रात का समय है। हवेली में गहरा सन्नाटा है।
बाहर तेज़ हवा चल रही है, बादलों के बीच से कभी-कभी चाँद झाँकता है।)
(करण अपने कमरे में अकेला बैठा है।
आईने के सामने, जहाँ उसका प्रतिबिंब बार-बार धुंधला पड़ता है —
कभी इंसान की तरह, कभी किसी शैतान की तरह।)
करण (अपने आप से, बुदबुदाते हुए) बोला -
“क्यों नहीं निकल रही वो यहाँ से?...
क्यों उसका चेहरा बार-बार मेरी आँखों के सामने आता है?...
वो इंसान है... और मैं...”
(उसकी आँखें धीरे-धीरे लाल होने लगती हैं।
आईने में उसका चेहरा बदलता है — तेज़ दाँत, लाल आँखें, और डरावना रूप।)
शैतानी आवाज़ (करण के अंदर से) बोली -
“तू भूल गया अपनी असलियत को, करण!
वो तेरी शिकार थी... तेरी ज़रूरत!”
(करण ज़ोर से चिल्लाता है और आईना तोड़ देता है।
आईने के टुकड़ों में उसका खून टपकता है।)
करण (गुस्से और दर्द में) बोला -
“नहीं!!! अब वो मेरी ज़रूरत नहीं... वो मेरी सज़ा है...
मेरी सज़ा... जिसने मुझे इंसान बना दिया!”
(वो घुटनों के बल बैठ जाता है।
उसकी साँसें तेज़ हैं, आँखों से आँसू गिर रहे हैं।
तभी दरवाज़ा धीरे से खुलता है — सिमरन अंदर आती है।)
सिमरन (धीरे से, काँपती आवाज़ में) बोली -
“करण जी... ये आवाज़ें कैसी थीं?... सब ठीक है?”
(करण पलटता है — उसके चेहरे पर पसीना और आँसू दोनों हैं।
वो जल्दी से सिर झुकाता है ताकि सिमरन उसकी आँखें न देख सके।)
करण (धीरे से) बोला -
“कुछ नहीं... बस... थोड़ा सर दर्द था।”
(सिमरन आगे बढ़ती है, उसके ज़ख्मी हाथ को पकड़ती है।
वो खून देखकर डर जाती है।)
सिमरन (आँखों में आँसू लिए) बोली -
“ये क्या किया आपने?... हर बार खुद को ही क्यों दर्द देते हैं?...”
(करण उसकी आँखों में देखता है — कुछ पल के लिए दोनों के बीच सन्नाटा।
फिर करण टूटे स्वर में कहता है —)
करण बोला -
“क्योंकि यही मेरा कर्म है...
मैं जहाँ जाता हूँ, वहाँ सुकून मर जाता है...
तुम्हें भी मुझसे दूर रहना चाहिए...”
(सिमरन सिर हिलाती है “ना” में।
वो उसका चेहरा पकड़कर धीरे से कहती है —)
सिमरन (धीरे से) बोली -
“अगर सुकून आपसे मरता है...
तो शायद प्यार उसे फिर से जिंदा कर देगा।”
(करण की आँखें नम हो जाती हैं।
उसके अंदर का शैतान जैसे पलभर के लिए शांत हो जाता है।
वो कुछ कह नहीं पाता, बस उसे देखता रह जाता है। जैसे उसे पुरानी यादें याद आ रहीं थीं।)
“उस पल, एक इंसान और एक शैतान के बीच जंग नहीं थी...
वो जंग थी — प्यार और नियति के बीच...”
(बाहर बारिश शुरू हो जाती है...
दोनों एक-दूसरे की तरफ देखते हैं —)
सुबह का समय है। हवेली के बाहर हल्की धूप फैली हुई है।
पंछियों की आवाज़ें हैं, लेकिन हवेली के अंदर सन्नाटा पसरा है।)
(सिमरन कमरे में अपने कपड़े समेट रही है।
बिस्तर के पास रखा छोटा बैग धीरे-धीरे भर रहा है।
उसकी आँखें सूजी हुई हैं — शायद पूरी रात सोई नहीं।)
सिमरन (धीरे से खुद से) बोली -
“अब बहुत हो गया... शायद भगवान यही चाहते हैं...
मैं अब और नहीं रह सकती यहाँ।”
(वो बैग की चेन बंद करती है।
पीछे से करण दरवाज़े के पास खड़ा सब देख रहा है — चुपचाप, बिना कुछ कहे।)
(उसके चेहरे पर कोई भाव नहीं, बस गहरी थकान और एक अनजाना डर।)
करण (धीरे से) बोला -
“जाने की तैयारी कर ली?”
सिमरन (सिर झुकाकर) बोली -
“हाँ... आपने कहा था न... जितनी जल्दी हो सके निकल जाऊँ।”
(कुछ सेकंड तक सन्नाटा।
सिर्फ घड़ी की टिक-टिक सुनाई देती है।)
करण (धीरे से, टूटी आवाज़ में) बोला -
“ठीक है... जैसा तुम चाहो...”
(सिमरन बैग उठाती है और दरवाज़े की तरफ बढ़ती है।
करण उसे जाता हुआ देखता है।
उसकी आँखों में कोई भाव नहीं, लेकिन अंदर कुछ टूट रहा है।)
(सिमरन दरवाज़े तक पहुँचती है — एक पल को रुकती है।
उसका मन काँपता है। वो पीछे मुड़कर करण को देखती है। उसे एक एक पल याद आ रहा था जब करण उसका हाथ पकड़ के शादी के बाद घर लाया था। शादी के बाद वो भागने की कोशिश कर रही थी जिसकी वजह से उसे चोट लग गई कैसे करण फिर उसे गोद में उठाकर लाया था। कैसे वो उसकी फिक्र करता था उसे प्यार करता था।)
सिमरन (धीरे से) बोली -
“आप... याद करने की कोशिश कीजिएगा...
कभी... अगर याद आए कि मैं कौन हूँ...?”
(करण कुछ नहीं बोलता। बस हल्की मुस्कान लाने की कोशिश करता है —
जो अधूरी रह जाती है।)
करण (बहुत धीमे स्वर में) बोला -
“शायद तुम वही हो...
जो मुझे इंसान बना सकती थी... पर मैं...”
(वो वाक्य अधूरा छोड़ देता है।
सिमरन उसकी आँखों में देखती है —
वहाँ गहरा दर्द और अकेलापन है।)
(वो धीरे से मुड़ती है और बाहर चली जाती है।
दरवाज़ा बंद होता है। हवेली के अंदर गूंज उठती है वो आवाज़ —
जैसे किसी के अंदर कुछ टूट गया हो।)
(करण वहीं खड़ा रह जाता है।
फिर धीरे से ज़मीन पर बैठ जाता है।
उसके हाथ काँप रहे हैं, आँखों से आँसू टपकते हैं।)
करण (धीरे से खुद से) बोला -
“कौन थी वो?... क्यों हर बार उसकी मुस्कान... मेरे अंधेरे में उजाला कर देती थी?...
क्यों लगता है... जैसे... मैं उसे पहले से जानता हूँ?”
(आईने के टूटे हुए टुकड़ों में उसका चेहरा दिखता है —
कभी इंसान, कभी दानव।)
“कभी-कभी यादें नहीं जातीं...
बस दिल के किसी कोने में छिप जाती हैं —
जब वक्त आता है, वही यादें इंसान को तोड़ देती हैं...”