पाँच वर्ष बीत गए थे।समय के बारे में सबसे विचित्र बात यही है,
जिस दिन हम टूटते हैं, उस दिन लगता है कि अब कुछ आगे नहीं बढ़ेगा।लेकिन समय रुकता नहीं।वह हमारी सहमति के बिना भी आगे बढ़ता रहता है।
पाँच वर्षों में शहर बदल गया था।कुछ सड़कें चौड़ी हो गई थीं।
पुरानी इमारतें गिराकर नई बना दी गई थीं।कई चेहरे चले गए थे।कई नए आ गए थे।
लेकिन शहर के पुराने हिस्से में वह छोटी-सी किताबों की दुकान अब भी थी।हालाँकि मोहनलाल जी नहीं रहे थे।उनके बेटे ने दुकान संभाल ली थी।
और महीने में एक बार...लगभग हर महीने...समर वहाँ आता था।अब उसके बालों में भी सफेदी उतर आई थी।आँखों के कोनों पर समय की महीन रेखाएँ थीं।और मुस्कान में एक स्थायी उदासी।लेकिन वह उदासी दुख नहीं थी।वह स्मृति थी।दुख समय के साथ बदल जाता है,स्मृति नहीं।
उस दिन भी वह उसी पुराने कोने में बैठा था।जहाँ वर्षों पहले उसे पहला पत्र मिला था।उसके हाथ में वही पुरानी डायरी थी।
जिसमें अब भी गुलमोहर का वह सूखा फूल दबा हुआ था।
समय ने उसके रंग छीन लिए थे।लेकिन उसकी उपस्थिति नहीं।
समर ने धीरे से डायरी खोली।और एक पन्ने पर उसकी नज़र ठहर गई।वर्षों पहले लिखा हुआ एक वाक्य,"मुझे तुम्हारी बीमारी से डर नहीं लगा।मुझे उस जीवन से डर लगा जिसमें तुम नहीं होगी।"
समर बहुत देर तक उसे देखता रहा।फिर धीरे से मुस्कुरा दिया।
क्योंकि अब उसे पता था,वह जीवन आ चुका था।और वह उसमें जी भी चुका था।कठिन था,बहुत कठिन......लेकिन असंभव नहीं।
अन्विता के जाने के बाद पहले कुछ वर्षों तक उसे लगता रहा कि वह हर चीज़ खो चुका है।फिर धीरे-धीरे उसने एक बात समझी।मनुष्य किसी प्रिय व्यक्ति को नहीं खोता।वह केवल उसके साथ भविष्य खोता है।व्यक्ति स्वयं कहीं नहीं जाता।
वह हमारी भाषा में रह जाता है,हमारी आदतों में,हमारी चुप्पियों में,हमारी पसंद की किताबों में,हमारी आँखों में ठहर जाने वाली उदासी में।
और सबसे अधिक...उन बातों में जिन्हें हम किसी और से कभी नहीं कहते।उस शाम समर दुकान से निकला।बाहर वही पुराना अमलतास था।अब पहले से कहीं बड़ा।पीले फूल हवा में झूल रहे थे।
धूप पेड़ के नीचे बिखरी हुई थी।समर धीरे-धीरे जाकर उसके नीचे बैठ गया।ठीक वैसे ही...जैसा उसने वादा किया था।
हवा चल रही थी।कुछ फूल टूटकर उसके पास गिरे।
और अचानक उसे लगा,जैसे कोई बहुत परिचित उपस्थिति उसके पास बैठ गई हो।न कोई चमत्कार हुआ.....न कोई आवाज़ आई.....बस एक शांति।गहरी,उजली,अपरिचित होकर भी परिचित।
और उस शांति में उसे वर्षों पुरानी एक आवाज़ सुनाई दी,"तुम सचमुच हो।"
समर की आँखें भर आईं।उसने आकाश की ओर देखा।और पहली बार...वर्षों में पहली बार...इस बार.....उसे अन्विता के लिए दुख नहीं हुआ।उसे कृतज्ञता हुई।
क्योंकि हर प्रेम का उद्देश्य साथ रहना नहीं होता।कुछ प्रेम हमें बदलने आते हैं।हमें यह सिखाने कि हृदय कितना गहरा हो सकता है।दुख कितना सुंदर हो सकता है,और स्मृति कितनी दीर्घायु।
सूरज धीरे-धीरे ढल रहा था।अमलतास की छाया लंबी होती जा रही थी।समर ने आँखें बंद कीं।और मन ही मन कहा,"तुम चली गईं।
यह सच है।लेकिन एक और सच भी है।तुम कभी गई ही नहीं।"
हवा ने पेड़ को छुआ।कुछ पीले फूल फिर गिरे।और उस क्षण...
उसे लगा कि जीवन ने अंततः अपना उत्तर दे दिया है।
हम जिन लोगों से सचमुच प्रेम करते हैं,वे मृत्यु के बाद कहीं स्वर्ग में नहीं रहते,न तारों में,न किसी और लोक में।
वे वहीं रहते हैं,जहाँ उन्होंने अपने लिए जगह बनाई थी।किसी दूसरे मनुष्य के हृदय में।और शायद प्रेम की अंतिम विजय यही है,कि वह मृत्यु से नहीं हारता।अपनी भी कहानी समाप्त होने से पहले... मैं केवल यही कहूंगा,कि वह दुनिया सुंदर थी, जिसमें तुम थे। वाकई........ उसने कुछ सोचा
समर ने अपनी डायरी का अंतिम पन्ना खोला।और लिखा,"मैंने तुम्हें खोया नहीं।मैंने तुम्हें जीवन के एक रूप से दूसरे रूप में जाते देखा है।पहले तुम मेरे पत्रों में थीं,फिर मेरे दिनों में,फिर मेरी स्मृतियों में।
और अब...तुम मेरे होने में हो।"
उसने कलम रखी,डायरी बंद की।और धीरे से मुस्कुरा दिया।
क्योंकि अंततः वह समझ चुका था,यह कहानी प्रेम की नहीं थी।
यह कहानी उस जीवन की थी...जिस जीवन में वह था,जिस जीवन में अन्विता थी, जिस जीवन में वो दोनों थे,जिस जीवन में तुम थे। जिस जीवन में हम थे।
"कहते हैं वक्त हर ज़ख्म भर देता है... लेकिन किसी ने ये नहीं बताया कि कुछ ज़ख्म वक्त के साथ और गहरे हो जाते हैं।"
अन्विता........तुम्हें पता है, मैं आज भी भीड़ में सबसे ज़्यादा अकेला इंसान हूँ। लोग समझते हैं कि मैं आगे बढ़ गया हूँ, मुस्कुरा लेता हूँ, काम में डूबा रहता हूँ... लेकिन उन्हें क्या पता कि मेरी हर मुस्कान के पीछे तुम्हारा नाम दबा हुआ है।
और अगर अगले जन्म जैसा कुछ सच में होता है...तो ख़ुदा से सिर्फ़ एक गुज़ारिश करूँगा,या तो मुझे फिर कभी तुमसे मिलाना मत...या इस बार तुम्हें मेरी तक़दीर बना देना।
क्योंकि अधूरी मोहब्बत... इंसान को ज़िंदा तो रखती है, मगर जीने नहीं देती। लेकिन वह भी क्या जीवन था....! जिस जीवन में वो दोनों थे!
मैं कितना याद करुं, कितना सराहूं...?वो जीवन सुखमय और सचमुच अनमोल था,जिस जीवन में तुम थे।
"समाप्त ।"