Muhabbat Ek Sabaq - 18 Afariya Faruqui द्वारा प्रेम कथाएँ में हिंदी पीडीएफ

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Muhabbat Ek Sabaq - 18

"भाई यह मिठाई किस खुशी में " … .? ?? 
आमना बेगम भाई की लाई हुई ढेर सारी मिठाई पर एक हैरान सी नज़र डाल कर पूछने लगीं। 
शहरयार भी वहीं मौजूद था वह भी उनके यूं आने और इतनी मिठाई लाने का मक़सद समझ नही पा रहा था। 
"हां भई यह मिठाई तुम्हारे लिये है , तुम बैठो यहां सब बताता हूं "……

असद साहब ने उन्हे बैठने का इशारा किया तो वह हैरान हैरान सी कुछ ना समझते हुए भाई के बराबर में बैठ गईं। 

"अनस की बात तय कर दी है अम्मां ने और घर की बात थी इसलिये ज़्यादा वक़्त भी नही लगा सब तय होने में अब हमारा इरादा निकाह का है" ....... 

उन्होंने रूक रूक कर अपनी बात पूरी की थी। 
"अनस का निकाह , लेकिन अम्मां ने मुझसे तो कोई ज़िक्र तक नही किया" ……. 

उन्होंने अफसोस से शिकायत की। 
"अरे मैंने बताया तो है ,घर की बात थी इसलिये ज़्यादा वक़्त नही लिया हम लोगों ने सब तय करने में "……..

उन्होंने बहन का दिल बुरा होते देख रसान से समझाया था। लेकिन आमना बेगम उन के अल्फ़ाज़ पर अटक गईं

"घर की बात"…. ??

उनहोंने अजीब से अंदाज़ में भाई को देखा था। 
"हां वह अम्मा की ख्वाहिश पर हमने अनस और शिफ़ा की बात तय कर दी है। इस जुमे को निकाह है और रूख्सती शिफ़ा की पढ़ाई पूरी होने के बाद करेंगे" 

असद साहब बता रहे थे। लेकिन उन के अल्फ़ाज़ थे या कोई बम बन जो उन दोनों को पूरी तरह से हिला गए थे। 

और शहरयार की हालत तो ग़ैर थी। उसे ऐसा लग रहा था जैसे किसी ने बहुत उँचाई पर ले जाकर उसे ज़ोर से धक्का दे दिया हो। 
आमना बेगम ने तड़प कर बेटे को देखा उसके चेहरे पर चट्टानो जैसी सख्ती थी और होंट आपस में सख्ती से भिंचे हुए थे। 
"क्या हुआ आमना , कहाँ खो गईं "???

असद साहब ने पूछा। 
"कहीं नही भाई साहब , बहुत बहुत मुबारक हो आप लोगों को"….

उन्होंने ज़ख्मी दिल के साथ एक फीकी मुस्कुराहट से भाई को मुबारकबाद दी थी। 
शहरयार झटके से उठा और तेज़ी के साथ बाहर निकल गया तो आमना बेगम बेटे की हालत और अपने कुछ ना कर सकने पर एक बार फिर तड़प कर रह गईं। 

"इसे क्या हुआ" ….? ? ? 

वह दोनो हैरानी से आमना बेगम को देखने लगे। 
"पता नहीं , आप लोग बैठें मैं नाशते वग़ैरह का देखती हूं जा कर" ……..

वह अपने आँसू छुपाती बाहर निकल गईं। 

☆ ☆ ☆

निकाह का दिन आ पहुँचा। 

ऑफ व्हाइट कलर का लहंगा जिस पर मिरर वर्क हुआ था के साथ में मैचिंग ज्वैलरी पहने और ब्यूटीशियन के माहिर हाथो के कमाल से वह नज़र लग जाने की हद तक खूबसूरत लग रही थी। अनस भी मैचिंग शेरवानी के साथ साफा पहने शहज़ादा लग रहा था। 

जो भी देख रहा दोनों की तारीफ करते नही थक रहा था। 

अनस और शिफ़ा के कुछ ननिहाल वालो को यह शिकायत भी थी कि उन्होंने ज़िक्र करना तक ज़रूरी नही समझा क्योंकि उनका इरादा अपने यहां करने का था। लेकिन सब को दादू ने जवाब दे दिया था कि जब घर में लड़का मौजूद है तो हम बाहर क्यों देखने लगे। 

निकाह हो चुका तो मुबारक सलामत का शोर उठा था। 

बड़ी अम्मी और दादू उसके पास मौजूद थीं। 

नादिरा बेगम बेटी को शादी के जोड़े में देख कर बार बार आबदीदा (रोंआंसी) हो रही थीं। जबकि असद और आसिम अहमद रिश्तेदारी डबल होने पर फूले नही समा रहे थे ।

सब खुश थे सिवाए आमना बेगम के। वह जब से आईं बहुत खामोश थीं और शहरयार भी कुछ महीनो के लिये लंदन चला गया था। 

"आमना आओ भई , कहाँ गुम हो सर पर हाथ नही रखोगी भतीजी के ??अब तो तुम्हारी बहु भी बन गई है यह" ……

.कौसर बेगम ने अन्जाने में ही उनके ज़खमों पर नमक छिड़क दिया। 

"नहीं भाभी यह बेटी ही रहेगी हमेशा मेरी" ……

उनका लहजा कुछ सख्ती लिये हुए था। सब उन्हें देख कर रह गए फिर उन्होंने शिफ़ा के सर पर प्यार किया तो बेसाख्ता ही आँसु उनका आँचल भिगो गए थे। 

"अरे रो क्यों रही हो बेटा , यह कौनसा बाहर जा रही है यहीं तो है इसी घर में" ………..

दादू ने मुस्कुरा कर उन्हें शिफ़ा से अलग किया था। 

"जी अम्मां"….…

वह आँखे खुश्क करती खामोशी के साथ मां के बराबर बैठ गईं। दर हक़ीक़त उन्हें बेटे का दुःख था क्या पता क्या कर रहा है किस हाल में है …..….

सोचते हुए उन्होंने आँखो में उमड़ आने वाले आँसुओं को चुपके से साफ किया था। 

☆ ☆ ☆

"तुम्हें जाने की इतनी जल्दी क्यों है आमना इस बार , हर बार तो तुम रूक जाती हो इस बार क्या हुआ है कल फंक्शन ख्तम हुआ और आज तुम्हें जाने की लग गई"?? 

बेगम शफ़ीक़ बेटी को पैकिंग करते देख कर कह रही थीं। 

"बस अम्मां घर भी देखना होता है जा कर इस बार हमारी इंचार्ज छुट्टी पर है इसलिये मुझे देखना पड़ेगा जा कर" ….. ..

उन्होंने कमज़ोर सा रीज़न पेश किया। 

"हां तो दो चार दिन में देख लेना, ऐसी भी क्या बात है तुम तो हवा के घोड़े पर सवार हो" …. . ….

आमना बेगम का रवैया इस बार सब ही को महसूस हो रहा था। 

"अम्मां बिल्कुल सही कह रही हैं बाजी, अभी कुछ दिन तो रूकें आप"…..……

नादिरा बेगम भी वहीं आ गईं थीं। 

"अगली बार आउंगी तब रूकुंगी ना अभी नही" … .. ….. .

उन्होंने फीकी सी मुस्कुराहट के साथ जवाब दिया। 

"शिफ़ा ने अपनी पैकिंग कर ली है क्या, क्योंकि सुबह आठ बजे निकलना है हमें" ???

उन्होंने याद आने पर पूछा। 

"हां कर ली है , ज़्यादा सामान तो भाई साहब के साथ भिजवा ही दिया था अब तो थोड़ा ही रहता है बस ,वह रख लिया है"….…

. नादिरा बेगम ने जवाब दिया। 

☆ ☆ ☆

"पापा वह फीस सबमिट होनी है यूनिवर्सिटी की आप सैन्ड कर दीजिएगा आज या कल में एकाउंट में" … .. …. . …

बैग गाड़ी में रखवाने के बाद वह आसिम साहब से मिलने आई तो याद आया था। 

"शिफ़ा बेटे"… .. …. . .

असद साहब ने उसे मुखातिब किया। 

"जी बड़े पापा" …. ? ?

"अब से फीस या आप के जो भी एक्सपैंस हैं सब मुझे या अनस को बताएंगी आप अपने पापा को नही"….....

उन्होंने उसके सर पर मुहब्बतत से हाथ फेरते हुए कहा। 

"जी" … .. .

वह शर्मा कर सर हिला गई। 

"यह लो बेटे आप की पॉकेट मनी" ….. ..

. उन्होंने दो दो हज़ार के कई नोट उसे पकड़ाए। 

"लेकिन पापा ने तो दे दी है पॉकेट मनी मुझे" … .. ..

उसने मासूमियत से सर उठा कर बताया। 

"हां तो यह मैने दे दी है अब मेरी भी तो बेटी हैं ना आप" …....

उन्होंने मुस्कुरा कर कहा तो वह झेंप गई। 

"फुप्पो चलें टाईम हो रहा है"… .. … ..

अनस ने अंदर दाखिल होते हुए कहा। 

"हां हां चलो शिफ़ा"… . … ..

दोनो भाईयों भाभियों और माँ से मिलने के बाद वह उसकी तरफ मुड़ी थीं। 

"जी चलें "… .. …

वह भी एक अल्विदाई नज़र सब पर डाल कर मुड़ी तो सामने ही वह खड़ा मुस्कुरा रहा था जो कभी उसे दुनिया का सबसे बुरा इन्सान लगता था लेकिन अचानक ही उसकी सारी बातें सारी शरारतें उसे अच़्छी लगने लगी थीं। 

वह झेंप कर नज़रें झुका गई। 

"अल्लाह हाफ़िज़ और जाते ही खैरियत का फोन ज़रूर कर देना ज़ोजा (बीवी) मोहतरमा"…. . …

फुप्पो के बैठने के बाद जब वह गाड़ी में बैठ रही थी अनस ने पास से गुज़रते हुए सरगोशी की। 

उसने कुछ कहने के बजाए मुड़कर उसे घूरा था लेकिन तब तक वह ग़ायब हो चुका था उसकी जगह सामने रज़ा भाई खड़े थे वह गड़बड़ा कर रह गई। 

रज़ा बेसाख्ता मुस्कुराने लगा था। 

☆ ☆ ☆

वह नोटस बना रही थी कि फोन की बैल रिंग हुई। 

"इस वक़्त कौन हो सकता है" ???

उसने वॉल क्लॉक पर नज़र डाली बारह बज रहे थे कुछ सोच कर उसने फोन उठा लिया। 

“अनस कॉलिंग” !!! 

स्क्रीन पर चमकते नाम से बेसाख्ता उसके लबों पर मुस्कुराहट आई थी। 

"अस्सलामु अलेयकुम" … .. .

अब उस के कॉल या मैसेज से उसे फर्सटरेशन नही होती और ना गुस्सा आता था। वाक़ई निकाह के बोलों में बहुत ताक़त होती है उसने मुस्कुराते हुए सलाम किया। 

"वालेयकुम अस्सलाम एण्ड मैनी मैनी हैप्पी रिटर्न्स ऑफ यौर बर्थ डे मिसेज़ अनस अहमद"….. . ….

उसने मुहब्बतें लुटाते लहजे में विश किया तो शिफ़ा अंदर तक सरशार हो गई थी। 

"बहुत शुक्रिया मिस्टर अनस अहमद"