Devil की दास्तान - 30 Sonam Brijwasi द्वारा नाटक में हिंदी पीडीएफ

Featured Books
श्रेणी
शेयर करे

Devil की दास्तान - 30

सुबह का समय। बारिश थमी है। हवेली के बाहर धूप की हल्की किरणें पड़ रही हैं। करण बिस्तर पर पड़ा है — थका हुआ, बिखरा हुआ। पास में सिमरन उसकी देखभाल कर रही है।)

"रात की वो आग अब राख बन चुकी थी...
पर उस राख में कुछ चिंगारियाँ अब भी जल रही थीं —
यादों की... और अधूरे प्यार की..."

(सिमरन धीरे से करण के माथे पर पानी का कपड़ा रखती है। करण करवट बदलता है।)

करण (धीरे से बड़बड़ाते हुए) बोला - 
“खून... लाल... गाड़ी... वो लड़की... वो चिल्ला रही थी…”

(सिमरन चौंकती है।)

सिमरन (धीरे से) बोली - 
“करण जी… क्या याद आ रहा है आपको?”

(करण अचानक आँखें खोलता है। उसकी साँसें तेज़। उसकी आँखों में डर और दर्द दोनों हैं।)

करण बोला - 
“वो मैं था... वो लड़की मुझसे डर रही थी... वो... वो तुम थीं ना सिमरन?”

(सिमरन धीरे से सिर हिलाती है। करण का चेहरा उतर जाता है। वो उठकर बैठता है, माथा पकड़ लेता है।)

करण (काँपती आवाज़ में) बोला - 
“मैंने तुम्हें डराया था… मैं वो दानव बन गया था जो इंसान का खून सूँघकर मुस्कुराता था…”

(सिमरन उसके पास आती है, उसके कंधे पर हाथ रखती है।)

सिमरन बोली - 
“आपके अंदर सिर्फ अंधेरा नहीं था करण जी…
वहीं अंधेरे में एक रोशनी भी थी…
जिसे मैंने देखा था… जिसे मैंने प्यार किया था…”

(करण धीरे से उसकी तरफ देखता है। उसकी आँखों में आँसू हैं।)

करण बोला - 
“तुम पागल थीं सिमरन...
किसी ऐसे इंसान से प्यार किया जो इंसान ही नहीं था…”

(सिमरन मुस्कुराती है, उसकी आँखें भी नम हैं।)

सिमरन बोली - 
“प्यार इंसान से नहीं, उसकी आत्मा से होता है करण जी…
और तुम्हारी आत्मा अब भी ज़िंदा है। 
अब मुझे कोई मतलब नहीं है आपका इंसान होने या ना होने से।
मैं तो बस ये जानती हूं आप मेरे करण जी हो। वो जिससे मैं खुद से ज्यादा प्यार करती हूं और हमेशा करूंगी।”

(करण के दिमाग में अचानक फ्लैशबैक चमकते हैं — सिमरन का हँसना, उसके साथ कॉफी पीना, सिमरन का हमेशा सहमकर उसे देखना, वो दिन जब उसने पहली बार सिमरन को बचाया था एक कार एक्सीडेंट से।)

“यादें जैसे किसी ने बंद दरवाज़े खोल दिए हों…
हर याद के साथ करण का अतीत लौटता गया…
और वो खुद को पहचानने लगा…”

(करण सिमरन का हाथ पकड़ता है।)

करण बोला - 
“तुम मेरे अंधेरे में आई थीं…
मुझे इंसान बनाया था…
पर मैंने तुम्हें ही सबसे ज़्यादा दर्द दिया…”

(सिमरन उसका चेहरा पकड़कर कहती है —)

सिमरन बोली - 
“अब भी वक़्त है करण जी…
आप अपने भीतर के शैतान को खत्म कर सकते हैं…
बस एक कदम… मेरे साथ…”

(करण उसकी आँखों में देखता है। उसकी आँखों का लाल रंग धीरे-धीरे मिटने लगता है। उसकी साँसें सामान्य हो जाती हैं।)

"उसने पहली बार अपने अंदर के राक्षस को हराया था…
न किसी तावीज़ से, न किसी मन्त्र से…
बस प्यार से..."

“पर प्यार आसान नहीं होता…
क्योंकि जो अंधेरा एक बार किसी की रगों में उतर जाए…
वो इतनी आसानी से नहीं जाता…”

रात के समय - 

( हवेली के दरवाज़े के बाहर एक परछाई दिखाई देती है। कोई अजनबी खड़ा है… उसकी आँखें लाल हैं… मुस्कुरा रहा है।)

(रात का समय। हवेली के बाहर ठंडी हवा चल रही है। पेड़ों की शाखाएँ हवा में चरमराती हैं। भीतर करण और सिमरन एक-दूसरे के करीब बैठे हैं — शांति का छोटा पल। लेकिन दूर से एक अनजानी आहट सबकुछ बदलने वाली है।)

“शांति जब ज़्यादा गहरी हो जाए… तो समझो तूफ़ान पास ही है।”

(हवेली के बाहर कदमों की आहट। कैमरा धीरे-धीरे गेट की तरफ बढ़ता है — गेट अपने-आप खुलता है। एक लंबा साया अंदर आता है — काले कोट में, चेहरा आधा छिपा हुआ, आँखें खून जैसी लाल।)

अजनबी (धीमे स्वर में) बोला - 
“तो... आखिरकार करण सुर्यवंशी को इंसान बना दिया एक लड़की ने…”

(उसकी हँसी धीमी और डरावनी है। हवेली के दरवाज़े के पास मौजूद पुराने बल्ब टिमटिमाते हैं और बुझ जाते हैं।)
8
(अंदर सिमरन खिड़की के पास खड़ी है। उसे बाहर से हवा का झोंका महसूस होता है। वो पीछे मुड़ती है — करण किताब देख रहा है।)

सिमरन बोली - 
“करण जी… दरवाज़ा खुला क्यों है?”

(करण उठकर बाहर की ओर बढ़ता है। जैसे ही वो दरवाज़े के पास पहुँचता है, बिजली चमकती है — और उस चमक में वो परछाई दिखाई देती है। करण एक कदम पीछे हटता है।)

करण (कठोर आवाज़ में) बोला - 
“कौन हो तुम?”

(अजनबी आगे बढ़ता है — उसके होंठों पर हल्की मुस्कान।)

अजनबी बोला - 
“मुझे याद नहीं किया करण?
मैं वो हूँ… जिसे तुमने कुछ साल पहले छोड़ा था…
रूद्र।”

रुद्र अपना मास्क हटाता है।

(करण की आँखें चौड़ी हो जाती हैं। सिमरन चौंकती है।)

करण बोला - 
“रूद्र… तुम तो मर चुके थे!”

(रूद्र की हँसी हवेली में गूँजती है।)

रूद्र बोला - 
“मरा नहीं था करण… बस तुम्हारे धोखे से बिखर गया था।
अब लौटा हूँ… वो सब लेने जो मेरा था।
खासकर वो… जो अब तुम्हारी है।”

(उसकी नजरें सिमरन पर टिकती हैं। सिमरन के रोंगटे खड़े हो जाते हैं। करण तुरंत उसके सामने आकर खड़ा हो जाता है।)

करण बोला - 
“उसकी तरफ देखना भी मत रूद्र। अब मैं वो करण नहीं रहा।”

रूद्र (हँसते हुए) बोला - 
“मुझे पता है...
अब तुम इंसान बन चुके हो।
कमज़ोर, भावुक, और आसानी से टूटने वाले।”

(रूद्र की आँखें और गहरी लाल हो जाती हैं। वो हवा में तैरता हुआ करण के करीब आता है। एक झोंके से उसकी गर्दन पकड़ लेता है।)

रूद्र बोला - 
“याद है करण… जब हमने पहली बार इंसानी खून चखा था?
कैसा नशा था वो… अब तुझे फिर वही स्वाद चखाऊँगा…”

(सिमरन चीखती है — “करण जी!”
और पास रखी लोहे की मूर्ति उठाकर रूद्र पर फेंकती है। रूद्र गुस्से से उसे घूरता है।)

रूद्र बोला - 
“वो तेरी ढाल बनेगी करण?
तो पहले मैं तेरी ढाल को तोड़ दूँगा।”

(करण गुस्से से लाल हो जाता है, उसकी आँखों में फिर से वही लाल चमक लौट आती है। वो रूद्र की पकड़ से खुद को छुड़ाता है। उसकी नसें तन जाती हैं, दाँत नुकीले हो जाते हैं।)

करण (गरजते हुए) बोला - 
“तुम भूल गए रूद्र…
शैतान जब इंसान बनता है…
तो वो और भी ख़तरनाक हो जाता है।”

(दोनों एक-दूसरे पर टूट पड़ते हैं। हवेली की दीवारें हिलने लगती हैं। काँच टूटते हैं। सिमरन पीछे हटती है — उसकी आँखों में डर और दर्द दोनों हैं।)

“और शुरू हुई दो राक्षसों की लड़ाई…
एक के पास अमरता थी, दूसरे के पास इंसानियत…”

सिमरन चिल्लाती है — “बस करो!”

पर दोनों नहीं रुकते।)

“पर सवाल अब ये नहीं था कि कौन जीतेगा…
सवाल ये था — कौन बचेगा…”