Devil की दास्तान - 39 Sonam Brijwasi द्वारा नाटक में हिंदी पीडीएफ

Featured Books
श्रेणी
शेयर करे

Devil की दास्तान - 39

(रात का सन्नाटा पूरे घर को घेर चुका है। खिड़की से चाँद की फीकी रौशनी कमरे में गिर रही है। सिया बिस्तर पर गहरी नींद में है, उसके माथे पर अब बुखार नहीं — पर चेहरे पर बेचैनी साफ झलकती है।)
(सिया खुद को एक पुराने हवेली जैसे स्थान पर देखती है। चारों ओर धुँध, दीवारों पर दीपक जल रहे हैं। हवा में धीमी फुसफुसाहट गूँज रही है।)

फुसफुसाहट (धीरे से) बोली - 
“सिमरन…”

(सिया चौंककर चारों ओर देखती है।)

सिया (डरी हुई) बोली - 
“कौन है वहाँ? कौन बुला रहा है मुझे?”

(फिर वही आवाज़ — इस बार ज़्यादा करीब से —
एक भारी पर दर्द भरी आवाज़।)

आवाज़ बोली - 
“सिमरन… मैं हूँ… करण…”

(सिया के कदम थम जाते हैं।
उसके चेहरे पर घबराहट और अजीब-सी पहचान दोनों एक साथ झलकती हैं।)

सिया (हकलाते हुए) बोली - 
“क… करण? ये नाम… इतना जाना-पहचाना क्यों लग रहा है…”

(वो आगे बढ़ती है और अचानक सामने एक छाया उभरती है —
लाल आँखों वाला आदमी — जो धीरे-धीरे रौशनी में आता है — वही कबीर, पर पुराने रूप में — करण के रूप में।)

सिया (घबराकर पीछे हटती हुई) बोली - 
“नहीं… ये सच नहीं हो सकता…”

करण (धीरे से) बोला - 
“तुम मुझसे क्यों डर रही हो, सिमरन… तुम मेरी थी…हो… और रहोगी…”

(जैसे ही करण उसका हाथ पकड़ने बढ़ता है,
सिया चीख मारती है — और सपना टूट जाता है।)

वर्तमान – रात का वही कमरा

(सिया हाँफते हुए उठती है, उसका चेहरा पसीने से भरा हुआ है।
कबीर उठकर उसके पास बैठता है, वो डर के मारे पीछे हटती है।)

कबीर (चौंकते हुए) बोला -
“सिया! क्या हुआ? सपना देखा?”

सिया (काँपती आवाज़ में) बोली - 
“एक नाम… करण… बार-बार वही नाम… वो कौन है कबीर जी?
मुझे लगता है… जैसे वो मुझसे जुड़ा हुआ है…”

(कबीर का चेहरा सख्त पड़ जाता है।
वो नज़रें झुका लेता है, भीतर गहराई में दर्द उमड़ आता है।)

कबीर (धीरे से, झूठ छिपाते हुए) बोला - 
“शायद पुरानी ज़िंदगी की कोई परछाई हो…
अब सब भूल जाओ सिया… कुछ सपने सच नहीं होने चाहिए…”

(सिया उसकी आँखों में कुछ तलाशती है, पर उसे बस रहस्य मिलता है।
वो चुपचाप सिर झुका लेती है।)
“सिया के सपनों ने वो परतें खोलनी शुरू कर दी थीं
जिन्हें कबीर ने अपनी रूह में दफना दिया था…
अब सिर्फ एक सवाल बाकी था —
जब सिया को सच्चाई पता चलेगी…
क्या वो फिर भी उसी शैतान से प्यार करेगी?”

रात का समय — घड़ी की सुइयाँ 12 बजा रही हैं। बाहर घना अंधेरा, आसमान में बादल, और बीच-बीच में बिजली की चमक। हवाओं की सिसकियाँ पूरे घर में गूँज रही हैं।)

सिया का कमरा

(सिया गहरी नींद में है। उसके माथे पर पसीने की नमी है। पास में रखा दिया अचानक बुझ जाता है। उसी समय बिस्तर की चादर धीरे-धीरे हिलती है — कबीर उठता है, सिया को निहारता है और चुपचाप कमरे से निकल जाता है।)

कबीर (धीरे से, खुद से) बोला - 
“आज अमावस्या है… आज मुझे अपने असली रूप में आना ही होगा…”

(वह कमरे का दरवाज़ा धीरे से बंद करता है और लंबी अंधेरी गलियारे में गायब हो जाता है।)
(कुछ देर बाद — सिया करवट बदलती है। उसे बाहर से अजीब-सी आवाज़ें सुनाई देती हैं — जैसे कोई भारी साँसें ले रहा हो, या किसी ने ज़मीन पर कुछ घसीटा हो।)

सिया (नींद में बड़बड़ाते हुए) बोली - 
“कबीर जी…? आप हो न?”

(कोई जवाब नहीं। अब डर उसकी नींद तोड़ देता है। वो उठकर कमरे से बाहर निकलती है।)
(हॉल अंधकार में डूबा है। बस मोमबत्तियों की लौ काँप रही है। दीवारों पर परछाइयाँ नाच रही हैं।
सिया धीरे-धीरे आगे बढ़ती है। तभी पीछे से दरवाज़ा खुद-ब-खुद बंद हो जाता है — धड़ाम!
वो डर के मारे घूमती है।)

सिया (काँपती आवाज़ में) बोली - 
“क-कौन है वहाँ…?”

(बिजली की एक तेज़ चमक पूरे हॉल को उजाला कर देती है। और तभी —
उसके सामने वही चेहरा दिखता है — वही लाल आँखें, वही डरावनी मुस्कान —
वो “सपनों का शैतान”!)

सिया (चीखते हुए) बोली - 
“नहीं… ये सपना नहीं… ये हक़ीक़त है…!”

(वो पीछे हटती है, पर दीवार से टकरा जाती है।)

शैतान (गहरी, भारी आवाज़ में) बोला - 
“क्यों डर रही हो, सिया…
तुम्हारा शैतान… तुम्हारा ‘कबीर’… तुम्हारे सामने है।”

(सिया की आँखें फैल जाती हैं।)

सिया (सहमकर):
“क… कबीर? नहीं… ये झूठ है… तुम वो नहीं हो!”

(शैतान धीरे-धीरे इंसानी रूप में आता है — चेहरा वही, पर आँखों में अब भी आग जल रही है।)

कबीर (धीरे से, मुस्कराते हुए) बोला - 
“हाँ, सिया…
मैं ही वो हूँ जिससे तुम प्यार करती हो…
पर मैं वो भी हूँ जिसे इस प्यार के लिए
अपना शैतान होना छोड़ना पड़ा…”

(सिया के आँसू बहने लगते हैं।)

सिया (रोते हुए) बोली - 
“तो जो मैं हर रात देखती थी… वो आप थे…?
आप ही मेरे सपनों का शैतान थे?”

कबीर (धीरे से, दर्द भरी आवाज़ में) बोला - 
“हाँ…
क्योंकि मैं तुम्हें खो नहीं सकता था, सिया।
इसलिए मैंने अपने अंधकार से समझौता किया…
ताकि तुम ज़िंदा रहो…”

(सिया एक कदम पीछे हटती है।
उसके चेहरे पर डर और मोह — दोनों मिलकर कुछ अनकहा सा रच देते हैं।)

सिया (टूटती आवाज़ में) बोली - 
“अगर ये सज़ा है प्यार की…
तो मैं इसे भी सह लूँगी, कबीर जी…”

(कबीर हैरान होकर उसकी ओर देखता है।
हवा अचानक शांत हो जाती है।
उसके भीतर का राक्षस थम जाता है —
सिया की आँखों में वही सच्चा प्रेम झलक रहा है।)
“अमावस्या की रात ने सिया के सामने वो सच रख दिया
जिसे छिपाने के लिए कबीर ने अपनी आत्मा तक गिरवी रख दी थी…
अब प्यार और अंधकार —
दोनों का संगम शुरू हो चुका था…”
सिया अब अपने डर को काबू में रखती है। कबीर उसके सामने खड़ा है — उसका असली शैतानी रूप, लाल आँखें, लंबे दांत और फैलते पंख। हवा में हल्की धुन सी बज रही है, जैसे समय थम गया हो।)

सिया (धीरे, पर आत्मविश्वास के साथ) बोली - 
“कबीर जी… या जो भी आप हो… मैं डरने नहीं आई।
अगर आप सच में वही हो जिसे मैं जानती थी…
तो मैं आपके अंधकार से भी प्यार करती हूँ।”

(कबीर झटका खाता है। उसके पंख हल्के से सिकुड़ते हैं।
वो सिया की आँखों में देखता है — वहां डर नहीं, बस भरोसा और मासूमियत है।)

कबीर (धीरे से, अचंभित होकर) बोला - 
“तुम… तुम डरती नहीं हो?
ये असली मैं है… अंधकार… राक्षस… जिसे मैं छुपाता रहा।”

सिया (हौले से हाथ बढ़ाते हुए) बोला - 
“तो फिर मैं आपको दिखाती हूँ…
कि प्यार की ताकत अंधकार से भी बड़ी होती है।”

(सिया का हाथ धीरे-धीरे कबीर के चेहरे की ओर बढ़ता है।
जैसे ही उसकी हथेली कबीर के गाल को छूती है,
एक हल्की रोशनी उनके बीच फैलती है।
कबीर का चेहरा पल-पल बदलता है — लाल आँखें धीरे-धीरे इंसानी आँखों में बदल जाती हैं।
उसका शैतानी रूप कम होता है, इंसान का रूप उभर आता है।)

कबीर (धीरे, विस्मय में) बोला - 
“ये… क्या… तुमने…”

सिया (मुस्कुराते हुए, आँसू भरी आँखों से) बोली - 
“मैंने सिर्फ प्यार किया, कबीर जी।
प्यार की ताकत… किसी राक्षस को भी बदल सकती है।”

(कबीर हैरान और भावुक, बस सिया को देखते रह जाता है।
उसके अंदर का अंधकार थम जाता है, लेकिन उसकी लाल आँखों में हल्की चमक अभी भी बची है — यह दर्शाता है कि अंधकार पूरी तरह नहीं गया।)
“सिया के मासूम दिल ने अंधकार को रोशनी में बदल दिया…
लेकिन यह केवल शुरुआत थी।
कबीर और सिया का संगम अब नए संघर्षों और रहस्यों के साथ आगे बढ़ेगा…”