किसी-किसी रात समय सो जाता है।घड़ी चलती रहती है, रात आगे बढ़ती रहती है, लेकिन भीतर कहीं सब कुछ ठहर जाता है।उस रात समर के साथ भी यही हुआ।
पत्र लिखने के बाद वह देर तक मेज़ पर बैठा रहा। कमरे में पीली रोशनी थी और उसके सामने खुली डायरी।
वह कई वर्षों से लिख रहा था।
लेख, टिप्पणियाँ, किताबों पर समीक्षाएँ, अधूरे उपन्यास।
लेकिन उस रात जो लिखा गया था, वह साहित्य नहीं था।
वह किसी ऐसे व्यक्ति से संवाद था जो अस्तित्व में भी हो सकता था और नहीं भी।
अगली सुबह उसने वह पत्र एक भूरे लिफाफे में रखा।
ऊपर केवल दो शब्द लिखे,"उसके लिए।"
फिर वह उसी पुरानी किताबों की दुकान पर गया जहाँ उसे वह पत्र मिला था।
दुकान शहर के सबसे पुराने हिस्से में थी।
संकरी गलियाँ, जर्जर इमारतें और समय की थकी हुई चाल,दुकान के मालिक, वृद्ध मोहनलाल जी, हमेशा की तरह लकड़ी की कुर्सी पर बैठे अख़बार पढ़ रहे थे।
समर कुछ देर किताबें देखता रहा।
फिर चुपके से वह लिफाफा उसी शेल्फ़ में रख आया, जहाँ से उसे वह पत्र मिला था।
उसे स्वयं अपनी हरकत बचकानी लगी।
लेकिन न जाने क्यों, वह मुस्कुरा रहा था।
जैसे उसने किसी अजनबी के दरवाज़े पर दस्तक दी हो।
तीन सप्ताह बीत गए......
फिर एक महीना.....
फिर दो....
समर लगभग भूल ही गया था कि उसने कोई पत्र रखा था।
मार्च की एक दोपहर वह फिर उसी दुकान में पहुँचा।
बाहर हल्की बारिश हो रही थी।
किताबों की सुगंध आज और गहरी थी।
वह अनायास उसी शेल्फ़ की ओर बढ़ गया।
और फिर...
उसका हाथ अचानक रुक गया।
वहाँ एक सफ़ेद लिफाफा रखा था,ठीक उसी जगह।
जहाँ उसने अपना पत्र छोड़ा था।
उसका दिल अजीब तरह से धड़कने लगा।
उसने काँपते हाथों से लिफाफा उठाया।
ऊपर लिखा था......"जिसने उत्तर लिखा था, उसके लिए।"
बस इतना.... फिर न नाम.....न पहचान......कुछ नहीं।
समर ने लिफाफा वहीं नहीं खोला।वह उसे लेकर बाहर निकल आया।बारिश अब तेज़ हो चुकी थी।सड़क के उस पार एक पुरानी चाय की दुकान थी।वह वहाँ जाकर बैठ गया।फिर धीरे-धीरे पत्र खोला।भीतर केवल एक पन्ना था।
और उस पर लिखा था,
"तुमने पूछा था कि मैंने वह पत्र क्यों लिखा?
सच कहूँ तो मुझे स्वयं याद नहीं।
मनुष्य अपने सबसे सच्चे वाक्य अक्सर उस समय लिखता है जब वह टूट रहा होता है।
बाद में वह स्वयं भी भूल जाता है कि उसने ऐसा क्यों कहा था।
लेकिन तुम्हारा पत्र पढ़कर लगा कि शायद वह लड़की अब भी मेरे भीतर कहीं जीवित है।
धन्यवाद।
बहुत वर्षों बाद किसी ने उसकी आवाज़ सुनी।"
समर बहुत देर तक उस पन्ने को देखता रहा।
बारिश की बूंदें दुकान की टीन की छत पर गिर रही थीं।
चाय ठंडी हो गई थी।
लेकिन उसके भीतर जैसे कोई बहुत पुराना कमरा खुल गया था।
वह स्त्री जीवित थी।
वह कहीं थी।
और उसने उत्तर दिया था।
उस रात समर ने कोई पत्र नहीं लिखा।
वह बस खिड़की के पास बैठा रहा।
उसे पहली बार एहसास हुआ कि प्रेम हमेशा किसी व्यक्ति से शुरू नहीं होता।
कभी-कभी वह एक आवाज़ से शुरू होता है।
कभी एक वाक्य से।
कभी किसी ऐसे दुख से, जो अपना नहीं होता, फिर भी अपना लगने लगता है।
रात के अंतिम पहर उसने डायरी खोली।
और केवल एक पंक्ति लिखी,
"मुझे तुम्हारा चेहरा नहीं जानना।
मुझे डर है कि कहीं चेहरा जान लेने से तुम्हारी आवाज़ खो न जाए।"
उधर, शहर के दूसरे छोर पर...
अन्विता अपनी बालकनी में बैठी थी।
सामने बारिश में भीगता अमलतास का पेड़ था।
उसकी गोद में वही पत्र रखा था।
समर का पहला पत्र।
वह उसे कई बार पढ़ चुकी थी।
फिर भी हर बार ऐसा लगता जैसे कोई उसके भीतर की धूल झाड़ रहा हो।
उसने जीवन में बहुत लोगों से बातें की थीं।
पर शायद पहली बार कोई ऐसा मिला था जो उसके उत्तरों से अधिक उसकी चुप्पियों को पढ़ रहा था।
और यह बात उसे भयभीत भी कर रही थी।
क्योंकि मनुष्य उन लोगों से नहीं डरता जो उसे नहीं समझते।
वह उनसे डरता है जो उसे बहुत गहराई से समझ लेते हैं।
अन्विता ने आँखें बंद कर लीं।
उसे नहीं मालूम था कि यह खेल कहाँ जाकर रुकेगा।
लेकिन पहली बार उसे प्रतीक्षा होने लगी थी।
किसी व्यक्ति की नहीं।
एक पत्र की।
और कई बार यही सबसे ख़तरनाक शुरुआत होती है।