(कहानी अब भावनाओं और रहस्यों की गहराई में उतर चुकी थी।
कबीर यानी करण अब दो दुनिया के बीच फँसा था —
एक दुनिया जिसमें सिया यानी सिमरन की मासूमियत थी,
और दूसरी, जिसमें उसका अंधकारमय सच छिपा था।)
हवेली का बरामदा – रात का समय
(हल्की ठंडी हवा बह रही है। सिया झूले पर बैठी है,
उसके बालों को हवा छू रही है।
उसकी गोद में एक किताब है, पर निगाहें कहीं दूर खोई हुई हैं।)
सिया (धीरे से, खुद से) बोली -
“कबीर जी बहुत बदल गए हैं…
कभी इतने चुप रहते हैं, कभी कुछ कहते नहीं…
मुझे समझ नहीं आता, वो मुझसे कुछ छिपा क्यों रहे हैं…”
(तभी कबीर पीछे से आता है, उसके हाथ में एक चाय का प्याला है।)
कबीर (मुस्कुराते हुए) बोला -
“कुछ नहीं छिपा रहा हूँ सिया…
बस ज़िंदगी की कुछ बातें ऐसी होती हैं जो बताई नहीं जातीं।”
सिया (हैरानी से) बोली -
"आप कब से मेरे मन की बातें सुनने लगे?”
कबीर (हलक़ा-सा हँसता है) बोला -
“जब से तुम मेरी ज़िंदगी बनी हो।”
(सिया मुस्कुरा देती है।
कबीर उसके पास बैठता है, पर उसके चेहरे पर एक अजीब-सी झिझक है।)
सिया (धीरे से) बोली -
“कबीर जी… आप पहली बार मुझसे कब मिले थे?”
(कबीर एक पल को चौंकता है।
वो कप को नीचे रख देता है, उसकी आँखों में पुरानी यादों की चमक है।)
कबीर (धीरे स्वर में) बोला -
“जब तुम… अठारह की थी…”
सिया (मासूम हँसी के साथ) बोली -
“और अब तो मैं उन्नीस की हूँ…
मतलब एक साल से आप मुझे झेल रहे हो?
पर आपने मुझे बताया नहीं कि मेरा असली ठिकाना क्या है।
खैर कोई बात नहीं मुझे जानने में कोई intrest नहीं है।
मुझे तो बस आप चाहिए।”
(दोनों हल्के से हँसते हैं, पर कबीर के चेहरे की मुस्कान जल्द ही फीकी पड़ जाती है।)
कबीर (अपने मन में, वॉयसओवर) -
“एक साल… पर मेरे लिए तो ये सदियों का इंतज़ार था, सिया…
तुम नहीं जानती, तुम्हारी हर साँस मेरे लिए जीवन है…”
(सिया उसकी ओर देखती है।)
सिया बोली -
“क्या सोच रहे हो?”
कबीर (धीरे से) बोला -
“कुछ नहीं… बस ये कि तुम बहुत बदल गई हो…
अब और भी सुंदर… और भी मासूम लगती हो।”
(सिया मुस्कुरा देती है। उसकी हँसी में भोलेपन की गूंज है।
कबीर उसे देखता है, पर उसकी आँखों में डर झलकता है —
वो जानता है, अगर उसने सिया को अपना असली सच बता दिया
तो वो डर जाएगी… शायद हमेशा के लिए उससे दूर चली जाएगी।)
कबीर (अपने आप से, मन की आवाज़ में) बोला -
“वो अब भी बच्ची है…
अठारह से उन्नीस की हुई है, पर दुनिया के दर्द से अनजान है।
मैं नहीं चाहता कि उसकी मासूम आँखों में डर भर दूँ।
इसलिए मैं चुप रहूँगा…
जब तक उसे याद नहीं आ जाता कि वो कौन थी…
कौन थी ‘सिया’ नहीं, ‘सिमरन’…”
(वो सिया के सिर पर हाथ रखता है।
सिया को सुकून मिलता है —
पर कबीर की आँखों में वही पुरानी लाल चमक फिर से झलक उठती है,
जो वो हर रात दबा देता है।)
आधी रात – कबीर अकेला कमरे में
(कबीर आईने के सामने खड़ा है।
आईना उसके असली रूप को दिखा रहा है —
आधी इंसान, आधी राक्षसी छवि।
वो खुद को देखता है और धीरे से बोलता है:)
कबीर (टूटे स्वर में) बोला -
“मैं उसे डराना नहीं चाहता…
वो मासूम है…
उसे ये नहीं पता कि मैं कौन हूँ —
वो नहीं जानती कि जिसको वो अपना पति मानती है,
वो वही शैतान है जिसने उसकी रूह से प्यार किया था…”
(आईना काँपता है, और आवाज़ आती है — “सच्चाई छुपी नहीं रह सकती, करण…”)
कबीर (गुस्से में) बोला -
“नहीं! जब तक मैं ज़िंदा हूँ, सिमरन को कुछ नहीं होगा!”
(उसकी आँखें जल उठती हैं, और कमरे में सब कुछ काँपने लगता है।
पर अगले ही पल, वो शांत होकर कमरे से बाहर निकलता है —
जैसे अपने भीतर के शैतान को फिर से कैद कर लिया हो।)
रात का सन्नाटा, बाहर हल्की बारिश हो रही है।
कमरे में बस एक नीली नाइट लैंप की रोशनी जल रही है।
सिया यानी सिमरन, कबीर यानी करण के साथ उसी कमरे में सो रही है।)
रात – सिया का सपना शुरू होता है
(सिया करवट बदलती है। उसके माथे पर पसीने की बूँदें चमक रही हैं।
अचानक उसका चेहरा डर से कस जाता है —
जैसे कोई अदृश्य साया उसके ऊपर झुक आया हो।)
(धीमी डरावनी ध्वनि — “हूँऽऽऽ…”)
(सपने में वो खुद को एक पुराने हवेली के बीच में देखती है।
लाल रंग की साड़ी, हाथों में खून, और सामने वही चेहरा — करण का - पर वो इंसान नहीं, एक राक्षस है।)
सपने में करण (भयावह आवाज़ में) बोला -
“भाग नहीं सकती मुझसे, सिमरन…
तुम्हारा खून ही मेरी ताकत है...
बस एक बूंद.....”
(सिया चिल्लाना चाहती है, पर आवाज़ गले में अटक जाती है।
वो पीछे हटती है, दीवार से टकराती है।
हवा में लाल धुंध फैल जाती है।)
सिया (सपने में, काँपती आवाज़ में) बोली -
“कबीर जी… बचाओ…”
(अचानक वो खुद को खून के तालाब में गिरा हुआ देखती है।
उसके माथे का सिंदूर बहकर पूरे पानी को लाल कर देता है।
और एक गहरी, डरावनी हँसी की आवाज़ गूँजती है।)
(“हा…हा…हा…”)
(सिया की आँखें फटी रह जाती हैं —
वो करवट लेकर अचानक उठ बैठती है, चीखते हुए।)
हकीकत में लौटना
(कबीर घबरा कर जाग जाता है।
वो तुरंत सिया के पास बैठता है, उसके कंधे थाम लेता है।)
कबीर (चिंतित होकर) बोला -
“सिया! क्या हुआ? फिर से वही सपना?”
(सिया काँप रही है, उसकी आँखों में डर है।
वो कुछ नहीं बोल पाती, बस उसके गले लग जाती है।)
सिया (रोते हुए) बोली -
“वो… वो कोई था वहाँ… लाल आँखों वाला…
वो मुझसे कह रहा था कि मैं भाग नहीं सकती…”
(कबीर एक पल को चुप हो जाता है, उसके चेहरे पर गहरी बेचैनी झलकती है।
वो जानता है कि सिया के सपने में जो दिखा, वो सपना नहीं —
बल्कि उसका अतीत है, उसका असली रूप।)
कबीर (धीरे, खुद से बुदबुदाते हुए) बोला -
“नहीं… उसे याद नहीं आना चाहिए…
अभी नहीं…”
(वो सिया के माथे पर हाथ रखता है, और उसकी आँखों में देखता है।
सिया की साँसें धीरे-धीरे सामान्य होने लगती हैं।)
कबीर (धीरे से) बोला -
“शांत हो जाओ… मैं यहीं हूँ… कोई नहीं आएगा।”
(सिया उसकी बाँहों में सिमट जाती है।
पर कबीर की आँखें छत की ओर उठ जाती हैं —
और उनमें हल्की लाल चमक फिर से दिखती है,
मानो उसका अंधेरा रूप फिर से जागने की कोशिश कर रहा हो।)
(कबीर के मन की आवाज़) -
“हर रात उसके सपनों में मेरा सच लौट आता है…
वो अतीत जो मैंने खुद दबा दिया था…
पर कब तक?
कब तक मैं अपनी रूह को झूठ में बाँधकर रखूँगा…”
(कहानी यहीं एक रहस्यमय मोड़ पर ठहरती है —
सिया सो रही है, पर उसकी पलकों के नीचे फिर से कंपन है।
और कबीर खिड़की से बाहर देख रहा है,
जहाँ दूर आसमान में लाल चाँद उग आया है…)
(सुबह की हल्की धूप खिड़की से छनकर कमरे में गिर रही है, पर कमरे के अंदर अंधकार और चिंता फैली हुई है।
बिस्तर पर सिया लेटी है — चेहरा पीला, माथे पर पसीना और साँसें भारी।
कबीर यानी करण उसके पास बैठा है, आँखों में बेचैनी साफ झलक रही है।)
सुबह – सिया का बुखार
(कबीर उसके माथे पर ठंडा कपड़ा रख रहा है।
हर कुछ सेकंड बाद वो तापमान जाँचता है, फिर पानी में कपड़ा डुबोकर निचोड़ता है।)
कबीर (धीरे से, चिंतित आवाज़ में) बोला -
“सिया… सुनो ना… आँखें खोलो…
तुम्हें कुछ नहीं होगा, मैं हूँ ना…”
(सिया हल्के से करवट लेती है। आँखें मुश्किल से खुलती हैं।
वो कबीर को धुँधले में देखती है और कमजोर स्वर में बोलती है।)
सिया (कमज़ोर आवाज़ में) बोली -
“कबीर जी… मुझे बहुत ठंड लग रही है…”
(कबीर तुरंत कंबल ओढ़ा देता है,
फिर पानी का ग्लास उठाता है और उसके होंठों तक ले जाता है।)
कबीर बोला -
“थोड़ा पानी पी लो… दवा भी लेनी है तुम्हें।”
(सिया सिर हिलाती है, पर उसकी आँखों में आँसू हैं।
वो कुछ बुदबुदाती है — “डर लगता है…”)
कबीर (धीरे से उसके बाल सहलाते हुए) बोला -
“किससे डर लगता है?”
(सिया आँखें बंद कर लेती है, उसकी आवाज़ काँपती है।)
सिया बोली -
“वो… सपनों वाला आदमी… लाल आँखों वाला…
वो बार-बार कहता है कि मैं उसकी हूँ…”
(कबीर के हाथ रुक जाते हैं।
उसकी आँखों में एक पल के लिए लाल चमक कौंधती है,
पर वो तुरंत खुद को सँभाल लेता है।)
कबीर (धीरे से, मजबूर मुस्कान के साथ) बोला -
“सपना था बस, सिया… अब सो जाओ… सब ठीक हो जाएगा।”
(वो उसके माथे पर हाथ रखता है।
सिया की साँसें धीरे-धीरे सामान्य होती जाती हैं।
वो गहरी नींद में चली जाती है।)
रात – सन्नाटा
(कबीर खिड़की के पास बैठा है।
बारिश की हल्की बूँदें काँच पर गिर रही हैं।
उसकी आँखें सिया की ओर टिकी हैं — जो अब चैन से सो रही है।)
कबीर (धीरे से खुद से बुदबुदाते हुए) बोला -
“कभी मैंने इस रूह को अपने अंधेरे में बाँधा था…
आज वही रूह मेरी ज़िंदगी की वजह बन गई है…”
(वो उठता है, जाकर उसके माथे को हल्के से चूमता है।)
कबीर बोला -
“तुम्हें कुछ नहीं होने दूँगा सिया…
कभी नहीं…”
(बाहर बिजली कड़कती है —
और उसी रोशनी में, कबीर का प्रतिबिंब शीशे में दिखता है —
उसकी लाल आँखें फिर चमक उठती हैं…
जैसे उसका ‘अंधेरा रूप’ जागने लगा हो।)
“प्यार और अंधकार का ये संगम अब एक नई आग को जन्म देने वाला था।
जहाँ एक इंसान की मासूमियत…
एक शैतान की रूह को फिर से जगा रही थी…”