाहे उसकी शैतानी प्रवृत्ति कितनी भी मजबूत क्यों न हो,
सिया की मासूमियत और सुरक्षा उसके लिए सबसे ऊपर रहेगी।
अंधकार भले ही अंदर मौजूद हो, लेकिन प्यार और सुरक्षा ने उसके अंदर की दुनिया को रोशन कर दिया था।”

(सिया धीरे-धीरे उठती है। उसकी आँखों में हल्की चमक है, पर अभी भी मासूमियत बरकरार है। कबीर उसके पास बैठता है, उसकी सुरक्षा सुनिश्चित करता है।)

सिया (हल्की मुस्कान के साथ) बोली - 
“कबीर जी… लगता है मैं सब भूल गई हूँ… पिछली रात क्या हुआ था, कुछ याद नहीं।”

कबीर (धीरे, शांत स्वर में) बोला - 
“हाँ सिया… तुम भूल गई हो। यही ठीक है। अब तुम सुरक्षित हो।”

(कबीर उसके हाथ थामता है और उसकी हालत को देखकर राहत की सांस लेता है। वह सोचता है कि अब उसे अपनी शक्तियों पर पूरी तरह से नियंत्रण रखना होगा ताकि सिया कभी भी डर न पाए।)
“अभी भी कबीर के अंदर अंधेरा था, लेकिन उसने ठान लिया कि अब सिया की मासूमियत और सुरक्षा सबसे ऊपर रहेगी।
हर रात की लड़ाई, हर खतरे के बावजूद, प्यार और जिम्मेदारी ने उसकी आत्मा को मार्ग दिखाया।
सिया की मासूम आँखों में अब वह शक्ति देखता था, जो उसे हमेशा इंसान बनाए रखेगी।”
(कबीर सिया को धीरे से अपने पास बिठाता है। वह उसके बाल सहलाता है और सोचता है कि अब उन्हें एक सामान्य जीवन की शुरुआत करनी होगी। हवा में हल्की ठंडी आहट, दोनों के लिए सुरक्षा और शांति का प्रतीक बन जाती है।)

(रात का समय, सिया अपने घर में अकेली है। अचानक अंधेरे से कुछ वैम्पायर उसके घर में घुसते हैं। उनके लाल आँसू और तेज़ दांत उसे डराते हैं।)

सिया (काँपते हुए, डर के मारे) बोली - 
“नहीं… ये क्या…?”

(वैम्पायर चारों तरफ से घेर लेते हैं। सिया पीछे हटती है, उसके कदम लड़खड़ा रहे हैं। वह जोर-जोर से रोने लगती है।)

वैम्पायर (हँसते हुए) बोले - 
“तुम इंसान हो… तुम्हारा खून स्वादिष्ट होगा!”

(सिया के पीछे अचानक तेज़ हवा की आहट होती है। छत पर से एक परछाई आती है। वह कबीर/करण था, अपने असली रूप में — बड़े सींग, लाल आँखें, फैलते हुए पंख, शक्ति से लबालब।)

कबीर (गहरा स्वर, गुस्से में) बोला - 
“हाथ मत लगाना!”

(कबीर हवा में उड़ते हुए वैम्पायरों के सामने आता है। उसकी शक्ति इतनी ज़ोरदार थी कि वैम्पायर कुछ कदम पीछे हटते हैं। वह तेजी से सिया की ओर आता है और उसे अपने बाहों में उठाता है।)

सिया (साँस फूँकते हुए, डर के मारे) बोली - 
“कबीर जी… क्या…?”

कबीर (धीरे, लेकिन दृढ़ स्वर में) बोला - 
“अब कुछ नहीं होगा… मैं तुम्हें सुरक्षित ले जाऊँगा। बस मेरे पास रहो।”

(कबीर तेजी से उड़ता है, वैम्पायर उसके पीछे दौड़ते हैं लेकिन उसे पकड़ नहीं पाते। हवा में पंख फैलाकर वह सिया को दूर किसी सुरक्षित जगह ले जाता है। सिया उसके सीने से चिपक जाती है, उसका डर धीरे-धीरे कम होने लगता है।)
“खतरा हमेशा पास था, लेकिन कबीर की शक्ति और उसकी प्रतिबद्धता ने सिया को सुरक्षित रखा।
अभी भी अंधेरा था, पर उनके बीच का भरोसा और सुरक्षा का एहसास, हर डर को पीछे धकेल रहा था।”

(कबीर ने सिया को एक सुरक्षित पहाड़ी स्थल पर उतारा। चारों तरफ़ पेड़, हल्की धूप, और हवा का ठंडा स्पर्श है। सिया अभी भी काँप रही है, पर कबीर उसके पास बैठ जाता है।)

सिया (धीरे, साँसें थमी हुईं) बोली - 
“मैं… मैं डर गई थी… वे… वे मेरे घर में…”

कबीर (धीरे से, गंभीर लेकिन कोमल स्वर में) बोला - 
“मुझे पता है… पर अब कुछ नहीं होगा। मैं हूँ ना… कोई तुम्हें नुकसान नहीं पहुँचा सकता।”

सिया (उसके हाथ पकड़ते हुए, कांपते स्वर में) बोली - 
“क्यों… क्यों आप मेरी मदद कर रहे हैं? मुझे याद ही नहीं कि मैं कौन हूँ…”

कबीर (हल्की मुस्कान के साथ) बोला - 
“क्योंकि तुम इंसान हो… और इंसानों को बचाना मेरी जिम्मेदारी है।
भले ही मैं शैतान या वैम्पायर हूँ, पर तुम्हारे लिए मैं वही बन जाऊँगा जो तुम्हें सुरक्षित रख सके।”

(सिया धीरे-धीरे उसके हाथ छोड़ती है और खुद को शांत महसूस करती है। उसकी आँखों में डर की जगह थोड़ी हिम्मत दिखती है।)

सिया (धीरे से, फुसफुसाकर) बोली - 
“मैं… अब भी नहीं जानती कि मैं कौन हूँ… या मेरा असली परिवार कौन है…
पर… मुझे लगता है कि मैं अभी आपके पास रहकर सुरक्षित हूँ।”

कबीर (उसका हाथ अपने हाथ में रखते हुए) बोला - 
“ठीक है… तुम्हें डरने की जरूरत नहीं। मैं तुम्हें कभी अकेला नहीं छोड़ूँगा।
आज की रात… बस यही हमारा वादा है।”

“अंधेरा हमेशा आसपास होता है… लेकिन कभी-कभी, वही अंधेरा हमें यह सिखा देता है कि भरोसा और सुरक्षा की ताकत सबसे बड़ी होती है।
सिया और कबीर का बंधन अब सिर्फ़ डर और खतरे से नहीं, बल्कि विश्वास और साथ से भी जुड़ चुका था।”

घना जंगल, जहाँ धूप पत्तों के बीच से छनकर ज़मीन पर गिर रही है।
सिया और कबीर धीरे-धीरे जंगल के बाहर की ओर बढ़ रहे हैं। सिया की आँखों में हल्का डर है, जबकि कबीर चारों ओर सतर्क नज़रों से देख रहा है।)

सिया (धीरे से) बोली - 
“कबीर जी… अब तो जंगल ख़त्म हो गया, है ना? अब हम सुरक्षित हैं?”

कबीर (गंभीर आवाज़ में) बोला - 
“हाँ, शायद…”
(फिर थोड़ी देर रुककर, नीचे झाड़ियों की तरफ़ देखता है)
“पर सावधान रहना, ये दुनिया अब पहले जैसी नहीं रही।”

(दोनों जंगल से बाहर आते हैं। सामने सड़क पर एक पुरानी, टूटी-सी बस खड़ी है जिसमें कुछ लोग बैठे हैं। बस धीरे-धीरे चल रही है। सिया राहत की साँस लेती है।)

सिया (मुस्कुराकर) बोली - 
“देखो, बस मिल गई! लोग हैं… शायद हमें मदद मिल जाए…”

(कबीर का चेहरा अचानक गंभीर हो जाता है।)

कबीर (धीरे, शक भरे स्वर में) बोला - 
“रुको सिया… कुछ गड़बड़ है…”

(अचानक बस से एक भयानक चीख सुनाई देती है। अगले ही पल बस की खिड़कियों पर खून के छींटे छप जाते हैं! बस के अंदर अफरा-तफरी मच जाती है।)

सिया (डरकर) बोली - 
“हे भगवान! ये क्या हो रहा है!!”

(बस का दरवाज़ा खुलता है — और अंदर से ज़ॉम्बी जैसे इंसान बाहर गिरते हैं।
उनकी आँखें सफ़ेद, दाँतों से खून टपक रहा है, और वे सड़क पर मौजूद लोगों को काटने लगते हैं।)

कबीर (चिल्लाते हुए) बोला - 
“सिया! मेरे पीछे आओ! भागो यहाँ से!!”

(कबीर सिया का हाथ पकड़कर उसे पीछे की ओर खींचता है। वो दोनों एक पुराने, टूटे मंदिर की दीवार के पीछे छिप जाते हैं।
सिया काँप रही है, उसकी साँसें तेज़ हैं।)

सिया (घबराकर, रोते हुए) बोली - 
“ये… ये क्या हैं? इंसान नहीं लग रहे…”

कबीर (धीरे, पर डरावनी गंभीरता से) बोला - 
“ये इंसान नहीं… ज़िंदा लाशें हैं। मृतकी हैं।
किसी ने इन पर श्राप दिया है… ये काटकर दूसरों को भी अपने जैसा बना देते हैं।”

सिया (फुसफुसाते हुए) बोली - 
“अब… अब हम क्या करेंगे?”

कबीर (गहरी सांस लेकर) बोला - 
“तुम यहीं रहो… मैं उन्हें रोकता हूँ।”

सिया (डरते हुए) बोली - 
“नहीं! मत जाइए… आप अकेले कैसे लड़ोगे?”

(कबीर उसकी ओर देखता है, उसकी आँखों में लाल चमक उभर आती है — वो धीरे से कहता है)

कबीर बोला - 
“क्योंकि अब वक्त आ गया है कि शैतान भी इंसानों की रक्षा करे।”

(वो दीवार के पार कूदता है — और अगले ही पल, ज़मीन पर तेज़ हवाओं का तूफ़ान उठता है।
ज़ॉम्बी उसकी ओर बढ़ते हैं, और कबीर अपनी असली शैतानी ताकत से एक-एक करके उन्हें चीरने लगता है।)
(सिया दीवार के पीछे से देख रही है — उसके चेहरे पर डर और हैरानी दोनों हैं। उसकी आँखों में सवाल हैं — “क्या यही मेरा पति है?”)

“कभी-कभी सबसे बड़ा डर, वही होता है जो तुम्हारी रक्षा करता है…
और सिया अब उस सच्चाई के और करीब पहुँचने वाली थी —
जो उसकी ज़िंदगी हमेशा के लिए बदल देने वाली थी…”