संस्मरण :_ अपने अपने नामवर
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"तुम्हारी कविताओं में एक नई बात है संदीप। जब इन्हें पढ़ता हूं तो लगता नहीं कि यह तुम्हारा प्रथम काव्य संग्रह है।" मेरे संग्रह " वह स्त्री लिख रही है" को पढ़ते हुए नामवर सिंह जी ने कहा।
दिल्ली ,कालका जी में गोविंदपुरी मेट्रो स्टेशन के बाई तरफ शांत सी अलकनंदा कालोनी में शिवालिक अपार्टमेंट। वहीं मैं उनके रूबरू था। कॉलबैल के जवाब में वह धवल धोती कुर्ता में स्वयं दरवाजा खोलने आए थे।साक्षात छ फुट कद का गौरवर्ण व्यक्तित्व,चश्मे से झांकती गंभीर पर बहुत कुछ कहती आंखे, मैं ही हिंदी आलोचना के शिखर पुरुष के सम्मुख था ।क्योंकि उससे पहले तीन बार उन्हें फोन करके बिल्डिंग का रास्ता पूछ चुका था। डीडीए के फ्लैट में प्रवेश करते ही ड्राईंगरूम था।वहीं दाई तरफ सोफे पर वह बैठे और सामने कुर्सियों पर मैं और मेरी मित्र। साहित्य जगत का सुपरस्टार ,अमिताभ बच्चन,मेरे सामने थे। मुझे यकीन नहीं हो रहा था। वर्ष दो हज़ार बारह का जून माह ।
उनके बारे में इतना पढ़ा और उनका लिखा भी पढ़ा था कि लगता ही नहीं था कि उनके पास भी जा पाऊंगा? पर होनी होकर रहती है। तभी उन्होंने पास रखे पानदान से ग्लोरी ली और मेरे बारे में पूछा। क्या करता हूं,क्या पढ़ता लिखता हूं? मैने भी दिल से उन्हें कहा,बताया। और आज भी दिल से कहता हूं उस पहली मुलाकात में ही उन्होंने मेरी इतनी मदद ,इतना अधिक सहयोग कर दिया जितना आज तक कोई नहीं कर पाया। यह अलग बात है कि सुदामा की भांति मैं मूर्ख भी बहुत बाद में समझ पाया।उनका यह अंदाज और विनम्रता मुझे हमेशा याद रहेगी ।
अपुन को हमेशा लगता है,पता नहीं क्यों,की अपुन कहीं नहीं पहुंचा। इतनी विनम्रता और झुकने की घुट्टी बचपन से दादी, मां,ताई,मौसी,गुरु, शिक्षिका से लेकर भाभियों तक ने पिला दी कि दशकों मेहनत के बाद भी अपुन वहीं खड़े पाएला। फिर आंखों ने कछुए तो छोड़ो घोंघो तक को अपुन से आगे और शान से कुर्सी पर बैठते देखा तो दिल ने कहा ,",कुछ तो गड़बड़ है दया।(सीआईडी धारावाहिक कितने प्राचीन काल से आ रहा है) तू ही क्यों हर बार आखिर में बचता है? मेहनत करता है रात दिन।अच्छे से अच्छी किताब पढ़ता है।"
प्रसाद,निराला हो या धर्मवीर भारती ,बच्चन,राजेंद्र यादव,शेखर जोशी, अज्ञेय, अमरकांत,रविंद्र कालिया,ममता कालिया से सुरेंद्र मोहन पाठक तक सब पढ़ा है। फिर चिंतन मनन भी किया।( पर उसके बाद क्या होता है ,यह किसी ने नहीं बताया) दरअसल उसके बाद तेजी से दौड़कर सामने चली जा रही बग्घी,बस,ट्रेन में लटक जाना होता है,गुरु के इशारे पर। फिर क्या?
फिर ...गुरु मेहरबान तो ऊपर खींच लेता है नहीं तो लटके रहो ,जब तक हाथ छूट न जाए। और कहीं खींच लिया गुरु ने तो नया चिंतन शुरू होता है। जैसे प्रभात रंजन ने किया मनोहर श्याम जोशी के लिए और खुद जोशी जी कर चुके अमृतलाल नागर के लिए। उनका हुक्का,तम्बाकू भरना,सच में, अफीम का अंटा लाना देना।
यह अपुन ने पढ़ा पर दो दशक बाद ।उस वक्त तो ऐसे बछड़े थे कि आदर्शवाद की पट्टी आंख पर बांधे चले जा रहे हैं।नीचे नाला,कीचड़ का एहसास हो रहा पर चले जा रहे,क्योंकि गुरुओं ने कहा कड़ी मेहनत और कड़ी मेहनत करो फल मिलेगा।
जब भी रचनाएं दिखाने जाओ,तो एक ही जवाब खूब पढ़ो खूब पढ़ो फिर लिखो एक पंक्ति। फिर काटो,सुधारो फिर लिखो। वह लोग जानते नहीं थे और मैंने बताया नहीं कि बीस वर्ष की आयु तक ऊपर लिखे सभी लेखकों की चर्चित कृतियों को पढ़ चुका हूं।पढ़ना मेरी मम्मी डैडी की देन है। तो वह दस वर्ष तक चक्कर लगवाते रहे।एकाध जगह,लोकल पाक्षिक पत्र में कहानी आई वरना हालात वैसे ही।बाद में,बहुत बाद में,पता चला कि उनके यहां तो कोई स्तरीय पत्रिका भी नहीं थी। एक के यहां थी इंद्रप्रस्थ भारती, समकालीन भारतीय साहित्य, पहल, मधुमति तो उन्होंने मुझे दी।इस हिदायत से कि पढ़कर वापस जरूर करूं। स्वर्गीय डॉ. लक्ष्मीकांत शर्मा,बहुत अच्छा लिखते थे।पर खुद भी प्रकाशन का अकाल झेल रहे थे
लिखना प्रारंभ मैंने सत्रह वर्ष से ही कर दिया था। व्यंग्य कहानी। अपनी शुरुआत लाखों लोगों की तरह कविता से नहीं हुई,शुक्र है, कहानी से हुई। आज भी दस पंक्ति की कविता मुझे याद नहीं होती पर दस पृष्ठ की कहानी का हर दृश्य मुझे याद रहता है।
व्यंग्य से बढ़ते हुए बीस की आयु में दो पत्र एक के बाद एक प्रथम पुरस्कृत हुए। पहला फिल्मसिटी पत्रिका में आया और पांच सौ रुपए पुरस्कार। याद है आज भी बैंक ऑफ बरोड़ा में चेक जमा करने के लिए डैडी मेरे साथ गए थे। वह बैंक बहुत दूर शास्त्रीनगर में कहीं था। वहां पहले मेरा अकाउंट खुला फिर चेक जमा हुआ। आज लिख रहा हूं तो याद आ रहा है वह पहली कमाई लेखन से। इसी के कुछ महीनों बाद स्टारडस्ट पत्रिका में मेरे पत्र को प्रथम पुरस्कार मिला। तब मैं बीएससी.द्वितीय वर्ष का विद्यार्थी था। दिलचस्प बात यह है द्वितीय पुरुस्कार श्री नीरज खरे को मिला था।यह आज बीएचयू में हिंदी विभाग में प्रोफेसर हैं।
लेकिन साहित्य में एंट्री राष्ट्रीय स्तर पर नहीं हुई बरसों और लगे। गोल गोल मुझे घुमाते रहे स्थानीय विद्वान और मे कूपमण्डूक सा रहा। उन्हीं दिनों संचिता नामक साहित्यिक पत्रिका भी प्रारंभ की थी युवाओं के लिए,जो दो वर्ष चली बढ़िया। उसकी अलग दिलचस्प कहानी है वह फिर कभी।
तो पढ़ाई खत्म,कामधंधे, पढ़ाने में लगे।कोचिंग क्लासेज लॉन्च की लेकिन साहित्य पढ़ना बंद नहीं हुआ।
नामवर जी के लेख और टिप्पणियां पाखी,हंस, समकालीन भारतीय साहित्य में आते तो हम पढ़ते थे।
लगता था उनसे कभी नहीं मिल पाएंगे।
बीच में लेखन बंद था और गृहस्थी अपना हक मांग रही थी।शुक्र है श्रीमती पढ़ी लिखी और स्वयं हिंदी में प्राध्यापक थी तो पढ़ने में दिक्कत नहीं रही।
राष्ट्रीय स्तर पर छपना फिर बदलाव आना
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उन्हीं दिनों वागर्थ में एकांत श्रीवास्तव ने मेरी कुछ कविताएं और रेणु की आलोचना पर लेख प्रकाशित किया। दोनों बहुत चर्चित हुए।मेरे पास फोन,पत्र आए। तब आज जैसी गुटबाजी नहीं थी कि जो वाम कार्ड होल्डर है वही प्रकाशित होगा। शंभूनाथ जी वागर्थ में दस वर्षों से हैं और मेरा कुछ भी प्रकाशित नहीं हुआ। फिर पाखी में चार कविताएं और तीन आलेख पांच महीनों में आए। प्रेम भारद्वाज,ईश्वर उन्हें शानदार स्थान दे चुके होंगे स्वर्गलोक में, ने लगाए।मेरा उनसे कोई परिचय नहीं था।
फिर परिकथा में कहानी,राष्ट्रीय स्तर पर प्रथम कहानी ,शंकर जी ने छापी।वह भी चर्चित हुई एक नए प्रयोग,जिसमें निर्मल वर्मा से गंभीरता,अश्क की अर्थ भरी हंसी,नामवर सिंह जैसी मुस्कान विभिन्न पात्रों पर लिखे गए थे।
काशीनाथ सिंह,आशीष त्रिपाठी के साथ पाखी में एक बहस प्रकाशित हुई।जिसमें इन दोनों के द्वारा नए लेखकों की बारात का स्वागत किया गया और मैंने उस बारात की कमियां और मिली भगत को उजागर किया। आज वह सब नव लेखन अंक की उपज कहां हैं ,कोई नहीं जानता।
तो नामवर जी का फोन नंबर तभी मिला।
तद्भव में उनकी और रामविलास शर्मा जी से बहुत लंबी बातचीत अखिलेश ने प्रकाशित की थी। वह पूरी मैने कई बार पढ़ी। शीर्षक आज डेढ़ दशक बाद भी मुझे याद है ,"आर्य भारत के मूल निवासी नहीं थे "।
उसके बाद मैंने तय किया कि इनसे मिलना है और दिल्ली जाना है।
दिल्ली की यह पहली मुलाक़ात शिवालिक अपार्टमेंट से प्रारंभ हुई और मुझे भी पता नहीं था कि यह आगे दस बरस तक चलती जाएगी। इतनी की उनका मेरा घरेलू सा संबंध बन जाएगा। आशीष क्षमा करेंगे ,पर मुझे हर भाषण को सुन सुनकर लिपिबद्ध नहीं करना पड़ा,उनके आशीर्वाद के लिए। और आत्मीयता इतनी हुई कि मैंने उनके मनपसंद फिल्म स्टार,दिलीप कुमार, अभिनेत्री,नरगिस,भोजन,सत्तू,लिट्टी चोखा,कुछ भी घर का बना और बीजेपी तक पर सवाल पूछ डाले ।
पर पहली मुलाकात की बात पहले।मैंने पूछा कि, "कई लोग गीत, कविता भी लिख रहे तो कहानी भी,बाल साहित्य भी।ऐसा प्रतिभा का विस्फोट कैसे संभव है?"
वह अपने चश्में में से झांकती सरल आंखों में व्यंग्य भरी मुस्कान लाकर देखते रहे फिर बोले ," ऐसा लोग करते हैं पर वह कहीं नहीं पहुंचते।उन्हें जल्दी रहती है लोकप्रिय होने की। व्यक्ति क्यों लिखता है?"
मैं चुप !!
वह बोले," नाम के लिए, लोकप्रियता के लिए। तो किसी भी एक विधा कथा,काव्य या आलोचना को साध लो और उसी में टिके रहो,जमे रहो,सीखते रहो तो अपने आप नाम,लोकप्रियता मिल जाती है। अधिक भटकने या इधर उधर भटकने से अच्छा है अपनी एक विधा बहुत अच्छे से आती हो।"
क्या खूब बात कही।मैंने गांठ बांध ली और आज तक उसे निभाता हूं। विधा भी उन्होंने ही चुनना बताया। बोले,"तुम्हारी दोनों पुस्तकें कविता और कहानी ",अभी उम्मीद बाकी है" मैने देखी ।अच्छा लिखते हो आगे और मझोगे और नाम कमाओगे।पर इनमें से एक मुख्य विधा हो और दूसरी में कभी कभी आवा जाही हो जाए।
मैने पूरी ईमानदारी से कहा," मुझे कविता याद नहीं रहती पर तब तक लिखी बीस कहानियां मुझे याद हैं। सुना सकता हूं।"
" तो बस ,_वह बोले,_ "हो गया फैसला।" तुम कथा विधा में रहोगे और इसी में खूब मेहनत करो।सब कुछ मिल जाएगा।"
उनके चरण छूकर आशीर्वाद जो लिया वह आज तक खूब फलफूल रहा है।
मेरी मित्र,युवा कवयित्री देहरादून की,ने भी उनसे कुछ सवाल किए। फिर एक फोटो लेने का अनुरोध किया। उस वक़्त स्मार्ट फोन नहीं की पेड फोन थे।
हमने देखा हमारे बुजुर्गों की तरह उन्होंने संकोच से कहा, "अच्छा फोटो ! तो फोटो के लिए कुर्ता बदलकर आते हैं।" वह अंदर गए और मिनट भर में कुर्ता बदल,बाल संवार आए। मुझे लगा मेरे घर के बुजर्ग मेरे साथ खड़े हैं।
हम तीनों के फोटो उनके घर में काम कर रही हाउस हेल्प ने ली।
वह गेट तक छोड़ने आए।मिलकर लगा,जितना बड़ा इंसान उतना ही विनम्र और प्रोत्साहन देने वाले।
अगली मुलाकात जल्दी हुई
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हरियाणा साहित्य अकादमी के तत्कालीन अध्यक्ष ऊर्जावान और बहुत अच्छे लेखक मेरे मित्र डाक्टर श्याम सखा श्याम थे। उनसे मैंने कहा कि कोई कार्यक्रम रखें तो नामवर जी को बुलाया जाए।
वह सहर्ष तैयार हुए। गुड़गांव में अकादमी का काव्य सम्मेलन तय हुआ। नामवर जी को तैयार करने और लाने का जिम्मा मैंने लिया। एक डर था कि कालकाजी ,दिल्ली का एक कोना से गुड़गांव आना काफी थकान भरा होने से वह मना नहीं कर दें।
खैर फोन लगाया मैंने।परिचय दिया कि पिछले माह घर आए थे और यह चर्चा हुई थी। गम्भीर पर बच्चों सी उत्सुक आवाज आई,"अवस्थी जी ,हम पहचान गए आपको।कहिए क्या काम है?" चार प्रधानमंत्रियों को पढ़ा चुके और हजारों को प्राध्यापकी दिला चुके, मुझे पहचानते हैं।पर मेरी समस्या यह है कि मुझे वक्त पर कुछ नहीं सूझता और बहुत बहुत बाद में मौके की नजाकत और महत्ता समझ आती है। तब अस्थाई प्राध्यापक था ।मुझे यह अक्ल नहीं आई उन्हें कह देता। पीएचडी,नेट योग्यताओं के साथ कहीं भी हो जाता। पर नहीं साहब, आदर्शवाद और निस्वार्थ कार्य करने का गुण अपने जीन में है।
खैर,अनुरोध किया उन्हें ,की हरियाणा साहित्य अकादमी द्वारा संयोजित काव्य आयोजन की आपको अध्यक्षता करनी है।
अनामिका,प्राजंल धर, चेतना, एक कोई दिल्ली की और मैं मात्र पांच लोगों का मुख्य काव्य पाठ है। उन्होंने कहा,"ठीक है। मैं आऊंगा। गाड़ी टाइम पर भेज देना।" फिर कुछ सोचकर बोले, " चंद्रकांता जी भी वहीं रहती हैं उन्हें भी बुलाएं।"
मैने कहा अवश्य।
दो हफ्ते बाद ,निर्धारित दिन कार्यक्रम अपराह्न चार बजे प्रारंभ होना था।मैंने ,हरियाणा साहित्य अकादमी के अध्यक्ष श्याम जी को कहा,उन्हें एक घंटे पहले बुलाएंगे और उनसे एक बातचीत करेंगे। मैने सवाल जवाब तैयार कर लिए।
श्याम जी भी तैयार। निर्धारित दिन अकादमी की लाल बत्ती की गाड़ी में सम्मानित प्रखर विद्वान प्रोफेसर नामवर सिंह जी आए ।पीडब्ल्यूडी के गेस्ट हाउस में इंतजाम था,रुकने , चाय आदि का।
उन्हें बता दिया था कि आपसे एक साक्षात्कार मेरे द्वारा लिया जाएगा।
यह भी अच्छा ही हुआ कि मेरे जीवन का पहला साक्षात्कार नामवर जी जैसी हस्ती का हुआ।
श्याम जी ने वीडियो कैमरा सेट किया।पूरी रिकॉर्डिंग हुई। अनामिका जी,जिन्हें पिछले वर्ष साहित्य अकादमी मिला है , मैं,दो कवि और अकादमी सचिव उपस्थित थे।मैंने सवाल जवाब प्रारंभ किए पूरी ईमानदारी से। उसमें साहित्य में गुटबाजी से लेकर बीजेपी के उभार और भविष्य के भी प्रश्न थे। सभी के बेहद संतुलित उत्तर दिए।ऐसे खूबी से कि कोई भी नाराज या आलोचना का पात्र न लगे। उनका सार यह था कि कब तक एक पार्टी सत्ता से बाहर रहेगी? कब तक एक ही शासन करती रहेगी? जो जनता के दिल को छुएगा वह सत्ता में आएगा। यह खूबी पूरी ईमानदारी से मैं उतारना चाहता हूं कि सभी की अच्छाई देखूं और प्रियम ब्रूही रहूं। नामवर जी की यह साफगोई दिल में उतर गई। फिर मैने वन लाइनर सवाल पूछे ,दिलचस्प उत्तर मिलें मनपसंद अभिनेता दिलीप कुमार और एक्ट्रेस मधुबाला। खिचड़ी और लिट्टी चोखा प्रिय भोजन तो पोशाक में धोती कुर्ता।
फिर रवाना हुए काव्य गोष्ठी के लिए।
वहां मंच पर सब विराजे,कवि गण नीचे थे। मैं संयोजक होने के नाते मंच पर था। श्याम जी ने क्या खूब स्वागत भाषण दिया।उन्होंने बता दिया कि वह एक योग्य साहित्यकार हैं जो अकादमी अध्यक्ष बनें।
काव्य पाठ हुआ अच्छे से।सभी से बातचीत हुई। कथा सत्तीसर की लेखिका चंद्रकांता जी से खास मुलाकात हुई। नामवर जी ने भी उनका हालचाल पूछा।श्याम सखा श्याम जी ने नामवर जी को ससम्मान गाड़ी से रवाना किया। अनामिका जी भी उसी गाड़ी से गई रास्ते में उनका घर पड़ता था शायद।
यह राष्ट्रीय स्तर पर मेरी पहली और सफल गोष्ठी या कहें कार्यक्रम रहा।सौभाग्यशाली हूं कि प्रथम कार्यक्रम में भी आदरणीय नामवर सिंह जी का सानिध्य रहा।
इसके बाद हिन्द युग्म के शैलेश भारतवासी ,तब यह उभर रहे थे,इतने बड़े नहीं बने थे कि देश भर में चर्चित हों। तो इनके कार्यक्रम में श्याम जी मुख्य अतिथि और मैं मुख्य वक्ता था। मैने शैलेश भारतवासी से कहा कि नामवर जी को बुलाया जाए? उनके शब्द मुझे आज भी याद हैं, "अरे सर,इतने बड़े आदमी,बड़ी हस्ती।मेरा कोई परिचय नहीं। कैसे बुलाऊं? वह आएंगे भी?"
मैने कहा, मैं बुलाऊं तो?
वह बोले नेकी और पूछ पूछ।
हिंदी भवन ,दिल्ली में आयोजित इस कार्यक्रम में, जो नवलेखकों की सात किताबों का लोकार्पण था, मेरे बुलावे पर नामवर जी आए। हिंदी भवन के निचले हिस्से में बने पुस्तकालय में बैठे,चर्चा हुई।बताया बहुत दिनो बाद यहां आया हूं।वहां की दीवारों पर हिंदी जगत की ख्यात हस्तियों भारतेंदु हरिश्चंद्र,महादेवी वर्मा,हजारी प्रसाद द्विवेदी आदि के बड़े,फ्रेम किए चित्र लगे हुए थे ।
कार्यक्रम में सदा की तरह बेहतरीन बोले वे। नए लेखकों से दूसरी मंजिल का सभागार भरा हुआ था।मेरा सौभाग्य था कि इस एतिहासिक भवन में एक बड़े कार्यक्रम का मैं भी अहम हिस्सा था। अजमेर जैसे छोटे से शहर से होने के बाद भी दिल्ली में अपनी प्रतिभा,मेहनत और ऊपर वाले की कृपा से पहचान बनी।मंच पर इनके साथ बैठने का सौभाग्य मिला अपने लेखन और श्री आदिशक्ति माताजी निर्मलादेवी जी,मेरी गुरु माता ,की कृपा से। दिल्ली में मेरा पहला बड़ा कार्यक्रम। तब पता नहीं था कि आगे ऐसे बड़े कार्यक्रमों का हिस्सा बनने का मौका मिलता ही रहेगा ।
वहां खास बात देखी मैंने।हिंद युग्म का एक काउंटर था उस पर किताबें बिक्री हेतु रखी थी। दो सौ पुस्तकें हाथों हाथ बिक गई। पता नहीं भारतवासी क्या जादू जानते हैं?आज हिंदयुग्म चर्चा में है सबसे अधिक रॉयल्टी,तीस लाख रुपए मात्र, छ माह की स्वर्गीय विनोद कुमार शुक्ल को देकर।
यहां से मुझ पर उनका और भरोसा और आशीर्वाद बना।फिर अगली बार साहित्य अकादमी के कार्यक्रम में मैं भी आमंत्रित था,धन्यवाद विश्वनाथ प्रसाद तिवारी,बेतिया हाथा,गोरखपुर का जो तत्कालीन अध्यक्ष थे साहित्य अकादमी के।
जल्द एक दिलचस्प संस्था के गठन का जिम्मा मुझे दिया गया। पूर्व कुलपति वीरेंद्रनाथ पांडेय एक समारोह में मुजफ्फरपुर में मुझे मिले,जल्द दोस्ती हो गई।
उन्होंने बताया कि एक पूर्व कुलपतियों की संस्था,यूनियन बननी चाहिए।जिससे उच्च शिक्षा में गड़बड़ी और अयोग्य लोग आ रहे हैं उन पर आवाज उठाई जाए।
कार्य प्रारंभ हुआ हम दो से। जल्दी ही मैंने चार पूर्व कुलपति जोड़ दिए। हर एक से बात करके। साहित्य और उसका निरंतर मनन यह आत्मविश्वास और गौरव देता है कि आप किसी भी व्यक्ति से सार्थक बात कर लेते हैं। आदरणीय नामवर सिंह जी बात की मैंने। तब तक उनसे मेरे घरेलू से संबंध हो गए थे। मेरी बड़ी बुआ और फूफाजी श्री कन्हैयालाल शुक्ल, वाराणसी में ही रहे तो ठेठ पुरबिया वातावरण मैंने बचपन में देखा। डैडी मम्मी,ताऊजी ताइजी हर वर्ष बनारस ले जाते हमको। पूर्व रेल मंत्री, कमलापति त्रिपाठी वाले मोहल्ले में ही बुआजी फूफाजी का बड़ा सा तीन मंजिला भवन था। उत्तम सुरती जर्दा के निर्माता थे फूफाजी। पर बनारस तब भी बेलौस था। वह किसी को भी कभी बड़ा नहीं बनने देता। कमलापति त्रिपाठी,मंत्री बनने के बाद भी,उसी मोहल्ले में अपने पुराने कोठीनुमा घर आते,मोहल्ले में निकलते। हम छोटे थे,आठ दस साल के ,जब बुआ जी के यहां साल दो साल में एक बार डैडी मम्मी छुटि्टयों में ले जाते। तो क्या देखते,की केंद्रित मंत्री,अकेले मोहल्ले में मुंह में पान दबाए टहल रहे,लोगों का हालचाल पूछ रहे और लोगन का वही हाल,सब उनकी नमस्ते का जवाब अपने जो काम में व्यस्त रखते हुए दे रहे। डैडी ,ताऊजी,चाचा सभी रेलवे में थे,तो उनके लिए बड़ी बात की रेल मंत्री को इतने नजदीक से देख रहे। पर हमने कभी कोई भीड़ या हुजूम उनके चारों तरफ नहीं देखा। वह भी वहीं की मिट्टी के थे तो बनारस के लोगों का मिजाज समझते थे। वह किसी को भी भाव नहीं देता। तब हम भी नहीं समझे थे कि इन गलियों में हम डैडी का हाथ पकड़े जा रहे और बगल में धोती कुर्ता पहने बात करने वाला व्यक्तिव केंद्रीय रेल मंत्री है। फिर अगला चुनाव पंडित जी बनारस से हार गए। किया होगा कुछ बनारस के लोगन को नाराज। आज की तरह मजबूत बूथ मैनेजमेंट थोड़ी होगा कि बनारस से गुजरात का मोटा भाई तीसरी बार जनता के प्यार से जीते हैं।
खैर, नामवर जी को कांसेप्ट बताया और पूरी टीम पांडे जी की बताई। वह सहर्ष तैयार हुए।क्योंकि संघर्ष और अन्याय के विरोध का उनका उन्नीस सौ साठ से इतिहास रहा है। गुरुवर हजारी प्रसाद द्विवेदी के साथ हुई बीएचयू की राजनीति से खुद अपने साथ हुई नीतियों से वाकिफ थे। बाकी अब तो वह खुद सर्वमान्य और बहुत नामवर थे। यह मणिकांचन योग है कि आप साहित्य में भी शिखर पर और साथ में देश भर के विश्वविद्यालयों में भी बेहद मजबूत पकड़ रखते हैं। यह बात सिर्फ और सिर्फ नामवर जी से ही सीखी जा सकती है। अपनी मेधा, क्षमता और संबंधों के निर्माण से पुल ही नहीं बनाए बल्कि उन पर सतत् आवाजाही भी की और देखभाल भी की।
कोई कुछ भी कहे पर जितना भला और लोक कार्य इन्होंने साहित्य से अकादमिक जगत तक उतना किसी ने नहीं किया ।लोग पावर में आते हैं तो अपना भला करने और "ऊपर वाले" की हर बात सिर झुकाकर मानते चलने में ही कल्याण समझते हैं। कोई ऐसा व्यक्तित्व नहीं जो अपने को संस्था में नियुक्त करने वाले से कहे कि मेरे फैसले और चर्चा पूर्ण स्वायत्त होंगी आपका हस्तक्षेप नहीं होगा। ऐसे हैं नामवर जी।और वह भी बाकायदा तर्क और विश्लेषण करके अपनी बात ऐसे रखते थे कि सामने वाला मानता ही था।
("थे" इसलिए नहीं लगाता कि ऐसी प्रतिभाएं और व्यक्तित्व कभी आपसे दूर नहीं होते।वह अपने विचारों,कार्यों के माध्यम से सदा जीवित रहते हैं।) यह देश में अपनी तरह की पहली फोरम थी और अभी भी है, पूर्व कुलपतियों की संस्था। मैने एमडीएस, विश्विद्यालय,अजमेर के पूर्व कुलपति और राजस्थान की तत्कालीन वसुंधरा सरकार में मंत्री अरुण चतुर्वेदी के पिता प्रोफेसर कर्नल पुरुषोत्तम लाल चतुर्वेदी को भी जोड़ा। बहुत अच्छे व्यक्ति रहे।
तो एक तरफ नामवर जी और दूसरी तरफ आरएसएस के कुलपति। यह मेरी साहित्यिक तर्कणा का कमाल था। क्योंकि संस्था को उच्च शिक्षा में नए क्षेत्र,गड़बड़ियां और अयोग्य लोगों के बारे में प्रधानमंत्री और तत्कालीन एच.आर.डी.मंत्री कपिल सिब्बल को मिलना और ज्ञापन भी देना था।
वीएन पांडेय जी ने बिहार, झारखंड, यूपी के करीब दस पूर्व कुलपति जोड़े थे,जिनमें से पहली मीटिंग में चार आए। वर्धा के अरविंदाक्षन भी थे। आज सोचता हूं तो आश्चर्य लगता है कि किस तरह यह समिति, संस्था बनी आगे में मुझ अंकिंचन का योगदान बराबर का था। गोविंदपुरी, मेट्रो स्टेशन दिल्ली के पास ही चांदीवाला संस्थान का विशाल परिसर है। वहां के सभा कक्ष में इस समिति की पहली बैठक हुई। पांडेय जी और मैं वहीं ठहरे। बाकी सारे कुलपति अपने समय पर आ गए। नामवर जी के घर के पास ही था।उनको जब बताया था तो वह बोले,"काफी पहले चांदीवाला संस्थान आया था।अब दुबारा आना हो रहा।आ जाऊंगा संदीप।"
लंच के बाद सत्र प्रारंभ हुआ। संस्था के मालिक खुद नामवर जी का स्वागत करने और उनके साथ बैठने को आगे बढ़कर आए। बहुत आत्मीय वातावरण में बातचीत हुई। सभी में ,चाहे चतुर्वेदी हो या नामवर जी,एक तालमेल और सहमति बनती हुई दिखाई दी। यह उनका वाक् कौशल और अनुभव ही था कि संघ विचारधारा के कुलपति भी उनकी बातों से सहमत दिखे।
मैं आयोजन हो रहा,देख खुश था।पर सोच रहा था आज शाम वापिस घर।क्योंकि इन बड़े लोगों में अपना क्या काम? पांडेय जी,पूर्व कुलपति ,मित्रवत हैं,उन्होंने मदद मांगी मैंने कर दी।
यह एक दशक बाद समझ आया कि संस्था और इन सभी से जुड़ने का लाभ यह होता कि मैं आज खुद कहीं कुलपति या निदेशक होता। सरकार कोई भी होती मैंने ईमानदारी से उच्च शिक्षा में बेहतरी के लिए इन लोगों को जोड़ा और कार्य किया। नामवर जी जितने ही आत्मीय पुरूषोत्तम चतुर्वेदी जी रहे। सभी में मेरी चर्चा पर?
आदर्शवाद की घुट्टी ऐसी ही जगह असर दिखाती है मेरे अंदर। राउंड टेबल कांफ्रेंस में सर्वसम्मति से कार्यकारिणी बनी और एकजुट होकर प्रोफेसर नामवर सिंह जी उसके प्रथम राष्ट्रीय अध्यक्ष बने।उपाध्यक्ष आरएसएस के चतुर्वेदी जी,कोषाध्यक्ष वीएन पांडेय जी,शेखावत जी और सचिव,सबसे महत्वपूर्ण पद डॉ संदीप अवस्थी को दिया गया।
नई टीम का लीडर कौन?
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सभी ने स्वागत किया इस टीम का ।आगे और विस्तार। मैं सोचता रहा,दो दिल्ली के ही प्राध्यापक और थे। वह सदस्य बनाए गए। सभी खुश सिवाय मेरे। जिसे यह समझ नहीं कि वह ज्ञान की गुफा के अंदर देश के टॉप के गुरुवरों के साथ बैठा है। चुपचाप बैठा भी रहेगा तो यह उसका अवश्य बहुत, बहुत अच्छा भविष्य बना देंगे।पर मैने क्या किया? मैने अजमेर पहुंच एक हफ्ते बाद ही पांडेय जी को फोन किया । आज भी याद हैं शब्द ,",पांडेय जी,आपने जैसा कहा वैसी संस्था बन गई है। यह सभी, अध्यक्ष आदि, सक्षम है संख्या सौ तक करने में। प्रधानमंत्री से भी मिलना करवा देंगे,पर अब मुझे अनुमति दें। मेरा कोई इसमें रोल नहीं दिखता। आपका दोस्त होने के नाते मदद कर दी। बस मेरा काम पूरा। "
यह सारी बातें कोई आज भी सुनेगा तो मुझे पागल,हिला हुआ ही मानेगा। क्योंकि मैं तब भी कुछ नहीं था और आगे का पता नही ...।पर कभी अपना स्वार्थ नहीं सोचा। कभी कुछ अपने लिए नहीं मांगा। श्री आदिशक्ति माताजी निर्मलादेवी जी की कृपा रही।
बाद में मैंने पढ़ा अखबारों में एक शिष्टमंडल पांडेय जी,नामवर जी,चतुर्वेदी जी,शेखावत जी,प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह और कपिल सिब्बल से मिला भी।
वह संस्था आज भी सक्रिय है,कार्य कर रही।अपनी तरह की इकलौती संस्था है अखिल भारतीय पूर्व कुलपति एसोसिएशन, नामवर जी और अन्य योग्य लोग उसे बहुत आगे ले गए। मैं वहीं का वहीं रहा।
आदरणीय नामवर जी से मिलना और बात होती रही। फिर उन्होंने मेरे बुलाने पर आते तो मानदेय का लिफाफा भी नहीं लेते। जबरदस्ती मैं देता।
अपने शहर अजमेर में उनको लाने की इच्छा थी पर वह अधूरी रह गई। उन्होंने कई बार बातचीत में मुझे अपने जोधपुर प्रवास और वी वी जॉन्,तत्कालीन कुलपति के बारे में बताया जो उन्हें लेकर आए। आज भी जय नारायण व्यास विश्विद्यालय में उनके द्वारा स्थापित भाषा और अनुवाद केंद्र महत्व रखता है। यही वी वी जॉन इससे पूर्व राजस्थान के सबसे बड़े राजकीग महाविधालय, अजमेर के प्राचार्य रहे।
नामवर जी ऐसे पारस इंसान रहे जिन्होंने बिना भेदभाव के हर नए पुराने इंसान की मदद की। कभी भी उन्होंने मुझसे मेरी विचारधारा नहीं पूछी। खुद ही अंदाजा लगाते और मदद भी करते।
हुए लोग ऐसे भी जिनके सान्निध्य में कुछ समय बिताने का मुझे अवसर मिला।
एक बार फिर हृदय तल से उनका आभार और उनके बताए रास्ते पर चल सकूं यही कामना है।
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(डॉ.संदीप अवस्थी, जाने माने आलोचक,कथाकार
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