Money Vs Me - Part 18 fiza saifi द्वारा मानवीय विज्ञान में हिंदी पीडीएफ

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Money Vs Me - Part 18

इस हिस्से को मैं आपकी कहानी के मूल भाव को रखते हुए थोड़ा अधिक उपन्यासात्मक, सहज और रहस्य पैदा करने वाले अंदाज़ में लिख रहा हूँ, ताकि आगे आने वाला ट्विस्ट और मजबूत लगे।

मैं धीरे-धीरे ऑफिस का सारा काम सीखता जा रहा था। अब ज्यादातर समय ठाकुर साहब के साथ ही बीतने लगा था। शायद ही कोई मीटिंग ऐसी होती, जिसमें वो मुझे अपने साथ न ले जाते। चाहे वो कोई ऑफिशियल मीटिंग हो, बिजनेस से जुड़ी कोई मुलाकात हो या फिर उनकी निजी जिंदगी से जुड़ा कोई मामला—हर जगह मैं उनके साथ रहने लगा था।

धीरे-धीरे उन्होंने अपने बिजनेस के साथ-साथ अपनी निजी जिंदगी के कई राज़ और फैसले भी मेरे साथ साझा करने शुरू कर दिए थे।

कई बार मुझे लगता, जैसे उन्हें किसी ऐसे इंसान की बहुत जरूरत थी, जो उनके साथ कदम से कदम मिलाकर चल सके। कोई ऐसा, जिससे वो बिना किसी झिझक के हर बात कर सकें और जिस पर उन्हें पूरा भरोसा हो।

उनका परिवार अमेरिका में सेटल था।

उनका बेटा इंजीनियरिंग की पढ़ाई पूरी करने के बाद वहीं अपना घर बसा चुका था। उनकी पत्नी और बेटी भी अमेरिका में ही रहती थीं। कभी-कभी हफ्ते में एक बार उनका बेटा फोन करके हाल-चाल पूछ लेता था या ठाकुर साहब खुद उसे फोन कर लेते थे।

बस इतना ही।

इसके अलावा मैंने उन्हें कभी अपने परिवार के साथ ज्यादा जुड़े हुए नहीं देखा।

शुरुआत में मुझे यह बात थोड़ी अजीब लगती थी।

आखिर एक इतना बड़ा बिजनेसमैन, जिसके पास करोड़ों की दौलत थी, जिसके पास इतना बड़ा कारोबार और इतनी बड़ी जायदाद थी… उसका अपना परिवार उससे इतना दूर कैसे रह सकता था?

कभी-कभी मैं मज़ाक में उनसे पूछ भी लेता—

“ठाकुर साहब, आप कभी अमेरिका जाने के बारे में नहीं सोचते?”

वो हल्का-सा मुस्कुरा देते।

“सोचा तो बहुत बार है, शितिज… लेकिन कुछ लोग अपनी बनाई हुई दुनिया छोड़कर कहीं और बस नहीं पाते।”

उस समय मुझे उनकी बात सामान्य लगी थी।

मुझे क्या पता था कि उस एक वाक्य के पीछे उनकी जिंदगी का ऐसा सच छिपा हुआ था, जो आने वाले दिनों में मेरी पूरी जिंदगी बदल देने वाला था।

ठाकुर साहब का बिजनेस यहाँ बहुत बड़े स्तर पर फैला हुआ था। कई कंपनियाँ, कई प्रोजेक्ट और शहर के बड़े-बड़े लोगों से उनके संबंध थे।

उनके पास यहाँ सब कुछ था।

दौलत, शोहरत, ताकत और लोगों पर असर।

बस परिवार नहीं था।

और शायद इसी खालीपन को भरने के लिए उन्होंने मुझे अपने इतना करीब कर लिया था।

धीरे-धीरे मुझे ऐसा लगने लगा था कि मैं उनके लिए सिर्फ एक कर्मचारी नहीं रहा।

मैं उनका भरोसेमंद आदमी बन चुका था।

उनका साथी।

उनका राजदार।

और शायद…

उनका अगला वारिस भी।

लेकिन एक सवाल हमेशा मेरे मन के किसी कोने में दबा रहता था—

अगर उनका बेटा अमेरिका में ही रहना चाहता था, तो ठाकुर साहब मुझे अपने इतना करीब क्यों ला रहे थे?

उस वक्त मेरे पास इस सवाल का कोई जवाब नहीं था।

और शायद सच सामने आने में अभी थोड़ा वक्त बाकी था।

हाँ, यहाँ से कहानी में धीरे-धीरे असली खतरा सामने आना बेहतर रहेगा—सीधे ठाकुर साहब को खलनायक बनाने के बजाय शितिज को छोटी-छोटी अजीब घटनाओं से शक होना चाहिए।

सब कुछ ठीक चल रहा था।

कम से कम बाहर से तो ऐसा ही लगता था।

मैं ऑफिस का काम अच्छी तरह समझने लगा था। ठाकुर साहब का भरोसा मुझ पर लगातार बढ़ता जा रहा था और अब कई बड़े फैसलों में मेरी राय भी ली जाने लगी थी। बंगले में भी मेरी जिंदगी आराम से गुजर रही थी।

लेकिन एक चीज़ बदलने लगी थी।

मैंने धीरे-धीरे महसूस करना शुरू किया कि ठाकुर साहब का ऑफिस और घर जितना बाहर से सामान्य दिखाई देता है, अंदर से उतना सामान्य बिल्कुल नहीं है।

शुरुआत छोटी-छोटी बातों से हुई।

ऑफिस में कुछ फाइलें ऐसी थीं, जिन्हें देखने की मुझे इजाज़त नहीं थी। जबकि उन्हीं फाइलों से जुड़े फैसले अक्सर मेरे सामने किए जाते थे।

कई बार ठाकुर साहब मीटिंग के बीच अचानक कोई बात रोक देते और कहते—

“इस हिस्से को तुम भूल जाओ, शितिज।”

मैं हँसकर बात टाल देता।

लेकिन सवाल मेरे दिमाग में रह जाता।

ऐसा ही बंगले में भी होने लगा।

कुछ कमरे ऐसे थे, जिनके दरवाज़े हमेशा बंद रहते थे। वहाँ जाने की इजाज़त किसी नौकर तक को नहीं थी।

एक रात मैंने देखा कि आधी रात के बाद भी ठाकुर साहब अपने कमरे से बाहर निकले और सीधे बंगले के पीछे बने पुराने हिस्से की तरफ चले गए।

मैंने दूर से उन्हें देखा।

उनके हाथ में एक काला बैग था।

मैं कुछ पूछ पाता, उससे पहले वो अंधेरे में गायब हो गए।

अगली सुबह मैंने सविता से उस हिस्से के बारे में पूछा।

वो कुछ पल चुप रही।

फिर बोली—

“साहब, आपको जितना जानना जरूरी है, उतना ही जानिए।”

उसका जवाब मुझे बिल्कुल अच्छा नहीं लगा।

“मतलब?”

“कुछ नहीं।”

वो जल्दी से वहाँ से चली गई।

अब मेरे मन में शक पैदा हो चुका था।

और उसी दिन ऑफिस में एक और अजीब घटना हुई।

मैं ठाकुर साहब के केबिन में बैठकर कुछ पुराने कागज देख रहा था। तभी एक फाइल नीचे गिर गई।

फाइल खुली तो उसके अंदर कई कागज बिखर गए।

मैं उन्हें समेट ही रहा था कि मेरी नजर एक नाम पर पड़ी।

विक्रम सिंह।

नाम जाना-पहचाना लगा।

मैंने कुछ देर सोचने के बाद याद किया।

विक्रम सिंह ठाकुर साहब के पुराने बिजनेस पार्टनर थे।

मैंने उनके बारे में पहले भी सुना था।

लेकिन फाइल में उनके नाम के आगे कुछ ऐसा लिखा था, जिसे देखकर मेरे हाथ रुक गए।

“कंपनी से स्थायी रूप से हटाया गया।”

नीचे तारीख थी।

करीब सात साल पुरानी।

मैंने आगे पढ़ना चाहा ही था कि अचानक पीछे से आवाज़ आई—

“वो फाइल तुम्हें किसने दी?”

मैंने पलटकर देखा।

ठाकुर साहब दरवाज़े पर खड़े थे।

उनका चेहरा बिल्कुल शांत था।

लेकिन उनकी आँखों में पहली बार मुझे गुस्सा दिखाई दिया।

“गलती से नीचे गिर गई थी।”

मैंने फाइल बंद करते हुए कहा।

वो धीरे-धीरे मेरी तरफ आए और फाइल मेरे हाथ से ले ली।

“कुछ फाइलें ऐसी होती हैं, शितिज, जिन्हें जितना कम पढ़ो उतना अच्छा होता है।”

मैं मुस्कुराया।

“जी।”

उन्होंने भी मुस्कुराने की कोशिश की।

लेकिन उस दिन पहली बार मुझे उनकी मुस्कान नकली लगी।

उस शाम मैं बंगले पर वापस आया तो सविता ने मुझे रोक लिया।

“साहब…”

मैंने उसकी तरफ देखा।

वो कुछ कहना चाहती थी लेकिन हिचक रही थी।

“क्या हुआ?”

उसने धीरे से कहा—

“आज रात अगर ठाकुर साहब आपको कहीं बुलाएँ… तो अकेले मत जाइएगा।”

मेरे शरीर में सिहरन दौड़ गई।

“क्यों?”

सविता ने मेरी आँखों में देखा।

उसकी आवाज़ बहुत धीमी थी।

“क्योंकि पिछले तीन साल में जो भी आदमी ठाकुर साहब के बहुत करीब आया है… वो ज्यादा दिन तक यहाँ नहीं रहा।”

मैं कुछ बोल पाता, उससे पहले वो वहाँ से चली गई।

मैं वहीं खड़ा रह गया।

उस रात पहली बार मुझे अपने कमरे की दीवारें भी अजीब लगने लगीं।

मैंने दरवाज़ा बंद किया।

खिड़की के पर्दे लगाए।

और बिस्तर पर बैठकर दिनभर की सारी घटनाओं के बारे में सोचने लगा।

विक्रम सिंह…

बंद कमरे…

रात में ठाकुर साहब का गायब होना…

सविता की चेतावनी…

और वो फाइलें, जिन्हें मुझसे छिपाया जा रहा था।

एक-एक करके सारी बातें जुड़ने लगी थीं।

लेकिन सबसे डरावनी बात अभी बाकी थी।

करीब रात के दो बजे मेरे कमरे के बाहर किसी के कदमों की आवाज़ आई।

मैं तुरंत उठकर बैठ गया।

कदम मेरे दरवाज़े के ठीक बाहर आकर रुक गए।

कुछ सेकंड तक खामोशी रही।

फिर किसी ने धीरे से दरवाज़े के हैंडल को घुमाया।

मैंने सांस रोक ली।

हैंडल दोबारा घूमा।

इस बार थोड़ा जोर से।

और तभी बाहर से एक धीमी आवाज़ आई—

“शितिज… दरवाज़ा खोलो।”

मैंने आवाज़ पहचान ली।

ठाकुर साहब थे।

लेकिन उनकी आवाज़ में आज वो अपनापन नहीं था, जिसे मैं इतने दिनों से सुनता आया था।

उस आवाज़ में आदेश था।

और उसके पीछे…

एक अजीब-सा खतरा।

इस हिस्से में मैंने हिंसा को बहुत ग्राफ़िक किए बिना तनाव, सदमे और ठाकुर साहब के असली रूप पर ज़्यादा फोकस रखा है, ताकि शितिज का डर और आगे का ट्विस्ट मजबूत हो।

मैंने धीरे से दरवाज़ा खोला।

ठाकुर साहब सामने खड़े थे।

उन्होंने बिना कुछ कहे बस मुझे अपने साथ आने का इशारा किया। मैं कुछ पूछ पाता, उससे पहले ही वो मुड़कर आगे बढ़ गए।

मैं भी उनके पीछे चल पड़ा।

बाहर गाड़ी पहले से तैयार खड़ी थी। ड्राइवर अपनी सीट पर बैठा इंतज़ार कर रहा था, जैसे उसे पहले से ही पता हो कि हमें कहाँ जाना है।

ठाकुर साहब चुपचाप गाड़ी में बैठे और मैं उनके बगल में बैठ गया।

कुछ ही पल बाद गाड़ी बंगले से निकलकर एक अनजान दिशा में बढ़ने लगी।

पूरे रास्ते ठाकुर साहब ने एक शब्द तक नहीं कहा।

मैंने कई बार उनकी तरफ देखा, लेकिन उनके चेहरे पर कोई भाव नहीं था।

करीब आधे घंटे बाद गाड़ी एक सुनसान इलाके में जाकर रुकी।

सामने एक पुरानी-सी फैक्ट्री थी। बाहर से देखकर लग रहा था कि शायद कभी यहाँ कोई गोदाम हुआ करता होगा।

गाड़ी से उतरते ही ठाकुर साहब आगे बढ़ गए।

मैं मजबूरी में उनके पीछे चल पड़ा।

हम एक लंबे और सुनसान रास्ते से होकर अंदर गए। रास्ते के दोनों तरफ पुराने कमरे और जंग लगी मशीनें पड़ी थीं। हर कदम के साथ मेरे मन में बेचैनी बढ़ती जा रही थी।

कुछ देर बाद हम एक बड़े से खुले मैदान में पहुँच गए।

मैंने चारों तरफ देखा।

रात के उस सन्नाटे में वहाँ का माहौल बेहद डरावना लग रहा था।

मेरे मन में सवाल उठ रहा था—

आखिर ठाकुर साहब मुझे इतनी रात को यहाँ क्यों लेकर आए हैं?

लेकिन मेरे इस सवाल का जवाब मुझे अगले ही पल मिल गया।

मैदान के बीचोंबीच एक आदमी कुर्सी से बंधा हुआ था।

उसके आसपास तीन-चार गार्ड खड़े थे।

मेरी नजर जैसे ही उस आदमी के चेहरे पर पड़ी, मेरे पैरों तले जमीन खिसक गई।

मैं उसे पहचानता था।

वो कश्यप था।

ठाकुर साहब का बिजनेस पार्टनर।

उसके हाथ-पैर कुर्सी से बंधे थे और मुँह पर कपड़ा बंधा हुआ था।

मेरे अंदर जैसे कुछ जम गया।

मैंने ठाकुर साहब की तरफ देखा।

वो बिल्कुल शांत खड़े थे।

इतने शांत कि उनकी शांति ही डर पैदा कर रही थी।

उन्होंने एक गार्ड की तरफ देखा।

“इसका मुँह खोलो।”

गार्ड आगे बढ़ा और कश्यप के मुँह से कपड़ा हटा दिया।

कश्यप ने जैसे ही ठाकुर साहब को देखा, उसके चेहरे पर डर साफ दिखाई देने लगा।

“ठाकुर साहब… मेरी बात सुनिए…”

ठाकुर साहब धीरे-धीरे उसके पास गए।

उन्होंने अपनी जेब से पिस्तौल निकाली और कश्यप की ठोड़ी के नीचे लगाकर उसका चेहरा ऊपर उठा दिया।

मेरी सांस जैसे वहीं अटक गई।

“क्यों कश्यप?”

ठाकुर साहब की आवाज़ बेहद शांत थी।

“तुझे क्या लगा था? ठाकुर उदय प्रताप को धोखा देना इतना आसान है?”

कश्यप काँप रहा था।

ठाकुर साहब की आँखों में एक अजीब-सी चमक थी।

“मेरे बिजनेस और मेरी साझेदारी का फायदा उठाकर मेरे दुश्मनों से हाथ मिलाएगा… और मैं देखता रहूँगा?”

“नहीं साहब… मुझे माफ कर दीजिए।”

कश्यप लगभग रो पड़ा।

“मैं ऐसा नहीं करना चाहता था। आपकी जो फॉरेन वाली डील कैंसिल हुई है, उसमें मेरा कोई हाथ नहीं है। मैं सच कह रहा हूँ। मुझे छोड़ दीजिए साहब।”

वो किसी तरह कुर्सी से झुककर ठाकुर साहब के पैरों तक पहुँचने की कोशिश करने लगा।

लेकिन ठाकुर साहब के चेहरे पर कोई नरमी नहीं आई।

मैंने पहली बार उन्हें इस रूप में देखा था।

वो आदमी, जो मेरे सामने हमेशा मुस्कुराकर बात करता था।

जो मुझे अपना बेटा कहता था।

जो मुझे अपने बराबर बैठाता था।

आज वही आदमी मेरे सामने एक ऐसे इंसान की तरह खड़ा था, जिसके भीतर किसी के लिए जरा भी रहम नहीं था।

अचानक एक तेज़ आवाज़ हुई।

मैं बुरी तरह चौंक गया।

कश्यप का शरीर कुर्सी पर ही ढीला पड़ गया।

कुछ सेकंड के लिए पूरा मैदान बिल्कुल शांत हो गया।

मैं वहीं खड़ा रह गया।

मेरे हाथ-पैर सुन्न पड़ चुके थे।

मैं समझ ही नहीं पा रहा था कि अभी मेरे सामने क्या हो गया।

ठाकुर साहब ने पिस्तौल वापस अपनी जेब में रखी और मेरी तरफ देखा।

हमारी नजरें मिलीं।

उनके चेहरे पर अब भी वही शांति थी।

जैसे कुछ हुआ ही न हो।

लेकिन मेरे लिए सब कुछ बदल चुका था।

जिस आदमी को मैं अपना रहनुमा समझ रहा था…

जिसके साथ अपनी जिंदगी का भविष्य देख रहा था…

उसका एक ऐसा चेहरा आज मेरे सामने था, जिसके बारे में मैंने कभी सपने में भी नहीं सोचा था।

मेरे दिमाग में एक ही सवाल गूंज रहा था—

अगर कश्यप के साथ ये हुआ है, तो कल मेरी बारी कब आएगी?

ठाकुर साहब मेरी तरफ बढ़े।

“चलो, शितिज।”

मेरे होंठ सूख चुके थे।

मैंने किसी तरह सिर हिला दिया।

लेकिन उस रात गाड़ी में बैठते समय मैं पहले वाला शितिज नहीं था।

मेरे मन में अब दौलत का सपना नहीं था।

बंगले की चमक नहीं थी।

ठाकुर साहब का दिया हुआ भरोसा नहीं था।

सिर्फ एक डर था—

मैं जिस आदमी को अपना सबसे बड़ा सहारा समझ रहा था, शायद वही मेरी जिंदगी का सबसे बड़ा खतरा था।