जिस जीवन में तुम थे - 7 SHREYA INDUSHREE द्वारा क्लासिक कहानियां में हिंदी पीडीएफ

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जिस जीवन में तुम थे - 7

वह कुछ दिनों से सोच में कई दिन सोचने और काफी दिनों की मुलाकातों के बाद समर आखिर पूछ ही लेता है, कि वे फ़ोन नंबर क्यों नहीं साझा करते? यूं ही तो इंसान के शक सुबहा दूर होते हैं।

बारिश अभी-अभी रुकी थी। सर्दियों की बारिश ने ठिठुरन और बढ़ा दी थी।कैफ़े की खिड़की पर पानी की कुछ बूँदें अब भी अटकी हुई थीं।समर सामने बैठी अन्विता को देख रहा था।

कई महीनों के पत्राचार और कुछ मुलाक़ातों के बाद भी एक बात उसके भीतर अटकी हुई थी।आख़िर उसने पूछ ही लिया।

"एक बात पूछूँ?"

अन्विता ने मुस्कुराकर सिर हिला दिया।

"हमने आज तक एक-दूसरे का नंबर क्यों नहीं लिया?"

कुछ क्षणों तक अन्विता चुप रही।जैसे उत्तर पहले से तैयार न हो।जैसे वह उसे महसूस कर रही हो।फिर उसने खिड़की के बाहर देखते हुए कहा,"क्योंकि मुझे डर लगता है।"

समर हल्का-सा मुस्कुराया।"नंबर से?"

"नहीं।"वह भी मुस्कुराई।"उस चीज़ से जो नंबरों के बाद शुरू होती है।"

समर चुप रहा।अन्विता धीरे-धीरे बोलती रही,"तुमने ध्यान दिया है? आजकल लोग कितनी जल्दी एक-दूसरे तक पहुँच जाते हैं।"
"एक संदेश। एक कॉल। एक वीडियो कॉल।"और फिर धीरे-धीरे वे एक-दूसरे के जीवन में इतने उपस्थित हो जाते हैं कि अनुपस्थिति असहनीय लगने लगती है।"

वह कुछ क्षण रुकी।फिर बोली,"मुझे अनुपस्थित रहने का अधिकार चाहिए, समर।"

समर ने उसकी ओर ध्यान से देखा।उसकी आवाज़ में एक थकान थी।बहुत पुरानी थकान......

"और पत्र?" उसने पूछा।

अन्विता हल्के से मुस्कुराई।"पत्रों में मनुष्य अपना सबसे अच्छा रूप लिखता है।"फ़ोन पर हम प्रतिक्रिया देते हैं। पत्रों में हम सोचते हैं।"
"फ़ोन पर हम बोल देते हैं। पत्रों में हम चुनते हैं कि क्या कहना है।"

फिर उसने मेज़ पर रखे अपने हाथों को देखा।"और सच कहूँ..."मुझे डर है कि अगर हम हर समय एक-दूसरे तक पहुँचने लगेंगे, तो शायद हम भी दुनिया के बाकी लोगों की तरह हो जाएँगे।"

"आदत....?

"और मैं तुम्हें आदत नहीं बनने देना चाहती।"

समर की आँखें उसके चेहरे पर टिक गईं।"तो क्या बनाना चाहती हो?"

अन्विता ने उसकी ओर देखा,बहुत देर तक।फिर धीमे से बोली,
"स्मृति।"

कैफ़े में अचानक बहुत शांति लगने लगी।बारिश के बाद की नमी हवा में घुली हुई थी।और अन्विता की आवाज़ फिर सुनाई दी,
"कुछ रिश्ते रोज़-रोज़ जीने के लिए नहीं होते, समर।"वे इतने दुर्लभ होते हैं कि उन्हें संभालकर रखना पड़ता है।"जैसे किसी किताब में रखा हुआ सूखा फूल।"अगर उसे बार-बार छुओगे...?उसने वाक्य अधूरा छोड़ दिया।

समर ने धीरे से पूरा किया......"तो वह टूट जाएगा।"

अन्विता मुस्कुराई।और उस मुस्कान में न जाने कितना प्रेम, कितना भय और कितनी आगामी विदाई छिपी हुई थी।

"हाँ," उसने कहा,......."तो वह टूट जाएगा।"

"अन्विता सोशल मीडिया से दूर रहती थी।समर को भी त्वरित संवादों पर भरोसा नहीं था।दोनों मानते थे कि कुछ बातें केवल लिखी जा सकती हैं, कही नहीं।"

इसलिए"उन्होंने जानबूझकर नंबर साझा न करने का निर्णय लिया, क्योंकि वे व्यक्ति से पहले शब्दों को जानना चाहते थे।"लेकिन अब.......आज........ उन्होंने नंबर बदल लिए थे, लेकिन साथ में एक वादा भी किया था ।कि बहुत जरूरी होने पर ही वह फोन करेंगे और यह पत्रों वाला व्यवहार चलता रहेगा....... इसमें एक आत्मीयता थी एक अलग सा खिंचाव सा महसूस होता था उन्हें......दोनों ही अपने बीते समय की यादों में रहना चाहते थे, दोनों ही बचपन का नोस्टाल्जिया जी रहे थे ,कि उन्हें यह पसंद था। कोई अपने मां से गहरे तौर पर जुड़ा था, तो कोई अपने पिता की यादों से...... और बस यही वजह थी, कि उन्हें उनका तरीका भी भाता था।

जनवरी की एक सुबह समर ने महसूस किया कि सर्दियाँ इस बार कुछ अधिक लंबी हो गई हैं।या शायद सर्दियाँ नहीं, प्रतीक्षा।
क्योंकि समय वही था।घड़ियाँ उसी तरह चल रही थीं।सूरज उसी तरह उग रहा था।लेकिन अन्विता की आवाज़ अब पहले जैसी नहीं रही थी।

बीमारी अचानक नहीं बढ़ी थी।दुखों की तरह बीमारियाँ भी धीरे-धीरे अपने अधिकार बढ़ाती हैं।पहले थकान...फिर साँसों का छोटा पड़ जाना....फिर कुछ दिनों का आराम....फिर वही चक्र।

अन्विता अब भी हँसती थी।पत्र अब भी लिखती थी।मिलती भी थी।लेकिन समर ने देख लिया था,उसकी आँखों के पीछे एक थकान स्थायी रूप से बस गई थी।

एक दिन वे शहर के उसी पुराने पार्क में बैठे थे।सर्द धूप पेड़ों की शाखाओं से छनकर आ रही थी।अन्विता ने ऊनी शॉल ओढ़ रखी थी।हवा हल्की थी।और दोनों बहुत देर से चुप थे।

फिर अचानक अन्विता बोली,"समर, क्या तुम्हें कभी ऐसा लगता है कि जीवन हमें पहले से चेतावनी देता रहता है?"

"किस बारे में?"

"हर विदाई के बारे में।"

समर ने उसकी ओर देखा।"मुझे लगता है हम ही सुनना नहीं चाहते।"

अन्विता मुस्कुराई।"हाँ.......शायद।"

फिर वह बहुत देर तक सूखे पत्तों को देखती रही।और बोली,"मैं बचपन में सोचती थी कि दुख अचानक आते हैं।

अब समझती हूँ,वे पहले धीरे-धीरे हमारे आसपास बैठते हैं।फिर एक दिन हम उन्हें पहचान लेते हैं।"

समर ने कुछ नहीं कहा।क्योंकि वह भी पहचान चुका था।उसके भीतर अब एक स्थायी भय रहने लगा था।अन्विता के खो जाने का भय।
और यह भय इतना गहरा था कि कई बार वह वर्तमान का आनंद भी नहीं ले पाता था।जब वह उसके साथ बैठा होता,
तो उसके साथ होने की खुशी से अधिक उसके न रहने की कल्पना सताती।

यही प्रेम का सबसे निर्दयी पक्ष है।जब कोई व्यक्ति हमारे लिए अपरिहार्य हो जाता है...तभी उसके खोने का आतंक जन्म लेता है।