जिस जीवन में तुम थे - 1 SHREYA INDUSHREE द्वारा प्रेम कथाएँ में हिंदी पीडीएफ

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जिस जीवन में तुम थे - 1

कुछ लोग हमारे जीवन में कभी नहीं आते।वे हमारे घरों की चौखट नहीं लाँघते, हमारी उँगलियों को नहीं छूते, हमारे साथ तस्वीरों में नहीं दिखते।
फिर भी, एक दिन जब हम अपनी स्मृतियों की अलमारी खोलते हैं, तो पाते हैं कि सबसे अधिक जगह उन्हीं लोगों ने घेर रखी है।
समर को यह बात बहुत देर से समझ आई थी।
इतनी देर से कि जब तक समझ आई, तब तक उस समझ का कोई उपयोग नहीं बचा था।
उस सुबह भी वह अपनी मेज़ पर झुका बैठा था।
जनवरी की धूप खिड़की से छनकर कमरे में आ रही थी और पुराने काग़ज़ों पर बिखर रही थी।
कमरे में किताबों की सौगंध थी,वह सौगंध जो केवल पुरानी किताबों में होती है....... हां जिसे किताबें पसंद है उनके लिए वह खूशबू ही है,थोड़ी-सी धूल, थोड़ी-सी नमी और बहुत सारा बीता हुआ समय।
समर को हमेशा लगता था कि किताबें भी मनुष्यों की तरह बूढ़ी होती हैं।उनकी जिल्दों पर झुर्रियाँ पड़ जाती हैं।पन्ने पीले होने लगते हैं।
और फिर एक दिन वे केवल शब्द नहीं रहतीं, स्मृतियाँ बन जाती हैं।
उसने सामने रखी किताब खोली।
पन्नों के बीच से एक मोड़ा हुआ काग़ज़ फिसलकर ज़मीन पर गिर पड़ा।वह चौंका नहीं। क्योंकि पुरानी किताबों में भूले हुए काग़ज़ मिल जाना कोई असामान्य बात नहीं थी।
कभी बिजली का बिल,कभी किसी लाइब्रेरी की रसीद,कभी कोई पुराना फ़ोन नंबर,लेकिन यह काग़ज़ कुछ अलग था।
बहुत सावधानी से मोड़ा गया।
मानो किसी ने उसे फेंका नहीं, छिपाया हो।
समर ने उसे उठाया।काग़ज़ पुराना था।
किनारे हल्के भूरे पड़ चुके थे।
उसने धीरे-धीरे तह खोली।
भीतर केवल कुछ पंक्तियाँ लिखी थीं।
स्याही हल्की पड़ चुकी थी।
फिर भी अक्षर साफ़ थे।
उसने पढ़ना शुरू किया........
"जिस दिन तुम मुझे मिलोगे,
शायद मैं किसी और की हो चुकी होऊँगी।
इसलिए बेहतर है कि हम कभी न मिलें।
कुछ लोग जीवन में प्रेम करने के लिए आते हैं,साथ रहने के लिए नहीं।"
समर की आँखें आख़िरी पंक्ति पर ठहर गईं।
कमरे में अचानक जैसे कोई आवाज़ बंद हो गई।
धूप अब भी वहीं थी।घड़ी अब भी चल रही थी।बाहर सड़क पर लोग अब भी गुजर रहे थे।लेकिन उसके भीतर कुछ रुक गया था।
किसी अजनबी ने वर्षों पहले लिखी हुई चार पंक्तियाँ उसके भीतर ऐसी जगह जाकर बैठ गई थीं, जहाँ शायद वह स्वयं भी कभी नहीं पहुँचा था।
उसने काग़ज़ पलटा।पीछे कुछ नहीं था,न नाम,न तारीख़,न पता,सिर्फ़ सफ़ेद ख़ालीपन।
जैसे पत्र लिखने वाला व्यक्ति जानबूझकर अपनी पहचान मिटाकर चला गया हो।
समर बहुत देर तक उस काग़ज़ को देखता रहा।
उसे नहीं मालूम था कि यह पत्र किसने लिखा?
किसके लिए लिखा?
किस दर्द में लिखा?
लेकिन उसे पहली बार लगा कि संसार में कहीं कोई ऐसा व्यक्ति है, जिसने प्रेम को उसी तरह समझा है जैसे वह समझता था।
एक ऐसी चीज़ की तरह जिसे पा लेना आवश्यक नहीं होता।
जिसे केवल महसूस कर लेना भी कभी-कभी पर्याप्त होता है।
खिड़की के बाहर एक सूखा पत्ता हवा में टूटा और धीरे-धीरे नीचे गिर गया।
समर ने पत्र को फिर से मोड़ा।बहुत सावधानी से,मानो वह काग़ज़ नहीं, किसी की धड़कन हो।
उसे नहीं पता था कि यह एक कहानी की शुरुआत है.......
नहीं,कहानी की नहीं.....एक ऐसे जीवन की शुरुआत,जिसे वह कभी जी नहीं पाएगा।
और शायद इसी कारण जीवन भर याद रखेगा।उस रात सोने से पहले उसने पहली बार उस अज्ञात स्त्री के बारे में सोचा।
वह कैसी होगी?
क्या वह अभी भी जीवित होगी?
क्या उसने सचमुच किसी और से विवाह कर लिया होगा?
क्या वह कभी उस पत्र को याद करती होगी?
या फिर वह पत्र उसके लिए भी उतना ही खो चुका होगा जितना वर्षों पहले उस किताब के भीतर खो गया था?
समर देर तक जागता रहा।
और वर्षों में पहली बार उसे नींद नहीं, शब्दों ने घेरा,उसने मेज़ पर रखी डायरी खोली........कलम उठाई।
और एक अजनबी स्त्री के नाम पहला पत्र लिखना शुरू किया।
"मैं नहीं जानता तुम कौन हो?
लेकिन आज तुम्हारे चार वाक्यों ने मेरे भीतर इतने दरवाज़े खोल दिए हैं कि मुझे डर लग रहा है।
शायद यह पत्र कभी तुम्हारे पास न पहुँचे,शायद तुम्हें इसकी आवश्यकता भी न हो।फिर भी मैं लिख रहा हूँ।
क्योंकि कुछ बातें कहने के लिए नहीं,
बचाने के लिए लिखी जाती हैं।"
उसने लिखना बंद किया।खिड़की के बाहर रात उतर चुकी थी।
और कहीं बहुत दूर........
अन्विता नाम की एक स्त्री को अभी तक यह भी नहीं मालूम था कि वर्षों पहले खोया हुआ उसका एक पत्र किसी अजनबी की नियति बनने जा रहा है।