Devil की दास्तान - 25 Sonam Brijwasi द्वारा नाटक में हिंदी पीडीएफ

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Devil की दास्तान - 25

(सिमरन धीरे-धीरे आँखें खोलती है।
वो करवट बदलती है — तभी देखती है, सामने करण खड़ा है।
उसकी लाल आँखें हल्के ग़ुस्से से चमक रही हैं।
हाथ में एक छोटा बैग है — जैसे उसे बाहर भेजना चाहता हो।)

करण (ठंडे स्वर में) बोला - 
“उठो... और निकलो यहाँ से।”

(सिमरन घबराकर उठने की कोशिश करती है, लेकिन जैसे ही खड़ी होती है —
वो अचानक ‘धड़ाम’ से ज़मीन पर गिर पड़ती है।)

(उसके मुँह से दर्द भरी सिसकी निकलती है।)

सिमरन (कराहते हुए) बोली - 
“आह... मेरी... मेरी कमर... हाथ... पैर... सब दुख रहे हैं...”

(करण पहले तो चुप रहता है, लेकिन जब उसकी नज़र सिमरन पर पड़ती है —
वो चौक जाता है।)

(सिमरन की साड़ी पर लाल धब्बे हैं — खून के।
करण की आँखें चौड़ी हो जाती हैं।)

करण (थोड़ी झुंझलाहट में) बोला - 
“ये क्या है?... तुम्हारी साड़ी पर खून...?”

(सिमरन सकपका जाती है।
उसका चेहरा शर्म से लाल पड़ जाता है।
वो झट से नीचे नज़र झुका लेती है।)

करण (थोड़ा घबराते हुए, पर सख्त लहज़े में) बोला - 
“देखो... वॉशरूम जाओ... साफ़ करो खुद को।
तुम्हारी साड़ी पर हर जगह खून लगा हुआ है।”

(सिमरन जल्दी से अपनी नज़रें नीची कर लेती है,
चेहरा शरम और असहजता से भर जाता है।)

सिमरन (धीरे से, टूटी आवाज़ में) बोला - 
“वो... वो... मेरा mounth... टाइम है...”

(करण कुछ पलों के लिए चुप हो जाता है —
उसकी लाल आँखें अब ग़ुस्से से नहीं, हैरानी से देख रही हैं।
वो थोड़ा पीछे हटता है, फिर गहरी साँस लेता है।)

करण (धीरे स्वर में) बोला - 
“ठीक है... अब कुछ मत बोलो।
अभी तुम्हारी तबीयत ठीक नहीं है...
इसलिए यहीं रहो।
जब ठीक हो जाओ... चली जाना।”

(सिमरन कुछ नहीं कहती, बस सिर हिला देती है।
वो धीरे से उठकर अलमारी खोलती है।
अंदर से एक पैकेट निकालती है — सैनेटरी पैड का।)

(करण उसे ध्यान से देखता है — उसकी भौंहें तन जाती हैं।)

करण (सवालिया लहज़े में) बोला - 
“ये... ये यहाँ कैसे आया?...”

(सिमरन शरमाते हुए, धीमे स्वर में जवाब देती है —)

सिमरन बोली - 
“बोला था न... मैं आपकी पत्नी हूँ...
तो मैंने अपना थोड़ा-सा सामान यहाँ रख दिया था।”

(करण की भौंहें और चढ़ जाती हैं।
वो कुछ कहना चाहता है, पर रुक जाता है।
उसकी आँखों में पहली बार ग़ुस्से और उलझन के साथ-साथ
एक अजीब-सी झिझक भी दिखती है।)

(वो मुँह फेर लेता है, फिर धीरे से कहता है —)

करण (धीरे स्वर में) बोला - 
“आराम करो... मैं बाहर जा रहा हूँ।”

(सिमरन सिर झुका लेती है।
वो महसूस करती है कि करण का लहज़ा थोड़ा बदला है —
उस ग़ुस्से में अब एक हल्का सा “ख़याल” भी छिपा है।)

“कभी-कभी राक्षस के दिल में भी इंसानियत की झलक आ जाती है...
वो जो ख़ून देखकर प्यासा हो जाता था...
आज उसी खून से किसी की तकलीफ़ देख बेचैन था…”

(सिमरन खिड़की के पास बैठी है, सूरज की रोशनी में उसका चेहरा दिखता है —
थकान, शर्म और एक छोटी-सी उम्मीद साथ में।)

दोपहर का वक़्त है। कमरे में हल्की धूप फैल रही है।
सिमरन खिड़की के पास बैठी है, बालों में हल्की हवा खेल रही है।
चेहरे पर थकान है लेकिन आंखों में शांति की झलक।)

(करण कमरे से बाहर गया हुआ है।
टेबल पर उसके लिए पानी और कुछ दवा रखी है — जो करण ने ही रखी थी।
सिमरन उन चीज़ों को देखती है और होंठों पर हल्की मुस्कान आ जाती है।)

सिमरन (धीरे से, मन ही मन) बोली - 
“भगवान जी... धन्यवाद...
आपने मुझे थोड़ा और वक्त दे दिया...
शायद अब मैं करण जी को ठीक कर सकूं...
उन्हें उनकी यादें... उनका दिल... सब लौटा सकूं।”

(उसकी आंखों में चमक आ जाती है।
वो धीरे से उठती है और कमरे में करण की तस्वीरों को देखने लगती है।
दीवार पर लगी एक पुरानी फोटो में करण और सिमरन साथ खड़े 
हैं —
हंसते हुए, खुश... जैसे वो वक्त किसी और जन्म का हो।)

सिमरन (धीरे से तस्वीर छूते हुए) बोली - 
“कभी तो आप ऐसे ही मुस्कुराते थे...
अब बस आपके अंदर वो मुस्कान फिर से जगानी है...”

(वो दवा की शीशी उठाकर देखती है, फिर धीरे से रख देती है।
आवाज़ आती है — दरवाज़ा खुलने की।)

(करण अंदर आता है — हाथ में दूध का गिलास लिए हुए।)

करण (थोड़ा झिझकते हुए) बोला - 
“ये... तुम्हारे लिए है...
डॉक्टर ने कहा था... इस वक्त कुछ गर्म पीना ठीक रहेगा।”

(सिमरन हैरान होकर उसकी तरफ देखती है।
पहली बार करण के चेहरे पर थोड़ी नरमी दिखाई देती है।)

सिमरन (धीरे से, मुस्कुराते हुए) बोली - 
“धन्यवाद... करण जी।”

(करण कुछ नहीं कहता, बस हल्के से सिर हिलाता है।
वो खिड़की के पास जाकर खड़ा हो जाता है — बाहर अंधेरा छा रहा है।)

(सिमरन उसे देखती है —
अब उसके अंदर डर नहीं, बस एक दृढ़ निश्चय है।)

सिमरन (मन ही मन) बोली - 
“भगवान जी... बस इतना कर दो कि मैं करण जी को उनके अंधेरे से निकाल सकूं...
उन्हें याद दिला सकूं कि वो कौन थे... और मैं कौन हूँ उनके लिए…”

(उम्मीद और दुआ का एहसास जगाती है।
सिमरन की आँखों से एक आँसू गिरता है — पर इस बार दर्द का नहीं, विश्वास का।)

“कभी-कभी इंसान को बचाने के लिए चमत्कार नहीं,
सिर्फ थोड़ी सी ‘उम्मीद’ और ‘प्यार’ ही काफी होते हैं…”

(खिड़की के बाहर आसमान में बादलों के बीच से सूरज की एक किरण निकलती है।
वो सीधा सिमरन के चेहरे पर पड़ती है — जैसे भगवान ने उसकी बात सुन ली हो।)

सुबह का वक़्त है। हल्की धूप खिड़की से अंदर आ रही है। कमरे में सन्नाटा है।)
(सिमरन रसोई में काम कर रही है — पर उसके चेहरे पर थकान साफ झलक रही है। पेट पकड़कर वो एक पल को रुकती है, गहरी सांस लेती है, फिर खुद को संभाल लेती है।)

(दूसरी तरफ करण — कमरे के बाहर दीवार के पीछे छिपकर सब देख रहा है। उसकी आंखों में शंका है, जिज्ञासा है, और कहीं न कहीं एक अजीब-सी बेचैनी भी।)

करण (धीरे से खुद से) बोला - 
“ये दिनभर कुछ न कुछ सोचती रहती है...
कभी रोती है, कभी खुद से बातें करती है...
क्या चाहती है आखिर ये लड़की? कौन है ये मेरे लिए?”

(सिमरन धीमे कदमों से कमरे में आती है। उसके हाथ में करण के लिए पानी का गिलास है।
वो रखकर जाने लगती है, तभी करण बोल उठता है —)

करण (कड़क आवाज़ में) बोला - 
“रुको।”

(सिमरन ठिठक जाती है। धीरे-धीरे उसकी ओर मुड़ती है।)

करण बोला - 
“क्या बात है? आजकल बहुत खोई-खोई सी रहती हो।
कुछ छिपा रही हो मुझसे?”

(सिमरन गहरी सांस लेती है, हल्की मुस्कान के साथ जवाब देती
है —)

सिमरन बोली - 
“कुछ नहीं... बस थकान है थोड़ी सी।”

(करण की आंखें थोड़ी सिकुड़ जाती हैं, जैसे वो झूठ पकड़ने की कोशिश कर रहा हो।
पर सिमरन नज़रे झुका लेती है और धीरे से कमरे से बाहर चली जाती है।)

(जैसे ही सिमरन बाहर जाती है, करण धीरे-धीरे उसके पीछे कदम बढ़ाता है।
वो दिनभर सिमरन पर नज़र रखता है — कभी खिड़की से, कभी शीशे में उसके प्रतिबिंब से।)

(सिमरन आंगन में बैठी है —
कान्हा की छोटी मूर्ति के सामने — हाथ जोड़कर, गहरी सोच में डूबी हुई।)

सिमरन (मन ही मन) बोली - 
“कैसे करूं इन्हें ठीक...?
ये खुद को भी नहीं पहचानते...
और अब ये दर्द... ये शरीर भी साथ नहीं दे रहा...
लेकिन नहीं... हार नहीं मानूंगी...
ये लड़ाई आखिरी सांस तक चलेगी...”

(वो धीरे से अपने पेट को सहलाती है, दर्द की लहर उसके चेहरे पर साफ दिखती है।
पर फिर भी वो भगवान की मूर्ति को देखकर मुस्कुराने की कोशिश करती है।)

(करीब में करण खड़ा है — छिपकर।
वो सिमरन को देखता है और कुछ पल के लिए उसका चेहरा नरम पड़ जाता है।)

करण (धीरे से खुद से) बोला - 
“अजीब है ये लड़की...
इतना दर्द झेलकर भी मुस्कुरा लेती है...
क्यों?”

(हवा में कान्हा जी की घंटियों की हल्की आवाज़ गूंजती है।
सिमरन आंखें बंद करके प्रार्थना करती है।
करण उसकी ओर देखता रहता है — जैसे किसी अनकहे खिंचाव में बंध गया हो।)

“कभी-कभी निगाहें सिर्फ देखने के लिए नहीं होतीं...
वो किसी की आत्मा तक उतर जाती हैं...
और वहीं से शुरू होती है ‘बदलाव’ की शुरुआत…”