Devil की दास्तान - 26 Sonam Brijwasi द्वारा महिला विशेष में हिंदी पीडीएफ

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Devil की दास्तान - 26

(रात का सन्नाटा फैला हुआ है। बाहर ठंडी हवा बह रही है।
कमरे में हल्की पीली रौशनी जल रही है। दीवारों पर परछाइयाँ कांप रही हैं।)

(सिमरन बिस्तर पर पड़ी है — चेहरा पसीने से भीगा हुआ, सांसें तेज़ चल रही हैं।
वो अपने पेट को पकड़कर तड़पती है।)

सिमरन (धीरे-धीरे कराहते हुए) बोली - 
“आह... भगवान... बहुत दर्द हो रहा है...
अब और नहीं सहा जाता...”

(वो करवट बदलने की कोशिश करती है लेकिन दर्द इतना ज़्यादा है कि आँसू अपने आप बह निकलते हैं।)

सिमरन (धीरे-धीरे रोते हुए) बोली - 
“कान्हा जी... बचा लो... अब नहीं सह पाऊँगी...”

(करण सो रहा होता है, लेकिन सिमरन की सिसकियाँ सुनकर वो चौंक जाता है।
वो तुरंत उठता है, कमरे की बत्ती जलाता है और उसके पास पहुँचता है।)

करण (घबराते हुए) बोला - 
“सिमरन! क्या हुआ? ये... ये क्या हो रहा है तुम्हें?”

(सिमरन दर्द से तड़पती है, उसकी आँखों से आँसू बह रहे हैं।)

सिमरन (कमज़ोर आवाज़ में) बोली - 
“दर्द... बहुत ज़्यादा दर्द है करण जी...
ऐसा लग रहा है जैसे... मर जाऊँगी इस दर्द से…”

(करण का चेहरा पहली बार डर से सफेद पड़ जाता है।
वो उसकी हालत देखकर सन्न रह जाता है। फिर जल्दी से उसके पास बैठ जाता है।)

करण (घबराहट में) बोला - 
“अरे... शान्त हो जाओ सिमरन... बस... बस, गहरी सांस लो... मैं हूँ ना यहाँ…”

(वो अपने हाथों से उसका सिर सहलाता है, उसके माथे से पसीना पोंछता है।
उसकी आँखों में पहली बार इंसानियत की झलक दिखती है।)

सिमरन (रोते हुए) बोली - 
“मुझे डर लग रहा है करण जी... बहुत दर्द है... मुझे बचा लीजिए…”

(करण का दिल भर आता है।
वो सिमरन को अपनी बाहों में खींच लेता है — पहली बार बिना गुस्से, बिना डर के।)

करण (धीरे से, काँपते स्वर में) बोला - 
“कुछ नहीं होगा... मैं हूँ तुम्हारे साथ...
अब कोई तुम्हें तकलीफ़ नहीं देगा... यहाँ तक कि तुम्हारा दर्द भी नहीं…”

(वो उसे अपने सीने से लगाए रखता है।
सिमरन उसके दिल की धड़कन सुनती है — धीमी, पर सच्ची।
उसकी सांसें थोड़ी स्थिर होने लगती हैं।)

(करण एक हाथ से उसकी पीठ सहलाता है और धीरे-धीरे उसकी आँखें बंद हो जाती हैं।
वो सो नहीं रही — बस दर्द से थोड़ी राहत पा रही है।)

करण (धीरे से फुसफुसाते हुए) बोला - 
“पता नहीं तुम मुझसे क्या चाहती हो?...
पर आज पहली बार... मैं तुम्हे खोने से डर रहा हूँ…”

(वो सिमरन के बालों को ठीक करता है, उसके माथे को चूमता है —
जैसे कोई सज़ा पा चुका शैतान पहली बार किसी फ़रिश्ते को छू रहा हो।)

“उस रात न जाने क्या टूटा, क्या जुड़ा...
पर इतना तय था —
दर्द सिमरन का था, और बेचैनी करण की…”

सुबह की हल्की धूप खिड़की से छनकर कमरे में आ रही है।
सिमरन की आँखें धीरे-धीरे खुलती हैं। उसके सिर के पास ठंडे पानी की पट्टी रखी है।
कमरे में सन्नाटा है, बस बाहर पक्षियों की हल्की आवाज़ें सुनाई दे रही हैं।)

(वो करवट लेकर देखती है — करण खिड़की के पास खड़ा है,
हाथ में कॉफी का कप लिए, पर नज़रें कहीं और हैं।
चेहरे पर एक अजीब सी सख़्ती, और आँखों में बेचैनी का सागर।)

सिमरन (धीरे से) बोली - 
“करण जी…”

(करण मुड़ता है, पर बिना मुस्कुराए बस ठंडे स्वर में जवाब देता है।)

करण बोला - 
“तुम उठ गईं?... तबियत कैसी है अब?”

सिमरन (कमज़ोर मुस्कान के साथ) बोली - 
“थोड़ी बेहतर है… आपने रात को…”

(वो बोलते-बोलते रुक जाती है। करण उसकी बात काट देता है।)

करण (कटे-फटे लहज़े में) बोला - 
“उसकी बात मत करो, सिमरन।”

(सिमरन चौंक जाती है। करण का चेहरा अब और भी कठोर हो गया है।)

करण (थोड़ा तेज़ स्वर में) बोला - 
“जो कुछ भी हुआ, वो ज़रूरी नहीं था…
तुम मुझे पूरी रात सोने नहीं दे रही थीं…
इसलिए मजबूरी में… जो किया, बस वही वजह थी।”

(सिमरन के चेहरे से मुस्कान गायब हो जाती है। उसकी आँखें नम हो जाती हैं।)

सिमरन (धीरे से, टूटी आवाज़ में) बोली - 
“मतलब... जो कुछ हुआ... उसमें कोई मतलब नहीं था आपके लिए?”

(करण कुछ पल चुप रहता है।
फिर जानबूझकर नज़रें फेर लेता है — शायद सच बोलने की हिम्मत नहीं है।)

करण (ठंडे स्वर में) बोला - 
“मतलब... कुछ नहीं था।
तुम बस बीमार थी... और अब ठीक हो जाओ तो निकल जाना यहाँ से।”

(सिमरन की आँखें भर आती हैं। वो अपनी चादर को कसकर पकड़ती है,
जैसे किसी ने उसका भरोसा तोड़ दिया हो।)

सिमरन (धीरे, आँखों में आँसू) लिए बोली - 
“मैं समझ गई...
आपके लिए मैं सिर्फ़ बोझ हूँ... एक मज़बूरी।”

(करण का चेहरा कठोर है, लेकिन अंदर कुछ टूट रहा है।
वो कुछ बोल नहीं पाता। बस चुपचाप बाहर निकल जाता है।)

(दरवाज़ा बंद होते ही सिमरन का चेहरा टूट जाता है।
वो तकिये में मुँह छिपाकर रोने लगती है।)

“कभी-कभी जो दिल के सबसे करीब होता है,
वो ही सबसे दूर चला जाता है…
करण ने अपने अंदर के डर को बचाने के लिए,
अपने प्यार को खो दिया…”

बाहर से हवा का झोंका आता है, खिड़की पर टंगी चुनरी उड़ती है…
जैसे खुद आसमान भी रो रहा हो।)

(चार दिन बीत चुके हैं।
हवेली में अब सन्नाटा पसरा हुआ है।
दीवारों पर लगी पुरानी तस्वीरों पर धूल जमी है, और हवा में अजीब सी ठंडक फैली है।)

(सिमरन अब भी वहीं है — पर पहले जैसी नहीं।
वो चुप रहती है, न मुस्कुराती है, न ज़्यादा बोलती है।
सुबह-सुबह पूजा करती है, फिर घर के कामों में लग जाती है।
करण उसे बस दूर से देखता है… कभी कुछ कहता नहीं।)

“चार दिन… पर हर दिन एक सदी जैसा लग रहा था…
करण के लिए भी… और सिमरन के लिए भी…”

(एक शाम, करण ऑफिस से लौटता है।
थका हुआ है, पर जैसे ही अंदर आता है — रसोई से आती खुशबू उसे रोक लेती है।
वो दरवाज़े पर रुकता है… सिमरन खाना बना रही है।
उसकी कमर पर बांधी साड़ी हवा में लहरा रही है, बाल थोड़ा खुले हैं।)

करण (धीरे से, खुद से) बोला - 
“क्यों नहीं जा रही ये अब तक?...”

(वो कमरे में आता है। सिमरन पलटती है — करण को देखकर झुककर बोलती है।)

सिमरन (धीरे से) बोली - 
“आप आ गए?... खाना गरम है, थाली लगा दूँ?”

(करण चुप रहता है, बस सिर हिलाता है।
वो उसके सामने बैठता है, और सिमरन चुपचाप परोसने लगती है।)

(कुछ पल सन्नाटा। बस बर्तनों की आवाज़।)

करण (धीरे, पर झिझकते हुए) बोला - 
“तुम... अब तक गई क्यों नहीं?”

(सिमरन थाली में परोसते हुए रुकती है।
फिर नज़रें झुका लेती है, और धीमे स्वर में कहती है।)

सिमरन बोली - 
“शायद... इस घर से जाने को मेरा मन नहीं मान रहा...”

(करण उसकी बात सुनकर कुछ पल चुप रहता है।
फिर थोड़ा तीखे लहज़े में बोलता है — जैसे खुद से बचने की कोशिश कर रहा हो।)

करण बोला - 
“मन नहीं मान रहा... या कोई और वजह है?”

(सिमरन उसकी आँखों में देखती है —
वो दर्द, वो मासूमियत, जो करण ने पहले कभी नहीं देखी थी।)

सिमरन (धीरे से) बोली - 
“वजह वही है... जो आपको भी समझ नहीं आ रही।”

(करण का चेहरा सख्त था, पर उसकी आँखों में हल्की कंपकंपी आ गई।
वो नज़रें फेर लेता है, और धीरे से उठकर चला जाता है।)

(सिमरन पीछे मुड़कर देखती है —
उसकी आँखों में आँसू हैं, पर होंठों पर एक हल्की मुस्कान।)

“कभी-कभी मोहब्बत को बोलने के लिए शब्द नहीं चाहिए होते…
बस चार दिन की चुप्पी ही काफी होती है यह जताने के लिए —
कि दिल अब भी धड़कता है… किसी के लिए…”

हाथ में वही कॉफी का कप… पर इस बार उसकी नज़रें अंदर की तरफ हैं…
जहाँ सिमरन है।)