Devil की दास्तान - 19 Sonam Brijwasi द्वारा महिला विशेष में हिंदी पीडीएफ

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Devil की दास्तान - 19

(काली रात... जंगल के पेड़ों से हवा टकरा रही है। झींगुरों की आवाज़ गूँज रही है।
सिमरन करण को किसी तरह एक पुराने पेड़ के नीचे ले आती है।
करण घायल है, उसकी साँसें टूटी-टूटी सी चल रही हैं।)

सिमरन (रोते हुए) बोली - 
“करण जी... आ आप कुछ बोल क्यों नहीं रहे?... मेरी तरफ देखिए। ... आपके ज़ख्म... इतना खून...। हेभगवान...मैं क्या करूं?”

(वो काँपते हाथों से करण का चेहरा थामती है। करण की आँखें बंद हैं, होंठ सूखे हुए हैं।)

सिमरन (घबराकर) बोली - 
“मुझे कुछ समझ नहीं आ रहा... मैं क्या करूँ?...
भगवान! कोई तो रास्ता दिखा दो...”

(वो इधर-उधर भागती है, पत्ते तोड़ती है, झील का थोड़ा पानी लाकर करण के माथे पर डालती है।
उसका चेहरा धुँधला-सा चमकता है, जैसे रोशनी और अंधकार का संगम हो।)

करण (कमज़ोर आवाज़ में) बोला - 
“ सिमरन... मत भागो... मुझे छोड़कर मत जाओ... मैं तुम्हारे बिना नहीं रह पाऊंगा...सिमरन... यहीं रहो...”

(सिमरन तुरंत उसके पास वापस आती है, उसके सामने ज़मीन पर बैठ जाती है। वो करण का चेहरा अपने करीब करती है। उसके आँसू करण के चेहरे पर गिरते हैं।)

सिमरन (फूट-फूट कर रोते हुए) बोली - 
“मुझे डर लग रहा है करण जी... बहुत ज़्यादा...
आप ऐसे क्यों हैं?... आप इंसान क्यों नहीं बन सकते?...”

(करण अपनी आधी खुली आँखों से सिमरन को देखता है। उसकी आँखों में दर्द और लाचारी है।)

करण (धीरे से) बोला - 
“शायद... मैं इंसान  नहीं हूं सिमरन... मैं शैतान हूं...”

सिमरन (काँपती आवाज़ में) बोली - 
“नहीं करण जी... आप झूठ बोल रहे हैं...
अगर आपके अंदर इंसान नहीं होता...
तो आप मुझे आज नहीं बचते... मुझे मार देता ना
इतने दिनों तक मुझे जिंदा नहीं रखते!”

(करण उसके शब्द सुनकर चुप हो जाता है। सन्नाटा छा जाता है।
चारों ओर बस पत्तों की सरसराहट और सिमरन की सिसकियाँ हैं।)

“कभी-कभी इंसानियत का मतलब जानवर से लड़ना नहीं होता...
बल्कि अपने अंदर के शैतान को रोक लेना होता है।”

(सिमरन करण के ज़ख्मों पर अपनी साड़ी की पट्टी बाँधती है,
काँपते हाथों से उसके माथे को सहलाती है।)

सिमरन (धीरे से, बच्चों की तरह) बोली - 
“अब कुछ नहीं होगा... आप बस सो जाइए... मेरी बाहों में...सब ठीक हो जाएगा...”

(वो उसकी बाहों में कैद हो जाता है, और सिमरन खुद भी रोते-रोते थककर शांत हो जाती है।
चाँद बादलों के पीछे छिप जाता है। हवा थम जाती है।)

“उस रात जंगल में एक शैतान घायल पड़ा था...
और उसके सीने पर एक मासूम लड़की अपनी मोहब्बत के आँसू बहा रही थी।”

(करण हल्का-सा मुस्कुराता है — बहुत हल्का —
शायद पहली बार उसके चेहरे पर इंसानियत झलकती है।)

रात का सन्नाटा... पेड़ों के पीछे से चाँद की हल्की किरणें छनकर करण और सिमरन पर पड़ रही हैं।
करण ज़मीन पर बैठा है — उसका शरीर ज़ख्मों से भरा है, साँसे भारी हैं।
सिमरन उसके सामने घुटनों के बल बैठी है, आँखों से आँसू बह रहे हैं।)

सिमरन (रोते हुए) बोली - 
“करण जी... आप बोल क्यों नहीं रहे?...
आपकी हालत हर पल बिगड़ती जा रही है... आप ठीक कैसे होंगे?”

(करण नज़रें झुका लेता है। उसके चेहरे पर दर्द और झिझक दोनों हैं।)

करण (धीरे से) बोला - 
“सिमरन... ये सवाल मत पूछो... तुम नहीं समझोगी...”

सिमरन (जिद्दी लहज़े में) बोली - 
“मुझे सब समझना है!
अगर मैं आपका साथ दे सकती हूँ तो आपके दर्द को भी बाँट सकती हूँ! शादी के सात वचन निभाने हैं मुझे।”

(करण की आँखों में एक पल को नमी आ जाती है। वो धीरे से कहता है:)

करण (धीरे, टूटे स्वर में) बोला - 
“एक ही रास्ता है... मुझे... तुम्हारा... थोड़ा-सा खून पीना होगा...”

(सिमरन हैरान, पर उसके चेहरे पर डर नहीं — बस अपनापन और मासूम मुस्कान है।)

सिमरन (हल्की मुस्कान के साथ) बोली - 
“तो पी लीजिए...
वैसे भी... आप तो हमेशा कहते थे... कि एक दिन मेरा खून पी लेंगे... आप मैं खुद बोल रही हूं, बुझा लीजिए अपनी प्यास।”

(करण के चेहरे पर सन्नाटा छा जाता है। उसकी लाल आँखों में आँसू भर आते हैं।)

करण (काँपती आवाज़ में) बोला - 
“सिमरन... तुम नहीं जानती... मैं क्या हूँ...
अगर मैंने तुम्हारा खून पी लिया... तो शायद तुम...”

(वो आगे नहीं बोल पाता। उसके शब्दों के साथ उसका गला भर आता है।
सिमरन उसका चेहरा पकड़कर अपने करीब करती है।)

सिमरन (धीरे से, भरोसे से) बोली - 
“मुझे डर नहीं लगता करण जी...
क्योंकि आप मुझे कभी नुकसान नहीं पहुँचा सकते...
आपको अंदर शैतान से ज़्यादा इंसान है।”

(करण के चेहरे पर एक आँसू लुढ़क जाता है।
उसके हाथ काँप रहे हैं। वो झुकता है... सिमरन की गर्दन के पास आता है...
पर अगले ही पल पीछे हट जाता है।)

करण (चीखकर) बोला - 
“नहीं!... मैं नहीं कर सकता!...
मैं तुम्हारा खून नहीं पी सकता!”

(सिमरन की आँखों में हैरानी, फिर आँसू। वो करण का चेहरा पकड़ती है।)

सिमरन (रोते हुए) बोली - 
“अगर मेरा मेरा खून नहीं पीएगा तो आप मर जाएंगे...
और मैं आपको मरने नहीं दूँगी!
2 ही दिन तो हुए हैं हमारी शादी को ।”

(रात अब और भी गहरी हो चुकी थी। पेड़ों के साए हिल रहे थे।
सिमरन की आँखों में आँसू थे, पर उसमें डर नहीं — बस एक अटूट भरोसा था।
करण उसके सामने बैठा था, टूट चुका था अंदर से।)

सिमरन (धीरे लेकिन दृढ़ स्वर में) बोली - 
“करण जी... आप बोले ना बोले, मैं जानती हूँ —
अगर आपने मेरा खून नहीं पिया... तो आप मर जाओगे…”

(करण की आँखें काँप उठीं, उसके होंठ थरथराने लगे।)

करण (रुआंसा होकर) बोला - 
“सिमरन... मैं नहीं कर सकता...
मैं तुम पर वो ज़ुल्म नहीं कर सकता…
क्योंकि.....”

(सिमरन उसकी बात काटती है — उसकी आँखों में आँसू हैं पर आवाज़ में ज़िद है।)

सिमरन बोली - 
क्योंकि क्या करन जी यही की आप मेरे पति हो।

सिमरन (कसम खाते हुए) बोली - 
“अगर अपने मेरा खून नहीं पिया तो मैं खुद अपनी जान दे दूँगी।
आपके सामने, इसी पल।”

(करण सन्न रह जाता है। उसकी आँखों से आँसू टपकने लगते हैं।)

करण (रोते हुए) बोला - 
“सिमरन… पागल मत बनो…
तुम्हे नहीं पता मैं क्या कर सकता हूँ…”

सिमरन (शांत लेकिन दर्द भरी आवाज़ में) बोली - 
“मुझे सब पता है...
फिर भी मैं आपसे अब डरती नहीं...
क्योंकि आप शैतान नहीं... आप मेरे करण जी हैं…”

(करण अब टूट चुका था। वो उसके पास झुकता है, सिसकियाँ लेता है।)

“उस पल... करण के सामने दो रास्ते थे —
एक, उसे मरते देखना...
या... उसकी रूह को छू लेना...”

(करण काँपते हाथों से उसके चेहरे को छूता है। सिमरन हल्की मुस्कान देती है और आँखें बंद कर लेती है।)

सिमरन (धीरे से) बोली - 
“पी लीजिए करण जी... जितना ज़रूरी हो उतना... बुझा लीजिए अपनी प्यास।”

(वो उसकी पीठ को कसकर पकड़ लेती है। करण की आँखें लाल हो जाती हैं।
वो धीरे-धीरे उसकी गर्दन की तरफ झुकता है…
फिर — उसके दाँत उसकी गर्दन में धँस जाते हैं।)

(सिमरन हल्के से सिसकारती है, उसका चेहरा दर्द से भर उठता है।
पर वो चुप रहती है। उसकी उँगलियाँ करण की पीठ को कसकर पकड़ लेती हैं।
करण का शरीर काँप रहा है, उसकी साँसें तेज़ हैं,
वो हर बूंद खून के साथ अंदर से टूट रहा है...)

“वो पी तो रहा था... पर हर बूंद के साथ खुद को मार भी रहा था…”

(कुछ पल बाद करण पीछे हटता है — उसकी आँखें धुँधली हैं, होंठों पर खून की एक पतली रेखा।
वो पीछे गिर पड़ता है, ज़मीन पर…
सिमरन उसे थाम लेती है।)

सिमरन (कमज़ोर आवाज़ में) बोली - 
“करण जी… आप... ठीक हैं न?”

(करण की साँसे अब सामान्य हो रही हैं। उसकी आँखें अब लाल हैं।)

करण (धीरे से, टूटी आवाज़ में) बोला - 
“तुमने मुझे बचा लिया सिमरन...
पर मैं तुझे दर्द दे बैठा...”

(सिमरन मुस्कुराती है, आँखें धीरे-धीरे बंद होने लगती हैं।)

सिमरन (धीरे से फुसफुसाती हुई) बोली - 
“अगर आपकी ज़िंदगी मिली...
तो ये दर्द भी क़ीमत बन जाएगा…”

(वो उसके सीने पर गिर जाती है — बेहोश।
करण उसे गोद में लेकर चिल्ला उठता है।)

करण (रोते हुए, आकाश की ओर देखकर) बोला - 
“क्यों... हर बार जो मैं चाहता हूँ... वो दर्द बन जाता है!”

(चाँदनी अब दोनों पर पड़ रही है...
एक इंसान, एक शैतान — और उनके बीच सिर्फ़ खून की एक लकीर...)

(जंगल के बीच सन्नाटा छाया हुआ है।
रात की ठंडी हवा पेड़ों की टहनियों को हिला रही है।
ज़मीन पर गिरे हुए पत्तों पर करण और सिमरन बैठे हैं —
सिमरन बेहोश पड़ी है, उसका चेहरा पीला पड़ गया है, होंठ सूख चुके हैं। वो अपने पति के सीने पे मासूमियत से बेहोश पड़ी है।)

(करण सिमरन को अपनी गोद में लिए हुए है, उसके बाल बिखरे हुए हैं,
उसकी साँसें धीमी हैं... लगभग बुझती हुई।)

करण (रोते हुए, टूटे स्वर में) बोला - 
“सिमरन... आँखें खोलो... प्लीज़...
देखो, मैं ठीक हूँ... तुमने मुझे बचा लिया...
सिमरन उठो ना।”

(वो उसके गालों को सहलाता है, पर कोई जवाब नहीं मिलता।)

करण (चीखते हुए) बोला - 
“नहीं!! तुम मुझसे दूर यूँ नहीं जा सकती सिमरन!
तुमने मुझसे वादा किया था... साथ निभाने का...
मैं तुम्हारे बिना नहीं जी पाऊंगा सिमरन।”

(उसके आँसू सिमरन के चेहरे पर गिर रहे हैं।
वो उसके सिर को अपने सीने से लगाता है, उसे कसकर पकड़ लेता है।)

“वो रो नहीं रहा था... वो टूट रहा था...
पहली बार एक अमर आत्मा ने मरने की तमन्ना की थी…”

(करण की आँखों में आँसू और लाल चमक दोनों एक साथ हैं।
उसकी साँसें तेज़ हो रही हैं, उसका शरीर काँप रहा है।)

करण (फूट-फूटकर रोते हुए) बोला - 
“मेरे हाथों से... मेरा प्यार मुझसे दूर जा रहा है...
हे ऊपरवाले... अगर तू है...
तो मेरी जान ले ले... पर मेरी सिमरन को लौटा दे...”

(उसकी आवाज़ जंगल में गूंजती है, पत्ते हिल उठते हैं, हवाओं की रफ्तार बढ़ जाती है।
करण सिमरन के चेहरे पर हाथ रखता है।)

करण (धीरे से फुसफुसाते हुए) बोला - 
“मुझे सज़ा चाहिए... लेकिन सिमरन को ज़िंदगी...”

(वो अपना हाथ काटता है — खून बहने लगता है।
वो अपना खून सिमरन के होंठों पर लगाता है, उसकी आँखों में आँसू हैं।)

“जिस खून ने किसी को मारा था,
आज वही किसी को ज़िंदा करने की कोशिश कर रहा था…”

(करण धीरे-धीरे उसके माथे को चूमता है।
उसका खून सिमरन के होंठों से अंदर जाता है।