(जंगल में गहरा सन्नाटा छाया है।
पेड़ों के बीच से धुंध की परतें निकल रही हैं।
18 साल की मासूम सिमरन अभी भी करण की गोद में निढाल पड़ी है।
उसकी साँसें थम चुकी हैं। करण की आँखों से लगातार आँसू बह रहे हैं।)
करण (टूटे स्वर में, काँपती आवाज़ में) बोला -
“सिमरन... उठो न... देखो मैं यहाँ हूँ...
तुमसे मुझसे वादा किया था कि कभी मुझे अकेला नहीं छोड़ेगी...”
(वो सिमरन के चहरे को पागलों की तरह बार-बार चूमता है,
पर कोई हरकत नहीं होती। उसकी साँसें अब पूरी तरह रुक चुकी हैं।)
“वो इंसान थी... और वो राक्षस...
दोनों का मिलन तो किस्मत के खिलाफ़ था...”
(करण का चेहरा ग़ुस्से और दर्द से भर जाता है।
उसकी आँखों की लाल चमक और तेज़ हो जाती है।
अचानक पेड़ों के पीछे से कई परछाइयाँ नज़र आती हैं —
करण की बिरादरी के साये — लंबी कद-काठी, लाल आँखें, काले लबादे।)
पहला साया (कर्कश आवाज़ में) बोला -
“करण... तूने जो किया... वो हमारी जाति के खिलाफ़ था...
इंसान का खून पीना एक बात थी...
पर उसके लिए रोना — ये हमारी बेइज़्ज़ती है!”
(करण ग़ुस्से से उनकी तरफ़ देखता है। उसकी आँखों में आग जल उठती है।)
करण (गरजते हुए) बोला -
“चुप रहो तुम!!!
अगर तुम्हें इंसानियत समझ में नहीं आती...
तो कम से कम प्यार की क़द्र तो करो!”
दूसरा साया (ठंडी हँसी के साथ) बोला -
“प्यार?... हमारे लिए प्यार एक मज़ाक है, करण...
वो अब मर चुकी है...
उसकी लाश हमें दे दे... हम उसे अपने तरीक़े से ठिकाने लगा देंगे।”
(करण धीरे-धीरे सिमरन को और कसकर अपनी बाँहों में भर लेता है।
उसकी साँसें भारी हो जाती हैं, पर आँखों में दृढ़ता झलकती है।)
करण (दाँत भींचते हुए) बोला -
“लाश?... ये लाश नहीं है...
ये मेरी सिमरन है... मेरी साँसों की वजह...”
(उसके पीछे बिजली की चमक होती है, हवा और तेज़ हो जाती है।
पेड़ हिलने लगते हैं, ज़मीन पर पत्ते उड़ने लगते हैं।)
तीसरा साया (ग़ुस्से में) बोला -
“करण, तू हमारी बिरादरी से गद्दारी कर रहा है!
एक इंसान के लिए तू अपने अस्तित्व को मिटा देगा?”
(करण धीरे से सिमरन को उठाता है,
और अपनी लाल आँखों से उन्हें घूरते हुए कहता है —)
करण (दहाड़ते हुए) बोला -
“अगर मेरा अस्तित्व उसकी मौत पर टिका है...
तो मैं बिना अस्तित्व के ही रह लूँगा!”
(वो अपने विशाल पंख फैलाता है,
सिमरन को सीने से लगाकर तेज़ी से आकाश की ओर उड़ जाता है।
पेड़ों की टहनियाँ टूटती हैं, पत्ते उड़ते हैं।)
“उस रात करण ने सिर्फ़ अपनी बिरादरी से नहीं,
अपने नियति से भी बग़ावत कर दी थी...”
(नीचे से उसके बिरादरी के तीनों साये हवा में उछलते हैं,
लाल रोशनी के साथ उसके पीछे-पीछे उड़ने लगते हैं।
करण और सिमरन बादलों के पार निकल रहे हैं —
एक तरफ़ वफ़ादारी, दूसरी तरफ़ प्यार की जंग छिड़ चुकी है।)
“आसमान में उड़ता वो राक्षस...
आज पहली बार किसी इंसान के लिए देवता बन गया था…
(रात का समय है।
आसमान में बादल छाए हुए हैं।
हवा में धूल और पत्तों की सरसराहट है।
करण थका हुआ, लहूलुहान, टूटा हुआ सिमरन को अपनी बाहों में उठाए चला जा रहा है।)
“वो अब लड़ नहीं सकता था...
उसकी ताक़त जवाब दे चुकी थी...
पर उसका दिल — अब भी सिमरन की साँसों से बँधा था…”
(आगे एक प्राचीन मंदिर दिखाई देता है — ऊँचे शिखर, घंटियों की मंद आवाज़, दीपक की लौ।
सिमरन की निढाल देह को सीने से लगाकर करण मंदिर की सीढ़ियों पर चढ़ने लगता है।)
करण (थकी, काँपती आवाज़ में) बोला -
“सिमरन... देखो, तुम्हारे भगवान जी आ गए...
अब तुम्हे वही बचाएंगे…”
(वो सिमरन को उठाकर मंदिर के द्वार के पास पहुँचता है।
जैसे ही कदम भीतर रखने की कोशिश करता है —
अचानक ज़ोरदार चिंगारी सी उठती है। करण के हाथों में जलन होती है।)
करण (चीखकर) बोला -
“आह्ह!!”
(वो पीछे गिर पड़ता है। उसके हाथ से धुआँ उठ रहा है।
वो घुटनों के बल गिर जाता है, पर सिमरन को अब भी सीने से लगाए हुए है।)
“एक शैतान... भगवान के दरवाज़े तक तो पहुँच सकता था...
पर भीतर कदम नहीं रख सकता था…”
(करण की आँखों से आँसू बहने लगते हैं।
वो मंदिर की चौखट पर बैठ जाता है, सिमरन को सीने से लगाकर रोने लगता है। वो बिल्कुल पागल सा हो चुका था।)
करण (फूट-फूटकर रोते हुए) बोला -
“हे भगवान... मैं आपकी मर्यादा नहीं तोड़ूँगा...
पर आप मेरी एक विनती सुन ले...
इसकी साँसें लौटा दे... ये आपका नाम लेती है हर पल…”
(उसके आँसू ज़मीन पर गिरते हैं, मंदिर की सीढ़ियों पर खून और आँसुओं का मेल बहता है।
अंदर मंदिर की घंटियाँ अपने आप बजने लगती हैं। हवा थम जाती है।)
“कभी-कभी... भगवान भी राक्षस की प्रार्थना सुन लेते हैं...
क्योंकि उस पल वो राक्षस नहीं... प्रेमी होता है…”
(करण सिमरन के सिर पर हाथ रखता है, उसकी आँखों में प्रार्थना और पछतावा दोनों हैं।
वो काँपती आवाज़ में बोलता है —)
करण (फुसफुसाते हुए) बोला -
“मुझे सज़ा दे दो...
पर इसे जीवन दे दो ...
ये निर्दोष है... ये आपकी है...
पाप तो मैने किए हैं ना शैतान तो मैं हूं ना तो सजा मुझे मिलनी चाहिए।
इसमें इस मासूम की क्या गलती है?”
(अचानक मंदिर के अंदर दीपक की लौ तेज़ जलने लगती है।
शंख बज उठता है। करण आँखें बंद कर लेता है।)
“वो जो देवालय के बाहर बैठा था,
शायद पहली बार भगवान और पाप दोनों को एक साथ झुका रहा था…”
(धीरे-धीरे मंदिर की चौखट से हल्की सुनहरी रोशनी निकलती है,
जो सिमरन के शरीर पर गिरती है। करण हैरानी से देखता है —
सिमरन की उँगलियाँ हल्की सी हिलती हैं…)
करण (टूटे स्वर में, काँपते हुए) बोला -
“सि...सिमरन?...”
(वो उसकी नब्ज़ टटोलता है।
धीरे से उसकी साँसें चलने लगती हैं — बहुत हल्की, मगर ज़िंदा।
करण की आँखों से आँसू बह पड़ते हैं, और वो ज़मीन पर झुककर मंदिर की तरफ़ सिर झुका देता है।)
करण (फूटते हुए स्वर में) बोला -
“धन्यवाद... भगवान जी... आपके मेरी सिमरन लौटा दी… सही कहती है सिमरन की उसके भगवान के घर देर है अंधेर नहीं।”
मंदिर की घंटियाँ गूँजती हैं,
और हवा में बस एक सच्चे प्यार की महक रह जाती है।)