ठाकुर साहब से मिलकर मुझे लगा जैसे मैं अपनी मंज़िल की पहली सीढ़ी चढ़ चुका हूँ। सीढ़ी इसलिए कहा, क्योंकि किसी की नौकरी करना मेरा सपना नहीं था। जो ठाठ की ज़िंदगी मैं जीना चाहता था, वह किसी की नौकरी करके तो मिलने वाली नहीं थी। असली मज़ा तो उस दिन आने वाला था, जब ठाकुर साहब अपना सब कुछ मुझे सौंपकर खुद किनारे हो जाएंगे। मैंने उसी दिन से उस दिन का इंतज़ार शुरू कर दिया था।
कॉल सेंटर में किसी को बताना इतना ज़रूरी नहीं था। छोटी-सी नौकरी छोड़ना भी कोई इतना मुश्किल काम नहीं था। न किसी फॉर्मेलिटी के चक्कर में पड़ा, न इस्तीफ़ा देने के। बस ज़रूरत का थोड़ा-सा सामान लिया और अपने रूममेट अजय को बता दिया।
“मैं अब से अपने एक रिश्तेदार के साथ रहूँगा। कल से काम पर भी नहीं आऊँगा… कुछ पर्सनल इमरजेंसी है।”
वह थोड़ा हैरान हुआ, फिर बेचारा मुझे तसल्ली देने लगा।
“कोई बात नहीं शितिज, तुम अपना ध्यान रखना। किसी चीज़ की ज़रूरत हो तो कॉन्टैक्ट कर लेना।”
न जाने उसने मेरी बात से क्या समझा था। मैं बस मुस्कुरा दिया और वहाँ से निकल गया।
अगले दिन अपना बैग लेकर मैं ठाकुर साहब के बंगले पर शिफ्ट हो गया।
मुख्य गेट पर वही गार्ड मौजूद था। उसने मुझे देखते ही पहचान लिया, लेकिन उसके साथ एक दूसरा गार्ड भी खड़ा था, जो उस दिन छुट्टी पर था। उसने अपना डंडा मेरे सामने करते हुए बड़ी बदतमीज़ी से मुझे रोक लिया।
“किससे मिलना है भाई? कौन हो तुम?”
मैं कुछ कह पाता, उससे पहले ही गिरीश ने उसे पीछे हटा दिया।
“अरे बहादुर! ये ठाकुर साहब के खास आदमी हैं। आज से यहीं रहेंगे। सुबह ही ठाकुर साहब ने मुझे बताया था।”
फिर मेरी तरफ देखकर बोला—
“आप आइए साहब… ये आपको जानता नहीं है।”
उसने तुरंत गेट खोल दिया और मैं बहादुर को देखता हुआ अंदर चला गया।
मेरे अंदर जाते ही गिरीश ने बहादुर को डाँटना शुरू कर दिया।
“कुछ भी करता है तू, बहादुर!”
ठाकुर साहब हमेशा की तरह बड़ी खुशी से मुझसे मिले। उनके चेहरे पर वही अपनापन और गर्मजोशी थी, जैसे मैं कोई मेहमान नहीं, बल्कि उनके अपने परिवार का हिस्सा हूँ।
इसके बाद सविता मुझे मेरा कमरा दिखाने ले गई।
कमरा क्या था… बंगले का ही एक छोटा-सा हिस्सा था, जो आज से मेरे इस्तेमाल में रहने वाला था। पूरी तरह सजा हुआ, फुली फर्निश्ड बेडरूम… आराम की हर चीज़ वहाँ मौजूद थी। बड़े-बड़े पर्दे, आलीशान बिस्तर, खूबसूरत फर्नीचर और जरूरत की हर सुविधा।
मैंने कमरे के चारों तरफ नज़र दौड़ाई और मन ही मन मुस्कुरा उठा।
“वाह बेटे शितिज…”
मैंने खुद से कहा।
“बस अब वो दिन दूर नहीं, जब तुम इस बंगले के मालिक बन जाओगे। यहाँ की हर चीज़… और यहाँ काम करने वाला हर नौकर-चाकर… सब तुम्हारा होगा।”
उस ख्याल ने मेरे अंदर एक अजीब-सी खुशी भर दी।
जिस ज़िंदगी का सपना मैंने देखा था, शायद अब वह सपना नहीं रहा था।
वह मेरी आँखों के सामने सच बनने लगा था।
मैंने अपना छोटा-सा सामान वहीं एक कोने में रख दिया और फिर सविता के साथ वापस ठाकुर साहब के पास आ गया।
“कमरा पसंद आया, शितिज?”
उन्होंने मुस्कुराते हुए पूछा।
मैंने धीरे से सिर हिला दिया।
“ठाकुर साहब, इतने सबकी क्या ज़रूरत थी? मैं सर्वेंट क्वार्टर में भी रह लेता…”
मैंने बड़ी मासूमियत से कहा।
मेरी बात जैसे सीधे उनके दिल को छू गई।
“नहीं, शितिज।”
वो गंभीर होते हुए बोले।
“मैंने तुम्हें इस घर में किसी नौकर का ओहदा नहीं दिया है। तुममें मुझे अपना बेटा नज़र आता है। दोबारा ऐसी बात मत सोचना। आज से तुम यहाँ, इस घर में, मेरी तरह ही रहोगे।”
उन्होंने एक पल रुककर मेरी तरफ देखा और फिर बोले—
“खाने-पीने से लेकर कपड़ों तक, और तुम्हारी हर ज़रूरत का ध्यान रखने के लिए सविता और बाकी के नौकर हैं। तुम्हें किसी चीज़ की कमी नहीं होनी चाहिए।”
फिर अचानक उनके चेहरे पर मुस्कान लौट आई।
“चलो, पहले अच्छा-सा नाश्ता करते हैं। उसके बाद हम ऑफिस चलेंगे। वहाँ पूरे स्टाफ से तुम्हारा आधिकारिक परिचय करवाना ज़रूरी है।”
मैं चुपचाप सिर हिलाकर रह गया।
सविता ने तब तक बड़ी-सी डाइनिंग टेबल पर नाश्ता लगा दिया था।
खाने की खुशबू से ही मेरी भूख अचानक बढ़ गई थी। मेज़ पर सजा हुआ इतना शाही नाश्ता और सामने फैली आलीशान डाइनिंग टेबल देखकर एक पल के लिए तो मेरे होश ही उड़ गए।
लेकिन मैंने तुरंत खुद को संभाल लिया।
आखिर अब मुझे भी तो इस ज़िंदगी का हिस्सा बनना था।
बिल्कुल। मैं आपकी कहानी के मौजूदा प्लॉट और किरदारों को ध्यान में रखते हुए अगला हिस्सा खुद आगे बढ़ा रहा हूँ, उसी लालच, रहस्य और सिनेमैटिक माहौल के साथ।
मैंने कुर्सी खींचकर बैठते हुए खुद को जितना हो सके सामान्य दिखाने की कोशिश की। लेकिन सच कहूँ तो मेरे सामने रखे खाने से ज़्यादा मेरा ध्यान उस ज़िंदगी पर था, जो अचानक मेरे सामने खुलती जा रही थी।
सविता ने मेरी प्लेट में खाना परोसना शुरू किया।
“आप खुद ले लीजिएगा साहब, जो पसंद हो।”
“नहीं… आप रहने दीजिए।”
मैंने संकोच दिखाते हुए कहा।
ठाकुर साहब मेरी तरफ देखकर मुस्कुरा दिए।
“शितिज, अब संकोच छोड़ दो। मैंने जो कहा है, उसे याद रखो। इस घर में तुम्हें किसी चीज़ के लिए झिझकने की जरूरत नहीं है।”
मैंने हल्की-सी मुस्कान के साथ सिर झुका लिया।
“जी।”
नाश्ता शुरू हुआ, लेकिन मेरे दिमाग में कुछ और ही चल रहा था।
आज मैं पहली बार उस घर की डाइनिंग टेबल पर बैठा था, जहाँ कल तक मेरे जैसे आदमी के लिए अंदर आना भी शायद आसान नहीं होता। और अब ठाकुर साहब खुद मुझे अपने बराबर बैठाकर खिला रहे थे।
किस्मत भी कितनी अजीब चीज़ थी।
कल तक मैं कॉल सेंटर की मामूली नौकरी कर रहा था और आज करोड़ों की दौलत के मालिक आदमी का भरोसा मेरे ऊपर था।
बस एक बात मुझे लगातार परेशान कर रही थी।
आखिर ठाकुर साहब ने मुझमें ऐसा क्या देख लिया था?
मैंने कई बार खुद से यह सवाल पूछा था, लेकिन हर बार अपने लालच और सपनों के नीचे उसे दबा देता था।
नाश्ता खत्म होने के बाद ठाकुर साहब उठ खड़े हुए।
“चलो शितिज, अब ऑफिस का समय हो गया।”
मैं भी तुरंत उठ गया।
बाहर गाड़ी पहले से तैयार खड़ी थी।
ड्राइवर ने हमें देखते ही पिछला दरवाज़ा खोल दिया। ठाकुर साहब अंदर बैठे और मैं उनके साथ बैठ गया।
गाड़ी बंगले से बाहर निकली तो मैंने खिड़की से पीछे मुड़कर उस विशाल बंगले को देखा।
कुछ ही देर पहले तक वह सिर्फ एक आलीशान घर था।
लेकिन अब मेरे लिए उसका मतलब कुछ और था।
मैंने मन ही मन कहा—
“एक दिन… यह सब मेरा होगा।”
मेरे चेहरे पर हल्की मुस्कान आ गई।
ठाकुर साहब शायद मेरी तरफ देख रहे थे।
“क्या सोच रहे हो?”
मैं थोड़ा चौंका।
“कुछ नहीं… बस यही कि जिंदगी कितनी जल्दी बदल जाती है।”
वो कुछ पल मुझे देखते रहे।
फिर धीमे से बोले—
“जिंदगी तभी बदलती है, जब इंसान उसे बदलने का फैसला करता है।”
उनकी बात सुनकर मैं चुप हो गया।
लेकिन उनके चेहरे पर आई अचानक गंभीरता ने मेरे मन में एक अजीब-सी बेचैनी पैदा कर दी।
कुछ देर बाद गाड़ी शहर की सबसे बड़ी व्यावसायिक इमारतों में से एक के सामने जाकर रुकी।
मैंने ऊपर देखा।
कांच की कई मंज़िलों वाली वह इमारत धूप में चमक रही थी।
“यही है हमारा ऑफिस।”
ठाकुर साहब ने कहा।
मैंने गहरी सांस ली और उनके साथ गाड़ी से बाहर उतर गया।
अंदर कदम रखते ही कई लोग हमें देखकर अपनी जगह से उठ खड़े हुए।
“गुड मॉर्निंग, सर।”
चारों तरफ से आवाजें आने लगीं।
ठाकुर साहब ने सबको हाथ के इशारे से जवाब दिया और सीधे रिसेप्शन की तरफ बढ़े।
मैं उनके पीछे-पीछे चल रहा था।
मेरे अंदर एक अजीब-सा उत्साह था।
आज पहली बार मैं उस दुनिया में कदम रख रहा था, जिसकी सिर्फ कल्पना किया करता था।
लिफ्ट के सामने पहुँचकर ठाकुर साहब रुके।
उन्होंने मेरी तरफ देखा और मुस्कुराते हुए कहा—
“तैयार हो?”
मैंने उनकी आँखों में देखा।
“जी, ठाकुर साहब।”
लिफ्ट का दरवाज़ा खुला।
हम दोनों अंदर चले गए।
लेकिन मुझे नहीं पता था कि इस लिफ्ट के साथ मेरी जिंदगी भी एक ऐसी मंज़िल की तरफ बढ़ रही थी, जहाँ पहुँचने के बाद वापस लौटना शायद मेरे लिए मुमकिन नहीं होने वाला था।
बिल्कुल—अब कहानी को थोड़ा और सस्पेंस, ऑफिस-पॉलिटिक्स और शितिज की बढ़ती महत्वाकांक्षा की तरफ ले जा रहा हूँ।
लिफ्ट के दरवाज़े बंद होते ही कुछ सेकंड के लिए हमारे बीच खामोशी छा गई।
मैं सामने लगे शीशे में खुद को देख रहा था।
साफ-सुथरे कपड़े, महंगी घड़ी जो ठाकुर साहब ने मुझे कुछ दिन पहले ही दी थी और चेहरे पर वो आत्मविश्वास, जो कुछ ही दिनों पहले तक मेरे अंदर कहीं दिखाई नहीं देता था।
मैंने मन ही मन खुद से कहा—
“शितिज… अब तू वही नहीं रहा।”
लिफ्ट की घंटी बजी और दरवाज़ा खुल गया।
हम एक बड़े से कॉरिडोर में आ गए। दोनों तरफ कांच के केबिन थे और हर तरफ कर्मचारी अपने-अपने काम में व्यस्त थे।
लेकिन जैसे ही ठाकुर साहब आगे बढ़े, लोगों की निगाहें अपने आप हमारी तरफ उठने लगीं।
मैंने महसूस किया कि कई लोग मुझे पहचानने की कोशिश कर रहे थे।
शायद उन्हें भी समझ नहीं आ रहा था कि ठाकुर साहब के साथ मैं कौन था।
आखिरकार हम एक बड़े से केबिन के सामने रुके।
दरवाज़े पर लिखा था—
“चेयरमैन”
ठाकुर साहब ने दरवाज़ा खोला और मुझे अंदर आने का इशारा किया।
मैं अंदर गया तो मेरी नजरें कुछ पल के लिए वहीं ठहर गईं।
बड़ा-सा केबिन, सामने शहर का शानदार नज़ारा, भारी लकड़ी की टेबल और पीछे दीवार पर कंपनी का लोगो।
ठाकुर साहब अपनी कुर्सी पर बैठे और मुझे सामने वाली कुर्सी पर बैठने को कहा।
“शितिज, आज से यह जगह तुम्हारे लिए भी उतनी ही अपनी है जितनी मेरे लिए।”
मैंने उनकी तरफ देखा।
“लेकिन ठाकुर साहब, मैं तो इस काम के बारे में ज्यादा कुछ जानता भी नहीं हूँ।”
वो हल्के से हँसे।
“काम सीखा जा सकता है। भरोसा नहीं।”
उनके ये शब्द मेरे कानों में अटक गए।
तभी दरवाज़े पर दस्तक हुई।
“कम इन।”
एक करीब पचास साल का आदमी अंदर आया। सूट-बूट में, चेहरे पर गंभीरता और आँखों में ऐसी पैनी नजर कि पहली ही मुलाकात में मुझे असहज महसूस होने लगा।
“सर, आपने बुलाया था?”
“हाँ, वर्मा जी।”
ठाकुर साहब ने मेरी तरफ इशारा किया।
“इनसे मिलिए। ये शितिज हैं।”
वर्मा जी ने मेरी तरफ देखा।
एक पल के लिए उनके चेहरे पर हैरानी दिखाई दी, लेकिन अगले ही पल उन्होंने खुद को संभाल लिया।
“जी…”
उन्होंने हाथ आगे बढ़ाया।
मैंने भी हाथ मिला लिया।
“आज से शितिज हमारे साथ काम करेंगे।”
ठाकुर साहब ने कहा।
वर्मा जी ने कुछ नहीं कहा।
बस हल्की-सी मुस्कान उनके चेहरे पर आई।
लेकिन उस मुस्कान में अपनापन नहीं था।
कुछ और था।
जैसे वो मुझे समझने की कोशिश कर रहे हों।
ठाकुर साहब ने आगे कहा—
“और एक बात ध्यान रखिएगा, वर्मा जी। शितिज को कंपनी के हर जरूरी काम की जानकारी चाहिए। अकाउंट्स, प्रोजेक्ट्स, स्टाफ… सब कुछ।”
वर्मा जी ने तुरंत हामी भर दी।
“जी सर, बिल्कुल।”
वो मुड़े और बाहर जाने लगे।
लेकिन दरवाज़े तक पहुँचकर अचानक रुक गए।
उन्होंने पीछे पलटकर मुझे देखा।
“सर… अगर आप बुरा न मानें तो एक बात पूछूँ?”
ठाकुर साहब ने उनकी तरफ देखा।
“पूछिए।”
“शितिज जी कंपनी में किस पद पर रहेंगे?”
कमरे में अचानक खामोशी छा गई।
मैंने भी ठाकुर साहब की तरफ देखा।
वो कुछ सेकंड चुप रहे।
फिर उनकी आवाज़ पहले से ज्यादा गंभीर थी।
“वही पद… जिस पर बैठने के बाद किसी को उनसे सवाल करने की जरूरत नहीं पड़ेगी।”
वर्मा जी के चेहरे का रंग हल्का-सा बदल गया।
“जी… समझ गया।”
वो बाहर चले गए।
दरवाज़ा बंद होते ही मैंने ठाकुर साहब की तरफ देखा।
“आपने ये क्या कह दिया?”
ठाकुर साहब कुर्सी से उठे और खिड़की के पास जाकर खड़े हो गए।
शहर उनके सामने फैला हुआ था।
उन्होंने बिना मेरी तरफ देखे कहा—
“कभी-कभी किसी को उसकी जगह बताने के लिए उसका पद बताना जरूरी नहीं होता।”
मैं उनकी बात समझने की कोशिश ही कर रहा था कि बाहर अचानक कुछ लोगों के बीच धीमी आवाज़ में बातचीत सुनाई दी।
एक आवाज़ साफ़ मेरे कानों तक पहुँची—
“पता नहीं कौन है ये लड़का… लेकिन लगता है ठाकुर साहब ने इसे कुछ बड़ा देने का फैसला कर लिया है।”
दूसरी आवाज़ आई—
“और अगर ऐसा है… तो बहुत लोगों की कुर्सियाँ हिलने वाली हैं।”
मैंने ठाकुर साहब की तरफ देखा।
वो अब भी खिड़की से बाहर देख रहे थे।
और पहली बार मुझे महसूस हुआ—
मैं सिर्फ ठाकुर साहब की जिंदगी में दाखिल नहीं हुआ था… मैंने एक ऐसी दुनिया में कदम रखा था, जहाँ हर मुस्कान के पीछे कोई न कोई राज़ छिपा था।