जिस जीवन में तुम थे - 8 SHREYA INDUSHREE द्वारा क्लासिक कहानियां में हिंदी पीडीएफ

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जिस जीवन में तुम थे - 8

इस बार उसने उसे खोला।हाथ काँप रहे थे,दिल भी।पत्र लंबा नहीं था।लेकिन हर पंक्ति जैसे किसी और समय से आई हुई लगती थी।
"समर,
अगर तुम यह पत्र पढ़ रहे हो तो इसका अर्थ है कि मैं वहाँ नहीं हूँ जहाँ तुम मुझे खोजते थे।"
समर की साँस अटक गई।वह पढ़ता गया।"मैं चाहती थी कि यह पत्र कभी न पढ़ा जाए।लेकिन जीवन हमारी इच्छाओं से अधिक अपने निर्णयों पर चलता है।"

कुछ क्षण तक शब्द धुँधले हो गए।फिर उसने आगे पढ़ा।"सबसे पहले एक बात।अपने जीवन को मेरे शोक में मत बदल देना।"

समर हँस पड़ा।एक टूटी हुई, भीगी हुई हँसी।क्योंकि वह जानता था,कुछ बातें इतनी सरल नहीं होतीं।

पत्र आगे कह रहा था"मुझे भूलने की कोशिश मत करना।लेकिन मुझे पकड़कर भी मत रखना।स्मृतियाँ घर होनी चाहिए,
कारागार नहीं।"

समर ने आँखें बंद कर लीं।कितनी बार उसने यही बात दूसरों को समझाई थी।और अब वही बात उसे सबसे कठिन लग रही थी।
पत्र के अंतिम हिस्से में लिखा था,"और एक स्वीकारोक्ति।

मैंने तुमसे प्रेम किया।शायद जितना करना चाहिए था उससे अधिक।शायद जितना करना उचित था उससे अधिक।"

समर के हाथ काँप गए।आँसू काग़ज़ पर गिरे।"लेकिन मेरा सबसे बड़ा दुख यह नहीं है कि हम साथ नहीं रह सके।मेरा सबसे बड़ा दुख यह है कि मुझे उस जीवन को छोड़ना पड़ रहा है...जिसमें तुम थे।"

कमरा पूरी तरह मौन था।बाहर रात थी।और वर्षों में पहली बार...समर ने महसूस किया कि कुछ वाक्य मनुष्य को बदल देते हैं.......हमेशा के लिए।

पत्र की आख़िरी पंक्ति थी,"जब कभी किसी पुराने पेड़ के नीचे धूप गिरती देखो,तो कुछ क्षण वहाँ बैठ जाना।मैं शायद वहीं कहीं मिल जाऊँ।"

समर ने पत्र मोड़ दिया,बहुत सावधानी से।जैसे किसी ने अपना हृदय उसकी हथेलियों पर रख दिया हो।

और उस रात...बहुत लंबे समय बाद...वह रोया।अन्विता के लिए नहीं।केवल उस स्त्री के लिए नहीं जिसे वह प्रेम करता था।
बल्कि उस जीवन के लिए...जो कभी उनका हो सकता था।
उस जीवन के लिए...जिस जीवन में वह थी।

अप्रैल की शुरुआत में अमलतास सचमुच खिल आया था।पीले फूलों से लदा हुआ।वैसा ही जैसा अन्विता ने कहा था।
समर अस्पताल की खिड़की के बाहर खड़े उस पेड़ को देख रहा था।और उसे लग रहा था कि जीवन कभी-कभी कितना क्रूर होता है।

जिस ऋतु का इंतज़ार कोई व्यक्ति पूरी सर्दियाँ करता है...कभी-कभी वही ऋतु उसके जाने के समय आती है।

अन्विता अब बहुत कम बोलती थी।बीमारी ने उसके शरीर को धीरे-धीरे अपने अधिकार में ले लिया था।लेकिन उसकी आँखें अब भी वैसी थीं,गहरी........शांत।और अजीब तरह से उजली।
जैसे भीतर कहीं कोई भय अब शेष न बचा हो।

उस दिन समर उसके पास बैठा था।कमरे में हल्की धूप थी।खिड़की से हवा आ रही थी।और दोनों लंबे समय से चुप थे।
फिर अचानक अन्विता ने कहा,"समर।"

उसने सिर उठाया।"हाँ?"

अन्विता कुछ क्षण उसे देखती रही।फिर मुस्कुराई।"तुम्हें पता है...मैं अब मृत्यु के बारे में नहीं सोचती।"

समर ने कुछ नहीं कहा।"मैं उन चीज़ों के बारे में सोचती हूँ जो मुझे याद आएँगी।"उसकी आवाज़ बहुत धीमी थी।

"बारिश.......

पुरानी किताबों की सुगंध.....

स्टेशन.....

गुलमोहर....

और..."वह रुक गई।

समर की आँखें नम हो गईं।

"और तुम।"कमरे में मौन उतर आया।ऐसा मौन जिसमें शब्दों की आवश्यकता नहीं रहती।कुछ देर बाद अन्विता ने धीरे से कहा,
"अगर कोई ईश्वर है...और अगर जन्म फिर से होते हैं...तो मैं चाहूँगी कि अगली बार हम समय पर मिलें।"

आज समर ने पहली बार उसके सामने रोना नहीं रोका।आँसू चुपचाप उसके चेहरे पर बह निकले।क्योंकि कुछ इच्छाएँ इतनी सुंदर होती हैं...कि उनका पूरा न होना असहनीय लगता है।
अन्विता ने काँपते हाथ से उसका हाथ छुआ।"मत रो।"फिर हल्की-सी मुस्कान के साथ बोली,

"तुम्हें देखकर मुझे हमेशा लगता था कि दुनिया उतनी बुरी नहीं है जितनी मैंने समझ ली थी।"

समर कुछ बोलना चाहता था।लेकिन शब्द उसके गले में ही अटक गए।क्योंकि प्रेम के अंतिम क्षणों में भाषा अक्सर असफल हो जाती है।और केवल उपस्थिति बचती है।

उस दिन जाते समय अन्विता ने उसे पुकारा......"समर।"

वह दरवाज़े पर रुक गया।"हाँ?"

बहुत देर तक वह उसे देखती रही।जैसे उसके चेहरे को स्मृति में सुरक्षित कर रही हो।फिर बोली"धन्यवाद।"

न प्रेम,न विदाई,न कोई बड़ा वाक्य.....केवल"धन्यवाद।"और समर ने उसी क्षण समझ लिया कि कुछ रिश्ते इतने गहरे होते हैं कि उन्हें किसी नाम की आवश्यकता नहीं होती।

प्रेम अलग तरह की भावना होती है। सच्चा प्रेम इंसान को बहुत बेहतर और अच्छा बना देता है ।जैसे वह दोनों बन गए थे।