अप्रैल की शुरुआत में शहर पर एक अजीब-सी धूप उतरती है।
न वह सर्दियों की कोमल धूप होती है, न गर्मियों की कठोर।
बस एक ऐसी धूप, जो पुरानी यादों की तरह कंधों पर आकर बैठ जाती है।
समर ने उस दिन तीसरा पत्र लिखा।
लेकिन उससे पहले उसने कई दिनों तक कुछ नहीं लिखा था।
उसे डर लगने लगा था।
डर इस बात का नहीं कि वह अजनबी स्त्री उत्तर देना बंद कर देगी।
डर इस बात का था कि वह उत्तर देती रहेगी।
मनुष्य जिन चीज़ों का अभ्यस्त हो जाता है, उनके खोने का भय भी उसी अनुपात में बढ़ता जाता है।
और समर को प्रतीक्षा की आदत पड़ने लगी थी।
उस दिन उसने लिखा,
"तुम्हें कभी ऐसा लगा है कि कुछ लोग हमारे जीवन में नहीं, हमारे भीतर रहते हैं?
वे कहीं बाहर नहीं होते।
न उनके पास कोई पता होता है, न कोई दरवाज़ा।
फिर भी जब हम दुखी होते हैं तो सबसे पहले उन्हीं की याद आती है।
मुझे नहीं मालूम तुम कौन हो?
लेकिन पिछले कुछ दिनों से तुम मेरे भीतर रहने लगी हो।"
पत्र लिखने के बाद वह बहुत देर तक उसे देखता रहा।
फिर अचानक उसे लगा कि यह वाक्य भेजना नहीं चाहिए।
यह बहुत अधिक था,बहुत जल्दी था,बहुत खतरनाक था।
लेकिन उसने काग़ज़ नहीं फाड़ा।
शायद इसलिए कि कुछ सच्चाइयाँ मनुष्य बोल नहीं पाता, केवल लिख पाता है।
तीन दिन बाद उसे उत्तर मिला।
इस बार पत्र छोटा था।
बहुत छोटा,सिर्फ़ एक पंक्ति।
"मुझे लगता है हम सब किसी-न-किसी के भीतर निर्वासित जीवन जी रहे होते हैं।"
समर उस पंक्ति को बार-बार पढ़ता रहा।
निर्वासित........
क्या सुंदर और दुखद शब्द था।
उसने सोचा, शायद प्रेम का दूसरा नाम ही निर्वासन है।
किसी के भीतर रहना, बिना उसके जीवन का हिस्सा बने।
उस रात वह सो नहीं सका।
और कई वर्षों बाद उसे अपना बचपन याद आया।
उसकी माँ की मृत्यु तब हुई थी जब वह बारह वर्ष का था।
उसके बाद पिता ने स्वयं को काम में डुबो दिया था।
घर में सब कुछ था,रसोई...कमरे.....फर्नीचर....दिनचर्या।
बस घर नहीं था।
समर ने बहुत छोटी उम्र में सीख लिया था कि मनुष्य अकेले भी बड़ा हो सकता है।
लेकिन उसने यह कभी नहीं सीखा कि अकेले कैसे जिया जाता है?
शायद इसी कारण वह किताबों में शरण लेता रहा।
शब्दों में,कहानियों में,उन लोगों में जो वास्तविक नहीं थे।
कुछ दिनों बाद अन्विता का एक लंबा पत्र आया।
समर ने उसे पढ़ना शुरू किया।
"जब मैं छोटी थी, मुझे लगता था कि जीवन का सबसे बड़ा दुख मृत्यु होती है।
फिर मैं बड़ी हुई।
और समझी कि मृत्यु से भी बड़ा दुख है,किसी जीवित चीज़ का धीरे-धीरे मरते जाना।
एक सपना....एक रिश्ता....एक विश्वास...या स्वयं मनुष्य।
मैंने अपने जीवन में बहुत-सी चीज़ों को मरते हुए देखा है।
शायद इसी कारण अब मैं किसी चीज़ से बहुत अधिक प्रेम नहीं करती।
प्रेम जितना सुंदर होता है,
उसका शोक उतना ही लंबा होता है।"
समर ने पढ़ना बंद कर दिया।
कुछ देर के लिए।
क्योंकि अचानक उसे लगा कि वह उस स्त्री के दुख को पढ़ नहीं रहा,उसे सुन रहा है।
और दुख जब आवाज़ बन जाए, तब वह शब्दों से अधिक वास्तविक हो जाता है।
पत्र के अंत में एक और पंक्ति थी।
"क्या तुम्हें भी कभी ऐसा लगता है कि हमें अपने जीवन का सबसे महत्वपूर्ण व्यक्ति बहुत देर से मिलता हैं?"
समर बहुत देर तक उस वाक्य को देखता रहा।
उसके पास उत्तर नहीं था,या शायद था।
लेकिन वह उसे स्वीकार करने से डर रहा था।
क्योंकि यदि उसने 'हाँ' कहा......
तो उसे यह भी स्वीकार करना पड़ता कि एक अजनबी स्त्री धीरे-धीरे उसके जीवन की सबसे महत्वपूर्ण उपस्थिति बनती जा रही है।
उधर अन्विता भी बदल रही थी।
अब वह किताबों की दुकान पर केवल पत्र लेने नहीं जाती थी।
वह वहाँ कुछ देर ठहरती,उसी शेल्फ़ के सामने,उसी जगह।
जहाँ कभी उसका पुराना पत्र छूट गया था।
कभी-कभी उसे लगता, नियति मनुष्य के जीवन में घटनाएँ नहीं भेजती।
वह केवल एक काग़ज़ गिरा देती है।बाक़ी कहानी मनुष्य स्वयं लिखता है।
मई की एक शाम अन्विता ने समर को एक प्रश्न भेजा.......सिर्फ़ एक प्रश्न।
"अगर तुम्हें अपने जीवन का एक दिन दोबारा जीने का अवसर मिले,
तो तुम कौन-सा दिन चुनोगे?"
समर ने पत्र पढ़ा।
और अचानक उसकी आँखें भर आईं।
क्योंकि आज पहली बार उसे एहसास हुआ,उसके पास ऐसा कोई दिन नहीं था जिसे वह दोबारा जीना चाहता है।
लेकिन उसके जीवन में बहुत-से ऐसे दिन थे जिन्हें वह बदल देना चाहता था।
और शायद यही अंतर था,सुखी और दुखी लोगों के बीच।
उस रात उसने उत्तर नहीं लिखा।वह केवल खिड़की के पास बैठा रहा।
बाहर आधा चाँद था,कमरे में मौन था।
और उसके भीतर पहली बार एक असंभव इच्छा जन्म ले रही थी.......
वह अन्विता को देखना चाहता था,केवल एक बार।
बस इतना जानने के लिए कि जिन शब्दों ने उसके भीतर इतना घर बना लिया है...
उनकी आँखें कैसी होंगी...?
समर ने अन्विता के प्रश्न का उत्तर पूरे सात दिन बाद लिखा।
सात दिन तक वह उस एक वाक्य के साथ जीता रहा,
"अगर तुम्हें अपने जीवन का एक दिन दोबारा जीने का अवसर मिले, तो तुम कौन-सा दिन चुनोगे?"
पहले उसे लगा, ऐसा कोई दिन नहीं है।
फिर उसे समझ आया कि ऐसा कोई दिन नहीं है क्योंकि वह उस दिन को याद नहीं करना चाहता।
कुछ स्मृतियाँ अलमारी में बंद रखी जाती हैं।
इसलिए नहीं कि वे महत्वहीन होती हैं।
बल्कि इसलिए कि वे इतनी महत्वपूर्ण होती हैं कि उन्हें छूते ही भीतर कुछ टूटने लगता है।
उसने उत्तर लिखा.......
"मैं अपने जीवन का कोई सुखद दिन दोबारा नहीं जीना चाहता।
मैं उस दिन में लौटना चाहता हूँ जब मेरी माँ ने आख़िरी बार मेरा माथा चूमा था।
उस समय मुझे नहीं पता था, कि वह आख़िरी बार है।
शायद जीवन का सबसे बड़ा दुख यही है......हम विदाइयों को विदाई की तरह नहीं जीते।
वे जब घट रही होती हैं, तब हमें उनके महत्व का पता ही नहीं होता।"
पत्र लिखकर समर बहुत देर तक चुप बैठा रहा।
उसे लगा जैसे उसने वर्षों बाद किसी बंद कमरे की खिड़की खोली हो।
अन्विता का उत्तर इस बार जल्दी आया।
लेकिन वह उत्तर नहीं था।वह स्वीकारोक्ति थी।
"मेरे पिता को किताबें बहुत पसंद थीं।
जब मैं छोटी थी, वे हर रविवार मुझे पुस्तकालय ले जाते थे।
मुझे लगता था कि संसार की सबसे सुरक्षित जगह पुस्तकालय होती है।
फिर एक दिन वे चले गए।और उसके बाद मैंने जाना कि संसार में कोई जगह सुरक्षित नहीं होती।
न घर....न रिश्ते.....न मनुष्य।"
समर पढ़ता गया।
"पिता की मृत्यु के बाद मैंने वर्षों तक किसी से कोई अपेक्षा नहीं रखी।
अपेक्षाएँ दुख की जननी होती हैं।और मैं दुख से थक चुकी थी।"
पत्र यहीं समाप्त हो गया।
लेकिन समर जान गया कि यह अंत नहीं था।
कुछ बातें लिख दी जाती हैं।
कुछ पंक्तियों के बीच छूट जाती हैं।
और असली कहानी अक्सर उन्हीं छूटे हुए स्थानों में रहती है।
जून की शुरुआत में बारिश आ गई।
पहली बारिश हमेशा शहर को नहीं, स्मृतियों को भिगोती है।
उस शाम समर दुकान पहुँचा तो शेल्फ़ में पत्र नहीं था।
वह कुछ क्षण वहीं खड़ा रहा,फिर मुस्कराकर लौटने लगा।
तभी उसकी नज़र एक किताब पर पड़ी....पुरानी जिल्द.....धूल से भरी।और उसके भीतर एक काग़ज़ का कोना झाँक रहा था।
समर का दिल धड़क उठा।उसने किताब खोली।
पत्र था,लेकिन इस बार उसके साथ कुछ और भी था।
एक सूखा हुआ गुलमोहर का फूल।
पत्र में लिखा था......
"जब मैं उदास होती हूँ तो फूल किताबों में रख देती हूँ।
मुझे लगता है कि किताबें चीज़ों को मरने नहीं देतीं।
वे उन्हें स्मृति में बदल देती हैं।
यह फूल मेरे घर के बाहर वाले पेड़ का है।
अब यह तुम्हारे पास रहेगा।"
समर ने फूल को हथेली पर रख लिया।
वह वर्षों से सूखा हुआ था।
फिर भी उसके भीतर न जाने कैसी गर्माहट थी।
जैसे किसी ने पहली बार अपने जीवन की कोई वस्तु उसके साथ साझा की हो।
उस रात वह बहुत देर तक उस फूल को देखता रहा।
और उसे एहसास हुआ,वह अब केवल पत्रों की प्रतीक्षा नहीं करता।वह अन्विता की प्रतीक्षा करता है।
लेकिन प्रेम जब जन्म लेता है, उसी समय भय भी जन्म लेता है।
कुछ दिनों बाद समर ने एक पत्र लिखा।
और लिखकर फाड़ दिया।
उसमें उसने पूछा था,"क्या तुम विवाहित हो?"
वह प्रश्न उसके भीतर बहुत दिनों से था।
लेकिन उसने उसे भेजा नहीं।
क्योंकि कुछ उत्तर मनुष्य सुनना नहीं चाहता।
और कुछ प्रश्न पूछने का साहस नहीं कर पाता।
उधर अन्विता भी एक ऐसे मोड़ पर पहुँच चुकी थी जहाँ लौटना कठिन था।
एक शाम उसने अपनी अलमारी से पुराने काग़ज़ निकाले।उनमें डायरी थी,पुरानी तस्वीरें थीं,और एक विवाह-एल्बम भी।
वह बहुत देर तक उसे देखती रही।फिर धीरे से बंद कर दिया।
कुछ तस्वीरें केवल यह याद दिलाने के लिए होती हैं कि जीवन हमेशा वैसा नहीं हुआ जैसा हमने सोचा था।
उसने उसी रात समर को लिखा....
"क्या तुम्हें कभी ऐसा लगा है कि हम जिन लोगों के साथ रहते हैं, वे हमेशा वे लोग नहीं होते जिनके साथ हम अपना जीवन बिताना चाहते थे?"
पत्र लिखने के बाद बहुत देर तक वह उसे देखती रही।
फिर उसे डर लगा।कहीं वह बहुत कुछ तो नहीं कह रही?
कहीं वह उस सीमा को तो नहीं पार कर रही जिसके बाद लौटना संभव नहीं होता?
समर ने वह पत्र अगले दिन पढ़ा।
और उसे लगा कि अन्विता के जीवन में कोई ऐसा दुख है जिसके बारे में उसने अब तक कुछ नहीं कहा।
एक ऐसा कमरा, जिसका दरवाज़ा अब तक बंद था।
और वह जानता था,जब कोई मनुष्य अपने भीतर का सबसे बंद कमरा खोलता है...तो या तो प्रेम जन्म लेता है,या फिर विनाश।
कभी-कभी दोनों साथ-साथ।
उस रात समर ने डायरी में केवल एक पंक्ति लिखी,
"मैं तुम्हारे बारे में जितना जानता जा रहा हूँ,उतना ही तुम्हें खोने से डरने लगा हूँ।"
और उसे नहीं पता था कि नियति ने उसी क्षण उनके लिए एक ऐसी राह चुन ली है...जहाँ प्रेम होगा,
लेकिन उसके साथ चलती हुई एक लंबी, अटल विदाई भी।
कुछ प्रेम अपने नाम नहीं बताते,बेनाम होते हैं और यक़ीनन वे सबसे गहरे होते हैं।
बरसात अब पूरे शहर पर उतर आई थी।
खिड़कियों पर पानी की महीन रेखाएँ खिंची रहतीं और शामें जल्दी अँधेरी हो जातीं।समर को बरसात हमेशा से पसंद थी।
लेकिन इस वर्ष बारिश अलग थी।
इस बार हर बारिश के साथ उसे किसी पत्र की प्रतीक्षा रहती।
किसी अजनबी की लिखावट की।
किसी ऐसे व्यक्ति की उपस्थिति की, जिसे उसने कभी देखा नहीं था।
एक दिन अन्विता का पत्र आया।बहुत छोटा,असामान्य रूप से छोटा।
उसमें केवल लिखा था......
"क्या तुम्हें कभी किसी ऐसे व्यक्ति से प्रेम हुआ है, जिसे तुम पा नहीं सकते थे?"
समर बहुत देर तक उस वाक्य को देखता रहा।
बार-बार....मानो वह कोई प्रश्न नहीं, दर्पण हो।
जिसमें उसे अपना चेहरा दिखाई दे रहा हो।
उसने उत्तर उसी रात लिखा।"नहीं.....
क्योंकि जिन लोगों से मुझे प्रेम हुआ, उन्हें पाने की कोशिश करने से पहले ही मैं उनसे दूर चला गया।
शायद मुझे अस्वीकार किए जाने से अधिक, किसी को खो देने का भय था।
इसलिए मैंने प्रेम से नहीं,प्रेम की संभावना से दूरी बनाई।"
पत्र पूरा करने के बाद उसने लंबे समय तक कलम हाथ में पकड़े रखी।
फिर नीचे एक पंक्ति और जोड़ दी"और तुम?"
उत्तर आने में बारह दिन लगे।बारह दिन........और वे बारह दिन समर ने किसी बीमार आदमी की तरह बिताए।
जिसे हर सुबह किसी रिपोर्ट का इंतज़ार हो।
जब उत्तर आया तो उसमें पहली बार अन्विता ने अपने बारे में कुछ कहा।
वास्तव में कहा....."हाँ।
मुझे प्रेम हुआ था,बहुत वर्षों पहले।
इतना कि उस समय मुझे लगता था संसार में प्रेम के अतिरिक्त कुछ भी महत्वपूर्ण नहीं है।
फिर जीवन ने मुझे समझाया कि प्रेम महत्वपूर्ण हो सकता है,
लेकिन पर्याप्त नहीं।"
समर की साँस जैसे थम गई।वह आगे पढ़ने लगा।
"हम अलग हो गए।
कोई नाटकीय कारण नहीं था,कोई विश्वासघात नहीं,कोई धोखा नहीं,बस जीवन था।परिवार थे।ज़िम्मेदारियाँ थीं।
और वे रास्ते थे जो हमें अलग दिशाओं में ले गए।"
पत्र यहीं समाप्त नहीं हुआ था।
सबसे कठिन हिस्सा अभी बाकी था।
"कभी-कभी मुझे लगता है कि मैंने उसे नहीं खोया।
मैंने उस स्त्री को खोया जो उसके साथ होती।"
समर ने पत्र मेज़ पर रख दिया।
उसके भीतर एक अजीब-सा शून्य फैल गया।
क्योंकि अब उसे एहसास हुआ कि वह और अन्विता एक-दूसरे को केवल जान नहीं रहे थे।वे एक-दूसरे के घावों को पहचान रहे थे।
उस रात उसने कोई उत्तर नहीं लिखा।वह शहर की सड़कों पर बहुत देर तक चलता रहा,बारिश रुक चुकी थी.....पेड़ों से बूंदें गिर रही थीं....सड़कें खाली थीं।
और अचानक उसे महसूस हुआ,
वह अन्विता से प्रेम करने लगा है।
यह स्वीकार करने में उसे कई सप्ताह लगे थे।
लेकिन सत्य वही था।
वह उस स्त्री से प्रेम करने लगा था जिसका चेहरा उसने नहीं देखा था।जिसकी आवाज़ उसने नहीं सुनी थी।जिसका नाम तक उसे नहीं मालूम था।उसी रात उसने पहली बार एक भयावह बात सोची।
अगर यह सब अचानक समाप्त हो गया तो?
अगर किसी दिन कोई पत्र न आया तो?
अगर वह दुकान जाना बंद कर दे?
अगर वह शहर छोड़ दे?
अगर...
अगर वह इस दुनिया में ही न रहे?
प्रेम का सबसे बड़ा दुख बिछड़ना नहीं होता।
प्रेम का सबसे बड़ा दुख है,
उस व्यक्ति के खो जाने की कल्पना।