उस पहली मुलाक़ात के बाद समर कई दिनों तक कोई पत्र नहीं लिख पाया।
शब्द, जो इतने महीनों से सहजता से उसके पास चले आते थे, अब जैसे कहीं छिप गए थे।
क्योंकि अब अन्विता केवल एक आवाज़ नहीं थी।केवल एक लिखावट नहीं थी।केवल एक उपस्थिति नहीं थी।अब उसके पास एक चेहरा था।एक मुस्कान थी।एक ठहरकर बोलने का ढंग था।और सबसे बढ़कर,एक वास्तविक अस्तित्व था।
मनुष्य कल्पनाओं से प्रेम कर सकता है।लेकिन वास्तविकता से प्रेम करना कहीं अधिक कठिन होता है।क्योंकि वास्तविकता नश्वर होती है।
नवंबर धीरे-धीरे बीत रहा था।पेड़ों से पत्ते गिरने लगे थे।और समर ने महसूस किया कि उसके भीतर एक अजीब-सी शांति और बेचैनी साथ-साथ रहने लगी है।
अन्विता से मिलने के बाद उनके पत्र बंद नहीं हुए।बल्कि बदल गए।अब उनमें प्रतीक्षा कम थी।स्मृतियाँ अधिक थीं।एक दिन अन्विता ने लिखा,"तुम्हें देखकर मुझे पहली बार समझ आया कि हम जिन लोगों से प्रेम करते हैं, वे हमारी कल्पना से अलग होने पर भी कम प्रिय नहीं होते।बल्कि शायद अधिक हो जाते हैं।"
समर ने उस वाक्य को कई बार पढ़ा।फिर उसने उत्तर में लिखा,
"मुझे डर था कि तुम्हें देखकर मेरे भीतर का जादू टूट जाएगा।
लेकिन हुआ उल्टा।
अब जब मैं तुम्हारे पत्र पढ़ता हूँ, तो तुम्हारी आँखें भी साथ दिखाई देती हैं।"
पत्र भेजने के बाद वह देर तक खिड़की के पास बैठा रहा।सर्दियों की हल्की हवा आ रही थी।और पहली बार उसे लगा कि खुशी भी कभी-कभी दुख जितनी भारी हो सकती है।
दिसंबर की शुरुआत में वे दूसरी बार मिले।फिर तीसरी बार....फिर चौथी।वे प्रेमियों की तरह नहीं मिलते थे।न हाथ पकड़ते,न भविष्य की बातें करते,न कोई वादा करते।
वे बस साथ बैठते,किताबों की दुकानों में,पुराने कैफ़े में,किसी पार्क की खाली बेंच पर।और हर मुलाक़ात के बाद उनके भीतर एक और विदाई जमा हो जाती।
एक दिन अन्विता ने पूछा,"अगर हम बीस साल पहले मिले होते तो?"
समर मुस्कुरा नहीं सका।क्योंकि कुछ प्रश्न मुस्कुराकर टाले नहीं जा सकते।
उसने कहा,"तो शायद हम आज यहाँ न बैठे होते।"एक वास्तविकता उसके सामने रखी।
अन्विता ने उसकी ओर देखा।"क्यों?"
"क्योंकि तब हम जीवन को नहीं जानते,हम एक-दूसरे को पा लेते,और शायद धीरे-धीरे सामान्य हो जाते।
लेकिन अब...अब हम जानते हैं कि हर चीज़ खो सकती है।इसलिए शायद हम एक-दूसरे को इतने ध्यान से देख रहे हैं।"
अन्विता बहुत देर तक चुप रही।फिर धीरे से बोली,"तुम्हें पता है?कभी-कभी मुझे लगता है कि हम एक-दूसरे के प्रेमी नहीं हैं।
हम एक-दूसरे की छूटी हुई संभावनाएँ हैं।"
उस दिन लौटते समय समर देर तक सड़क पर चलता रहा।छूटी हुई संभावनाएँ।क्या यही प्रेम था?
न वह व्यक्ति जिसे हमने पाया।न वह जीवन जो हमने जिया।
बल्कि वह सब...जो हो सकता था।
कुछ दिनों बाद अन्विता की तबीयत बिगड़ गई।बहुत गंभीर नहीं।लेकिन इतनी कि उसे कुछ दिनों के लिए अस्पताल जाना पड़ा।
समर उससे मिलने नहीं गया।अन्विता ने मना किया था।"मैं नहीं चाहती कि तुम्हारी स्मृति में मेरी कोई अस्पताल वाली तस्वीर रहे।"
समर ने उसकी बात मान ली।लेकिन उन दिनों उसने पहली बार जाना कि असहायता क्या होती है।
सुबह उठना,फोन की ओर देखना,कोई संदेश न मिलना।और फिर पूरे दिन यह सोचते रहना कि वह कैसी होगी?
उसने डायरी में लिखा,"प्रेम का सबसे कठिन रूप देखभाल नहीं है।प्रेम का सबसे कठिन रूप है,देखभाल करना चाहते हुए भी कुछ न कर पाना।"
क्रिसमस के आसपास अन्विता घर लौट आई।कमज़ोर,थोड़ी थकी हुई,लेकिन मुस्कुराती हुई।उस दिन वे शहर के पुराने पार्क में मिले।पेड़ों के नीचे सूखे पत्ते बिखरे थे।
कुछ देर बाद अन्विता ने अचानक पूछा,"समर, क्या तुम्हें कभी लगता है कि हम स्वार्थी हैं?"
"क्यों?"
"क्योंकि हम जानते हैं कि यह कहीं नहीं जाएगा।फिर भी हम इसे जी रहे हैं।"
समर ने बहुत देर तक उत्तर नहीं दिया।फिर बोला"नहीं।मुझे लगता है हम पहली बार ईमानदार हैं"खुद के साथ....
अन्विता की आँखें भर आईं।क्योंकि वह जानती थी,वे किसी भविष्य के लिए साथ नहीं थे।वे किसी मंज़िल की ओर नहीं जा रहे थे।
वे केवल उस थोड़े-से समय को बचाने की कोशिश कर रहे थे...जो उन्हें नियति ने उधार दिया था।
शाम ढल रही थी।आकाश पर धुँधली सुनहरी रोशनी थी।और अचानक अन्विता ने कहा"अगर मैं तुमसे पहले चली गई...
तो मुझे भूलने की कोशिश मत करना।"
समर का गला भर आया।उसने तुरंत उत्तर नहीं दिया।क्योंकि कुछ वाक्यों के बाद शब्द छोटे पड़ जाते हैं।बहुत देर बाद उसने केवल इतना कहा,"तुम्हें भूलना वैसा होगा जैसे कोई अपनी ही उम्र भूलने की कोशिश करे।"
अन्विता मुस्कुराई।लेकिन उस मुस्कान में एक अजीब-सी उदासी थी।मानो वह पहले से जानती हो...कि आने वाले दिनों में उन्हें प्रेम नहीं,बल्कि विदाई सीखनी होगी।और प्रेम से अधिक कठिन कला शायद दुनिया में कोई नहीं,सिवाय विदाई के।