Devil की दास्तान - 29 Sonam Brijwasi द्वारा नाटक में हिंदी पीडीएफ

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Devil की दास्तान - 29

करण अपनी हवेली के ऊपरी कमरे में खड़ा है। रात गहरी और चांदनी बहुत हल्की है। हवेली की खिड़कियों से हल्की-हल्की हवा आती है। कमरे में केवल उसकी साँसों की आवाज़ सुनाई दे रही है।)

"जब इंसान और शैतान का संगम एक ही हृदय में हो…
तो हर धड़कन एक जंग बन जाती है।
करण के भीतर भी वही हो रहा था — प्यार और प्यास के बीच।"

( उसकी आँखें लाल हैं, दाँत लंबे और नुकीले, हाथ हिल रहे हैं। वह अपने आप से लड़ रहा है।)

करण (भीतर से, खुद से लड़ते हुए, फुसफुसाते स्वर में) बोला - 
"नहीं... मैं उसे नुकसान नहीं पहुँचा सकता... मैं... मैं नियंत्रित कर लूँगा... मैं उसे कभी… कभी नहीं छूऊँगा!"

(वो पंख फैलाता है, कमरे के चारों ओर घूमता है, सांसें भारी हैं। उसकी नजरें अचानक दरवाजे की ओर जाती हैं — सिमरन कमरे में खड़ी है, मासूम चेहरा, आँखें उसकी तरफ़।)

"लेकिन जैसे ही सिमरन दिखाई दी…
करण का भीतर का शैतान जाग उठा।
लाल आँखों में प्यास की चमक बढ़ गई, दाँत बढ़ गए।
हर पल उसका मन चाहता कि वह उसका खून पी ले…"

(सिमरन कमरे के बीच में खड़ी है, unaware। करण धीरे-धीरे पास आता है, पर रुक जाता है, साँस रोककर।)

करण (अपने आप से जोर से, गुस्से और दर्द के मिश्रित स्वर में) 
बोला - 
"नहीं! मैं उसे नहीं मार सकता...
मैं शैतान भी हूँ और वैंपायर भी… लेकिन मैं उसे मार नहीं सकता...
बस थोड़ी सी प्यास... बस थोड़ी... नहीं! मैं खुद को रोक लूँगा!"

(वो दीवार से टिका बैठता है। उसकी पलकें झपकती हैं, हाथ हिल रहे हैं। अंदर की लाल प्यास और बाहर का प्यार दोनों के बीच उसका दिल फटा हुआ है।)

"करण की आत्मा टूट रही थी।
हर बार जब वह सिमरन को देखता, उसके भीतर का शैतान और वैंपायर प्यास से बौखलाता।
लेकिन प्यार, वही प्यार, उसे हर बार रोक देता।"

सिमरन (शांत, मासूम आवाज़ में) बोली - 
"करण जी… आप ठीक तो हैं?"

(करण झट से पलटता है। आँखें लाल, दाँत नुकीले — पर चेहरा दर्द में भरा।)

करण (धीरे, फुसफुसाते स्वर में) बोला - 
"हूँ… मैं ठीक हूँ… बस… खुद से लड़ रहा हूँ…
तुम्हारे सामने… मैं सिर्फ इंसान रहना चाहता हूँ…
हां मैं तुम्हें नहीं जानता तुम कौन हो फिर भी मैं तुम्हे नुकसान नहीं पहुंचा सकता।"

(सिमरन धीरे-धीरे उसकी तरफ बढ़ती है, हाथ फैलाती है। करण पीछे हटता है, फिर पलटकर दूर खड़ा हो जाता है।)

"यही था करण का सबसे बड़ा युद्ध —
वह जिसको प्यार करता था, वही उसका खून पीने की प्यास जगाता।
इंसान और शैतान की जंग, वैंपायर की प्यास और दिल के प्यार की लड़ाई —
एक ही पल में, एक ही हृदय में।"

( करण कमरे में घूमता है, लाल आँखें चमकती हैं। सिमरन थोड़ी पीछे हटती है। हवा में पंख फैलते हैं। )

रात का समय। हवेली में सन्नाटा फैला है। बाहर काले बादलों की गड़गड़ाहट सुनाई दे रही है। अंदर मोमबत्ती की लौ हिल रही है — करण खिड़की के पास खड़ा है, आँखों में बेचैनी, चेहरे पर संघर्ष।)

"रात फिर उतर आई थी...
और हर बार की तरह इस रात में करण की प्यास और भी बढ़ गई थी।
वो प्यास जो खून की नहीं, बल्कि सिमरन की मौजूदगी की थी…"

( सिमरन रसोई में खड़ी है, पानी पीने आती है। उसके कदमों की आहट करण के कानों में गूंजती है। उसकी साँसें तेज़ हो जाती हैं। लाल रोशनी उसकी आँखों में फैल जाती है।)

करण (अपने आप से फुसफुसाते हुए) बोला - 
“नहीं... आज नहीं... मैं उसे चोट नहीं पहुँचा सकता... पर ये... ये खुशबू...”

(वो खुद को रोकने की कोशिश करता है, पर धीरे-धीरे कदम बढ़ाने लगता है। हवा में उसकी परछाई दीवार पर लंबी हो जाती है। सिमरन कुछ महसूस करती है और पलटती है। करण उसके पीछे खड़ा है, आँखें लाल, दाँत नुकीले।)

सिमरन (धीरे से, मासूमियत से) बोली - 
“करण जी... फिर वही लाल आँखें क्यों?”

(करण कुछ नहीं बोलता। बस गहरी साँस लेता है, जैसे हर साँस उसके भीतर की आग को भड़का रही हो।)

“उसके भीतर का शैतान कह रहा था —
‘ले ले इसे... यही तेरी राहत है...
वैसे भी तू उसे नहीं जानता।’
और उसके दिल का इंसान पुकार रहा था —
‘मत छू उसे, यही तेरा प्यार है…
भले ही तू भूल गया पर दिल अभी भी उसके लिए ही धड़क रहा है।’”

(करण धीरे-धीरे सिमरन के करीब आता है। सिमरन डर के मारे पीछे हटती है, पर गिर जाती है। करण झुकता है, उसके बालों को हटाता है, उसकी गर्दन देखता है — और वहीं ठहर जाता है।)

करण (काँपती आवाज़ में) बोला - 
“सिमरन... मुझे... मुझे माफ़ कर देना...”

(वो उसकी गर्दन के पास आता है, पर अपने दाँत रोक लेता है। उसकी आँखों में आँसू हैं। सिमरन उसका चेहरा पकड़ती है।)

सिमरन (धीरे से) बोली - 
“अगर आप खुद को रोक नहीं पा रहे... तो मत रोकिए।
मैं आपसे अब डरती नहीं करण जी...”

(उसके शब्द सुनकर करण की आँखें भर आती हैं। वो टूट जाता है। उसकी नज़रों में दर्द, प्यास, और प्यार तीनों हैं।)

करण (फुसफुसाते हुए) बोला - 
“तुम समझती क्यों नहीं... अगर मैंने तुम्हें काट लिया... तुम... तुम मर जाओगी सिमरन…”

(सिमरन हल्की मुस्कान देती है, आँखें बंद करती है।)

सिमरन बोली - 
“अगर आपकी बाहों में मर भी गई...
तो भी मुझे डर नहीं लगेगा…”

(करण की आँखों से आँसू गिरते हैं। एक पल को वो अपने अंदर के वैंपायर के आगे हार जाता है। धीरे से झुकता है, उसके गले के पास जाता है... पर तभी — मंदिर की घंटियों की आवाज़ दूर से आती है!)

“वो आवाज़… जैसे किसी ने शैतान की जंजीर खींच दी हो…”

(करण झट से पीछे हटता है, ज़ोर से चिल्लाता है। उसकी आँखें फिर से इंसान जैसी हो जाती हैं। वो ज़मीन पर गिर जाता है।)

करण (दर्द में) बोला - 
“नहीं!... मैं तुम्हे नुकसान नहीं पहुंचा सकता !...”

(सिमरन उसके पास आती है, उसे पकड़कर रुलाती है। दोनों ज़मीन पर बैठे हैं, मोमबत्ती बुझ जाती है, कमरे में सिर्फ अंधेरा और उनके रोने की आवाज़ रह जाती है।)

"उस रात दो लोग रोए —
एक जिसने अपनी प्यास को हराया,
और दूसरी जिसने अपने प्यार को जिंदा रखा…"